केसर
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| केसर क्रोकस | |
|---|---|
| केसर का पौधा, लाल स्टिग्मा के साथ | |
| वैज्ञानिक वर्गीकरण | |
| जगत: | पादप |
| अश्रेणीत: | एंजियोस्पर्म |
| अश्रेणीत: | एकबीजपत्री |
| गण: | एस्पैरागलेस |
| कुल: | इरिडेशियेई |
| उपकुल: | क्रोकोएडियेइ |
| वंश: | क्रोकस |
| जाति: | सी. सैटिवस |
| द्विपद नाम | |
| क्रोकस सैटिवस L. | |


केसर (अंग्रेजी: Saffron) एक बहुमूल्य मसाला है, जो क्रोकस सैटिवस (केसर क्रोकस) के चमकीले लाल रंग के कलंक (stigma) और शैलियों (style) से प्राप्त होता है। यह भोजन में स्वाद, रंग और सुगंध के लिए उपयोग किया जाता है। वजन के हिसाब से यह दुनिया का सबसे महंगा मसाला है, जिसकी कीमत 2024 तक 5,000 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम या अधिक हो सकती है।[1]
वनस्पति विवरण
[संपादित करें]केसर क्रोकस एक बहुवर्षीय, कांडहीन क्षुप है, जिसकी ऊँचाई 15-25 सेमी होती है। इसकी पत्तियाँ मूलोद्भव, संकरी, लंबी और नालीदार होती हैं। पुष्पदंड पर नीललोहित, बैंगनी, नीले या सफेद रंग के 1-3 कीपनुमा पुष्प निकलते हैं। प्रत्येक पुष्प में तीन लाल-नारंगी मादा भाग (वर्तिका और वर्तिकाग्र) होते हैं, जिन्हें केसर कहते हैं। इसकी गंध तीक्ष्ण और स्वाद कटु पर रुचिकर होता है।[2]
उत्पत्ति और खेती
[संपादित करें]केसर की उत्पत्ति संभवतः ग्रीस, ईरान या मेसोपोटामिया में हुई, और इसे 3,500 वर्षों से अधिक समय से खेती और व्यापार किया जा रहा है। यह यूरेशिया, उत्तरी अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और ओशिनिया में फैल गया। 2024 तक, ईरान वैश्विक केसर उत्पादन का ~90% योगदान देता है।[3] भारत में, केसर की खेती जम्मू-कश्मीर (पंपोर और किश्तवाड़) में होती है। इसे समुद्र तल से ~2,000 मीटर ऊँचाई, शीतोष्ण सूखी जलवायु और दोमट मिट्टी में उगाया जाता है। कंद (bulb) अगस्त-सितंबर में रोपे जाते हैं, और पुष्प-पत्र अक्टूबर-दिसंबर में निकलते हैं। 1 किलो सूखा केसर प्राप्त करने के लिए ~1,50,000 फूलों की आवश्यकता होती है।[4]
रासायनिक संरचना
[संपादित करें]केसर में पिक्रोक्रोसिन (कटु स्वाद), सफ़रनल (सुगंध), और क्रोसिन (सुनहरा-पीला रंग) प्रमुख यौगिक हैं। अन्य घटकों में कैरोटिन, लाइकोपिन, जियाजैंथिन, वाष्पशील तेल, और तारपीन यौगिक शामिल हैं। इसमें तेल (1.37%), आर्द्रता (12%), प्रोटीन, शर्करा और भस्म भी पाए जाते हैं।
उपयोग
[संपादित करें]- पाककला: बिरयानी, मिठाई, मक्खन आदि में रंग और स्वाद के लिए।
- आयुर्वेद: उष्णवीर्य, उत्तेजक, आर्तवजनक, वात-कफ नाशक, वेदनास्थापक। यह मासिक धर्म, सर्दी-जुकाम, सिरदर्द, त्वचा उज्ज्वलता, रक्त शोधन, और यौन शक्ति में लाभकारी है।
- अन्य: पूजा, पान मसाले, और औषधीय नुस्खों में उपयोग।
उत्पादन प्रक्रिया
[संपादित करें]फूलों को छायादार स्थान में सुखाया जाता है, फिर मादा भाग (केसर) अलग किया जाता है। इसे रंग और आकार के आधार पर मागरा, लच्छी, गुच्छी आदि श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। 450 ग्राम केसर के लिए ~75,000 फूलों की आवश्यकता होती है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
[संपादित करें]केसर का उल्लेख 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व के असीरियन ग्रंथों में मिलता है। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यापार के माध्यम से एशिया, यूरोप और अफ्रीका में फैला। संस्कृत में इसे 'अग्निशाखा' भी कहा जाता है।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "World's COSTLIEST spice blooms in Kashmir". Rediff. अभिगमन तिथि: 7 January 2013.
- ↑ Katzer, G. (2010). "Saffron (Crocus sativus L.)". Gernot Katzer's Spice Pages. अभिगमन तिथि: 1 December 2012.
- ↑ Menia M, Iqbal S, Zahida R, Tahir S, Kanth RH, Saad AA, Hussian A (2018). "Production technology of saffron for enhancing productivity". Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry. 7 (1): 1033–1039.
- ↑ Hooker, Lucy (13 September 2017). "The problem for the world's most expensive spice". अभिगमन तिथि: 12 January 2020.
बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]Gernot Katzer's Spice Pages BBC: The problem for the world's most expensive spice
