शरद पूर्णिमा

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शरद पूर्णिमा
आधिकारिक नाम शरद पूर्णिमा व्रत
अनुयायी हिन्दू, भारतीय, प्रवासी प्रवासी
प्रकार Hindu
उद्देश्य सर्वकामना पूर्ति
तिथि आश्विन पूर्णिमा
समान पर्व अन्य पूर्णिमाएं३

शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को कहते हैं।[1] ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है।[2] शरद पूर्णिमा के दिन समुद्र मंथन से चंद्रमा,भगवती आदिशक्ति श्री महालक्ष्मी और अमृत कलश सहित धनवंत्री देव का प्राकट्य हुआ था। समुद्र मंथन से शरद पूर्णिमा के दिन भगवती आदिशक्ति महालक्ष्मी के प्राकट्य के पश्चात इसी दिन उनका भगवान श्री विष्णु से पुनः विवाह हुआ था। हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।

कथा[संपादित करें]

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।[2] दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।[3]

उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

विधान[संपादित करें]

इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे।[4] धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें।[5] तत्पश्चात भक्तिपूर्वक ग़रीबों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा किसी दीन दुःखी को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।

इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Sharad Purnima 2020 (Blue Moon day): जानिए शरद पूर्णिमा से जुड़ी खास बातें!". S A NEWS (अंग्रेज़ी में). 2020-10-31. अभिगमन तिथि 2020-10-31.
  2. शरद पूर्णिमा व्रतकथा Archived 2010-08-24 at the Wayback Machine। हिन्दी लोक।
  3. "Sharad Purnima 2020: शरद पूर्णिमा व्रत से प्रसन्न होती हैं मां लक्ष्मी, पढ़ें व्रत कथा". News18 India. अभिगमन तिथि 2020-10-31.
  4. शरद पूर्णिमा पर करें रात्रि उपासना Archived 2010-01-23 at the Wayback Machine। वेबदुनिया।- डॉ॰ किरण रमण
  5. "शरद पूर्णिमा के दिन इस विधि से लक्ष्मी पूजन करने से हो सकती है धन प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त और मंत्र". Jansatta. 2020-10-31. अभिगमन तिथि 2020-10-31.