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नृसिंह राय द्वितीय

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नृसिंह राय द्वितीय
सम्राट
विजयनगर के राजा
शासनावधि1491 – 1505 ईस्वी
पूर्ववर्तीथिम्म भूपाल
उत्तरवर्तीवीरनृसिंह राय
राजवंशसुलुव
पितासुलुव नृसिंह द्वितीय
धर्महिन्दू धर्म
विजयनगर साम्राज्य
संगम राजवंश
हरिहर राय प्रथम 1336-1356
बुक्क राय प्रथम 1356-1377
हरिहर राय द्वितीय 1377-1404
विरुपाक्ष राय 1404-1405
बुक्क राय द्वितीय 1405-1406
देव राय प्रथम 1406-1422
रामचन्द्र राय 1422
वीर विजय बुक्क राय 1422-1424
देव राय द्वितीय 1424-1446
मल्लिकार्जुन राय 1446-1465
विरुपाक्ष राय द्वितीय 1465-1485
प्रौढ़ राय 1485
शाल्व राजवंश
शाल्व नृसिंह देव राय 1485-1491
थिम्म भूपाल 1491
नृसिंह राय द्वितीय 1491-1505
तुलुव राजवंश
तुलुव नरस नायक 1491-1503
वीरनृसिंह राय 1503-1509
कृष्ण देव राय 1509-1529
अच्युत देव राय 1529-1542
सदाशिव राय 1542-1570
अराविदु राजवंश
आलिया राम राय 1542-1565
तिरुमल देव राय 1565-1572
श्रीरंग प्रथम 1572-1586
वेंकट द्वितीय 1586-1614
श्रीरंग द्वितीय 1614-1614
रामदेव अरविदु 1617-1632
वेंकट तृतीय 1632-1642
श्रीरंग तृतीय 1642-1646

नृसिंह राय द्वितीय (शासन 1491-1505) (जन्म = 1468)( नृसिंह द्वितीय, इम्मडी नरसिंहा राय अथवा धम्म थिम्मा राय)[1] विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंशों में दूसरे राजवंश सुलुव राजवंश के तीसरे और अंतिम राजा थे।

पृष्ठभूमि

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नृसिंह के पिता का नाम भी नृसिंह ही था जो संगम राजवंश में सैन्य जनरल के रूप सेवायें देते थे। संगम राजवंश की स्थापना 13वीं सदी में हुई थी। संगमा राजवंश विभिन्न कारणों से समय के साथ कमजोर होता गया और सन् 1485 में पिता नृसिंह ने तात्कालिक राजा संगम प्रौढ़ राय को हटाकर राजधानी पर कब्जा कर लिया और शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इस सैन्य कार्यवाही की अगुवाही उनके वफादार अधीनस्थ तुलुव नरस नायक ने की।

पिता नृसिंह को सम्राट घोषित किया गया और उन्हें शाल्व नृसिंह देव राय के नाम से जाना गया। सन् 1491 में राजगद्दी प्राप्त करने के छः वर्ष के उपरांत ही उनका निधन हो गया और उत्तराधिकारी के रूप में दो जवान बच्चे छोड़ गये। मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपने वफादार तुलुव नरस नायक को उनके बच्चों का ध्यान रखने के लिए कहा था। पिता की मृत्यु के कुछ माह पश्चात् ही संगम राजवंश के एक वफादार सैनिक कमांडर ने उनके बड़े बेटे थिम्म भूपाल की हत्या कर दी। इस तरह उनका दूसरा बेटा नृसिंह राजा बने।

शासनकाल

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नृसिंह द्वितीय बड़े भाई की हत्या के बाद राजगद्दी पर आये। वो जब विजननगर के राजा बने तब तक उनकी आयु बहुत कम थी और वास्तविक अधिकार उनके संरक्षक और अनुभवी राज-प्रतिनिधि तुलुव नरस नायक के हाथ में था। बारह वर्षों तक यह दौर जारी रहा और सन् 1503 में तुलुव नरस नायक का निधान हो गया। इस समय तक नृसिंह द्वितीय जवान हो चुके थे और राज-प्रतिनिधि नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं था। फिर भी पूर्व राज-प्रतिनिधि के बड़े बेटे तुलुव वीर नृसिंह राय राजगद्दी के निकट शक्तिशाली रहे क्योंकि सैन्य शक्ति उन्ही के अधीन थी। उन्होंने नृसिंह द्वितीय को उन्हें दलवायी (सेना का कमांडर-इन-चीफ) तथा सर्वाधिकारी ("प्रशासनिक जनरल", प्रभावि रूप से राजप्रतिनिधि) घोषित करने के लिए मजबूर किया।

नृसिंह द्वितीय और प्रधानमंत्री तुलुव वीर नृसिंह के बीच तनाव का माहौल विकसीत होने लग गया। दोनों ही अपने आप को राज्य का वास्तविक अधिकारी समझने लग गये। चूँकि नृसिंह द्वितीय को तुलुव नृसिंह के पिता ने ही राजा बनाया था।

अंततः पूर्व राज-प्रतिनिधि तुलुव नरस नायक के निधन के दो वर्ष बाद ही सन् 1505 में पेनुकोंडा के महल में नृसिंह द्वितीय की हत्या कर दी गयी। माना जाता है कि यह हत्या वीर नृसिंह राय ने की। उनके निधन के साथ ही सुलुव राजवंश के शासन का अंत हो गया और पिता व दोनों पुत्रों को मिलाकर इस राजवंश ने केवल 20 वर्ष तक शासन किया।

नृसिंह द्वितीय के निधन के बाद उनके दलवयी तुलुव वीर नृसिंह राय विजयनगर की राजगद्दी पर दावा किया और तुलुव राजवंश का उदय हुआ।

टिप्पणी

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  1. Majumdar R.C. (2006). The Delhi Sultanate, Mumbai: Bharatiya Vidya Bhavan, p. 305

सन्दर्भ

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  • Suryanath U. Kamath, A Concise history of Karnataka from pre-historic times to the present, Jupiter books, MCC, Bangalore, 2001 (Reprinted 2002) OCLC: 7796041
पूर्वाधिकारी
थिम्म भूपाल
विजयनगर साम्राज्य
1491 1505
उत्तराधिकारी
तुलुव नरस नायक