श्रीरंग द्वितीय
| श्रीरंग द्वितीय | |
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| विजयनगर के राजा | |
| शासनावधि | अक्टूबर 1614 – फ़रवरी 1615 |
| पूर्ववर्ती | वेंकट द्वितीय |
| उत्तरवर्ती | जग्गा राय (वास्तविक) |
| निधन | फ़रवरी 1615 वेल्लूर, विजयनगर |
| संतान | रामदेव राय |
| पिता | रामदेव |
| विजयनगर साम्राज्य | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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श्रीरंग द्वितीय (उर्फ़ श्रीरंग चिका राय) (निधन फ़रवरी 1615) वेंकट द्वितीय द्वारा विजयनगर साम्राज्य में अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त राजा थे। उनकी नियुक्ति सन् 1614 में हुई। श्रीरंग को अपने रेचेर्ला वेलमा वंश के प्रमुख यचमा नायक का समर्थन प्राप्त था।
विद्रोह और हत्या
[संपादित करें]वेंकट द्वितीय के संभावित उत्तराधिकारी की उपस्थिति ने स्थिति को और भी बिगाड़ दिया। जग्गा राया अपने दो अधीनस्थों के साथ विद्रोह करते हुये श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को पकड़कर वेल्लोर किले में कारागार में डाल दिया और पूर्व सम्राट के नाम वाले पुत्र को नाममत्र का सम्राट बना दिया।
अंत में, यचामा नायक ने वेल्लोर किले के एक कप्तान से मिलकर रक्षकों को मारने और श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को रिहा करने की योजना बनाई। रक्षकों को मार दिया लेकिन यह समाचार जग्गा राय के पास पहुँच गया और यचमा नायक के उद्देश्य प्राप्त करने से पहले ही जग्गा राय वहाँ पहुँच गया। जग्गा ने चिन्ना ओबो नामक अपने भाई को आदेश दिया कि वो श्रीरंग द्वितीय को अपने परिवार की हत्या करने के लिए मनाये या फिर उन्हें स्वयं ही मार दे। दुखी श्रीरंग ने चिन्ना ओबो के प्रस्ताव को स्वीकार किया और पहले अपने परिवार की हत्या की एवं बाद में स्वयं को आत्यहत्या को प्राप्त किया।
यचमा नायक ने जग्गा राय की योजनाओं का विरोध किया और एक धोबी की मदद से श्रीरंग द्वितीय के 12 वर्षीय दूसरे पुत्र राम को चुपके से किले के बाहर निकाल लिया। हालांकि यचमा नायडू द्वारा श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को भूमिगत सुरंग के जरिए भगाने की एक उत्तरोत्तर कोशिश का खुलासा हो गया, जिससे श्रीरंग द्वितीय की बंदीगिरी और अधिक कठोर हो गई।[1]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Journal of Indian History Volumes 5-6. 1927. pp. 174, 175.
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