हैहयराय चन्द्रवर्मन चन्देल

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
चन्द्र-वर्मन:
नृपति, महिपति, हैहयाधिपति
Haihaya king Chandra-Varman Chandel.jpg
चन्द्रवर्मन चन्देल
महोबा के राजा
शासनावधि831-845 ई0
पूर्ववर्तीहैहयराय भूभुजामवर्मन चन्देल
उत्तरवर्तीवाक्पति चन्देल
महारानीअरन्या देवी, (रघुवंशी राजकुमारी)
पुत्र
पूरा नाम
हैहयराय चन्द्रवर्मन चन्देल
शासनावधि नाम
नन्नूकदेव
घराना हैहय, चन्द्रवंश
राजवंशचन्देल
पिता
माताहेमावती (कान्यकुब्ज ब्राह्मण)
धर्मवैष्णव धर्म, हिन्दू

चन्द्रवर्मन या चन्द्रवर्मन चन्देल (831-845 ई0)(उपनाम नन्नुकदेव) चंदेरी के राजा थे। उन्होंने महोबा नगर को बसा उसे अपनी राजधानी बना जेजाकभूक्ति के चन्देल राजवंश की स्थापना की। महोबा के शीलालेख के अनुसार वे चन्द्र देव के मानस पुत्र थे। वो महोबा के चन्देल राजवंश के प्रथम महान एवं अत्यंत प्रजापाल राजा थे। उन्होंने अरबों के खिलाफ प्रतिहार राजाओं का साथ दिया एवं अरबों को खदेड़ने में कामयाब रहे।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

खजुराहों के शिलालेख के अनुसार जेजाकभुक्ति के चन्देल राजवंश के संस्थापक चन्द्रवर्मन का जन्म चन्द्रवंशी यादवों की प्रमुख शाखा वृष्णीकुल (हैहय) में हुआ था। चन्द्रवर्मन के पिता का नाम भूभुजामवर्मन चन्देल एवं माता का नाम हेमावती था, जो की काशी के राजा के ब्राम्हण पुरोहित हेमराज की पुत्री थी।

कुल का परिचय[संपादित करें]

चन्देल राजपुत या क्षत्रिय मूलत: हैहयवंश के ब्रम्हक्षत्रिय थे (श्रेष्ठता में ब्राम्हण के समान क्षत्रिय), जिस कारण वो कुछ पीढ़ी का अंतराल देकर चन्द्रात्रेय गोत्रिय यानी राजवंश के चन्देल राजपुत ब्राम्हण कन्या से विवाह कर सकते थे, इस कारण राजा भूभुजामवर्मन चन्देल और ब्राम्हणी हेमावति का पुत्र चन्द्रवर्मन चन्देल वर्णसंकर नही हुआ उल्टा खजुराहो के ताम्रपत्रो में ब्राम्हणों ने उसकी रक्त शुद्धता की तुलना उनके पूर्वज भगवान चन्द्रदेव से की।[1] [2]


चन्द्रवर्मन अपने पिता के समान तेजस्वी, वीर और पराक्रमी था। सोलह वर्ष की आयु में, वह एक शेर या बाघ को बिना हथियार के मार सकता था। पुत्र के असाधारण पराक्रम को देखकर हेमावती ने भगवान चन्द्रदेव की कठोर तपस्या की, जिन्होंने चन्द्रवर्मन को पत्थर का एक पत्थर भेंट किया और उन्हें खजुराहो एवं महोबा का राजा बनाया। पारस पत्थर से लोहे को सोना बनाया जा सकता था।[3][4]

राज्यकाल[संपादित करें]

शिलालेखो के अनुसार अपने पिता राजा भूभुजामवर्मन चन्देल की मृत्यु के वक्त वो 6 वर्ष के थे। 831 ईस्वी में 16 वर्ष के आयु में उनके मानस पिता भगवान चन्द्रनारायण ने महोबा के राजसिंहासन पे उनका राज्याभिषेक किया जो की महोबा के मंदिर में इंकित है। जेजाकभुक्ति के चन्देल राजवंश के प्रथम महान एवं अत्यंत प्रजापाल राजा थे। यहां तक की उनकी प्रजा ने ऐसे राजा को पाकर उनके जन्मदिवस पे महोबा का महोत्सव यानी महोबा का त्योहार एवं मेला शुरू कराया। उन्होंने अरबों के खिलाफ प्रतिहार राजाओं का साथ दिया एवं अरबों को खदेड़ने में कामयाब रहे। चन्द्रवर्मन सोलह वर्ष की आयु में, वह एक शेर या बाघ को बिना हथियार के मार सकते थे। चन्द्रवर्मन ने उत्तराधिकार में लगातार कई युद्ध जीते। उसने कालिंजर का विशाल किला बनवाया। अपनी माँ के कहने पर, चन्द्रवर्मन ने खजुराहो में तालाबों और उद्यानों से आच्छादित 85 अद्वितीय स्वर्ण मंदिरों का निर्माण किया और अपनी ब्रह्मक्षत्रिय स्थिति को जारी रखने के लिए यज्ञ किया। चन्द्रवर्मन और उनके उत्तराधिकारियों ने खजुराहो में कई मंदिरों का निर्माण करवाया। [5][6]

चन्द्रवर्मन ने चन्देल राज्य की सीमित प्रभुत्व दूरी बेतवा से नर्मदा से यमुना के बीच (विंध्याचल) में 35 भव्य किले बनवाए एवं कालिंजर का किला बनवा कर उसे अपनी राजधानी बनाई।[7]

चन्द्रवर्मन ने कई बार अरबों के आक्रमण को रोका। उनके तीरंदाजी कौशल की तुलना महान नायक अर्जुन से करता है । यह उनकी विनम्रता और उदारता की प्रशंसा करता है, और उन्हें "अपनी प्रजा का आनंद" कहता है। [8]

  1. Parmaalraso 1189, पृ॰ Jagnikarao.
  2. chandrodayanatakam 1089, पृ॰प॰ 450.
  3. Dixit, Ram Swaroop (1992). Marketing Geography in an Urban Environment (अंग्रेज़ी में). Pointer Publishers. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7132-051-6.
  4. Pradesh (India), Madhya; Krishnan, V. S. (1982). Madhya Pradesh District Gazetteers: Dhar (अंग्रेज़ी में). Government Central Press.
  5. Dixit, Ram Swaroop (1992). Marketing Geography in an Urban Environment (अंग्रेज़ी में). Pointer Publishers. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7132-051-6.
  6. Pradesh (India), Madhya; Krishnan, V. S. (1982). Madhya Pradesh District Gazetteers: Dhar (अंग्रेज़ी में). Government Central Press.
  7. Calcutta Review (अंग्रेज़ी में). University of Calcutta. 1927.
  8. Dikshit, R. K. (1976). The Candellas of Jejākabhukti (अंग्रेज़ी में). Abhinav Publications. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7017-046-4.