सुहासिनी गांगुली

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सुहासिनी गांगुली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी थी।[1] उनका जन्म खुलना में हुआ। पैत्रिक घर ढाका, जिला विक्रमपुर के बाघिया गाँव में था। पिता अविनाश चन्द्र गांगुली और माता सरलासुन्दरी देवी की बेटी सुहासिनी १९२४ में ढाका ईडन हाईस्कूल से मैट्रिक पास करके ईडन कालेज से स्नातक बनीं। एक तैराकी स्कूल में वे कल्याणी दास और कमला दासगुप्ता के सम्पर्क में आईं और क्रांतिकारी दल का साथ देने के लिए प्रशिक्षण लेने लगीं। १९२९ में विप्लवी दल के नेता रसिक लाल दास से परिचय होने के बाद तो वह पूरी तरह से दल में सक्रिय हो गईं। हेमन्त तरफदार ने भी उन्हें इस ओर प्रोत्साहित किया। १९३० के `चटगांव शस्त्रागार कांड' के बाद बहुत से क्रांतिकारी ब्रिटिश पुलिस की धर-पकड़ से बचने के लिए चन्द्रनगर चले गये थे। सुहासिनी गांगुली इन क्रांतिकारियों को सुरक्षा देने के लिए कलकत्ता से चंद्रनगर पहुँचीं। इसके पहले वह कलकत्ता में गूंगे-बहरे बच्चों के एक स्कूल में कार्य कर रहीं थीं। चन्द्रनगर पहुँचकर उन्होंने वहीं के एक स्कूल में अध्यापन-कार्य ले लिया। शाम से सुबह तक वह क्रांतिकारियों की सहायक उनकी प्रिय सुहासिनी दीदी थीं। दिन भर एक समान्य अध्यापिका के रूप में काम पर जाती थीं और घर में शशिधर आचार्य की छद्म पत्नी बन कर रहती थीं ताकि किसी को संदेह न हो और यह घर एक सामान्य गृहस्थ का घर लगे और वह क्रांतिकारियों को सुरक्षा भी दे सकें। गणेश घोष, लोकनाथ बल, जीवन घोषाल, हेमन्त तरफदार आदि क्रांतिकारी बारी-बारी से यहीं आकर ठहरते थे।

इतना सब करने पर भी अधिकारियों को संदेह हो गया। उस घर पर चौबीसों घंटे निगाह रखी जाने लगी। फिर १ सितम्बर १९३० को उस मकान पर घेरा डाल दिया गया। आमने-सामने की मुठभेड़ में जीवन घोषाल, गोली से मारे गए। अनन्त सिंह पहले ही पुलिस को आत्म समर्पण कर चुके थे। शेष साथी और सुहासिनी गांगुली अपने तथाकथित पति श्री शशिधर आचार्य के साथ गिरफ्तार हो गईं। उन्हें हिजली जेल भेज दिया गया जहाँ इन्दुमति सिंह भी थीं। आठ साल की लम्बी अवधि के बाद वे १९३८ में रिहा की गईं। १९४२ के आन्दोलन में उन्होंने फिर से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया फिर जेल गईं और १९४५ में छूटीं। हेमन्त तरफदार तब धनबाद के एक आश्रम में संन्यासी भेष में रह रहे थे। रिहाई के बाद सुहासिनी गांगुली भी उसी आश्रम में पहुँच गईं और आश्रम की ममतामयी सहासिनी दीदी बनकर वहीं रहने लगीं। बाकी का अपना जीवन उन्होंने इसी आश्रम में बिताया। भारतवर्ष की आज़ादी उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना था जिसको पूरा करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। उनके इस त्यागमय जीवन और साहसिक कार्य को सम्मान देने के लिए कोलकाता की एक सड़क का नाम सुहासिनी गांगुली सरनी रखा गया है। रचना भोला यामिनी ने अपनी पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी महिलाएँ में उनके जीवन चरित्र का वर्णन किया है।[2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. व्होरा, आशारानी (जुलाई १९८६). क्रांतिकारी महिलाएँ. नई दिल्ली: प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार. पृ॰ 37-39. |access-date= दिए जाने पर |url= भी दिया होना चाहिए (मदद)
  2. "Book Review Swatantrata Sangram Ki Krantikari Mahilayen by Rachana Bhola Yamini" (अंग्रेज़ी में). असोसिएटेड कंटेंट. मूल (एचटीएमएल) से 28 जून 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 मई 2008. |access-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)