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कृष्णदेवराय

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श्रीकृष्णदेवराय
महाराजाधिराज
कन्नड़ राज्य राम रमण
आंध्र भोज
दक्षिण समुद्राधीश्वर
हिंदू धर्म धारक
गौब्राह्मण प्रतिपालक
विजयनगर का सम्राट
शासनावधि२६ जुलाई १५०९ – १७ अक्टूबर १५२९
राज्याभिषेक२३/२४ जनवरी १५१०
पूर्ववर्तीवीरनरसिंहराय
उत्तरवर्तीअच्युतदेवराय
जन्म17 जनवरी 1471
विजयनगर साम्राज्य
(आधुनिक दिन हम्पी, कर्नाटक, भारत)
निधन17 अक्टूबर 1529(1529-10-17) (उम्र 58 वर्ष)
विजयनगर साम्राज्य
(आधुनिक दिन हम्पी, कर्नाटक, भारत)
संगिनीतिरुमाला देवी
चिन्ना देवी
अन्नपूर्णा देवी
संतान
  • तिरुमलम्बा (तिरुमाला देवी के गर्भ से)
  • वेंगलम्बा (चिन्ना देवी के गर्भ से)
  • तिरुमलराय (तिरुमाला देवी के गर्भ से)
राजवंशतुलुव
पितातुलुव नरसा नायक
मातानगला देवी
धर्महिंदू धर्म (वैष्णव)
हस्ताक्षरश्रीकृष्णदेवराय के हस्ताक्षर
सैन्य सेवा
निष्ठा विजयनगर साम्राज्य
सेवा वर्ष १५०९१५२९
युद्ध/झड़पें

कृष्णदेवराय (१७ जनवरी १४७१ – १७ अक्टूबर १५२९) विजयनगर के सर्वाधिक कीर्तिवान सम्राट थे। वे स्वयं कवि और कवियों के संरक्षक थे। तेलुगु भाषा में उनका काव्य अमुक्तमाल्यद साहित्य का एक रत्न है। इनकी भारत के प्राचीन इतिहास पर आधारित पुस्तक वंशचरितावली तेलुगू के साथ-साथ संस्कृत में भी मिलती है। संभवत तेलुगू का अनुवाद ही संस्कृत में हुआ है। तेलुगु भाषा के आठ प्रसिद्ध कवि इनके दरबार में थे जो अष्टदिग्गज के नाम से प्रसिद्ध थे। स्वयं कृष्णदेवराय भी आंध्रभोज के नाम से विख्यात थे। प्रख्यात इतिहासकार तेजपाल सिंह धामा ने हिन्दी में इनके जीवन पर प्रामाणिक उपन्यास आंध्रभोज लिखा है।

जिन दिनों वे सिंहासन पर बैठे उस समय दक्षिण भारत की राजनीतिक स्थिति डाँवाडोल थी। पुर्तगाली पश्चिमी तट पर आ चुके थे। कांची के आसपास का प्रदेश उत्तमत्तूर के राजा के हाथ में था। उड़ीसा के गजपति नरेश ने उदयगिरि से नेल्लोर तक के प्रांत को अधिकृत कर लिया था। बहमनी राज्य अवसर मिलते ही विजयनगर पर आक्रमण करने की ताक में था।[1][2] सम्राट कृष्णदेवराय ने इस स्थिति का अच्छी तरह सामना किया। दक्षिण की राजनीति के प्रत्येक पक्ष को समझनेवाले और राज्यप्रबंध में अत्यंत कुशल श्री अप्पाजी को उन्होंने अपना प्रधान मंत्री बनाया। उत्तमत्तूर के राजा ने हारकर शिवसमुद्रम के दुर्ग में शरण ली। किंतु कावेरी नदी उसके द्वीपदुर्ग की रक्षा न कर सकी। कृष्णदेवराय ने नदी का बहाव बदलकर दुर्ग को जीत लिया। बहमनी सुल्तान महमूदशाह को उन्होंने बुरी तरह परास्त किया। रायचूड़, गुलबर्ग और बीदर आदि दुर्गों पर विजयनगर की ध्वजा फहराने लगी। किंतु प्राचीन हिंदु राजाओं के आदर्श के अनुसार महमूदशाह को फिर से उसका राज लौटा दिया और इस प्रकार यवन राज्य स्थापनाचार्य की उपाधि धारण की। १५१३ में उन्होंने उड़ीसा पर आक्रमण किया और उदयगिरि के प्रसिद्ध दुर्ग को जीता। कोंडविडु के दुर्ग से राजकुमर वीरभद्र ने कृष्णदेवराय का प्रतिरोध करने की चेष्टा की पर सफल न हो सका। उक्त दुर्ग के पतन के साथ कृष्ण तक का तटीय प्रदेश विजयनगर राज्य में सम्मिलित हो गया। उन्होंने कृष्णा के उत्तर का भी बहुत सा प्रदेश जीता। १५१९ में विवश होकर गजपति नरेश को कृष्णदेवराय से अपनी कन्या का विवाह करना पड़ा। सम्राट कृष्णदेवराय ने कृष्णा से उत्तर का प्रदेश गजपति को वापस कर दिया। जीवन के अंतिम दिनों में कृष्णदेवराय को अनेक विद्रोहों का सामना करना पड़ा। उसके पुत्र तिरुमल की विष द्वारा मृत्यु हुई।

सम्राट कृष्णदेवराय ने अनेक प्रसादों, मंदिरों, मंडपों और गोपुरों का निर्माण करवाया। रामस्वामीमंदिर के शिलाफलकों पर प्रस्तुत रामायण के दृश्य दर्शनीय हैं।

सन्दर्भ

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  1. A Social History of the Deccan, 1300-1761: Eight Indian Lives, by Richard M. Eaton p.90
  2. A Social History of the Deccan, 1300-1761: Eight Indian Lives, by Richard M. Eaton p.88

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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