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प्रदोष व्रत

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प्रदोष व्रत
अनुयायीहिन्दू
प्रकारहिन्दू
आवृत्तिहर मास में दो बार

प्रदोष व्रत हिन्दू धर्म में शिव और पार्वती की आराधना हेतु रखा जाने वाला एक प्रमुख उपवास है।[1] प्रत्येक माह के दोनों पक्षों (शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष) की त्रयोदशी तिथि के सांध्यकाल (सूर्यास्त के समय) को 'प्रदोष काल' कहा जाता है।[2] पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान् शिव कैलाश पर्वत पर आनन्द ताण्डव करते हैं और समस्त देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। सप्ताह के अलग-अलग वारों में पड़ने वाले प्रदोष व्रतों का अपना विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।[3]

व्रत विधि

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प्रदोष व्रत के नियमों के अनुसार त्रयोदशी तिथि पर व्रती को दिनभर उपवास रखना होता है। इसमें निर्जल अथवा निराहार व्रत को श्रेष्ठ माना गया है; सामर्थ्य न होने की स्थिति में फलाहार या नक्तव्रत (रात्रि में एक बार भोजन) का विधान है। प्रदोष काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान् शिव और माता पार्वती का विधिवत पूजन किया जाता है। पूजा के समय घी के दीपक प्रज्वलित करने और सूर्यास्त के लगभग 72 मिनट उपरान्त हविष्यान्न ग्रहण करने का उल्लेख मिलता है।[4]

वार अनुसार महत्व

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सप्ताह के दिनों के अनुसार प्रदोष व्रत का फल भिन्न-भिन्न माना गया है:

  • रवि प्रदोष: आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति हेतु फलदायी माना जाता है।[5]
  • सोम प्रदोष: मनोकामनाओं की पूर्ति और मानसिक शांति के लिए किया जाता है।[6]
  • भौम प्रदोष (मंगलवार): रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ के लिए यह व्रत रखा जाता है।[7]
  • बुध प्रदोष: समस्त कामनाओं और अभीष्ट सिद्धि के लिए मान्य है।[8]
  • गुरु एवं शुक्र प्रदोष: बृहस्पतिवार के व्रत से शत्रुओं पर विजय तथा शुक्रवार के व्रत से सौभाग्य और दांपत्य सुख की वृद्धि मानी गई है।[9]
  • शनि प्रदोष: संतान प्राप्ति एवं संकट निवारण हेतु इसका विशेष महत्व माना गया है।[10][11]

पौराणिक संदर्भ

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पौराणिक आख्यानों के अनुसार, इस व्रत के माहात्म्य का वर्णन महर्षि सूत ने गङ्गा तट पर सनकादि ऋषियों को सुनाया था।[12] कथा के अनुसार, कलियुग में धर्म और सदाचार के ह्रास के समय प्रदोष व्रत शिवकृपा एवं आत्म-कल्याण का एक साधन बनेगा।[13] सूत जी के अनुसार, सर्वप्रथम भगवान् शिव ने इस व्रत का माहात्म्य माता सती को सुनाया था, जो कालान्तर में महर्षि वेदव्यास के माध्यम से परम्परागत रूप से आगे बढ़ा।

सन्दर्भ

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  1. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 24 नवंबर 2016 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 23 नवंबर 2016.
  2. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 22 सितंबर 2019 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  3. ↑ 9 जुलाई: प्रदोष व्रत[मृत कड़ियाँ]। हिन्दुस्तान लाइव। २ जुलाई २०१०
  4. ↑ "भौम प्रदोष व्रत तिथि, महत्व और पूजा विधि". Vastu Astro Hub. अभिगमन तिथि: 2026-04-28.
  5. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 27 अक्तूबर 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  6. ↑ "सोमवार व्रत से संबंधित जानकारी". दैनिक भास्कर. अभिगमन तिथि: 27 अप्रैल 2026.
  7. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 4 मार्च 2016 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  8. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 1 अगस्त 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  9. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 4 मार्च 2016 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  10. ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 27 दिसंबर 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 27 अक्तूबर 2015.
  11. ↑ https://archive.org/details/shani-pradosham शनि प्रदोष का विस्तृत विवरण। पुराणों से संकलित
  12. ↑ स्कन्द पुराण
  13. ↑ हेमाद्रि (व्रत0 2, 18,भविष्यपुराण से उद्धरण)

बाहरी कड़ियाँ

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