2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी

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सबप्राइम मोर्टगेज क्राइसिस
2009 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर को दिखाते हुए दुनिया का नक्शा.

2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी (या ग्रेट रिसेशन (भयंकर मंदी)[1][2]) एक गंभीर आर्थिक मंदी थी जो संयुक्त राज्य अमेरिका में दिसंबर 2007[3] में शुरू हुई और जून 2009 में समाप्त हुई (यू.एस. नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनोमिक रिसर्च के अनुसार)। [4] यह औद्योगिक दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में फैला जिसकी वजह से आर्थिक गतिविधियों स्पष्ट रूप से कमी आई। यह वैश्विक आर्थिक मंदी एक ऐसे आर्थिक माहौल में अपने पाँव पसारती रही है जिसकी पहचान विभिन्न प्रकार के असंतुलनों से होती है और 2007-2010 के वित्तीय संकट के प्रकोप से एकदम भड़क उठी. जुलाई 2009 में घोषणा की गयी कि काफी बड़ी संख्या में अर्थशास्त्रीयों मानना है कि आर्थिक मंदी संभवतः समाप्त हो गयी है।[5][6] हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका में अपेक्षित जीडीपी वृद्धि की लगातार दो तिमाहियों को वास्तव में 2009 के अंत से पहले नहीं देखा गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका में वित्तीय संकट का संबंध सरकार के प्रोत्साहन से वित्तीय संस्थानों द्वारा लापरवाही से कर्ज दिए जाने के चलन और रियल एस्टेट संबंधी बंधकों के प्रतिभूतिकरण की बढ़ती प्रवृत्ति से था।[7] अमेरिकी बंधक-समर्थित प्रतिभूतियों में, जहाँ इनका मूल्यांकन करने में काफी जोखिम था लेकिन दुनिया भर में इनकी मार्केटिंग की गयी थी। एक और अधिक बड़े पैमाने के क्रेडिट बूम ने रियल एस्टेट और शेयरों में वैश्विक सट्टेबाजी के बुलबुले को फलने-फूलने का मौक़ा दिया जिसने जोखिमपूर्ण कर्ज देने की प्रथाओं को बढ़ावा देने में मदद की। [8][9] तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी से हुई वृद्धि ने अनिश्चित वित्तीय स्थिति को और भी अधिक जटिल बना दिया था। 2007 में सब-प्राइम लोन के घाटों के बढ़ने से संकट की शुरुआत हुई और इसने अन्य जोखिम भरे ऋणों एवं संपत्तियों की अत्यधिक-बड़ी हुई कीमतों को उजागर किया। ऋण के घाटों के बढ़ने और 15 सितम्बर 2008 को लीमैन ब्रदर्स के पतन के साथ अंतर-बैंक ऋण बाजार पर एक बड़ी घबड़ाहट फ़ैल गयी। शेयरों और हाउसिंग की कीमतों में गिरावट के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में कई बड़े सुव्यवस्थित निवेश एवं वाणिज्यिक बैंकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा और यहाँ तक की वे दिवालियेपन की कगार तक पहुंच गए, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर सार्वजनिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गयी।

वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तेजी से गिरावट आई है, बेरोजगारी बढ़ रही है और उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में भारी कमी आई है। दिसंबर 2008 में राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो (एनबीईआर) ने यह घोषणा की थी कि संयुक्त राज्य अमेरिका दिसंबर 2007 के बाद से मंदी के दौर से गुजर रहा था।[10] कई अर्थशास्त्रियों ने यह भविष्यवाणी की थी कि 2011 तक इसमें सुधार नहीं देखा जा सकेगा और यह कि यह आर्थिक मंदी 1930 के दशक की भारी मंदी से भी बुरी होगी। [11][12] अर्थशास्त्र में नोबेल मेमोरियल पुरस्कार जीतने वाले पॉल रोबिन क्रुगमैन ने इस पर एक बार यह टिप्पणी की थी कि यह "एक दूसरी भारी मंदी" की शुरुआत जैसा मालूम होता है।[13] संकट की स्थिति तक की परिस्थितियाँ जिनकी विशेषता संपत्ति की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि और इससे जुडी आर्थिक मांग में एक बड़ी उछाल हैं, इन्हें आसानी से उपलब्ध ऋण की विस्तारित अवधि,[14] अपर्याप्त विनियमन और पर्यवेक्षण[15] या बढ़ती हुई असमानता[16] का नतीजा समझा जाता है।

इस आर्थिक मंदी ने आर्थिक मंदी की परिस्थितियों का सामना करने संबंधी कीनेशियन के आर्थिक विचारों में नए सिरे से रुचि जगा दी है। आर्थिक मंदी और वित्तीय जोखिमों से निबटने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में काफी ढील दी गयी है। अर्थशास्त्रियों की सलाह है कि स्टिमुलस (आर्थिक सहायता) को तभी वापस लिया जाना चाहिए जब अर्थव्यवस्थाएं इस हद तक संभल जाएं कि "एक स्थायी विकास का रास्ता दिखाई देने लगे".[17][18][19]

अनुक्रम

मंदी से पूर्व के आर्थिक असंतुलन[संपादित करें]

आर्थिक संकट की शुरुआत ने ज्यादातर लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। वर्ष 2009 में एक दस्तावेज/अखबार ने बारह ऐसे अर्थशास्त्रियों और टीकाकारों की पहचान की थी जिन्होंने 2000 और 2006 के बीच अमेरिका में उस समय के तेजी से बढ़ते हाउसिंग मार्केट के पतन पर आधारित एक आर्थिक मंदी की भविष्यवाणी की थी:[20] डीन बेकर, वेन गुडले, फ्रेड हैरिसन, माइकल हडसन, एरिक जेन्सजेन, स्टीव कीन, जैकब ब्रोश्नर मैडसेन एवं जेन्स जायेर सोरेंसन, कर्ट रिचेनबाशर, नौरियेल रॉबिनी, पीटर शिफ्फ़ और रॉबर्ट शिलर.[20]

विभिन्न असंतुलनों के बीच जहाँ अमेरिकी मौद्रिक नीति ने अत्यधिक धन सृजन के जरिये योगदान दिया जिसका नतीजा नकारात्मक घरेलू बचत और एक भारी अमेरिकी व्यापार घाटे, डॉलर की अस्थिरता और सार्वजनिक घाटे के रूप में सामने आया, निम्नलिखित पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है:

सामग्री की कीमतों में तेज उछाल[संपादित करें]

ब्रेंट बैरल पेट्रोलियम की वर्तमान कीमतें, मई 1987 - अप्रैल 2011.

2000 के दशक में विशेष रूप से उपयोगी वस्तुओं और हाउसिंग पर केंद्रित कीमतों में वैश्विक विस्फोट का नजारा देखा गया जिसने 1980-2000 की सामग्रियों की मंदी के अंत का संकेत दिया। 2008 में कई वस्तुओं, विशेषकर तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतें इतनी बढ़ गयीं कि इनसे एक वास्तविक आर्थिक नुकसान होता दिखाई दिया जिससे मुद्रास्फीति जनित मंदी और वैश्वीकरण के उल्टी दिशा में चलने का खतरा मंडराने लगा.[21]

जनवरी 2008 में कच्चे तेल की कीमतें पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गयीं जो वर्ष के दौरान कीमतों के मामले में कई बार मील का पत्थर पार करने के क्रम में पहला अवसर था।[22] जुलाई 2008 में कच्चा तेल 147.30 डॉलर[23] प्रति बैरल की चोटी पर पहुँच गया और गैसोलीन के एक गैलन की कीमत संयुक्त राज्य अमेरिका के ज्यादातर हिस्सों में 4 डॉलर से अधिक हो गयी थी। 2008 की चौथी तिमाही के आर्थिक संकुचन के कारण मांग में नाटकीय गिरावट आयी और वर्ष के अंत तक कीमतें 35 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गयीं। [23] कुछ लोगों का मानना है कि तेल की कीमतों में यह उछाल पीक ऑयल का एक नतीजा था।[24][अविश्वनीय स्रोत?] एक चिंता यह थी कि अगर अर्थव्यवस्था में सुधार होना था तो तेल की कीमतें मंदी से पहले के स्तरों पर वापस लौट सकती थीं।[25]

खाद्य पदार्थों और ईंधन संकट दोनों पर जुलाई 2008 में हुए 34वें जी-8 शिखर सम्मेलन में चर्चा की गयी थी।[26]

सल्फ्यूरिक एसिड (एक महत्त्वपूर्ण रासायनिक सामग्री जिसका उपयोग स्टील प्रोसेसिंग, तांबा उत्पादन और बायोइथेनॉल उत्पादन जैसी प्रक्रियाओं में होता है) की कीमतें एक वर्ष से भी कम समय में 3.5 गुना बढ़ गयी थीं जबकि सोडियम हाइड्रोऑक्साइड के उत्पादकों ने बाढ़ और कीमतों में जल्दी-जल्दी एक जैसी तीव्र वृद्धि के कारण फ़ोर्स मेजर की घोषणा कर दी थी।[27][28]

2008 की दूसरी छमाही में वैश्विक आर्थिक मंदी में कम मांग की उम्मीदों के आधार पर ज्यादातर वस्तुओं की कीमतें नाटकीय रूप से गिर गयीं। [29]

हाउसिंग का बुलबुला[संपादित करें]

1975 और 2010 के बीच यूके में घरों की कीमतें.

2007 तक रियल एस्टेट का बुलबुला अब भी दुनिया के कई हिस्सों,[30] विशेष रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त अरब अमीरात, इटली, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, स्पेन, फ्रांस, पोलैंड,[31] दक्षिण अफ्रीका, इसराइल, ग्रीस, बुल्गारिया, क्रोएशिया,[32] कनाडा, नॉर्वे, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, फिनलैंड, अर्जेंटीना,[33] बाल्टिक राज्यों, भारत, रोमानिया, रूस, यूक्रेन और चीन में बनता दिखाई दे रहा था।[34] अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष एलन ग्रीनस्पैन ने 2005 के मध्य में कहा था कि "यहाँ कम से कम (अमेरिकी हाउसिंग मार्केट में) एक छोटा सा झाग है।.. यह देखना मुश्किल नहीं है कि इस तरह के बहुत सारे स्थानीय बुलबुले मौजूद हैं".[35] इसी दौरान इस विषय पर लिखते हुए इकोनोमिस्ट पत्रिका ने कुछ और आगे बढ़कर कहा "दुनिया भर में हाउसिंग की कीमतों में हो रही वृद्धि इतिहास का सबसे बड़ा बुलबुला है".[36] रियल एस्टेट के बुलबुले ("बुलबुला" शब्द की परिभाषा के अनुसार) के बाद कीमतों में गिरावट (जिसे हाउसिंग प्राइस क्रैश के रूप में भी जाना जाता है) जिसके परिणाम स्वरूप कई मालिकों को नकारात्मक इक्विटी पर निवेश बनाए रखना पड़ सकता है (संपत्ति के वर्त्तमान मूल्य से कहीं ज्यादा बंधक ऋण)।

मुद्रास्फीति[संपादित करें]

फरवरी 2008 में रायटर ने यह रिपोर्ट दी कि वैश्विक मुद्रास्फीति अपने ऐतिहासिक स्तर पर थी और यह कि घरेलू मुद्रास्फीति कई देशों में 10-20 वर्षों के उच्चतम स्तर पर थी।[37] "दुनिया भर में धन की अत्यधिक आपूर्ति, वित्तीय संकट को वश में करने के लिए फेड द्वारा धन की व्यवस्था, एशिया में आसान मौद्रिक नीति के जरिये तीव्र विकास, सामग्रियों में अटकलें, कृषि की विफलता, चीन से आयात की बढ़ती कीमतें और तेजी से उभरते हुए बाज़ारों में खाद्य पदार्थों एवं उपभोक्ता वस्तुओं (कमोडिटीज) की बढ़ती हुई मांग" को मुद्रास्फीति के संभावित कारणों के रूप में नामित किया गया है।[38]

2007 के मध्य में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों ने यह संकेत दिया था कि मुद्रास्फीति तेल निर्यातक देशों में सबसे अधिक थी, जिसका कारण काफी हद तक विदेशी मुद्रा भंडार का अनस्टेरिलाइज्ड (अबाध्य) विकास था, यहाँ "अनस्टेरिलाइज्ड" शब्द का मतलब मौद्रिक नीति के कार्यान्वयन में कमी से है जो किसी देश की मौद्रिक नीति के लक्ष्य को बरकरार रखने के क्रम में विदेशी विनिमय के हस्तक्षेप को काफी बढ़ा सकता है। हालांकि मुद्रास्फीति अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा तेल और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि के मामले में "गैर-तेल निर्यातक एलडीसी (न्यूनतम विकसित देशों) और "विकासशील एशिया" के रूप में वर्गीकृत देशों में भी बढ़ रही थी।[39]

मुद्रास्फीति विकसित देशों में भी बढ़ रही थी,[40][41] लेकिन यह बढ़त विकासशील देशों की तुलना में कहीं कम थी।

कारण[संपादित करें]

गंभीर परिसंपत्ति बुलबुला:[42] केन्द्रीय बैंक का गोल्ड रिजर्व – $0.845 ट्रिलियन.एमओ (पेपर मनी) - - $3.9 ट्रिलियन. पारंपरिक (फ्रैक्षनल रिजर्व) बैंकिंग परिसंपत्तियां - $39 ट्रिलियन. शैडो बैंकिंग परिसंपत्तियां - $62 ट्रिलियन. अन्य परिसंपत्तियां - $290 ट्रिलियन.बेल-आउट मनी (2009 की शुरुआत में) - $1.9 ट्रिलियन.

उत्पत्ति पर बहस[संपादित करें]

उत्पत्ति के बारे में केंद्रीय बहस, संबंधित सार्वजनिक मौद्रिक नीति (विशेष रूप से अमेरिका में) और निजी वित्तीय संस्थाओं की कार्य प्रणालियों द्वारा निभाई गयी भूमिकाओं पर केंद्रित है।

15 अक्टूबर 2008 को एंथोनी फैओला, एलेन नकाशिमा और जिल ड्रयू ने द वाशिंगटन पोस्ट में "व्हाट वेंट रांग" शीर्षक से एक विस्तृत आलेख लिखा.[43] अपनी तहकीकात में लेखकों ने यह दावा किया था कि फेडरल रिज़र्व के पूर्व अध्यक्ष एलेन ग्रीनस्पान, कोष सचिव रॉबर्ट रुबिन और एसईसी चेयरमैन आर्थर लेविट ने डेरीवेटिव्ज़ के नाम से जाने जानेवाली वित्तीय सुविधाओं के नियमन का ज़बरदस्त प्रतिरोध किया था। आगे उन्होंनें दावा किया कि ग्रीनस्पान ने सक्रिय रूप से कामोडिटी वायदा कारोबार आयोग के कार्यालय को कमज़ोर करने का प्रयास किया था, विशेष रूप से तब, जब ब्रूक्सले ई. बोर्न के नेतृत्व में आयोग ने डेरीवेटिव्ज़ को विनियमित करने की पहल करने की कोशिश की थी। अंततः एक विशेष प्रकार के डेरीवेटिव, बंधक-आधारित प्रतिभूति में अचानक गिरावट से 2008 के आर्थिक संकट को तेज़ करने की शुरुआत हो गयी।

हालांकि फेडेरल रिज़र्व के अध्यक्ष की हैसियत से ग्रीनस्पान की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गयी है (विवाद का मुख्य बिंदु फेडेरल फंड की दर को एक वर्ष से अधिक समय तक केवल 1% तक नीचे करना है जिसने, ऑस्ट्रियन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के अनुसार वित्तीय प्रणाली में भारी मात्रा में "आसान" ऋण-आधारित धन पहुंचा दिया और इस तरह एक अवहनीय अस्थायी आर्थिक तेज़ी का सृजन किया),[44][45] लेकिन एक तर्क यह भी है कि 2002-2004 के वर्षों में ग्रीनस्पान की कार्यवाहियाँ वास्तव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को डॉट-कॉम के बुलबुले के फटने के कारण वर्ष 2000 की शुरुआत में आई मंदी से बाहर निकालने की ज़रूरत को देखते हुए उठाये गए कदम थे - हालांकि ऐसा करके उन्होंने इस संकट को समाप्त करने में मदद नहीं की बल्कि इसे कुछ समय के लिए टाल दिया। [46][47]

कुछ अर्थशास्त्रियों - ऑस्ट्रियन स्कूल और मंदी की भविष्यवाणी करने वाले जैसे कि स्टीव कीन का दावा है कि 2007-2010 के भारी आर्थिक संकट की उत्पत्ति के चरम बिंदु को बुरी तरह से ऋण ग्रस्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तलाशा जा सकता है। 2006 में रियल स्टेट बाज़ार का पतन संकट की उत्पत्ति निकटतम बिंदु था। सबप्राइम बंधकों की गिरती दरें ध्वस्त होने के कगार पर पहुँच चुके ऋण संबंधी उछाल और एक रियल स्टेट के सदमे के शुरुआती लक्षण थे। लेकिन सबप्राइम बंधकों के बकाएदारों की बढ़ती दरों को संकट की गंभीरता के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. बल्कि निम्न गुणवत्ता वाले बंधकों ने पूरी वित्तीय प्रणाली में फैली आग में घी की तरह काम किया। वित्तीय प्रणाली इस संकट से जुड़े कई विशेष पहलुओं के कारण कमज़ोर हो गयी थी: बैंक के बैलेंस शीटों से संपत्तियों को बाज़ार में स्थानांतरित करना, जटिल और अपारदर्शी संपत्तियों का सृजन, ऐसी संपत्तियों के जोखिम का उचित मूल्यांकन करने और उचित मूल्य के लेखांकन को लागू करने में रेटिंग एजेंसियों की विफलता. अब इन नवीन कारकों में प्रकट हो रही कमजोरियों को पहचानने और इन्हें सुधारने में नियामकों और निरीक्षकों की प्रमाणित असफलता को भी जोड़ा जाना चाहिए। [48]

रॉबर्ट रीच ध्यान दिलाते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ऋण की मात्रा को आर्थिक असमानता में खोजा जा सकता है; जहाँ मध्यम वर्ग की मजदूरी स्थिर बनी हुई थी जबकि शीर्ष स्तर पर दौलत इकट्ठी हो रही थी और परिवारों ने "अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए इक्विटी को घरों से निकालकर अपने ऊपर ज़रूरत से ज्यादा क़र्ज़ लाद लिया था।"[49]

प्रभाव[संपादित करें]

समीक्षा[संपादित करें]

वर्ष 2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दर्ज की गई सबसे खराब आर्थिक संकुचन का रूप ले रही है।[50]

  • वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2008 की तीसरी तिमाही से संकुचित होनी शुरू हुई और 2009 की शुरुआत तक इस वार्षिक गति से कम हो रही थी जैसा कि 1950 के दशक के बाद से नहीं देखा गया था।[51]
  • पूंजी निवेश जो कि 2008 की तीसरी तिमाही से साल दर साल उतार पर था, 2009 की पहली तिमाही में युद्ध के बाद 1957-58 के रिकॉर्ड की बराबरी पर पहुँच गया था। आवासीय निवेश में गिरावट की गति में 2009 की पहली तिमाही में तेज़ी आने लगी जो साल दर साल 23.2% के दर से गिरी, यह पिछली तिमाही की तुलना में लगभग चार प्रतिशत अंक अधिक तेज थी।
  • घरेलू मांग लगातार पाँच तिमाहियों तक गिरने पर भी अभी 1974-75 के रिकार्ड से तीन माह कम है लेकिन 2.6% प्रति तिमाही की गिरावट पिछली कालावधि में 1.9% के मुकाबले - पहले से ही रिकार्ड तोड़ है।

नीतिगत प्रतिक्रियाएं[संपादित करें]

संकट का वित्तीय चरण कई राष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों में आपातकालीन हस्तक्षेप का कारण बना। जैसे-जैसे संकट कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में वास्तविक आर्थिक मंदी के रूप में विकसित हुआ आर्थिक वृद्धि को पुनर्जीवित करने के लिए आर्थिक स्टिमुलस (उद्दीपन) सबसे आम नीतिगत उपाय बन गया। बैंकिंग प्रणाली में राहत योजनाओं को कार्यान्वित करने के बाद प्रमुख विकसित और उभरते हुए देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को राहत देने की योजना की घोषणा की। आर्थिक प्रोत्साहन योजना की घोषणा विशेष रूप से चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ में गयी थी।[52] अमेरिका, यूरोपीय संघ और भारत में लड़खड़ाते हुए या खतरे का सामना कर रहे कारोबारों को आर्थिक सहायता पैकेज दिए गए या इस पर चर्चा की गयी।[53] 2008 की अंतिम तिमाही में आर्थिक संकट ने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के जी-20 समूह को आर्थिक और वित्तीय आपदा प्रबंधन के केंद्र के रूप में एक नया सम्मान हासिल करते हुए देखा.

आई। एम.एफ. की सिफारिश[संपादित करें]

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई। एम.एफ.) ने कहा था कि बेरोज़गारी में एक भारी कमी के बग़ैर वित्तीय संकट का अंत नहीं होगा, क्योंकि दुनिया भर में 30 मिलियन (तीन करोड़) लोग बेरोजगार हैं। आई। एम.एफ. ने सरकारों से सामजिक सुरक्षा जाल को विस्तृत करने और रोज़गार सृजन के उपाय करने का आग्रह किया बावजूद इसके कि वे खर्च कटौती के दबाव में हैं। सरकारों को बेरोजगारों के कौशल प्रशिक्षण में निवेश करना चाहिए और यहाँ तक की बड़े ऋण खतरे से जूझ रहे ग्रीस जैसे देश की सरकार को भी पहले रोज़गार सृजन करके दीर्घावधि आर्थिक बहाली पर ध्यान देना चाहिए। [54]

संयुक्त राज्य अमेरिका की नीतिगत प्रतिक्रियाएं[संपादित करें]

फेडरल रिज़र्व, वित्त विभाग और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने संकट में हस्तक्षेप करने के लिए 19 सितम्बर को कई कदम उठाए. मुद्रा बाज़ार के म्युचुअल फंड से संभावित निकासी को रोकने के क्रम में वित्त विभाग ने निवेश को सुरक्षा देने के लिए 19 सितम्बर को 50 बिलियन डॉलर की एक नई योजना की घोषणा की जो फेडरल डिपोजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एफडीआईसी) कार्यक्रम के समान थी।[55] घोषणा के एक हिस्से में सेक्शन 23ए और 23बी (रेगुलेशन डब्ल्यू) का अस्थाई अपवाद भी शामिल था जिसने वित्तीय समूहों को अपने समूह में आसानी से फंड की साझेदारी करने की अनुमति दी। यह अपवाद 30 जनवरी 2009 को समाप्त हो जाएगा अगर फेडरल रिज़र्व बोर्ड द्वारा इसे बढ़ा न दिया जाए.[56] प्रतिभूति और विनिमय आयोग नें 799 वित्तीय शेयरों की शॉर्ट सेलिंग को निलंबित करने की घोषणा की, साथ ही बंधक संकट की प्रतिक्रिया में खुली शॉर्ट सेलिंग के खिलाफ कार्रवाई करने की भी घोषणा की। [57]

यूएस 401(के) और सेवानिवृत्ति योजनाओं में बाजारी अस्थिरता[संपादित करें]

2006 के अमेरिकी पेंशन संरक्षण अधिनियम में एक नियम शामिल था जिसने सेवानिवृत्ति योजनाओं के लिए क्वालिफाइड डिफॉल्ट इनवेस्टमेंट (क्यूडीआई) की परिभाषा को स्थिर मूल्य निवेशों, मुद्रा बाज़ार के फंडों और नक़द निवेश के स्थान पर ऐसे निवेशों में बदल दिया जिसने किसी व्यक्ति की सेवानिवृत्ति की बची उम्र के आधार पर शेयरों के उचित स्तर और बांडों के जोखिम को बेनकाब कर दिया। इस अधिनियम में यह अपेक्षित था कि जिन्होंने कभी भी सक्रिय रूप से अपने निवेश का चुनाव नहीं किया था और मूलभूत निवेश विकल्प में योगदान किया था, योजना प्रायोजक उन व्यक्तियों की संपत्तियों को स्थानांतरित कर सकते हैं। इसका मतलब यह था कि वैसे व्यक्ति जिन्होंने कम अस्थिर या वृद्धि वाले नक़द फंड में धन निवेशित किया था उनके एकाउंट बैलेंसों को शीघ्र ही अधिक आक्रामक निवेशों में लगाया जा सकता था।

2008 की शुरुआत में ज्यादातर अमेरिकी नियोक्ता-प्रायोजित योजनाओं ने अपने कर्मचारियों को नोटिस भेजे जिसमें उन्हें सूचना दी गयी कि मूलभूत निवेश योजना अब नक़द/स्थिर विकल्प के स्थान पर कुछ नए स्वरूप में बदल रही है जैसे कि सेवानिवृत्ति तिथि फंड जो काफी मात्रा में बाज़ार संबंधी जोखिम के लिए खुला था। ज़्यादातर हिस्सेदारों ने सितम्बर और अक्टूबर तक इन नोटिसों को नज़रंदाज़ किया जब बाज़ार कि धमाकेदार गिरावट की खबर हर समाचार केंद्र और मीडिया केंद्र पर नहीं आने लगी. इसके बाद सहभागियों ने अपने 401(के) और सेवानिवृत्ति योजना प्रदाताओं से संपर्क करना शुरू किया और कुछ मामलों में 30% से भी अधिक घाटा होने का पता चला. 401 (के) प्रदाताओं के कॉल सेंटर में रिकॉर्ड कॉल संख्या और प्रतीक्षा समय दर्ज किया गया क्योंकि लाखों अनुभवहीन निवेशक यह जानने के लिए संघर्ष कर रहे थे कि किस तरह उनकी स्पष्ट इजाज़त के बिना उनका निवेश बुनियादी रूप से इतना बदल दिया गया और दहशत भरी प्रतिक्रिया में शेयर या बांड के जोखिम वाली हर चीज़ को बेच दिया गया जिसके कारण उनको अपने खातों में भारी नुकसान उठाना पड़ा.

बाज़ार में अटकलबाजी और अनिश्चितता के कारण परिचर्चा फोरम या गोष्ठियों में संपत्ति को बेचने या न बेचने के बारे में प्रश्नों की भरमार लग गयी[58] और वित्तीय गुरु सेवानिवृत्ति खातों में बची रक़म को हासिल करने और उसे बचाने के सही कदम के बारे में किये गए सवालों के सैलाब में डुबो दिए गए। 2008 की तीसरी तिमाही के दौरान शेयरों और बांडों में निवेशित 72 बिलियन डॉलर से अधिक के म्युचुअल फंड निवेश को छोड़कर अक्टूबर के महीने में स्थाई मूल्य के निवेशों में लगा दिया गया।[59] वित्तीय विशेषज्ञों की सलाह के विपरीत और हर तरह के बाज़ार में लम्बी अवधि के संतुलित निवेश में सकारात्मक लाभ के विवरण देने वाले एतिहासिक आंकड़ों को नज़रंदाज़ करते हुए उन निवेशकों ने भी जिनकी सेवानिवृत्ति में कई दशक बचे थे,[60] शेयर बाज़ार के इतिहास में सबसे बड़ी गिरावट के दौरान भी अपनी शेयर पूँजी को बेच डाला.

संपत्ति-समर्थित वाणिज्यिक दस्तावेज के लिए बैंकों को ऋण[संपादित करें]

मुद्रा बाजार कंपनियों को किस प्रकार धन मुहैया करवाते हैं।

19 सितंबर 2008 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान मुद्रा बाजार म्युचुअल फंडों ने निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में धन की निकासी को अनुभव करना शुरू कर दिया था। इसने एक काफी बड़ा जोखिम पैदा कर दिया क्योंकि मुद्रा बाजार के फंड हर तरह के कॉरपोरेशनों के चालू वित्तपोषण का अभिन्न अंग हैं। व्यक्तिगत निवेशक मुद्रा बाजार के फंडों को धन उधार देते हैं जो फिर संपत्ति-समर्थित वाणिज्यिक पत्र (एबीसीपी) नामक कॉरपोरेट अल्पकालिक प्रतिभूतियों के बदले में निगमों को धन उपलब्ध कराते हैं। हालांकि कुछ ख़ास मुद्रा बाजार फंडों पर बैंकों में अपना धन वापस लेने की संभावित होड़ शुरू हो चुकी थी। अगर यह स्थिति और बिगड़ जाती तो बड़े निगमों द्वारा एबीसीपी के आधार पर अल्पकालिक ऋण लेने की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हो जाती. संपूर्ण प्रणाली में नकदी की सहायता के माध्यम से मदद करने के लिए अमेरिकी वित्त विभाग और और फेडरल रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि बैंक एबीसीपी को आनुषांगिक के रूप में इस्तेमाल कर फेडरल रिजर्व के डिस्काउंट विंडो के जरिये धन प्राप्त कर सकते हैं।[55][61]

फेडरल रिजर्व की प्रतिक्रिया[संपादित करें]

फेडरल रिजर्व की दर में परिवर्तन (1 जनवरी 2008 के तुरंत बाद का डाटा)
तिथि छूट दर छूट दर छूट दर फेडरल फंड फेड फंड्स दर
प्राथमिक द्वितीयक

|- ! !! परिवर्तन की दर!! नई ब्याज दर!! नई ब्याज दर!! परिवर्तन की दर!! नई ब्याज दर |- | अक्टूबर 8, 2008* || -0.50% || 1.75% || 2.25% || -0.50% || 1.50% |- | अप्रैल 30, 2008 || -0.25% || 2.25% || 2.75% || -0.25% || 2.00% |- | मार्च 18, 2008 || -0.75% || 2.50% || 3.00% || -0.75% || 2.25% |- | मार्च 16, 2008 || -0.25% || 3.25% || 3.75% || || |- | जनवरी 30, 2008 || -0.50% || 3.50% || 4.00% || -0.50% || 3.00% |- | जनवरी 22, 2008 || -0.75% || 4.00% || 4.50% || -0.75% || 3.50% |}

- *मुख्य सेन्ट्रल बैंकों द्वारा 50 बेसिस अंक की एक समन्वित वैश्विक कटौती का एक हिस्सा.[62]

- अधिक विस्तृत अमेरिकी फेडरल डिस्काउंट रेट चार्ट को देखें:[63]

कानून[संपादित करें]

संयुक्त राज्य अमेरिका के ट्रेजरी (खज़ाना) सचिव, हेनरी पॉलसन और राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने बंधक-समर्थिक सिक्योरिटीज के बाजार में और इसमें हिस्सा लेने वाली वित्तीय कंपनियों में आत्मविश्वास बढाने की उम्मीद में वित्तीय कंपनियों से 700 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक के "संकट ग्रस्त बंधक-संबंधी संपत्तियों" को सरकार द्वारा खरीदे जाने के लिए क़ानून बनाने का प्रस्ताव किया।[64] नेताओं और प्रशासन के बीच बहस, सुनवाई और विधायी बैठकों ने बाद में यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस द्वारा अनुमोदित किये जाने से पहले इस प्रस्ताव को महत्त्वपूर्ण बदलावों की प्रक्रिया से गुजारा जाएगा.[65] 1 अक्टूबर को एक संशोधित समझौता संस्करण को सीनेट द्वारा 74-25 वोट से मंजूरी दी गयी। एचआर1424 नमक इस बिल को संसद द्वारा 3 अक्टूबर 2008 को पारित कर दिया गया और एक कानून के रूप में इस पर हस्ताक्षर कर दिया गया। बेलआउट राशि के पहले आधे हिस्से को संकट ग्रस्त बंधक संपत्तियों की बजाय बैंकों में रखे पसंदीदा स्टॉक (शेयरों) को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया।[66]

जनवरी 2009 में ओबामा प्रशासन ने अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए दो वर्षों में 3.6 लाख से अधिक नौकरियों का सृजन करने या इन्हें बचाने के इरादे से एक प्रोत्साहन योजना (स्टिमुलस प्लान) की घोषणा की। इस शुरुआती सुधार योजना की लागत 825 बिलियन डॉलर (जीडीपी का 5.8%) अनुमानित की गयी थी। इस योजना में स्वास्थ्य प्रणाली में महत्त्वपूर्ण नीतियों और सुधार पर 365.5 बिलियन डॉलर, उल्लेखनीय रूप से अक्षय ऊर्जा में निवेश करने वाले परिवारों और कंपनियों को पुनर्वितरण के लिए 275 बिलियन (करों में छूट के माध्यम से), बेरोजगारों और परिवारों के लिए सामाजिक सहायता के लिए समर्पित 94 बिलियन, मेडिकएड के स्वास्थय संबंधी खर्चों के लिए राज्यों को मदद के रूप में 87 बिलियन का प्रत्यक्ष सहयोग और अंत में डिजिटल तकनीकों तक पहुँच में सुधार करने के लिए 13 बिलियन डॉलर खर्च किया जाना शामिल था। प्रशासन ने ऑटोमोबाइल निर्माताओं जनरल मोटर्स और क्रिसलर को भी 13.4 बिलियन डॉलर की सहायता पहुँचाई है लेकिन इस योजना को प्रोत्साहन योजना में शामिल नहीं किया गया है।

इन योजनाओं को और अधिक आर्थिक संकुचन को दूर करने के मकसद से तैयार किया गया था, हालांकि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के पिछली आर्थिक मंदियों से अलग होने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कई घटकों जैसे कि निर्माण, टेक्सटाइल्स और तकनीकी विकास को अन्य देशों में आउटसोर्स किया जा रहा है। ओबामा प्रशासन द्वारा उल्लिखित आर्थिक सुधार योजना के साथ संबद्ध सार्वजनिक कल्याण परियोजनाओं का स्तर सड़क और पुल विकास परियोजनाओं के अभाव कमी के कारण गिरा दिया गया है जो ग्रेट डिप्रेशन में प्रचुर मात्रा में मौजूद थे, लेकिन अब ज्यादातर का निर्माण हो चुका है और इनमें से ज्यादातर के लिए रखरखाव को कायम रखने की जरूरत है। बाजार की स्थिरता और विश्वास को कायम करने के लिए विनियमों को ओबामा की योजना में नज़रअंदाज कर दिया गया है और इन्हें अब भी शामिल किया जाना बाकी है।

फेडरल रिजर्व की प्रतिक्रिया[संपादित करें]

वाणिज्यिक बैंकों के लिए उपलब्ध धनराशि में वृद्धि और फेड फंड दर को गिराने के प्रयास में 29 सितंबर को अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी टर्म ऑक्शन फैसिलिटी को दुगुना कर 300 बिलियन डॉलर करने की घोषणा की थी। क्योंकि उस समय यूरोप में अमरीकी डॉलर की कमी दिखाई दे रही थी इसीलिये फेडरल रिजर्व ने यह भी घोषणा की कि वह विदेशी सेन्ट्रल बैंकों के साथ अपनी स्वैप सुविधाओं को भी 290 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 620 बिलियन डॉलर कर देगा। [67]

24 दिसम्बर 2008 तक फेडरल रिजर्व ने अपने स्वतंत्र अधिकारों का इस्तेमाल विभिन्न वित्तीय संपत्तियों की खरीद पर 1.2 ट्रिलियन डॉलर की धनराशि खर्च करने और फेडरल बजट से कांग्रेस द्वारा अधिकृत 700 बिलियन डॉलर से अधिक और इससे कहीं ज्यादा के वित्तीय संकट का सामना करने के लिए आपातकालीन ऋण की व्यवस्था करने के लिए किया था। इसमें बैंकों, क्रेडिट कार्ड कंपनियों और सामान्य व्यवसायों, बंधक समर्थित सिक्योरिटीज के लिए ट्रेजरी बिलों के अस्थायी स्वैपों, बीयर स्टीयर्न्स की बिक्री और अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रूप (एआईजी) के बेलआउट, फैनी माई एवं फ्रेडी माइक और सिटीग्रूप के लिए आपातकालीन ऋण शामिल था।[68]

एशिया-प्रशांत की नीतिगत प्रतिक्रियाएं[संपादित करें]

15 सितंबर 2008 को चीन ने 2002 के बाद से पहली बार अपने ब्याज दरों में कटौती की। इंडोनेशिया ने अपने ओवरनाइट रेपो रेट को दो प्रतिशत अंक घटाकर 10.25 प्रतिशत पर ला दिया, यह वही दर है जिसपर वाणिज्यिक बैंक सेन्ट्रल बैंक से ओवरनाइट फंड उधार ले सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक ने बैंकिंग प्रणाली में तकरीबन 1.5 बिलियन की धनराशि डाली जो बाजार की अनुमानित आवश्यकता से करीब तीन गुना ज्यादा थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने पुनार्वित्तीय ऑपरेशन के जरिये लगभग 1.32 बिलियन का योगदान किया, यह कम से कम एक महीन में सबसे अधिक था।[69] 9 नवम्बर 2008 को 2008 की चीनी आर्थिक प्रोत्साहन योजना पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की केन्द्रीय सरकार द्वारा घोषित 4 ट्रिलियन आरएमबीयुआन (RMB¥) (586 बिलियन डॉलर) का एक स्टिमुलस पैकेज है जो विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को वैश्विक वितीय संकट से बचाने के लिए उनके द्वारा उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। सरकार की वेबसाइट पर एक बयान में कहा गया कि स्टेट काउंसिल ने वर्ष 2010 के अंत तक बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और सामाजिक कल्याण में 4 ट्रिलियन युआन (586 अरब डॉलर) के निवेश की एक योजना को मंजूरी दी थी। इस स्टिमुलस पैकेज को हाउसिंग, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा, पर्यावरण, उद्योग, आपदा पुनर्निर्माण, आमदनी बढाने, करों में कटौती और वित्तीय सहायता जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा.

चीन की निर्यात प्रेरित अर्थव्यवस्था ने संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में आर्थिक मंदी के प्रभाव को महसूस करना शुरू कर दिया है और सरकार ने आर्थिक विस्तार में अपनी दावेदारी के लिए पहले ही दो महीने से भी कम समय में प्रमुख ब्याज दरों में तीन बार कटौती कर दी है। 28 नवम्बर 2008 को चीनी जनवादी गणराज्य के वित्त मंत्रालय और कराधान के राज्य प्रशासन ने संयुक्त रूप से कुछ श्रम-प्रधान वस्तुओं पर निर्यात कर में छूट की दरों में वृद्धि की घोषणा की थी। इन अतिरिक्त कर छूटों को 1 दिसम्बर 2008 से लागू किया जाना था।[70]

विश्व भर के नेताओं और विश्लेषकों ने इस स्टिमुलस पैकेज का स्वागत किया था क्योंकि यह उनकी उम्मीद से ज्यादा था और यह अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक संकेत था, इस तरह चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में मदद कर रहा है। इस प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की खबर से दुनिया भर के बाजारों में तेजी आ गयी। हालांकि 16 जनवरी को मार्क फैबर ने कहा कि उनके अनुसार चीन आर्थिक मंदी के दौर में था।

ताइवान में सेन्ट्रल बैंक ने 16 सितंबर 2008 को कहा कि यह आठ सालों में पहली बार अपने आवश्यक आरक्षित अनुपात में कटौती करेगा। सेन्ट्रल बैंक ने उसी दिन विदेशी-मुद्रा इंटरबैंक मार्केट में 3.59 बिलियन डॉलर की धनराशि डाल दी। बैंक ऑफ जापान ने 17 सितंबर 2008 को वित्तीय प्रणाली में 29.3 बिलियन डॉलर की धनराशि का प्रवेश कराया और ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक ने उसी दिन 3.45 बिलियन डॉलर की धनराशि का समावेश किया।[71]

विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वैश्विक संकट की प्रतिक्रियाओं में मुख्य रूप से कम दरों वाली मौद्रिक नीति (मुख्य रूप से एशिया और मध्य पूर्व में) के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले मुद्रा का अवमूल्यन की बातें शामिल थीं। कुछ एशियाई देशों, मध्य पूर्व और अर्जेंटीना में भी प्रोत्साहन योजनाएं लाई गयी थीं। एशिया में आम तौर पर योजनाओं की राशि जीडीपी के 1 से 3% के रूप में थी जिसमें चीन एक उल्लेखनीय अपवाद था जिसने अपनी जीडीपी के 16% (प्रति वर्ष जीडीपी का 6%) की धनराशि की योजना की घोषणा की थी।

यूरोपीय नीतिगत प्रतिक्रियाएं[संपादित करें]

सितंबर 2008 तक यूरोपीय नीतिगत उपायों को कुछ ही देशों (स्पेन और इटली) तक सीमित रखा गया था। दोनों देशों में इस तरह के उपाय हाउसिंग जैसे विशेष क्षेत्रों की मदद के लिए कर प्रणाली में घरेलू (करों में छूट) सुधार के प्रति समर्पित थे। सितंबर से, जब वित्तीय संकट ने अर्थव्यवस्था को गंभीरता से प्रभावित करना शुरू कर दिया तब कई देशों ने विशिष्ट उपायों की घोषणा की: जर्मनी, स्पेन, इटली, नीदरलैंड, ब्रिटेन, स्वीडन.: के रूप में को किया, कई देशों के विशिष्ट उपायों की घोषणा की। यूरोपीय आयोग ने विभिन्न देशों द्वारा यूरोपीय स्तर पर लागू किये जाने के लिए 200 बिलियन यूरो की प्रोत्साहन योजना का प्रस्ताव किया। 2009 की शुरुआत में ब्रिटेन और स्पेन ने अपनी प्रारंभिक योजनाएं पूरी कर ली जबकि जर्मनी ने एक नई योजना की घोषणा की।

यूरोपियन सेंट्रल बैंक ने एक-दिवसीय मनी-मार्केट ऑक्शन में 99.8 बिलियन डॉलर का प्रवेश कराया. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने 36 बिलियन डॉलर की राशि का योगदान किया। कुल मिलाकर दुनिया भर में सेन्ट्रल बैंकों ने 17 सितंबर को शुरू हुए सप्ताह से 200 बिलियन डॉलर से अधिक का समावेश किया।[71]

29 सितंबर 2008 को बेल्जियम, लक्समबर्ग और डच अधिकारियों ने फोर्टिस का आंशिक राष्ट्रीयकरण किया। जर्मन सरकार ने हाइपो रियल एस्टेट को बेल आउट किया।

8 अक्टूबर 2008 को ब्रिटिश सरकार ने तकरीबन 500 बिलियन पाउंड (उस समय 850 बिलियन डॉलर) के एक बैंक बचाव पैकेज की घोषणा की। [72] यह योजना तीन भागों में हैं। सबसे पहले 200 बिलियन पाउंड की राशि बैंक ऑफ इंग्लैण्ड की स्पेशल लिक्विडिटी स्कीम में बैंकों को उपलब्ध कराई जायेगी. दूसरा, सरकार बैंक पुनर्पूंजीकरण कोष (बैंक रीकैपिटलाइजेशन फंड) के माध्यम से बैंकों के बाजार पूंजीकरण को बढ़ाएगी जिसमें शुरुआत में 25 बिलियन पाउंड की राशि और दूसरी 25 बिलियन पाउंड की राशि जरूरत पड़ने पर प्रदान की जायेगी. तीसरा, सरकार ब्रिटिश बैंकों के बीच तकरीबन 250 बिलियन पाउंड तक के किसी भी पात्र ऋण को अस्थायी तौर पर सहमति प्रदान करेगी। फ़रवरी 2009 में सर डेविड वॉकर को बैंकों के कॉरपोरेट प्रशासन में एक सरकारी जाँच का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया गया।

दिसंबर की शुरुआत में जर्मन वित्त मंत्री पीयर स्टेनब्रक ने संकेत दिया कि वे एक "बड़ी बचाव योजना (ग्रेट रेस्क्यू प्लान)" पर विश्वास नहीं करते हैं और इस संकट का सामना करने के लिए अधिक धनराशि खर्च करने में अपनी अनिच्छा जाहिर की। [73] मार्च 2009 में यूरोपीय संघ की प्रेसीडेंसी ने यह पुष्टि कर दी कि यूरोपीय संघ यूरोपीय बजट घाटों को बढ़ाने के अमेरिकी दबाव का दृढ़ता से प्रतिरोध करती है।[74]

वैश्विक प्रतिक्रिया[संपादित करें]

चित्र:UK US 2008 अक्टूबर bank bailouts.svg
ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा अपने जीडीपी के अनुपात में प्रतिक्रियाएं

ऊपर वर्णित के अनुसार राष्ट्रों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक और वित्तीय संकट के प्रति अधिकांश राजनीतिक प्रतिक्रियाएं ली गयी हैं। कुछ समन्वय यूरोपीय स्तर पर देखा गया लेकिन वैश्विक स्तर पर सहयोग की जरूरत ने नेताओं को जी-20 की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की इकाई को सक्रिय करने के लिए मजबूर किया। राज्य प्रमुखों के स्तर पर संकट को समर्पित पहला शिखर सम्मलेन नवंबर 2008 में आयोजित किया गया (2008 जी-20 वॉशिंगटन शिखर सम्मेलन)।

जी-20 के देश आर्थिक संकट से निपटने के लिए नवंबर 2008 को वाशिंगटन में आयोजित शिखर सम्मलेन में मिले। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय विनियमन पर प्रस्तावों के अलावा उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था का समर्थन करने और उन्हें सहयोग देने के उपाय करने का वचन दिया और संरक्षणवाद के किसी भी प्रयास को नकार दिया।

एक अन्य जी-20 शिखर सम्मेलन लंदन में अप्रैल 2009 को आयोजित किया गया। वित्त मंत्रियों और जी-20 के सेन्ट्रल बैंकों के नेताओं ने सम्मलेन की तैयारी के लिए मार्च के महीने में हॉर्शाम में मुलाकात की और जितनी जल्दी संभव हो वैश्विक विकास को बहाल करने का वचन दिया। उन्होंने अपने कार्यों में समन्वय के साथ-साथ मांग एवं रोजगार को बढ़ावा का फैसला किया। उन्होंने किसी भी तरह के संरक्षणवाद के खिलाफ लड़ने और व्यापार एवं विदेशी निवेश को बनाए रखने का वचन दिया। इसके अलावा उन्होंने अधिक नकदी उपलब्ध कराने और बैंकिंग प्रणाली के रीकैपिटलाइजेशन द्वारा ऋण की आपूर्ति को बनाए रखने और प्रोत्साहन योजनाओं को तेजी से लागू करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई. जैसा कि सेन्ट्रल बैंकरों के लिए उन्होंने जहाँ तक जरूरत हो निम्न-दरों की नीतियों को बरकरार रखने का वचन दिया। अंत में नेताओं ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को मजबूत बनाते हुए उभरते और विकासशील देशों को मदद करने का फैसला किया।

विकास की गति को कायम रखने या तकनीकी रूप से आर्थिक मंदी से बचने वाले देश[संपादित करें]

पोलैंड यूरोपीय संघ का एकमात्र सदस्य है जो जीडीपी में गिरावट से बचा रहा है, इसका मतलब यह है कि 2009 में पोलैंड ने यूरोपीय संघ (ईयू) में सबसे अधिक जीडीपी विकास दर हासिल किया। दिसंबर 2009 तक पोलिश अर्थव्यवस्था ने मंदी में प्रवेश नहीं किया था और ना ही इस पर इसका कोई असर पड़ा था, जबकि इसकी आईएमएफ 2010 जीडीपी विकास का पूर्वानुमान 1.9 फीसदी से और बेहतर होने की उम्मीद की गयी थी।[75][76][77] विश्लेषकों ने इसके कई कारणों की पहचान की है: बैंक को कर्ज देने का अत्यंत न्यूनतम स्तर और एक अपेक्षाकृत बहुत छोटा बंधक बाजार; अपेक्षाकृत हाल ही में यूरोपीय संघ की व्यापार बाधाओं के निराकरण और 2004 के बाद से पोलिश वस्तुओं की मांग में तेजी से हुई वृद्धि के परिणामस्वरूप; 2004 के बाद से यूरोपीय संघ से प्रत्यक्ष धन की प्राप्ति; एकल निर्यात क्षेत्र पर बहुत-अधिक निर्भर नहीं रहना; सरकार की राजकोषीय जिम्मेदारी की एक परंपरा; एक अपेक्षाकृत बड़ा आंतरिक बाजार; मुक्त रूप से प्रवाहित पोलिश ज़्लॉटी; निरंतर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाला न्योनतम श्रम लागत; दशक की शुरुआत में आर्थिक मुश्किलें जिसने वैश्विक संकट से पहले ही खर्च करने संबंधी अग्रिम उपायों के लिए प्रेरित किया; क्वांटेटिव ईजिंग से बचने का सरकार का फैसला.

जबकि चीन, भारत और ईरान ने धीमी विकास दर का अनुभव किया है लेकिन ये आर्थिक मंदी की चपेट में नहीं आये।

दक्षिण कोरिया 2009 की पहली तिमाही में तकनीकी आर्थिक मंदी के दौर से बाल-बाल बच गया।[78] अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने सितम्बर के मध्य में कहा था कि दक्षिण कोरिया एकमात्र बड़ा ओईसीडी देश हो सकता है जो पूरे 2009 के दौरान आर्थिक मंदी से बचा रह जाए.[79] यह 2009 की पहली छमाही में विस्तारित होने वाली एकमात्र विकसित अर्थव्यवस्था थी। 6 अक्टूबर को ऑस्ट्रेलिया अपने मुख्य ब्याज दर को बढ़ाने वाला पहला जी20 देश बन गया जब ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को 3.00% से बढ़ाकर 3.25% करने का फैसला किया।[80]

ऑस्ट्रेलिया ने 2008 की चौथी तिमाही में केवल एक तिमाही के नकारात्मक विकास का अनुभव करने के बाद ही एक तकनीकी आर्थिक मंदी से परहेज किया है, जहाँ 2009 की पहली तिमाही में इसकी जीडीपी सकारात्मक स्तर की ओर वापस लौटने लगी थी।[81][82]

आर्थिक मंदी या मंदी के दौर में शामिल देश[संपादित करें]

2008 में कई देशों ने मंदी का अनुभव किया।[83] वर्त्तमान में एक तकनीकी आर्थिक मंदी में शामिल देश/क्षेत्र हैं एस्टोनिया, लातविया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, जापान, हांगकांग, सिंगापुर, इटली, रूस और जर्मनी.

डेनमार्क 2008 की पहली तिमाही में मंदी के दौर में चला गया लेकिन दूसरी तिमाही में यह फिर से बाहर निकल आया।[84] आइसलैंड 2008 में अपनी बैंकिंग प्रणाली के पतन के बाद आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया (देखें आइसलैंडिक फ़ाइनान्शियल क्राइसिस)।

निम्नलिखित देश 2008 की दूसरी तिमाही में मंदी के दौर में शामिल हुए: एस्टोनिया,[85] लातविया,[86] आयरलैंड[87] और न्यूजीलैंड.[88]

निम्नलिखित देशों/क्षेत्रों ने 2008 की तीसरी तिमाही में मंदी के दौर में प्रवेश किया: जापान,[89] स्वीडन,[90] हांगकांग,[91] सिंगापुर,[92] इटली,[93] तुर्की[83] और जर्मनी.[94] कुल मिलाकर यूरो का इस्तेमाल करने वाले यूरोपीय संघ के पंद्रह देश और युनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) तीसरी तिमाही में मंदी की चपेट में आये। [95] इसके अलावा यूरोपीय संघ, जी7 और ओईसीडी इन सभी ने तीसरी तिमाही में नकारात्मक विकास का अनुभव किया।[83]

निम्नलिखित देश/क्षेत्र 2008 की चौथी तिमाही में तकनीकी मंदी का शिकार हुए: संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड,[96] स्पेन[97] और ताइवान.[98]

दक्षिण कोरिया "चमत्कारिक ढंग से" 2009 की पहली तिमाही में 0.1% के विस्तार से सकारात्मक जीडीपी की ओर वापस लौटते हुए आर्थिक मंदी की मार से बचा रह गया।[99]

जीडीपी के आधार पर दुनिया की सात सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से सिर्फ चीन और फ्रांस ही 2008 में आर्थिक मंदी की मार से बचने में सफल रहा। फ्रांस ने 2008 की दूसरी तिमाही (क्यू2) में 0.3% की कमी और तीसरी तिमाही (क्यू2) में 0.1 की वृद्धि का अनुभव किया। 2008 की तीसरी तिमाही के वर्ष में चीन ने 9% की दर से विकास किया। यह दिलचस्प है क्योंकि चीन ने हाल ही तक सिर्फ शहरी क्षेत्रों में पलायन करने वाले ग्रामीण लोगों को पर्याप्त रोजगार मुहैया कर 8% की आवश्यक जीडीपी विकास दर हासिल करने का विचार किया था।[100] यह आंकड़ा और अधिक सही रूप में अब 5-7% के बीच माना जा सकता है क्योंकि कार्यशील आबादी में मुख्य विकास की गति अब धीमी पड़ रही है। 5%-8% के बीच की वृद्धि दर चीन की तरह के प्रभाव को दिखा सकता है जहाँ आर्थिक मंदी का नामोनिशान नहीं था। यूक्रेन जनवरी 2009 में मंदी की चपेट में आया जहाँ वार्षिक जीडीपी विकास दर में मामूली -20% की वृद्धि हुई थी।[101]

जापान में आर्थिक मंदी 2008 की चौथी तिमाही में -12.7% के एक मामूली वार्षिक जीडीपी विकास दर के साथ तेज हुई,[102] और बाद में 2009 की पहली तिमाही में और अधिक गहरा कर यह -15.2% के मामूली वार्षिक जीडीपी विकास दर पर पहुँच गयी।[103]

आर्थिक मंदी से प्रभावित प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं.[104]

align="left"
देश कुल जीडीपी की हानि मंदी की अवधि (तिमाहियों की संख्या)
Flag of Poland.svg Poland -0.33% 1
Flag of Australia.svg Australia -0.73% 1
Flag of Israel.svg Israel -1.09% 2
Flag of Norway.svg Norway -2.75% 6
Flag of South Africa.svg South Africa -2.79% 3
Flag of Cyprus.svg Cyprus -2.93% 5
Flag of Switzerland.svg Switzerland -3.32% 4
Flag of Canada.svg Canada -3.36% 6
Flag of New Zealand.svg New Zealand -3.40% 5
Flag of France.svg France -3.88% 4
Flag of Portugal.svg Portugal -3.88% 4
Flag of the United States.svg United States -4.14% 6
Flag of Chile.svg Chile -4.16% 4
Flag of Belgium.svg Belgium -4.23% 3
साँचा:देश आँकड़े Korea, South -4.58% 2
Flag of the Czech Republic.svg Czech Republic -4.87% 3
Flag of Spain.svg Spain -4.89% 7
Flag of Austria.svg Austria -5.13% 4
Flag of the Netherlands.svg Netherlands -5.19% 5
Flag of Greece.svg Greece -5.40% 6
Flag of Germany.svg Germany -5.94% 4
Flag of the United Kingdom.svg United Kingdom -6.39% 6
Flag of Italy.svg Italy -6.76% 7
Flag of Denmark.svg Denmark -7.32% 6
Flag of Slovakia.svg Slovakia -7.38% 1
Flag of Sweden.svg Sweden -7.68% 5
Flag of Hungary.svg Hungary -7.85% 6
Flag of Japan.svg Japan -8.67% 4
Flag of Luxembourg.svg Luxembourg -8.68% 5
Flag of Mexico.svg Mexico -9.06% 4
Flag of Finland.svg Finland -9.51% 7
Flag of Romania.svg Romania -9.65% 7
Flag of Slovenia.svg Slovenia -9.71% 3
Flag of Russia.svg Russia -10.78% 4
Flag of Bulgaria.svg Bulgaria -11.94% 5
Flag of Turkey.svg Turkey -12.84% 4
Flag of Iceland.svg Iceland -12.91% 8
Flag of Ireland.svg Ireland -14.26% 8
Flag of Lithuania.svg Lithuania -18.04% 7
साँचा:देश आँकड़े Estonia -19.63% 7

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी पूर्वानुमान[संपादित करें]

मार्च 2009 में अमेरिकी फेड के चेयरमैन बेन बर्नांके ने एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने यह महसूस किया था कि अगर बैंक और अधिक स्वतंत्र रूप से ऋण देना शुरू करेंगे तो वित्तीय बाजार सामान्य स्थिति में वापस लौट सकता है और यह आर्थिक मंदी 2009 के दौरान ही ख़त्म हो सकती है।[6][105] उसी साक्षात्कार में बर्नांके ने कहा कि आर्थिक पुनरुत्थान की हरी शाखाएं पहले से ही स्पष्ट हैं।[106] 18 फ़रवरी 2009 को अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी आउटपुट के 0.5% और 1.5% के बीच सिमट जाने के अनुमान से 2009 के अपने आर्थिक पूर्वानुमान में कटौती कर दी जो +1.1% (वृद्धि) और -2% (कमी) के बीच के इसके अक्टूबर 2008 के पूर्वानुमान से कम था।[107]

ब्रुसेल्स में यूरोपीय संघ के आयोग ने जर्मनी द्वारा यूरोपीय संघ के 27 देशों के लिए -2.25% और -1.8% के औसत स्तर तक कम किये जाने के अनुमान से 19 जनवरी 2009 को अपने पिछले पूर्वानुमान को अपडेट किया।[108] ड्यूशे बैंक द्वारा नए पूर्वानुमानों के अनुसार (नवम्बर 2008 के अंत में) जर्मनी की अर्थव्यवस्था 2009 में 4% से अधिक संकुचित हो जायेगी.[109]

3 नवम्बर 2008 को सभी अखबारों के अनुसार ब्रसेल्स में यूरोपीय आयोग ने यूरो जोन के सभी देशों (फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि) के लिए 2009 के जीडीपी में केवल 0.1% की एक अत्यंत निम्न वृद्धि की भविष्यवाणी की। [110] उन्होंने ब्रिटेन (-1.0%), आयरलैंड, स्पेन और यूरोपीय संघ के अन्य देशों के लिए नकारात्मक आंकड़ों की भी भविष्यवाणी की। तीन दिनों के बाद आईएमएफ ने वाशिंगटन डी.सी. में 2009 के लिए विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर उसी संख्या के औसतन +0.3% की एक विश्वव्यापी कमी की भविष्यवाणी की (अमेरिका के लिए -0.7% और जर्मनी के लिए -0.8%)। [111] 22 अप्रैल 2009 को जर्मन वित्त और अर्थव्यवस्था के मंत्रियों ने एक आम प्रेस सम्मेलन में 2009 के बाद के अपने आंकड़ों को एक बार फिर से अधोगामी दिशा में संशोधित किया: इस बार आईएमएफ के हाल ही के पूर्वानुमान के समझौते के साथ जर्मनी के लिए "पूर्वानुमान" जीडीपी में कम से कम -5%[112] की गिरावट का था।[113]

11 जून 2009 को विश्व बैंक समूह ने पहली बार 2009 के लिए आर्थिक शक्ति के एक वैश्विक संकुचन के लिए -3% की भविष्यवाणी की। [114]

ग्रेट डिप्रेशन (भारी मंदी) के साथ तुलना[संपादित करें]

संयुक्त राज्य अमेरिका में[संपादित करें]

हालांकि 2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी और ग्रेट डिप्रेशन के बीच कुछ अनौपचारिक तुलना की गयी है, जहाँ इन दोनों घटनाओं के बीच काफी बड़ा अंतर रहा है।[115][116][117] मार्च 2009 में अर्थशास्त्रियों के बीच यह आम सहमति थी कि उस समय डिप्रेशन की स्थिति पैदा होने की संभावना नहीं थी।[118] यूएलसीए एंडरसन के पूर्वानुमान निदेशक एडवर्ड लीमर ने 25 मार्च 2009 को कहा था कि उस समय दूसरे ग्रेट डिप्रेशन के जैसी कोई बड़ी भविष्यवाणी नहीं की गयी थी।

"हमने उपभोक्ताओं को इस कदर भयभीत कर दिया कि वे एक ग्रेट डिप्रेशन की सम्भावनाओं की कल्पना करने लगे थे। जो निश्चित रूप से संभावना में शामिल नहीं है। कोई भी प्रतिष्ठित भविष्यवक्ता एक ग्रेट डिप्रेशन जैसी किसी भी स्थिति की भविष्यवाणी नहीं कर रहा था।"[119]

आर्थिक मंदी और ग्रेट डिप्रेशन के बीच स्पष्ट रूप से बताये गए अंतरों में शामिल हैं 1929 और 2008 के बीच 79 वर्षों से अधिक के तथ्य, आर्थिक दर्शन और नीतियों में देखे गए बड़े बदलाव,[120] शेयर बाजार उतना अधिक नहीं गिरा था जितना कि यह 1932 या 1982 में गिरा था, 10 साल में शेयरों के मूल्य और कमाई का अनुपात उतना नीचे नहीं आया था जितना कि या 30 के दशक में या 80 के दशक में आ गया था, मुद्रास्फीति से समायोजित अमेरिकी आवास की कीमतें मार्च 2009 में 1890 के बाद के किसी भी समय से अधिक थी (1970 और 80 के दशक के हाउसिंग क्षेत्र की तेज उछाल सहित),[121] 30 के दशक के शुरुआत की आर्थिक मंदी साढ़े तीन साल तक चली थी,[120] और 1930 के दशक के दौरान धन की आपूर्ति (करेंसी के साथ-साथ डिमांड डिपोजिट) 25% तक गिर गयी थी (जबकि 2008 और 2009 में फेड ने "एक अल्ट्रालूज क्रेडिट रूपी कदम उठाया है")। [122] इसके अलावा 2008 में बेरोजगारी दर और 2009 की शुरुआत में यह जिस स्तर से ऊपर उठा था, इसकी तुलना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद होने वाली ज्यादातर मंदियों से की जा सकती है और यह ग्रेट डिप्रेशन की 25% बेरोजगारी दर की चोटी से नीचे ही था।[120]

शेयर बाजार[संपादित करें]

मूल्य-से-कमाई का अनुपात पिछली मंदी के न्यूनतम स्तर तक अभी तक नहीं गिरा है। इस मुद्दे पर हालांकि "यह जानना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि अलग-अलग विश्लेषकों की अपेक्षाएं अलग-अलग होती हैं और सर्वसम्मति का विचार सही की अपेक्षा अक्सर गलत साबित होता है।"[123] कुछ लोगों का तर्क है कि मूल्य-से-कमाई का अनुपात आमदनी में अनपेक्षित गिरावट की वजह से ऊँचा बना रहता है।[124]

बाजार के रणनीतिकार फिल डो ने कहा था उनका मानना है कि मौजूदा बाजार अस्वस्थता और ग्रेट डिप्रेशन के बीच विशिष्टताएं मौजूद हैं। 17 महीनों में डाऊ की 50% से अधिक की गिरावट ग्रेट डिप्रेशन में 54.7% की गिरावट के सामान है जिसके बाद अगले 16 महीनों में कुल मिलाकर 89% की गिरावट दर्ज की गयी थी। डाऊ ने कहा था "अगर आप एक आइना छवि रखते हैं तो यह बहुत सी मुश्किलें पैदा करता है।"[125] द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुख्य वित्तीय संवाददाता, फ्लोयड नॉरिस ने मार्च 2009 में एक ब्लॉग इंट्री में लिखा था कि यह गिरावट ग्रेट डिप्रेशन की एक आइना छवि नहीं है, उनहोंने स्पष्ट किया था कि हालांकि गिरावट की मात्रा उस समय के तकरीबन बराबर थी, गिरावट की दरें 2007 में कहीं अधिक तेज रफ़्तार से बढ़नी शुरू हो गयी थी और यह कि डाऊ में प्रतिशत गिरावट के लिए दर्ज सबसे बुरे वर्षों में पिछले वर्ष को केवल आठवां स्थान दिया गया था। हालांकि पिछले दो वर्षों को तीसरे स्थान पर रखा गया था।[126]

बेरोजगारी[संपादित करें]

आई। एम.एफ. के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ॰ ओलिवर ब्लैनकार्ड ने कहा था कि लंबी अवधि के लिए रखे गए श्रमिकों की प्रतिशतता दशकों के प्रत्येक गिरावट के साथ बढ़ती रही है लेकिन आंकड़े इस बार बढ़े हैं। "लंबी-अवधि की बेरोजगारी चिंताजनक रूप से उच्च स्तर पर है: अमेरिका में आधे बेरोजगार छह महीने से भी ज्यादा समय से काम पर नहीं गए हैं, इस तरह की स्थिति ग्रेट डिप्रेशन के बाद से अभी तक नहीं देखी गयी है।" आईएमएफ ने यह भी कहा था कि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ती असमानता और मांग में गिरावट के बीच एक कड़ी मौजूद हो सकती है। आखिरी बार जब धन का अंतर इस तरह के तिरछे चरम स्तर पर पहुँचा था वह अवसर 1928-1929 का था।[127]

ग्रेट डिप्रेशन के तीन सालों में अमेरिका में बेरोजगारी 25% फीसदी के चरम स्तर पर पहुँच गयी थी।[128] संयुक्त राज्य अमेरिका दिसंबर 2007[129] में मंदी के दौर में प्रवेश कर गया और मार्च 2009 में यू-3 बेरोजगारी 8.5% तक जा पहुँची.[130] मार्च 2009 में सांख्यिकीविद्[131] जॉन विलियम्स ने यह तर्क दिया कि मापन में वर्षों से हुए बदलावों ने वर्त्तमान बेरोजगारी दर की तुलना ग्रेट डिप्रेशन के दौरान देखे गए दर के साथ करना संभव बना दिया है।[131]

विनियमन में ढील द्वारा बढ़ाए गए जोखिम[संपादित करें]

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने अपनी रिटर्न टू डिप्रेशन इकोनोमिक्स (2000) में "अर्थव्यवस्था के मांग पक्ष की विफलताओं के आधार पर" डिप्रेशनों की एक शृंखला की भविष्यवाणी की थी। 5 जनवरी 2009 को उन्होंने लिखा था कि "डिप्रेशन को रोकना आखिरकार उतना आसान भी नहीं है" और यह कि "अर्थव्यवस्था अभी भी मुक्त रूप से गिरती जा रही है।"[132] मार्च 2009 में क्रुगमैन ने बताया कि इस स्थिति में एक बड़ा अंतर यह है कि इस वित्तीय संकट के कारण छाया बैंकिंग प्रणाली में मौजूद हैं। "संकट में नए जोखिम लेने उठाने अविनियमित संस्थानों के साथ जुड़ी समस्याएं शामिल नहीं की गयी हैं।.. इसकी बजाय इसमें संस्थानों द्वारा उठाये गए उन जोखिमों को शामिल किया गया है जिन्हें पहले चरण में विनियमित नहीं किया गया था।[133]

22 फ़रवरी को एनवाययू के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नॉरियेल रोबिनी ने कहा कि यह संकट ग्रेट डिप्रेशन के बाद सबसे बुरा संकट था और यह कि राजनीतिक दलों और दूसरे देशों के सहयोग के बिना और अगर कमजोर राजकोषीय नीतिगत फैसलों (जैसे कि जूम्बी बैंकों को सहयोग) को लागू किया गया तो परिस्थिति "ग्रेट डिप्रेशन के जैसी बुरी हो सकती है।"[134] 27 अप्रैल 2009 को रोबिनी ने यह उल्लेख करते हुए एक अधिक उत्साहपूर्ण मूल्यांकन दिया कि "अर्थव्यवस्था का आधार अगले वर्ष की शुरुआत या मध्य के आस-पास [दिखाई देगा].[135]

15 नवम्बर 2008 को लेखक और एसएमयू के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रवि बत्रा ने कहा, उन्हें 'डर है कि वैश्विक वित्तीय असफलता एक तीव्र आर्थिक मंदी में बदल जायेगी और यह ग्रेट डिप्रेशन के बाद सबसे बुरी होगी, यहाँ तक कि 1980-82 में पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली दर्दनाक मंदी से भी बदतर हो जायेगी.[136] 1978 में बत्रा की पुस्तक द डाउनफॉल ऑफ कैपिटलिज्म एंड कम्मुनिज्म प्रकाशित हुई थी। उनकी पहली प्रमुख भविष्यवाणी 1990 में सोवियत साम्यवाद के पतन के साथ सच साबित हुई. उनकी दूसरी भविष्यवाणी कि एक वित्तीय संकट पूंजीवादी व्यवस्था को निगल जाएगा यह 2007 के बाद से सही होता दिखाई दे रहा है और अब उनके अध्ययन पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है।[137][138][139]

6 अप्रैल 2009 को वरनौन एल स्मिथ और स्टीवन जेर्स्टाड ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की "कि एक वित्तीय संकट जिसकी शुरुआत उपभोक्ता ऋण में होती है, विशेष रूप से धन और आय के वितरण के निम्न स्तर पर केंद्रित उपभोक्ता ऋण को तुरंत और जबरदस्ती वित्तीय प्रणाली में डाला जाएगा. ऐसा मालूम होता कि हम दूसरे बड़े उपभोक्ता ऋण को धराशायी होता देख रहे हैं जो एक व्यापक स्तर पर उपभोग की फिजूलखर्ची की समाप्ति है।"[140]

राष्ट्रपति के रूप में अपनी अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस में जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने यह दावा किया था कि सितम्बर 2008 में उनके मुख्य आर्थिक सलाहकारों ने यह कहा था कि आर्थिक परिस्थिति किसी भी समय ग्रेट डिप्रेशन से भी बदतर हो सकती है।[141]

सैक्रामांटो, कैलिफोर्निया में एक टैंट सिटी को "1930 के दशक और ग्रेट डिप्रेशन के प्रतीकात्मक तस्वीरों को यादगार छवियाँ" और "और विचारोत्तेजक डिप्रेशन-युग की छवियों" के रूप में वर्णित किया गया है।[142]

17 अप्रैल 2009 को आईएमएफ के प्रमुख डोमिनिक स्ट्रॉस-क्हान ने कहा कि इस बात की संभावना है कि कुछ देश प्रतिक्रिया प्रणालियों से बचने के लिए उचित नीतियों को लागू नहीं कर सकते हैं जो अंततः मंदी को डिप्रेशन में तब्दील कर दे सकता है। "वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुक्त रूप से गिरावट 2010 में उभरते सुधारों के साथ कम होनी शुरू हो सकती है लेकिन यह काफी हद तक आज अपनाई गयी सही नीतियों पर निर्भर करता है।" आईएमएफ ने कहा था कि ग्रेट डिप्रेशन के विपरीत यह मंदी बाजारों के वैश्विक एकीकरण द्वारा समकालिक की गयी थी। इस तरह की समकालिक मंदियों की व्याख्या आम तौर पर देखी जाने वाली आर्थिक गिरावट से कहीं अधिक समय तक कायम रहने और इसमें अपेक्षाकृत धीमी गति से सुधार के रूप में की गयी थी।[143]

दक्षिण अफ्रीका में[संपादित करें]

11 फ़रवरी को दक्षिण अफ्रीका के वित्त मंत्री ट्रेवर मैनुएल ने कहा कि "वित्तीय संकट के रूप में जिसकी शुरुआत हुई है वह दूसरा ग्रेट डिप्रेशन भी हो सकता है।"[144]

युनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) में[संपादित करें]

10 फ़रवरी 2009 को यूनाइटेड किंगडम के बच्चों, स्कूलों और परिवारों के विदेश सचिव एड बॉल्स ने कहा कि "मैं यह सोचता हूँ कि यह 1930 के दशक की तुलना में एक कहीं अधिक तीव्र और गंभीर वितीय संकट है और हम सभी को यह याद है कि अर्थव्यवस्था द्वारा उस युग की नीतियों को किस तरह आकार दिया गया था।[145] 24 जनवरी 2009 को द डेली टेलीग्राफ के आर्थिक संपादक एडमंड कॉनवे ने लिखा कि "ब्रिटेन जिस दुर्दशा का सामना कर रहा है वह रहस्यमय ढंग से 1930 के दशक जैसी है क्योंकि कई संपत्तियों की कीमतों - शेयरों से लेकर घरों की कीमतों - में [ब्रिटेन में] रिकॉर्ड दर से गिरावट देखी जा रही है लेकिन उस ऋण के मूल्य में कोई बदलाव नहीं हुआ है जिसके बदले उन्हें यह सुविधा दी गयी है।[146]

आयरलैंड में[संपादित करें]

आयरलैंड गणराज्य ने "तकनीकी रूप से" 2009 में आर्थिक मंदी के दौर में प्रवेश किया।[147] ईएसआरआई (आर्थिक और सामाजिक अनुसंधान संस्थान) ने 2010 तक 14% के एक आर्थिक संकुचन की भविष्यवाणी की है,[148] हालांकि यह आंकड़ा संभवतः 2008 की चौथी तिमाही के दौरान जीडीपी में तिमाही दर तिमाही 7.1% की गिरावट के साथ पहले ही पार हो चुका है,[149] और 2009 की पहली तिमाही में इससे बड़े एक संकुचन की संभावना थी, जिसमें सभी ओईसीडी देशों में गिरावट हो सकती थी जिसका एक अपवाद फ्रांस है जिसने पिछली तिमाही की गिरावट को पार कर लिया था।[150] बेरोजगारी 8.75%[151] से 11.4% तक ऊपर पहुँच गयी है।[152][153][154] सरकारी उधार, वित्तीय बेलआउट और आयरलैंड के एक बैंक[155] के राष्ट्रीयकरण जो आयरिश प्रोपर्टी के बुलबुले के कारण कर्ज में बुरी तरह डूब चुके थे।

नौकरियों की कमी और बेरोजगारी दर[संपादित करें]

दुनिया भर में अनेक नौकरियाँ ख़त्म हो गयी हैं। अमेरिका में नौकरियों की कमी की समस्या दिसंबर 2007 के बाद से बढ़ती जा रही है और इसमें लीमैन ब्रदर्स के दिवालियापन के बाद सितम्बर 2008 की शुरुआत में जबरदस्त वृद्धि हुई। [156] फरवरी 2010 तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कनाडा की अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक अस्थिर होने की सूचना मिली है। कई सेवा उद्योगों ने यह जानकारी दी है कि एक ऐसे युग में जहाँ रोजगार अस्थायी है और बेरोजगारी या निम्नस्तरीय रोजगार जीवन का एक निश्चित पहलू बन गया है, वे अपने मुनाफे के अंतर को बढ़ाने के क्रम में अपनी कीमतों को घटा रहे हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • 2008 चीनी आर्थिक प्रोत्साहन योजना
  • 2008 संयुक्त राज्य अमेरिका के बैंकों की विफलता
  • 2008-2009 कीनेशियन पुनरुत्थान
  • 2008-2009 लातवियाई वित्तीय संकट
  • 2008-2009 रूसी वित्तीय संकट
  • 2009 की अमेरिकी रिकवरी और पुनर्निवेश अधिनियम
  • 2008-2009 की मोटर-वाहन उद्योग संकट
  • लेहमन ब्रदर्स का दिवालियापन
  • बीयर स्टर्न्स सबप्राइम मोर्टगेज हेज फंड संकट
  • फैनी में और फ्रेडी मैक का संघीय अधिग्रहण
  • 2007-2010 के वित्तीय संकट
  • भारी मंदी
  • 2007-2008 वित्तीय संकट में शामिल कंपनियों की सूची
  • 2007 ग्रीष्मकाल की सांख्यिकी अंतरपणन घटनाएँ
  • सबप्राइम संकट के प्रभाव की समय-रेखा
  • 2007-2009 की संयुक्त राज्य अमेरिका का बियर मार्केट (गिरता बाजार)
  • संयुक्त राज्य अमेरिका आवासीय बबल
  • संयुक्त राज्य के आवास बाजार में गिरावट
  • 2000 के दशक का कमोडिटी बूम

सन्दर्भ[संपादित करें]

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अग्रिम पठन[संपादित करें]

  • कोहन, विलियम डी., दी लास्ट टाय्कूनस. दी सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ लजार्ड फेयरर्स एंड कंपनी. न्यूयॉर्क, ब्रॉडवे बुक्स (डबलडे), 2007. आईएसबीएन 9780385521772
  • कोहन, विलियम डी., हाउस ऑफ कार्ड्स: ए टेल ऑफ हब्रिस एंड व्रेच्ड एक्सेस ऑन वॉल स्ट्रीट, [एक उपन्यास]. न्यूयॉर्क, डबलडे, 2009. आईएसबीएन 9780385528269
  • फेंग्बो झांग: 1.पर्स्पेक्टिव ऑन दी यूनाइटेड स्टेट्स सब-प्राइम मॉर्गज क्राइसिस, 2.एक्यूरेटली फॉरकास्टिंग टेंड्स ऑफ दी फायनेंशियल क्राइसिस, 3.Stop Arguing about Socialism versus Capitalism .
  • फुन्नेल्ल, वार्विस्क एन, इन गवर्नमेंट वी ट्रस्ट: मार्केट फेलियर एंड दी डिलूश़न्स ऑफ प्रिवेटिजेशन / वार्विस्क फुन्नेल्ल, रॉबर्ट ज्यूप एंड जेन एंड्रयू. सिडनी: न्यू साउथ यूनिवर्सिटी वेल्स प्रेस, 2009. आईएसबीएन (पीबीके) 9780868409665
  • हरमन, क्रिस ज़ोंबी कैपिटलिज्म: ग्लोबल क्राइसिस एंड दी रिलेवेंस ऑफ मार्क्स / लंदन: बुकमार्क्स पब्लिकेशन्स 2009. आईएसबीएन 9781905192533
  • पॉलसन, हांक, ऑन दी ब्रिंक . लंदन, हेडलाइन, 2010. आईएसबीएन 9780755360543
  • पढ़ें, कॉलिन. ग्लोबल फाइनांशियल मेल्टडाउन: हाउ वी कैन एवाइड दी नेक्सट इकॉनोमिक क्राइसिस / कॉलिन पढ़े. न्यू यॉर्क: पालग्रेव मैकमिलन, सी2009. आईएसबीएन 9780230222182
  • वुड्स, थॉमस ई. मेल्टडाउन: ए फ्री-मार्केट लुक एट वाई दी स्टॉक मार्केट कॉलेप्सड, दी इकॉनोमी टैंगक, एंड गवर्नमेंट बेलआउट्स विल मेक थिंग्स वर्स / वॉशिंगटन डीसी: रिजेंडरी पब्लिशिंग 2009. आईएसबीएन 1596985879

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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