"भक्ति काल" के अवतरणों में अंतर

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== कृष्णाश्रयी शाखा ==
[[File:Git govind large.jpg|thumb|श्री कृष्ण और सूरदास जी]]
इस गुण की इस शाखा का सर्वाधिक प्रचार हुआ है। विभिन्न संप्रदायों के अंतर्गत उच्च कोटि के कवि हुए हैं। इनमें [[वल्लभाचार्य]] के [[पुष्टिमार्ग|पुष्टि-संप्रदाय]] के अंतर्गत [[अष्टछाप]] के [[सूरदास]] [[कुम्भनदास]] [[रसखान]] जैसे महान कवि हुए हैं। वात्सल्य एवं श्रृंगार के सर्वोत्तम भक्त-कवि [[सूरदास]] के पदों का परवर्ती हिंदी साहित्य पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है। इस शाखा के कवियों ने प्रायः [[मुक्तक|मुक्तक काव्य]] ही लिखा है। भगवान [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] का बाल एवं किशोर रूप ही इन कवियों को आकर्षित कर पाया है इसलिए इनके काव्यों में श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य की अपेक्षा माधुर्य का ही प्राधान्य रहा है। प्रायः सब कवि गायक थे इसलिए कविता और संगीत का अद्भुत सुंदर समन्वय इन कवियों की रचनाओं में मिलता है। [[गीतिकाव्य|गीति-काव्य]] की जो परंपरा [[जयदेव]] और [[विद्यापति]] द्वारा पल्लवित हुई थी उसका चरम-विकास इन कवियों द्वारा हुआ है। नर-नारी की साधारण प्रेम-लीलाओं को राधा-कृष्ण की अलौकिक प्रेमलीला द्वारा व्यंजित करके उन्होंने जन-मानस को रसाप्लावित कर दिया। आनंद की एक लहर देश भर में दौड गई। इस शाखा के प्रमुख कवि थे [[सूरदास]], नंददास, [[मीरा बाई]], हितहरिवंश, हरिदास, रसखान, [[नरोत्तमदास]] वगैरह। [[रहीम]] भी इसी समय हुए।
 

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