अजीत कौर
अजीत कौर | |
|---|---|
अजीत कौर (2015) | |
| मूल नाम | ਅਜੀਤ ਕੌਰ |
| जन्म | 16 नवम्बर 1934 |
| पेशा | लेखिका, उपन्यासकार, सामाजिक कार्यकर्ता |
| भाषा | पंजाबी |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| शिक्षा | एम.ए. (अर्थशास्त्र) |
| मातृ संस्था | दिल्ली विश्वविद्यालय |
| विधा | कथा साहित्य, आत्मकथा, संस्मरण |
| विषय | सामाजिक यथार्थ, महिला विमर्श, राजनीति |
| उल्लेखनीय कृतियाँ | खानाबदोश (आत्मकथा), गौरी, पोस्टमार्टम |
| संतानें | अर्पणा कौर (पुत्री) |
अजीत कौर (जन्म: 16 नवंबर 1934) एक भारतीय लेखिका हैं, जो मुख्य रूप से पंजाबी साहित्य में अपने योगदान के लिए जानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, नारी संघर्ष और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े विषय शामिल होते हैं। वे वर्तमान में जीवित और सक्रिय हैं, तथा वर्ष 2024 में उन्हें साहित्य के क्षेत्र में भारत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक 'साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता' (फेलोशिप) से सम्मानित किया गया है।[1]
साहित्य के अतिरिक्त, वे पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने नई दिल्ली में 'एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर' (AFAL) और 'फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर' (FOSWAL) की स्थापना की है।[2]

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
[संपादित करें]अजीत कौर का जन्म 16 नवंबर 1934 को अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लाहौर में हुई। 1947 में विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'खानाबदोश' में अपने जीवन के अनुभवों और संघर्षों का विवरण दिया है। उनकी एक पुत्री अर्पणा कौर हैं, जो भारत की एक जानी-मानी चित्रकार हैं।
साहित्यिक कार्य
[संपादित करें]अजीत कौर ने मुख्य रूप से पंजाबी में लेखन किया है। उनकी कई रचनाओं का हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
कहानी संग्रह
- कसाईबाड़ा
- गुलबानो
- महक दी मौत
- बुतशिकन
- फालतू औरत
- सावियां चिड़ियां
- मौत अली बाबे दी
- ना मारो
- नवम्बर 84
- काले कुएँ
- दास्तान एक जंगली राज की
उपन्यास
- धुप्प वाला शहर (धूप वाला शहर)
- पोस्टमार्टम
- गौरी
आत्मकथा
- खानाबदोश (पहला खंड)
- कूड़ा-कबाड़ा (दूसरा खंड)
संस्मरण और यात्रा वृतांत
अनुवाद एवं अन्य कार्य
- सीताकांत महापात्र और रमाकांत रथ की कविताओं का अनुवाद।
- साहित्य अकादमी के लिए कुलवंत सिंह विर्क पर एक मोनोग्राफ।
मीडिया रूपांतरण
[संपादित करें]उनकी रचनाओं पर आधारित दृश्य-श्रव्य कार्य भी हुए हैं। उनके कहानी संग्रह 'ना मारो' पर एक टीवी धारावाहिक बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, 'गुलबानो', 'चौखट' और 'मामी' पर टेली-फ़िल्में भी बनी हैं। अंग्रेजी में उनकी कहानियों का संग्रह 'डेड एंड' नाम से प्रकाशित हुआ है। उनकी कुछ पुस्तकें पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुई हैं।
पुरस्कार और सम्मान
[संपादित करें]साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें निम्नलिखित सम्मान प्राप्त हुए हैं:
- 1979: पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार
- 1983: पंजाबी अकादमी, दिल्ली का साहित्य पुरस्कार
- 1985: आत्मकथा 'खानाबदोश' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार[3]
- 1986: बाबा बलवंत अवार्ड
- 1989: भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार
- 2006: भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्म श्री[4]
- 2019: कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार (Kuvempu Rashtriya Puraskar)
- 2024: साहित्य अकादमी महत्तर सदस्यता (फ़ेलोशिप)
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "प्रतिष्ठित पंजाबी लेखिका अजीत कौर को साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता, अध्यक्ष ने किया सम्मानित". Amar Ujala. 20 दिसंबर 2024. अभिगमन तिथि: 20 मार्च 2026.
- ↑ "About Us: Foundation of SAARC Writers and Literature". FOSWAL. अभिगमन तिथि: 20 मार्च 2026.[मृत कड़ियाँ]
- ↑ "Akademi Awards (1955-2023) - Punjabi". Sahitya Akademi. अभिगमन तिथि: 20 मार्च 2026.
- ↑ "Adoor, Nilekani, Mahasveta among Padma awardees". Rediff News (अंग्रेज़ी भाषा में). 26 जनवरी 2006. अभिगमन तिथि: 20 मार्च 2026.