सदस्य वार्ता:राठौड़ महेंद्र सिंह

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राठौड़ महेंद्र सिंह जी, कृपया किसी भी लेख से सामग्री न हटायें, यदी उसमें कोई गलत जानकारी है तो इसके लिये पहले चर्चा करे। यदी और कोई जानकारी जोड़नी है तो ससन्दर्भ जोड़े। धन्यवाद। निलेश शुक्ला (वार्ता) 10:05, 27 जुलाई 2021 (UTC)[उत्तर दें]

जुलाई 2021[संपादित करें]

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/* सन्दर्भ */ 1. - लेखक डॉ. दिवाकर सिंह शोधग्रंथ अमझेरा के राजपूत जागीरदारों के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक योगदान वर्ष १९५८से वर्श१९४७) 1) मूल्यांकन शोध प्रबंध 2. ↑ पाटिल, प्रेमविजय (12 अगस्त 2016). "अमर शहीद महाराणा बख्तावरसिंह". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. मूल से 8 अक्तूबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 सितंबर 2016., 3. - नटनागर शोधसंस्थान सीतामऊ लाइब्रेरी स्थित अमझेरा राजवंश कुलगुरु की पोथी, 4. -रानीमंगा रामसिंग की बही पोथी 5. ,-उज्जैन पंडित अरविंद त्रिवेदी के पूर्वजों क[संपादित करें]

[1]१८५७ कि क्रांति के समय अमझेरा राज्य का क्षेत्रफल ५८४ वर्गमील था,जनसँख्या ६०,000 थी, ओर राजस्व २लाख रु. था संदर्भ द रिवोल्ट ऑफ़ १८५७ इन सेन्ट्रल इंडिया-मालवा डॉ.के.एल.श्रीवास्तव १९६६,पृष्ठ १७-१८, अमझेरा का वृहत इतिहास(२००९) पृष्ठ १४३ अमझेरा के राजपूत जागीरदारों का राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक योगदान लेखक डॉ.दिवाकर सिंह तोमर पृष्ठ ५१ से लेकर पृष्ठ ६० तक राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 04:39, 16 अगस्त 2021 (UTC)राठोड महेन्द्र सिंह[उत्तर दें]

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महोदय उपरोक्त विषय में निवेदन है, कि मेरे द्वारा बख्तावर सिंह लेख पर सम्पादन किया था, उक्त लेख में गलत जानकारिया है, अतः मेने सही जानकारी डली थी, परन्तु से विकिपीडिया नया जुड़ने के कारण लेख को सम्पादन प्रक्रीया को नहीं समझने के कारण सम्पादनो कि पुनरावृति कि जा रही थी, जिसके कारण मेरा सदस्य खाता अवरूध्द कर दिया गया,

संजीवजी मै प्रमाणिकता के साथ अमझेरा राजवंश कि विस्तृत जानकारी  साझा करना चाहता हूँ,अतः उक्त (बख्तावारसिंह) लेख  को न छेड़ते हुए नया लेख प्रयोग पृष्ठ पर सन्दर्भ सहित लिखना चाहत हूँ,जिसकी चर्चा चोपाल पर होने के बाद प्रकाशित करना चाहता हूँ यदि आप उचित समझे तो  उक्त विषयांकित 223.236.52.182 का  अवरोध क्रमांक(ब्लॉक आई॰डी॰) #5416  हटाने कि कृपा करें धन्यवाद राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 05:29, 16 अगस्त 2021 (UTC)राठौड़ महेंद्रसिंह राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 05:29, 16 अगस्त 2021 (UTC)[उत्तर दें]
पाटिल, प्रेमविजय (12 अगस्त 2016)जी ने भी अपने लेख में बख्तावर सिंह जी के पिताजी को महाराव अजित सिंह जी ही लिखा है,अतः बख्तावरसिंह जी को महाराव कहा जाता है राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 11:25, 16 अगस्त 2021 (UTC)[उत्तर दें]

एक से अधिक मान(मदद)🤔समझ नही आया। राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 11:28, 16 अगस्त 2021 (UTC)[उत्तर दें]

बख्तावरसिंह विषयांकित लेख[संपादित करें]

बख्तावर सिंह, मारवाड़ जोधपुर महाराव मालदेव के बड़े पुत्र रामसिंह के वंशज थे, इनके पिता को महरावअजित सिंह जी लिखा जाता था, इनकी पदवी भी महाराव है। मेवाड़ वंशीय राजघराने की पदवी महाराणा है। अमझेरा एक छोटी स्टेट थी,जिसके अधीन 32-33 जागीरदार थे ,अमझेरा को कस्बा लिखना गलत है,

  बख्तावरसिंह के पुत्र किशन सिंह की मृत्यु शेशवकाल मे हो गई थी, जिसका लेख कुलगुरु निर्भय सिंह की पोथी(सन1850) में है जोकि मध्य प्रदेश के सबसे बड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों के संकलन की लाइब्रेरी नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ म.प्र. में है, तथा उज्जैन में शहीद भवानीसिंह का कर्मकांड 30 दिसंबर1857 की इंदराज पृष्ठ 7,8 पर लिखित अमझेरा राजवंश की वंशावली में दर्ज है। किशन सिंह शैशवास्था में मर गए थे,तो किशन सिंह की शादी और किशन सिंह की विधवा का गोद लेने का प्रश्न नही उठता, लक्ष्मण सिंह रानी दौलत कुँवर से 27अप्रेल1858 को उत्पन्न पुत्र थे,(वजीर बेग का पत्र अक्टोबर1858 तात्कालिक सीतामऊ स्टेट के वकील)  विस्तृत जानकारी के ओर  प्रमाण के लिए आप मेरे वाट्सअप न.9340007319 पर शीघ्र काल करे.अथवा अपना न. देवे मैं आपको दस्तावेज़ की प्रमाणित प्रति उपलब्ध करा दूंगाराठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 08:23, 24 अगस्त 2021 (UTC)राठौड़ महेन्द्र सिंह[उत्तर दें]

सही जानकारी[संपादित करें]

अमझेरा के शहीद राजा बख्तावर सिंहजी राठौड़

   अंग्रेज डलहोजी की हड़प नीति के कारण कई राजा महाराजा अंग्रेजों के खिलाफ हो गए थे,डलहोजी की नीति के अनुसार भारत के किसी राज्य का वारिस नही होने पर अथवा राजा के निसंतान होने पर वह राज्य अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाता, निसंतान राजाओं के दत्तक या गोद लेने पर अंग्रेज दत्तक को राजा का उत्तराधिकारी नही मानते, और राज्य को लावारिस घोषित कर राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लेते,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी इसी नीति की शिकार हुई थी।

किन्तु मध्य भारत स्थित अमझेरा के उत्तराधिकारी महाराजा बख्तावर सिंह जी के पुत्र 14 वर्षीय युवराज रघुनाथसिंह थे, उनकी रियासत पर डलहोजी की साम्राज्यवादी हडप नीति का कोई प्रभाव नही पड़ता,फिर भी अमझेरा महाराजा बख्तावरसिंहजी ने अपने राज्य और सुखों की परवाह नहीं की । उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचार शोषण के खिलाफ १८५७ में सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया । १८५७ की क्रांति विफल रही,राजा बख्तावरसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर 10 फरवरी १८५८ को सुबह 9 बजे के लगभग इन्दोर के एम.वाय. प्रांगण में स्थित नीम के पेड़ पर फांसी दे दी। अमझेरा में राजा सा. की मृत्यु पर आयोजित मृत्युभोज के बाद अमझेरा के उत्तराधिकारी राजा बख्तावर सिंह जी की रानी लालकुंवर भादरिया के १४ वर्षीय पुत्र युवराज रघुनाथसिंह जी का राजतिलक किया, पर कुछ उनकी हत्या कर दी। राजा बख्तावर सिंह जी की रानी गुलाब कुँवर से जन्मे दुसरे पुत्र किशन सिंह मृत्यु शैशवावस्था में ही हो चुकी थी, चावड़ी रानी दौलत कुँवर मानसा गर्भवती थी,लक्ष्मण सिंह गर्भ में थे। अमझेरा राज जप्त कर ग्वालियर स्टेट के जयाजी राव सिंधिया को दे दिया। राजा बख्तावर सिंह राठौड़ की शहादत के दो माह बाद २७ अप्रेल १८५८ को बख्तावरसिंहजी की चावड़ी रानी दौलत कुंवर मानसा ने पुत्र लक्ष्मण सिंह को जन्म दिया। सत्ताधारी अंग्रेजों व उनके पिट्ठुओं के ताकतवर होने के कारण लक्ष्मण सिंह हत्या के डर से बेटमा के जंगलों में गुप्तवास में सन्यासी वेश में ही रहे,बागियों विद्रोहियों की मदद करते रहे । पराजित राजपरिवार इस अपमानजनक परिस्थितियों के कारण समाज प्रजा से दूर होकर गुमनाम हो गया था। उसी समकाल में छडावद के ठाकुर भीम सिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र किशनसिंग छडावद की गद्दी पर बैठा था,पर गाड़ी पर बैठने के एक वर्ष के अंदर ही किशन सिंह की मृत्यु हो गई थी। इस समकालीन घटना का फायदा उठाने के लिए छडावद के भीमसिंह के वंशज ठाकुर उदय सिंह ने मध्य प्रदेश सरकार से वर्ष १९९६ के लगभग शहीद बख्तावर सिह के शैशव अवस्था में ही मृत पुत्र किशन सिंह को ही २७ अप्रेल १८५८ में जन्मा बताकर उनकी विधवा द्वारा दीप सिंह के पुत्र  लक्ष्मण सिंह को गोद लेना बता कर अमझेरा का मुआवजा का क्लेम किया था, किंतु नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ में मौजूद कुलगुरु की पोथी में दर्ज रिकार्ड के अनुसार छडावद के ही भीम सिंह के पुत्र का नाम भी किशनसिंह था, उनकी विधवा ने दीप  सिंह के दुसरे पुत्र निर्भय सिंह को गोद लिया था। छडावद के उदयसिंह केस हार गये,सरकार ने उनका दावा खारिज़ कर दिया। चावड़ी रानी दौलत कुँवर मानसा से २७ अप्रेल १८५८ को जन्मे असली पुत्र लक्ष्मण सिंह अंग्रेजों के खिलाफ बागियों और विद्रोहियों कि मदद के अलावा कुछ नहीं कर पाए पर लक्ष्मण सिंह के पुत्र ठाकुर अमर सिंह ने महू में अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त रूप से विद्रोही गतिविधियां संचालित की,उनका राज खुलने पर वे भूमिगत हो गए,अंग्रेजों ने उनकी महू स्थित सम्पति जप्त कर ली ठा.अमरसिंहजी के बड़े पुत्र ठा.राम सिंग राठौड़ को महू में (ओक्ट्रय सुपरिडेंट/ सर्कल इंस्पेक्टर) के पद से हटा दिया और उनके दुसरे पुत्र हरि सिंह को ब्रितानी पुलिस पूछताछ के लिए उठा ले गई, दुसरे दिन अधमरी हालत में छोड़ गई, कुछ ही घंटो बाद उनकी मृत्य होगई, परिवार को और नुकसान  न पहुचे इस लिए ठा.अमर  सिंह जी ने आत्म समर्पण कर दिया, अंग्रेजों से माफ़ी न मांगने के कारण गाँधी इरविन समझोते के बाद भी विद्रोही अमर सिंह की सजा कम नहीं हुई, ब्रितानी हुकूमत ने विद्रोही ठा.अमरसिंह की सम्पति जप्त रखी,ठाकुर अमरसिंह को महू की शांति के लिए खतरा मानते हुए उनका महू में प्रवेश वर्जित रखा। इस तरह अंग्रजों से आजादी के संघर्ष में अमझीरा राजवंश की तीन पीड़ी के बख्तावर सिंह, रघुनाथ सिंह और हरि सिंह शहीद हो गए। ठाकुर अमर सिंह के पौत्र अजित सिंह राठौड़ S/o ठा राम सिंग राठौड़(ओक्ट्रय सुपरिडेंट/सर्कल इंस्पेक्टर महू)महू में कालेज प्रोफ़ेसर बन गए , ट्रांसफर होने के बाद नीमच म.प्र. में ही बस गए। वर्ष २००७ के लगभग उत्तर प्रदेश का एक फर्जी व्यक्ति अमझेरा के कुछ लोगों को बरगला कर प्रो.अजित सिंह राठौड़ जगह स्वयं को शहीद राव बख्तावरसिंह राठौड़ का वंशज बता कर सम्मानित सम्मानित होता रहा,अमझेरा की जनता ने उसे सर आँखों पर बिठाया पर कुछ समय बाद ही असलियत सामने आने पर अमझेरा की जनता ने उसे नकार दिया था। उसके पहले भी फर्जी तरीके से शहीद बख्तावर सिह के शैशव अवस्था में ही मृत पुत्र किशन सिंह को २७ अप्रेल १८५८ में जन्मा बता कर भीमसिंह के पुत्र किशन सिंह की विधवा द्वारा छ्डावाद के दीप सिंह के दुसरे पुत्र निर्भय सिंह उर्फ़ (लक्ष्मण सिंह) को गोद लेना बता अमझेरा की वारिसी सिध्द कराने कि कोशिश कि गई थी,पर बात नहीं बनी और छ्डावाद केस हार गए, पर लोगबागों में यही भ्रान्ति अभी भी फ़ैली है, कि २७अप्रेल१८५८ में किशन सिंह जन्मे और किशन सिंह विधवा ने लक्ष्मण सिंह को गोद लिया,जबकि उज्जैन में  स्थित प. अरविन्द त्रिवेदी मगरगुहा के पूर्वज गुरु किशनलाल की बही में पृष्ठ 8 पर 30 दिसंबर १८५७ को शहीद भुवानी सिंह संदला के क्रियाकर्म दर्ज है ,उसी के उपर अमझेरा वंशावली पृष्ठ 7 और 8 पर दर्ज है ,जिसमे अजित सिंह बख्तावर सिंह रघुनाथ सिंह और किशन सिंह का नाम दर्ज है ३० दिसम्बर १८५७ के पूर्व से ही किशन सिंह का  दर्ज है,तो किशन सिंह का जन्म २७ अप्रेल १८५८ को दोबारा नहीं हो सकता, १८५७ के बाद अमझेरा राजवंश का लेखाजोखा रखनेवाले बड़वाह जी शंकर सिंह के पूर्वज अमझेरा क्षेत्र में नहीं गए पर अमझेरा राजवंश कि रानियों का लेखा जोखा रखने वाले रानीमंगा राम सिंग बडवा जी और उनके पूर्वज अमझेरा क्षेत्र में जाते रहे उनके पास  दर्ज अमझेरा  रानियों से सम्बंधित दस्तावेजों में 27 अप्रेल १८५८ को लक्ष्मण सिंह का ही जन्म की लिखतम है लक्ष्मण सिंहजी का विवाह भंवर कुँवर भटियानी जी ओसिया से हुआ उनके पुत्र अमर सिंह का विवाह पालनपुर पीथापुर  वाघेला जी से हुआ, अमरसिंह के पुत्र ओक्ट्रय सुपरिडेंट महू राम सिंग राठौड़ का विवाह बरडिया समंद कुंवर सिसोदानी जी से हुआ,राम सिंह के पुत्र  प्रो. अजित सिंह राठौड़ का विवाह कृष्णा कुँवर जाधवन जी  मेत्राल गुजरात  से हुआ।प्रो.अजितसिंघजी के एक पुत्री भारती बाई सा. चार पुत्र राजेन्द्र सिंह,देवेंद्र सिंह,महेंद्र सिंह,और विजय सिंह हुए, भारती बाई सा. शिवपालसिंह चौहान को परणाई, राजेन्द्र सिंह मे. रजनी भाटी,देवेंद्र सिंह मे. प्रमिला चौहान, महेन्द्र सिंह मे. चंद्रकुमारी गौड़ पुनासा ,विजय सिंह मे. अर्चना राजोरिया, प्रो.अजितसिंग जी के एकमात्र पौत्र कुँवर आदित्यराज सिंह राठौड़ है|[1] मध्यप्रदेश सरकार ने अमझेरा स्थित महाराणा बख्तावरसिंह के किले को राज्य संरक्षित इमारत घोषित किया है।जिला मुख्यालय से 27 km इंदोर अहमदबाद राज्य मार्ग पर हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने अमझेरा स्थित महाराणा बख्तावरसिंह के किले को राज्य संरक्षित इमारत घोषित किया है।जिला मुख्यालय से 27 km इंदोर अहमदबाद राज्य मार्ग पर हैं।। राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 10:07, 3 सितंबर 2021 (UTC)[उत्तर दें]

शहीद राजा बख्तावर सिंहजी[संपादित करें]

अमझेरा के शहीद राजा बख्तावर सिंहजी राठौड़

   अंग्रेज डलहोजी की हड़प नीति के कारण कई राजा महाराजा अंग्रेजों के खिलाफ हो गए थे,डलहोजी की नीति के अनुसार भारत के किसी राज्य का वारिस नही होने पर अथवा राजा के निसंतान होने पर वह राज्य अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाता, निसंतान राजाओं के दत्तक या गोद लेने पर अंग्रेज दत्तक को राजा का उत्तराधिकारी नही मानते, और राज्य को लावारिस घोषित कर राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लेते,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी इसी नीति की शिकार हुई थी।

किन्तु मध्य भारत स्थित अमझेरा के उत्तराधिकारी महाराजा बख्तावर सिंह जी के पुत्र 14 वर्षीय युवराज रघुनाथसिंह थे, उनकी रियासत पर डलहोजी की साम्राज्यवादी हडप नीति का कोई प्रभाव नही पड़ता,फिर भी अमझेरा महाराजा बख्तावरसिंहजी ने अपने राज्य और सुखों की परवाह नहीं की । उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचार शोषण के खिलाफ १८५७ में सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया । १८५७ की क्रांति विफल रही,राजा बख्तावरसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर 10 फरवरी १८५८ को सुबह 9 बजे के लगभग इन्दोर के एम.वाय. प्रांगण में स्थित नीम के पेड़ पर फांसी दे दी। अमझेरा में राजा सा. की मृत्यु पर आयोजित मृत्युभोज के बाद अमझेरा के उत्तराधिकारी राजा बख्तावर सिंह जी की रानी लालकुंवर भादरिया के १४ वर्षीय पुत्र युवराज रघुनाथसिंह जी का राजतिलक किया, पर कुछ उनकी हत्या कर दी। राजा बख्तावर सिंह जी की रानी गुलाब कुँवर से जन्मे दुसरे पुत्र किशन सिंह मृत्यु शैशवावस्था में ही हो चुकी थी, चावड़ी रानी दौलत कुँवर मानसा गर्भवती थी,लक्ष्मण सिंह गर्भ में थे। अमझेरा राज जप्त कर ग्वालियर स्टेट के जयाजी राव सिंधिया को दे दिया। राजा बख्तावर सिंह राठौड़ की शहादत के दो माह बाद २७ अप्रेल १८५८ को बख्तावरसिंहजी की चावड़ी रानी दौलत कुंवर मानसा ने पुत्र लक्ष्मण सिंह को जन्म दिया। सत्ताधारी अंग्रेजों व उनके पिट्ठुओं के ताकतवर होने के कारण लक्ष्मण सिंह हत्या के डर से बेटमा के जंगलों में गुप्तवास में सन्यासी वेश में ही रहे,बागियों विद्रोहियों की मदद करते रहे । पराजित राजपरिवार इस अपमानजनक परिस्थितियों के कारण समाज प्रजा से दूर होकर गुमनाम हो गया था। उसी समकाल में छडावद के ठाकुर भीम सिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र किशनसिंग छडावद की गद्दी पर बैठा था,पर गाड़ी पर बैठने के एक वर्ष के अंदर ही किशन सिंह की मृत्यु हो गई थी। इस समकालीन घटना का फायदा उठाने के लिए छडावद के भीमसिंह के वंशज ठाकुर उदय सिंह ने मध्य प्रदेश सरकार से वर्ष १९९६ के लगभग शहीद बख्तावर सिह के शैशव अवस्था में ही मृत पुत्र किशन सिंह को ही २७ अप्रेल १८५८ में जन्मा बताकर उनकी विधवा द्वारा दीप सिंह के पुत्र  लक्ष्मण सिंह को गोद लेना बता कर अमझेरा का मुआवजा का क्लेम किया था, किंतु नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ में मौजूद कुलगुरु की पोथी में दर्ज रिकार्ड के अनुसार छडावद के ही भीम सिंह के पुत्र का नाम भी किशनसिंह था, उनकी विधवा ने दीप  सिंह के दुसरे पुत्र निर्भय सिंह को गोद लिया था। छडावद के उदयसिंह केस हार गये,सरकार ने उनका दावा खारिज़ कर दिया। चावड़ी रानी दौलत कुँवर मानसा से २७ अप्रेल १८५८ को जन्मे असली पुत्र लक्ष्मण सिंह अंग्रेजों के खिलाफ बागियों और विद्रोहियों कि मदद के अलावा कुछ नहीं कर पाए पर लक्ष्मण सिंह के पुत्र ठाकुर अमर सिंह ने महू में अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त रूप से विद्रोही गतिविधियां संचालित की,उनका राज खुलने पर वे भूमिगत हो गए,अंग्रेजों ने उनकी महू स्थित सम्पति जप्त कर ली ठा.अमरसिंहजी के बड़े पुत्र ठा.राम सिंग राठौड़ को महू में (ओक्ट्रय सुपरिडेंट/ सर्कल इंस्पेक्टर) के पद से हटा दिया और उनके दुसरे पुत्र हरि सिंह को ब्रितानी पुलिस पूछताछ के लिए उठा ले गई, दुसरे दिन अधमरी हालत में छोड़ गई, कुछ ही घंटो बाद उनकी मृत्य होगई, परिवार को और नुकसान  न पहुचे इस लिए ठा.अमर  सिंह जी ने आत्म समर्पण कर दिया, अंग्रेजों से माफ़ी न मांगने के कारण गाँधी इरविन समझोते के बाद भी विद्रोही अमर सिंह की सजा कम नहीं हुई, ब्रितानी हुकूमत ने विद्रोही ठा.अमरसिंह की सम्पति जप्त रखी,ठाकुर अमरसिंह को महू की शांति के लिए खतरा मानते हुए उनका महू में प्रवेश वर्जित रखा। इस तरह अंग्रजों से आजादी के संघर्ष में अमझीरा राजवंश की तीन पीड़ी के बख्तावर सिंह, रघुनाथ सिंह और हरि सिंह शहीद हो गए। ठाकुर अमर सिंह के पौत्र अजित सिंह राठौड़ S/o ठा राम सिंग राठौड़(ओक्ट्रय सुपरिडेंट/सर्कल इंस्पेक्टर महू)महू में कालेज प्रोफ़ेसर बन गए , ट्रांसफर होने के बाद नीमच म.प्र. में ही बस गए। वर्ष २००७ के लगभग उत्तर प्रदेश का एक फर्जी व्यक्ति अमझेरा के कुछ लोगों को बरगला कर प्रो.अजित सिंह राठौड़ जगह स्वयं को शहीद राव बख्तावरसिंह राठौड़ का वंशज बता कर सम्मानित सम्मानित होता रहा,अमझेरा की जनता ने उसे सर आँखों पर बिठाया पर कुछ समय बाद ही असलियत सामने आने पर अमझेरा की जनता ने उसे नकार दिया था। उसके पहले भी फर्जी तरीके से शहीद बख्तावर सिह के शैशव अवस्था में ही मृत पुत्र किशन सिंह को २७ अप्रेल १८५८ में जन्मा बता कर भीमसिंह के पुत्र किशन सिंह की विधवा द्वारा छ्डावाद के दीप सिंह के दुसरे पुत्र निर्भय सिंह उर्फ़ (लक्ष्मण सिंह) को गोद लेना बता अमझेरा की वारिसी सिध्द कराने कि कोशिश कि गई थी,पर बात नहीं बनी और छ्डावाद केस हार गए, पर लोगबागों में यही भ्रान्ति अभी भी फ़ैली है, कि २७अप्रेल१८५८ में किशन सिंह जन्मे और किशन सिंह विधवा ने लक्ष्मण सिंह को गोद लिया,जबकि उज्जैन में  स्थित प. अरविन्द त्रिवेदी मगरगुहा के पूर्वज गुरु किशनलाल की बही में पृष्ठ 8 पर 30 दिसंबर १८५७ को शहीद भुवानी सिंह संदला के क्रियाकर्म दर्ज है ,उसी के उपर अमझेरा वंशावली पृष्ठ 7 और 8 पर दर्ज है ,जिसमे अजित सिंह बख्तावर सिंह रघुनाथ सिंह और किशन सिंह का नाम दर्ज है ३० दिसम्बर १८५७ के पूर्व से ही किशन सिंह का  दर्ज है,तो किशन सिंह का जन्म २७ अप्रेल १८५८ को दोबारा नहीं हो सकता, १८५७ के बाद अमझेरा राजवंश का लेखाजोखा रखनेवाले बड़वाह जी शंकर सिंह के पूर्वज अमझेरा क्षेत्र में नहीं गए पर अमझेरा राजवंश कि रानियों का लेखा जोखा रखने वाले रानीमंगा राम सिंग बडवा जी और उनके पूर्वज अमझेरा क्षेत्र में जाते रहे उनके पास  दर्ज अमझेरा  रानियों से सम्बंधित दस्तावेजों में 27 अप्रेल १८५८ को लक्ष्मण सिंह का ही जन्म की लिखतम है लक्ष्मण सिंहजी का विवाह भंवर कुँवर भटियानी जी ओसिया से हुआ उनके पुत्र अमर सिंह का विवाह पालनपुर पीथापुर  वाघेला जी से हुआ, अमरसिंह के पुत्र ओक्ट्रय सुपरिडेंट महू राम सिंग राठौड़ का विवाह बरडिया समंद कुंवर सिसोदानी जी से हुआ,राम सिंह के पुत्र  प्रो. अजित सिंह राठौड़ का विवाह कृष्णा कुँवर जाधवन जी  मेत्राल गुजरात  से हुआ।प्रो.अजितसिंघजी के एक पुत्री भारती बाई सा. चार पुत्र राजेन्द्र सिंह,देवेंद्र सिंह,महेंद्र सिंह,और विजय सिंह हुए, भारती बाई सा. शिवपालसिंह चौहान को परणाई, राजेन्द्र सिंह मे. रजनी भाटी,देवेंद्र सिंह मे. प्रमिला चौहान, महेन्द्र सिंह मे. चंद्रकुमारी गौड़ पुनासा ,विजय सिंह मे. अर्चना राजोरिया, प्रो.अजितसिंग जी के एकमात्र पौत्र कुँवर आदित्यराज सिंह राठौड़ है|[1] मध्यप्रदेश सरकार ने अमझेरा स्थित महाराणा बख्तावरसिंह के किले को राज्य संरक्षित इमारत घोषित किया है।जिला मुख्यालय से 27 km इंदोर अहमदबाद राज्य मार्ग पर हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने अमझेरा स्थित महाराणा बख्तावरसिंह के किले को राज्य संरक्षित इमारत घोषित किया है।जिला मुख्यालय से 27 km इंदोर अहमदबाद राज्य मार्ग पर हैं।। राठौड़ महेंद्र सिंह (वार्ता) 10:15, 3 सितंबर 2021 (UTC)[उत्तर दें]

  1. ठा.रघुनाथसिंह, राठौड़; डॉ.दिवाकर सिंह, तोमर (2009(द्वितीय संस्करण )). अमझेरा राज्य का वृहत इतिहास ((द्वितीय संस्करण ) संस्करण). जोधपुर: महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केंद्र जोधपुर. पृ॰ 196पर,२१९ब का दूसरा पेरा की ४ थी लेन,और ६ठा पेरा. |pages= और |page= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)