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श्रीरंग द्वितीय

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श्रीरंग द्वितीय
विजयनगर के राजा
शासनावधिअक्टूबर 1614 फ़रवरी 1615
पूर्ववर्तीवेंकट द्वितीय
उत्तरवर्तीजग्गा राय (वास्तविक)
निधनफ़रवरी 1615
वेल्लूर, विजयनगर
संतानरामदेव राय
पितारामदेव
विजयनगर साम्राज्य
संगम राजवंश
हरिहर राय प्रथम 1336-1356
बुक्क राय प्रथम 1356-1377
हरिहर राय द्वितीय 1377-1404
विरुपाक्ष राय 1404-1405
बुक्क राय द्वितीय 1405-1406
देव राय प्रथम 1406-1422
रामचन्द्र राय 1422
वीर विजय बुक्क राय 1422-1424
देव राय द्वितीय 1424-1446
मल्लिकार्जुन राय 1446-1465
विरुपाक्ष राय द्वितीय 1465-1485
प्रौढ़ राय 1485
शाल्व राजवंश
शाल्व नृसिंह देव राय 1485-1491
थिम्म भूपाल 1491
नृसिंह राय द्वितीय 1491-1505
तुलुव राजवंश
तुलुव नरस नायक 1491-1503
वीरनृसिंह राय 1503-1509
कृष्ण देव राय 1509-1529
अच्युत देव राय 1529-1542
सदाशिव राय 1542-1570
अराविदु राजवंश
आलिया राम राय 1542-1565
तिरुमल देव राय 1565-1572
श्रीरंग प्रथम 1572-1586
वेंकट द्वितीय 1586-1614
श्रीरंग द्वितीय 1614-1614
रामदेव अरविदु 1617-1632
वेंकट तृतीय 1632-1642
श्रीरंग तृतीय 1642-1646

श्रीरंग द्वितीय (उर्फ़ श्रीरंग चिका राय) (निधन फ़रवरी 1615) वेंकट द्वितीय द्वारा विजयनगर साम्राज्य में अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त राजा थे। उनकी नियुक्ति सन् 1614 में हुई। श्रीरंग को अपने रेचेर्ला वेलमा वंश के प्रमुख यचमा नायक का समर्थन प्राप्त था।

विद्रोह और हत्या

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वेंकट द्वितीय के संभावित उत्तराधिकारी की उपस्थिति ने स्थिति को और भी बिगाड़ दिया। जग्गा राया अपने दो अधीनस्थों के साथ विद्रोह करते हुये श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को पकड़कर वेल्लोर किले में कारागार में डाल दिया और पूर्व सम्राट के नाम वाले पुत्र को नाममत्र का सम्राट बना दिया।

अंत में, यचामा नायक ने वेल्लोर किले के एक कप्तान से मिलकर रक्षकों को मारने और श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को रिहा करने की योजना बनाई। रक्षकों को मार दिया लेकिन यह समाचार जग्गा राय के पास पहुँच गया और यचमा नायक के उद्देश्य प्राप्त करने से पहले ही जग्गा राय वहाँ पहुँच गया। जग्गा ने चिन्ना ओबो नामक अपने भाई को आदेश दिया कि वो श्रीरंग द्वितीय को अपने परिवार की हत्या करने के लिए मनाये या फिर उन्हें स्वयं ही मार दे। दुखी श्रीरंग ने चिन्ना ओबो के प्रस्ताव को स्वीकार किया और पहले अपने परिवार की हत्या की एवं बाद में स्वयं को आत्यहत्या को प्राप्त किया।

यचमा नायक ने जग्गा राय की योजनाओं का विरोध किया और एक धोबी की मदद से श्रीरंग द्वितीय के 12 वर्षीय दूसरे पुत्र राम को चुपके से किले के बाहर निकाल लिया। हालांकि यचमा नायडू द्वारा श्रीरंग द्वितीय और उनके परिवार को भूमिगत सुरंग के जरिए भगाने की एक उत्तरोत्तर कोशिश का खुलासा हो गया, जिससे श्रीरंग द्वितीय की बंदीगिरी और अधिक कठोर हो गई।[1]

सन्दर्भ

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  1. Journal of Indian History Volumes 5-6. 1927. pp. 174, 175.