रसायन विज्ञान का इतिहास

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रसायन विज्ञान का इतिहास बहुत पुराना है। १००० ईसापूर्व में प्राचीन सभ्यताओं के लोग ऐसी प्राविधियों का प्रयोग करते थे जो बाद में रसायन विज्ञान की विविध शाखाएं बनीं।

आरम्भिक काल[संपादित करें]

जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, रसायन विज्ञान का विकास भी उसी के साथ हुआ। प्रकृति में पाई जानेवाली अगाध संपत्ति और उसका उपभोग कैसे किया जाए, इस आधार पर इसकी नींव पड़ी। घर, भोजन, वस्त्र, निरोग रहने की आकांक्षा, और आगे चलकर विलास की सामग्री तैयार करने की प्रवृत्ति ने इस शास्त्र के व्यावहारिक रूप को प्रश्रय दिया। अथर्वांगिरस ने भारत काष्ठ और शिलाओं के मंथन से अग्नि उत्पन्न की। अग्नि सभ्यता और संस्कृति की केंद्र बनी। ग्रीक निवासियों की कल्पना में प्रोमीथियस पहली बार अग्नि को देवताओं से छीनकर मानव के उपयोग के लिए धरती पर लाया।

मनुष्य ने देखा कि बहुत से पशु प्रकृति में प्राप्त बहुत सी जड़ी-बुटियाँ खाकर अपना रोग दूर कर लेते हैं। मनुष्य ने भी अपने चारों ओर उगनेवाली वनस्पतियों की मीमांसा की और उनसे अपने रोगों का निवारण करने की पद्धति का विकास किया। महर्षि भारद्वाज के नेतृत्व में हिमालय की तजहटी में वनस्पतियों के गुणधर्म जानने के लिए आज से २,५०० वर्ष पूर्व एक महान्‌ सम्मलेन हुआ, जिसका विवरण चरक संहिता में मिलता है। पिप्पली, पुनर्नवा, अपामार्ग आदि वनस्पतियों का उल्लेख अथर्ववेद में है। यजुर्वेद में स्वर्ण, ताम्र, लोह, त्रपु या वंग तथा सीस धातुओं की ओर संकेत है। इन धातुओं के कारण धातुकर्म विद्या का विकास लगभग सभी देशो में हुआ। धीरे-धीरे इस देश में बाहर से यशद और पारद भी आया। पारद भारत में बाहर से आया और माक्षिक तथा अभ्रक इस देश में थे ही, जिससे धीरे-धीरे रसशास्त्र का विकास हुआ। सुश्रुत के समय शल्यकर्म का विकास हुआ, और व्रणों के उपचार के निमित्त क्षारों का उपयोग प्रारंभ हुआ। लवणों का उपयोग चरक काल से भी पुराना है। सुश्रुत में कॉस्टिक, या तीक्ष्ण क्षारों, को सुधाशर्करा (चूने के पत्थर) के योग से तैयार करने का उल्लेख है। इससे पुराना उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। मयर तुत्थ (तुतिया), कसीस, लोहकिट्ट, सौवर्चल (शोरा), टंकण (सुहागा), रसक, दरद, शिलासीत, गैरिक, और बाद को गंधक, के प्रयेग से रसशास्त्र में एक नए युग को जन्म दिया। नागार्जुन पारद-गंधक-युग का सबसे महान्‌ रसवेत्ता है। रसरत्नाकर और रसार्णव ग्रंथ उसकी परंपरा के मुख्य ग्रंथ हैं। इस समय अनेक प्रकार की मूषाएँ, अनेक प्रकार के पातन यंत्र, स्वेदनी यंत्र, बालुकायंत्र, कोष्ठी यंत्र और पारद के अनेक संस्कारों का उपयोग प्रारंभ हो गया था। धातुओं के भस्म और उनके सत्य प्राप्त करने की अनेक विधियाँ निकाली गई और रोगोपचार में इनका प्रयोग हुआ। समस्त भोज्य सामग्री का भी बात, कफ, पित्त निवारण की दृष्टि से परीक्षण हुआ। आसव, कांजी, अम्ल, अवलेह, आदि ने रसशास्त्र में योग दिया।

भारत में वैशेषिक दर्शन के आचार्य कणाद ने द्रव्य के गुणधर्मों की मीमांसा की। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पंचतत्वों ने विचारधारा को इतना प्रभावित किया कि आजतक ये लोकप्रिय हैं। पंचज्ञानेद्रियों के पाँच विषय थे : गंध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द, और इनके क्रमश: सबंध रखनेवाले ये पाँच तत्व "पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाश' ("क्षिति, जल, पावक गगन समीरा", तुलसीदास के शब्दों में) थे। कणाद भारतीय परमाणुवाद के जन्मदाता है। द्रव्य परमाणुओं से मिलकर बना है। प्रत्येक द्रव्य के परमाणु भिन्न-भिन्न हैं। ये परमाणु गोल और अविभाज्य हैं। दो परमाणु मिलकर द्वयणुक और फिर इनसे त्रयणुक आदि बनते हैं। पाक, या अग्नि के योग से पविर्तन हाते हैं। रासायनिक पविर्तन किस क्रम में होते हैं, इसकी विस्तृत मीमांसा कणाद दर्शन के परवर्ती आचार्यों ने की।

अमृत एवं पारस-पत्थर[संपादित करें]

भारत में और भारत से बाहर लगभग सभी प्राचीन देशों, चीन, अरब, यूनान में भी, मनुष्य की दो चिर आकांक्षाएँ थीं :

  • (१) किस प्रकार रोग, जरा और मृत्यु पर विजय प्राप्त की जाए अर्थात्‌ संजीवनी की खोज या अमरुल की प्राप्ति हो और
  • (२) लोहे के समान अधम धातुओं को कैसे स्वर्ण के समान मूल्यावान्‌ धातुओं में परिणत किया जाए।

अलकेमी (Alchemy)[संपादित करें]

आधुनिक रसायन[संपादित करें]

आधुनिक रसायनशास्त्र का जनक रॉबर्ट बॉयल

पंद्रहवीं-सोलहवीं शती तक यूरोप और भारत दोनों में एक ही पद्धति पर रसायन शास्त्र का विकास हुआ। सभी देशों में अलकीमिया का युग था। पर इस समय के बाद ये यूरोप में (विशेषतया इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और इटली में) रसायन शास्त्र का अध्ययन प्रयोगों के आधार पर हुआ। प्रयोग में उत्पन्न सभी पदार्थों को तोलने की परंपरा प्रारंभ हुई। कोयला जलता है, धातुएँ भी हवा में जलती हैं। जलना क्या है, इसकी मीमांसा हुई। मालूम हुआ कि पदार्थ का हवा के एक विशेष तत्व ऑक्सीजन से संयोग करना ही जलना है। लोहे में जंग लगता है। इस क्रिया में भी लोहा ऑक्सीजन के साथ संयोग करता है। रासायनिक तुला के उपयोग ने रासायनिक परिवर्तनों के अध्ययन में सहायता दी। पानी के विद्युत-अपघटन से हेनरी कैवेंडिश (Cavendish, १७३१-१८१० ई.) ने १७८१ ई. में हाइड्रोजन प्राप्त किया। जोज़ेफ ब्लैक (Black, १७२८-१७९९ ई.) ने कार्बन डाइऑक्सइड और कार्बोनेटों पर प्रयोग किए (१७५४ ई.)।

जोज़ेफ प्रीस्टले (Priestley, १७३३-१८०४ ई.), शेले (Scheele) और लाब्बाज़्ये (Lavoisier, १७४३-१७९४ ई.) ने १७७२ ई. के लगभग ऑक्सीजन तैयार किया। राबर्ट बॉयल (Boyle, १६२७-१६९१ ई.) ने तत्वों की परिभाषा दी, जॉन डाल्टन (Dalton, १७६६-१८४४ ई.) ने परमाणुवाद की स्पष्ट कल्पना सामने रखी, आवोगाद्रो (Avogadro, १७७६-१८५६ ई.), कैनिज़ारो (Cannizzaro, १८२६-१९१० ई.) आदि ने अणु और परमाणु का भेद बताया। धीरे धीरे तत्वों की संख्या बढ़ने लगी। अनेक धातु और अधातु तत्व इस सूची में सम्मिलित किए गए। बिखरे हुए तत्वों का वर्गीकरण न्यूलँड्स (Newlands, १८६३ ई.), लोथरमेयर (Lothermeyer, १८३०-१९०७ ई.) और विशेषतया मेंडलीफ (Mendeleev, १८३४-१९०७ ई.) ने किया। मेंडेलीफ ने अनेक अप्राप्त तत्वों के संबंध में भविष्यद्वाणी भी की। बाद में वे तत्व बिलकुल ठीक वैसे ही मिले, जैसा कहा गया था। डेवी (Davy, १७७८-१८२९ ई.) और फराडे (Faraday, १७९१-१८६७ ई.) ने गैसों और गैसों के द्रवीकरण पर काम किया। इस प्रकार रसायन शास्त्र का सर्वतोमुखी विकास होने लगा।

इस पश्चिमी रसायन के दो उपांग थे : इनॉर्गैनिक (अजैव पदार्थों से संबंधित) और ऑर्गेनिक (सजीव पदार्थों से संबंधित)। शर्करा, वसा, मोम, फलों में पाए जानेवाले अम्ल, प्रोटीन, रंग आदि सब सजीव रसायन के अंग थे। लोगों का विश्वास था कि ये पदार्थ प्रकृति स्वयं अपनी प्रयोगशाला में संश्लेषित नहीं हो सकते। रसायनज्ञों ने इन पदार्थों का विश्लेषण प्रारंभ किया। कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन, इन चार तत्वों के योग से बने हुए सहस्रों यौगिकों से रसायनज्ञों का परिचय हुआ। पता चला कि किसी यौगिक को समझने के लिए केवल इतना ही आवश्यक नहीं है कि इस यौगिक में कौन कौन से तत्व किस अनुपात में है, यह भी जानना आवश्यक है कि यौगिक के अणु में इन तत्वों के परमाणु किस क्रम में सज्जित है। इनका रचनाविन्यास जानना आवश्यक हो गया। फ्रैंकलैड (Frankland, १८२५-१८९७ ई.), ज़्हेरार (Gerhardt), लीबिख (Liebig), द्यूमा (Dumas), बर्ज़ीलियस (Berzelius) आदि रसायनज्ञों ने इन यौगिकों में पाए जानेवाले मूलकों की खोज की, जैसे मेथिल, एथिल, मेथिलीन, कार्बोक्सिल इत्यादि। इस प्रकार सजीव पदार्थों के आधार की इटों (building blocks) का पता चल गया, जिनके रचनाविन्यास द्वारा विभिन्न यौगिकों की विद्यमानता संभव हुई। केकूले (Kekule) ने १८६५ ई. में खुली शृंखला के यौगिकों के साथ साथ बंद श्रृंखला के यौगिकों का भी प्रतिपादन किया (बेन्ज़ीन की संरचना)। बंद श्रृंखलाओं के यौगिकों ने कार्बनिक रसायन में एक नए युग का प्रवर्तन किया। नेफ्थालीन, क्विनोलीन, एंथ्रासीन आदि यौगिकों में एक से अधिक वलयों का समावेश हुआ।

फ्रेडरिक वलर ने सबसे पहले एक कार्बनिक यौगिक (यूरिया) का संश्लेषण किया

कार्बनिक रसायन का एक महत्वपूर्ण युग वलर (Wohler) की यूरिया-संश्लेषण-विधि से आरंभ होता है। १८२८ ई. में उन्होंने इनॉर्गैनिक या अजैव रसायन के ढंग की विध से अमोनियम सायनेट, (NH4CHO), बनाना चाहा। उसने देखा कि अमोनियम सायनेट ताप के भेद से अनुकूल परिस्थितियों में यूरिया (H2N. CO. NH2) में स्वत: परिणत हो जाता है।

अब तक यूरिया केवल जैव जगत्‌ का सदस्य माना जाता था। वलर ने अपने इस संश्लेषण से यह सिद्ध कर दिया कि जैव रसायन में जिन यौगिकों का प्रतिपादन किया जाता है, उनका भी संश्लेषण रासायनिक विधियों से प्रयोगशालाओं में हो सकता है। इस नवीन कल्पना ने जैव रसायन को एक नया रूप दिया। जैव रसायन का जीव से संबंध न रहा। अब जैव रसायन कार्बनिक रसायन मात्र रह गया और इसलिए अजैव रसायन को हम लोग अकार्बनिक रसायन कहने लगे। वैसे तो कार्बनिक और अकार्बनिक दोनों रसायनों के बीच का भेद अब सर्वथा मिट चुका है।

द्रव्य निर्माण के मूल तत्व[संपादित करें]

संसार में इतने विभिन्न पदार्थ इतनी विभिन्न विधियों से विभिन्न परिस्थितियों में तैयार होते रहते हैं कि आश्चर्य होता है। जो भोजन हम ग्रहण करते हैं, वह शरीर में रुधिर, मांस, वसा, विविध ग्रंथिरस, अस्थि, मज्जा, मलमूत्र आदि में परिणत होता है। भोज्य पदार्थ वनस्पतियों के शरीर में तैयार होते हैं। भोजन के सृजन और विभाजन का चक्र निरंतर चलता रहता है। यह सब बताता है कि पकृति कितनी मितव्ययी है। रासायनिक अभिक्रियाओं का आधार द्रव्य की अविनाशिता का नियम है। रसायनज्ञ इस आस्था पर अपने रासायनिक समीकरणों का निर्माण करता है कि द्रव्य न तो बनाया जा सकता है और न इसका विध्वंस हो सकता है। द्रव्य का गुणधर्म उन अणुओं का गुणधर्म है जिनसे द्रव्य बना है। वे अणु स्वयं परमाणुओं से बने हैं। प्रकृति में सौ से ऊपर तत्व हैं। प्रत्येक तत्व के परमाणु परस्पर भिन्न हैं, पर भिन्नता भी आकस्मिक नहीं है। एक तत्व दूसरे तत्व से उत्तरोत्तर कुछ भिन्न होता जाता है। डाल्टन ने परमाणुवाद की नींव डाली। बॉयल ने तत्व की कल्पना दी। मोज़ले (Moseley) ने १९१३-१४ ई. में परमाणुसंख्या का महत्व बताया। प्रत्येक तत्व का एक क्रमांक, या परमाणुसंख्या है तथा यह परमाणुसंख्या पूर्णांक है। मेंडेलीफ की आवर्तसारणी में तत्वों का वर्गीकरण परमाणुभारों की अपेक्षा से किया गया था। मोज़लि के बाद परमाणुसंख्या का महत्व मिला और इस संख्या के हिसाब से तत्वों का आवर्त वर्गीकरण किया गया। यह नियम बड़ा महत्व पूर्ण था कि तत्वों के गुणधर्म उनकी परमाणुसंख्या के आवर्ती फलन है।

द्रव्य की अविनाशिता के नियम ने रासायनिक समीकरणों की पद्धति को जन्म दिया। वर्जीलियस (१७७९-१८४८ ई.) ने तत्वों की सकेतपद्धति को जन्म दिया। रसायनज्ञों न समीकरणों द्वारा एक नई भाषा निर्धारित की। रसायन के समीकरण रसयनविज्ञान की भाषा हैं। अणुओं के सूत्र और इन सूत्रों के आधार पर बने हुए समीकरणों द्वारा रसायनज्ञ दुरूह रासायनिक परिवर्तनों को व्यक्त करन का प्रयत्न करता है। जितना महत्वद्रव्य की अविनाशिता के इस नियम का था, उतना ही महत्व अभी ऊपर बताए गए आवर्ती नियम का भी हुआ। तत्वों और उनसे बने हुए यौगिकों के गुणधर्म आकस्मिक नहीं हैं। ये परमाणु संख्या पर निर्भर हैं।

यह परमाणुसंख्या केवल निराधार अंक नहीं है। यह परमाणु की रचना की द्योतक है। डाल्टन का परमाणु अविभाज्य था, पर १९वीं शती के अंत में पता चला कि यह अविभाज्य नहीं है। परमाणु स्वयं मिली जुली एक सत्ता है। परमाणु के केंद्र में एक नाभिक है, जिसमें परमाणु का लगभग समस्त भार निहित है और जिसपर धनात्मक आवेश रहता है। इस नाभि के चारों ओर इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते हैं। यह चक्कर वृत्ताकार परिधियों पर लगता है। ऐसी कल्पना नील्स बोर (Bohr) ने १९१३ ई. में दी। आर्नल्ड सोमरफेल्ड (Sommerfeld, १८६८-१९५१ ई.) ने कहा कि इन परिधियों में कुछ परिधियाँ दीर्घवृत्त या अंडाकार भी हो सकती हैं। श्रेडिंगर (Schrodinger, जन्म १८८७ ई.) ने बताया कि परमाणु और इलेक्ट्रॉन सभी तरंगमय हैं, और उसने इनकी स्थितियों को तरंग समीकरणों द्वारा व्यक्त किया। परमाणु के नाभिक पर कितना धन आवेश है और अमुक तत्व के परमाणु में कितने इलेक्ट्रॉन हैं, यह बात तत्व की परमाणुसंख्या से व्यक्त होती है।

बीसवीं शती में परमाणु के विभाजन पर कार्य हुआ, अर्थात्‌ परमाणु के नाभिक का विखंडन किया गया। अनेक प्रकार के सूक्ष्म खंड मिले, जिनका अध्ययन इस युग में रसायन और भौतिकी का स्वतंत्र उपांग बन गया। इस विखंडन में द्रव्य का कभी-कभी लोप, या तिरोभाव देखा गया। अलबर्ट आइंस्टाइन ने अपना प्रसिद्ध समीकरण बीसवीं शती के प्रथम दशक (१९०५ ई.) में ही दिया था :

ऊर्जा (ऊ) = द्रव्य भार x (प्रकाश का वेग), अथवा
E = mc2

अत: पता चल गया कि द्रव्य का विलोप होने पर कितनी ऊर्जा प्राप्त हो सकती है। आज का युग इस नाभिक ऊर्जा के उपयोग का युग हैं। इसका ध्वंसकारी रूप परमाणु बम विस्फोट में हुआ।

परमाणु नाभिकों के विखंडन से हमें निम्नलिखित खण्ड मिले :

इलेक्ट्रॉन - इस पर ४.८´१०-१० स्थि.वै.मा. (e.s.u.) अर्थात्‌ एक इकाई ऋण आवेश है। इसका भार ९.१´१०-२८ ग्राम (हाइड्रोजन परमाणु का १/१८३७) है।

पॉज़िट्रॉन - एंडरसन (Anderson) ने १९३२ ई. में इसकी खोज की। इसपर एक इकाई धनात्मक आवेश है। शेष बातों में यह इलेक्ट्रॉन के समान है। हमारे विश्व में ये पाज़िट्रॉन (e+, या इ+) क्षणभंगुर हैं। इलेक्ट्रॉनों (e-, या इ-) से अभिक्रिया कर दोनों विलुप्त हो जाते हैं, और इनसे विद्युच्चुंबकीय विकिरण मिलते हैं।

+ +- --> विद्युच्चुंबकीय विकिरण

प्रोटॉन - इसपर एक इकाई, अर्थात्‌ +४.८´१०-१० स्थि.वै.मा. (e.s.u.) धन अवेश रहता है। इसका भार १.६७´१०-२० ग्राम (या १.००८१ परमाणुभार इकाई) है। यह हाइड्रोजन परमाणु का नाभिक है।

न्यूट्रॉन - १९३२ ई. में चैडविक (Chadwick) ने इसकी खोज की। इसपर शून्य आवेश है। इसका १.००८९३ परमाणुभार इकाई है। वेरिलियम और ऐल्फा कणों के संघात से यह उत्पन्न होता है। इसकी अंत: भेदकता बहुत अधिक है।

न्यूट्रिनो - इसका भार भी लगभग शून्य है और आवेश भी शून्य है। इसकी कल्पना पाउलि (Pauli) ने प्रस्तुत की, जिसे आधार पर उसने बीटा कणों के अव्ह्रास के कोणीय आवेग समन्वय की व्याख्या की।

मेसॉन - १९३५ ई. में यूकावा (Yukawa) ने इनकी कल्पना प्रस्तुत की। मेसॉनों का भार इलेक्ट्रॉनों और प्रोटॉनों के बीच का है। कॉस्मिक (cosmic) या अंतरिक्ष किरणों में इनकी विद्यमानता पाई गई। मेसॉन कई प्रकार के हैं, जैसे पाई मेसॉन (p+, p-, p°) और म्यू मेसॉन (m+, m-)। धनात्मक पाई मेसॉन (p+) धन नाभिक से उतनी श्घ्रीा क्रिया नहीं करेगा जितना कि त्रणात्मक पाई मेसॉन (p-)। पाई मेसॉन इलेक्ट्रॉन से २८५ गुना भारी होते हैं और म्यू मेसॉन २१६ गुना।

नाभिक रसायन का युग[संपादित करें]

इन परमाणु विखंडों द्वारा ऐसे अनेक नए तत्वों का संश्लेषण भी हुआ है, जो प्रकृति में पाए नहीं जाते, पर जिनके अस्तित्व की संभावना हो सकती थी। संश्लेषित तत्व निम्न हैं (कोष्ठक में इनके परमाणुभार दिए हैं) :

टेक्नीशियम (४३) , प्रोमीथियम (८५) , फ्रांसियम (८७) , नेप्चूनियम (९३)
ऐमेरिकियम (९४) , क्यूरियम (९६) , बर्केलियम (९७) , कैलिफोर्नियम (९८)
आइंस्टाइनियम (९९) , फर्मियम (१००) , मेंडेलीवियम (१०१) , नोवेलियम (१०२)

मेंडेलीफ के समय में उसकी आवर्त सारणी में कुछ स्थान रिक्त थे। अब न केवल वे सब भर गए हैं, बल्कि यूरेनियम के बाद भी १० कृत्रिम तत्वों का इस सारणी में और समावेश किया गया है।

ऐस्टन (Aston) ने १९१९ ई. में समस्थानिकों (isotopes) को पृथक्‌ कर प्राउट (Prout) की उस कल्पना का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रत्येक तत्व हाइड्रोजन पूर्णसंख्या होनी चाहिए। ऐस्टन के इन प्रयोगों के फलस्वरूप न केवल समस्थानिकों को पृथक्‌ करने का ही प्रयास किया गया, बल्कि उनके गुणधर्मों का अध्ययन भी किया गया। यूरि (Urey) के प्रयोगों के फलस्वरूप साधारण हाइड्रोजन से बने हुए पानी के भीतर ही भारी हाइड्रोजन के भी अस्तित्व का पता चला (१९२९ ई.)। हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक, जिनको क्रमश: हाइड्रोजन, ड्यूटीरियम, और ट्रिशियम (T) कहते हैं, क्रमश: १, २, और ३ परमाणुभार के हैं, पर उन सब की परमाणुसंख्या १ ही है (अर्थात्‌ नाभिक पर एक इकाई धनात्मक आवेश हैं, 1H1, 1D2, 1T3) भारी हाइड्रोजन और भारी पानी का महत्व इस परमाणु युग में बहुत बढ़ गया है, क्योंकि इनकी सहायता से न्यूट्रॉनों की गति में सामंजस्य (moderation) लाया जा सकता है। न्यूट्रॉनों की सहायता से अनेक नए समस्थानिकों का सृजन भी कृत्रिम विधियों से किया गया है। कृत्रिम रेडियेऐक्टिव आयोडीन, कार्बन१४ आदि, जिनका उपयोग चिकित्साकार्य में एवं रासायनिक अभिक्रियाओं के अध्ययन में बढ़ रहा है। कार्बन१४ की सहायता से भूवैज्ञानिक युगों की तिथियों का निर्धारण करने में सहायता मिलती हैं।

साधारण यूरेनियम-२३८ में थोडी सी मात्रा यूरेनियम-२३५ की भी मिलती है, जो यूरेनियम का ही एक समस्थानिक है। इस समस्थानिक का उपयोग परमाणु बम में किया गया। न्यूट्रॉनों के सघात से यह समस्थानिक बेरिय-१३९ और क्रिप्टॉन-९४ में विखंडित हुआ, कुछ न्यूट्रॉन नाभिक में से बाहर निकले और कुछ द्रव्य का लोप हुआ, जिसकी ऊर्जा बनी।

एक एक विखंडन क्रिया में १८०-२०० मिली इलेक्ट्रॉन वोल्ट, अर्थात्‌ (१.८-२.०)´१०८ इलेक्ट्रॉन बोल्टा, ऊर्जा प्राप्त होती है। साधारण यूरेनिय में से यूरेनियम-२३५ का पृथक्‌ करना सरल कार्य न था, पर अतुल संपत्ति का व्यय करके द्वितीय महायुद्ध के समय यह श्रमसाध्य कार्य भी सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।

नाभिकों के विखंडन का कार्य जितने महत्व का है, नाभिकों के सघनन का कार्य उससे कम नहीं है। हल्के तत्वों के परमाणु परस्पर संयुक्त होकर कुछ भारी तत्व भी दे सकते हैं। इन प्रक्रियाओं को संलयन प्रक्रिया, या संघनन प्रक्रिया कहते हैं। इन प्रक्रियाओं के लिए लाखों, करोड़ों डिगरी ताप की आवश्यता होती है, पर एक बार प्रक्रिया का आरंभ होने पर प्रक्रिया में स्वत: उच्च ताप की ऊष्मा प्राप्त होने लगती है। इन्हीं प्रक्रियाओं के कारण सूर्य ऊष्मा का भंडार है। कार्बन द्वारा उत्प्रेरित होकर सूर्य में हाइड्रोजन से हीलियम बनता रहता है।

जिन हाइड्रोजन बमों के आतंक की इस युग में इतनी चर्चा है, वह भी लगभग इसी प्रकार की नाभिक संघनन या नाभिकीय संलयन प्रक्रियाओं द्वारा बनते हैं, जिनमें भारी हाइड्रोजन, (1H2) के नाभिक भाग लेते हैं। हाइड्रोजन बम परमाणु विखंडन से प्राप्त बमों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रबल और ध्वंसकारी हैं।

भारत में रसायन की परम्परा[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]