बामसेफ

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बामसेफ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछडे व इन समुदायों के धर्मांतरित अल्‍पसंख्‍यकों के कर्मचारियों का अखिल भारतीय संगठन है। जो व्यवस्था भारत में व्याप्त गैरबराबरी को दूर कर बराबरी स्थापित करना चाहती है।

इतिहास[संपादित करें]

इसकी स्‍थापना 1973 में मान्‍यवर कांशीराम और डी.के. खरपडे ने की। कांशीराम ने दलितों को एकताबद्ध कर, अत्याचारों का प्रतिरोध करने तथा उन्हें समाज में न्यायोचित स्थान बनाने के लिये जोरदार ढंग से प्रेरित किया। आजकल यह संगठन 'मूलनिवासी बहुजन संघ' के नाम से जाना जाता है।[1] बीच में कमजोर पड गई बामसेफ को बाबासाहब अंबेडकर के जन्म दिन 14 अप्रैल को सन् 1978 में पुनः सशक्त बनाने का प्रयास किया गया। बामसेफ से कांशीराम ने दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में दलित कर्मचारियों का संगठन मजबूत बनाया। इसके पश्चात 6 दिसम्बर को डीएस 4 की स्थापना की। कांशीराम ने नारा दिया ‘ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डी एस 4’। इसी क्रम में सन 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की गई। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद सन 1993 में विधान सभा के चुनाव में बसपा और सपा गठबंधन ने 67 सीटें जीतीं। यह भारतीय राजनीति के इतिहास में किसी दलित बाहुल्य दल की जीती गईं सर्वाधिक सीटें थीं। पिछले दिनों बामसेफ व बहुजन समाज पार्टी के बीच मतभिन्‍नता दिखाई दी।[2]

विचारधारा[संपादित करें]

बामसेफ ब्राह्मणवाद को अपना मुख्‍य शत्रु मानते हुए महात्‍मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले और बाबासाहब अंबेडकर को अपना आदर्श पुरुष मानती है। बामसेफ के अनुसार समानताविरोधी शक्तियों से लडने के लिए सामाजिक बदलाव के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी आवश्‍यक है। बामसेफ का विश्‍वास है कि सत्‍ताधारी जातियों और शोषित जातियों के स्‍पष्‍ट विभाजन को समझते हुए हमें बामसेफ के अंतर्गत शोषित जातियों को संगठित कर शोषण का प्रतिकार करना होगा।

बाहरी कडियां[संपादित करें]


सन्दर्भ[संपादित करें]