बघेली

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बघेली या बाघेली, हिन्दी की एक बोली है जो भारत के बघेलखण्ड क्षेत्र में बोली जाती है। यह मध्य प्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, उमरिया, एवं शहडोल,अनूपपुर में; उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद एवं मिर्जापुर जिलों में तथा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर एवं कोरिया जनपदों में बोली जाती है। इसे "बघेलखण्डी", "रिमही" और "रिवई" भी कहा जाता है। वघेलखण्ड मे वघेली लोक गीत प्रचलित है, जिसके अंतर्गत सोहर, कजरी, जेवनार, अंजुरी, सुहाग, हिंदुली, बरुआ, आदि बड़े उत्साह के साथ गाये जाते हैं। यदि जंन-जातिय गीतों की बात की जाय तो छैला,कर्मा व भगत जैसे लोक गीत गाये जाते रहे हैं। आधुनिक युग(21वी सदी) में बघेली बोली में बहुत सारे युवा कमेडीयन बने हैं, जिसमे पंडित अविनाश ति़वारी, पूजा तिवारी, व लखन भैइया बहुत ही लोक प्रिय हैं। कविता के क्षेत्र में श्री रामलखन वघेल का नाम भला कौन बघेलखण्डी भूल सकता है।

बघेली शब्द -व्याकरण

हिंदी शब्दों का बघेली रूप

हिंदी-शब्द बघेली-शब्द

लोटा-लोटबा

गाय-गइया

लड़का-लड़िका

लड़की-लड़िकीबा

क्रिया-पद

होना-होब

खाना-खाब

जाना-जाब

करना-करब

बनना-बनब

आना-आउब

रहना-रहब।

कुछ महत्त्वपूर्ण सहायक-क्रियाएं


वर्तमान काल

है -हबय

है -हबय (इज)

हैं-हमय (आर)

हूँ-हयन(एम)

हो-हया(आर)

भूतकाल

था-ते(वाज)

थी-ते(वाज)

थे-ते(वर)

भविष्यकाल

होगा-होई

होगी-होई

होंगे-होंई।

सर्वनाम-शब्द

य-यह

व-वह

मैं-हम

तुम-तुम

आप-अपना

हम-हम पंचे

वह-उवा

वे-ऊँ

किधर-केंघा

क्या-का

कब-कबे

विशेषण-पद

छोटा-छोट

बड़ी-बड़ी

कैसा-कइसा

कारक-शब्द

ने-उआ

को -ओका

से-ओसे

को,लिए-ओका,ओके लाने
से,अलग होने के अर्थ में-ओसे

का,के,की-ओकर

में,पे,पर-ओमा,मा

संयोजक शब्द

और-अउर

और-अउर

और-अउर

दिनों के नाम

१.सोमवार-सम्मार

२.मंगल-मंगल

३.बुधवार-बुद्धवार

४.गुरुवार-बिहफैं

५.शुक्र-शुक्र

६.शनि-शनीचर

७.रविवार-अइतवार

बघेलखंडी से गिनती १ से १० तक

१.एक

२.दुइ

३.तीन

४.चार

५.पाँच

६.छै

७.सात

८.आठ

९.नौ

१०.दस(अशोक शुक्ल झिन्ना)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]