ईद-उल-अज़हा

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ईद-उल-अज़हा
ईद-उल-अज़हा
ईद-उल-अज़हा
मनाने वाले मुस्लिम
प्रकार इस्लाम
शुरु 10 धु अल-हिज्जह
अन्त 13 धु अल-हिज्जह
2015 तिथि 24 सितम्बर
2016 तिथि 11 सितम्बर

ईद-उल-जुहा (बकरीद) (अरबी में ईद-उल-अज़हा जिसका मतलब क़ुरबानी की ईद) इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग ७० दिनों बाद इसे मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है।
इस शब्द का बकरों से कोई संबंध नहीं है। न ही यह उर्दू का शब्द है। असल में अरबी में 'बक़र' का अर्थ है बड़ा जानवर जो जि़बह किया (काटा) जाता है। उसी से बिगड़कर आज भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे 'बकरा ईद' बोलते हैं। ईद-ए-कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना। अरबी में 'क़र्ब' नजदीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं मतलब इस मौके पर भगवान इंसान के बहुत करीब हो जाता है। कुर्बानी उस पशु के जि़बह करने को कहते हैं जिसे 10, 11, 12 या 13 जि़लहिज्ज (हज का महीना) को खुदा को खुश करने के लिए ज़िबिह किया जाता है। कुरान में लिखा है : हमने तुम्हें हौज़-ए-क़ौसा दिया तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो।
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इन्हें भी देखें[संपादित करें]

त्याग का उत्थान[संपादित करें]

ईद उल अजहा का त्योहार हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज मे मनाया जाता है ।पूरी दूनिया के मूसलमान इस महीने मे मक्का सऊदी अरब मे एकत्रित होकर हज मनाते है ।ईद उल अजहा भी इसी इसी दिन मनाई जाती है।वास्तब मे यह हज की एक अंशीय अदायगी और मुसलमानो के भाव का दिन है ।दूनिया भर के मुसलमानो का एक समुह मक्का मे हज करता है वाकी मुसलमानो के अंतरराष्ट्रीय भाव का दिन वन जाता है। ईद उल अजहा का अक्षरश: अर्थ त्याग बाली ईद है इस दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी है । हज और उसके साथ जुड़ी हुई पध्दति हजरत इब्राहीम और उनके परिबार द्अरा किए गये कार्यो को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है।हजरत इब्राहीम के परिवार मे उनकी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल थे।मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमे बह अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे हजरत इब्राहीम अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्बर की राह पर कुर्बान करने निकल पड़े । पुस्तको मे आता है कि ईश्बर ने अपने फरिश्तो को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा ।दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मागीँ गई थी वह थी उनकी खुद की जब की, जब उन्होने अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का मे बसाने का निर्णल लिया ।लेकीन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिबा कुछ न था। उन्हे मक्का मे बसाकर बे खुद मानव सेबा के लिए निकल गये। इस तरह एक रेगिस्तान मे वसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी जब इस्माइल वड़े हुए तो उधर से एक काफिला (कारबा) गुजरा और इस्माइल का विबाह उस काफिले (कारबा) मे से एक युवती से करा दिया गया फिर प्ररांम्भ हुआ एक वंश जिसे इतिहास मे इश्माइलिट्स, या वनु इस्माइल के नाम से जाना गया । हजरत मुहम्मद सहाब का इसी वंश मे जन्म हुआ था।

ईद उल अजहा के दो शंन्देश है पहला परिवार के वड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए

ईद उल अजहा यह याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार मे एक नया अध्याय लिखा गया।


इस्लाम धर्म के त्यौहार Kabaa.jpg
ईद-उल-जुहा | ईद उल-फ़ित्र | मीलाद उन-नबी | बारा वफात | मुहर्रम | शबे बरात
  1. http://navbharattimes.indiatimes.com/other/sunday-nbt/special-story/-/articleshow/10627860.cms