भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान

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जी.एस.एल.वी.
भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान
भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान
प्रकार्य मध्यम उत्तोलन प्रवर्तन प्रणाली
निर्माता इसरो
मूल देश Flag of India.svg भारत
आकार
ऊंचाई ४९ मी. (१६० फ़ीट)
व्यास २.८ मी. (९.१ फ़ीट)
द्रव्यमान ४,०२,००० कि.ग्रा. (८,८६,००० पाउण्ड)
चरण
क्षमता
LEO को पेयलोड 5,100 किलोग्राम (11,200 पाउन्ड)
जी.टी.ओ
को पेयलोड
2,000 किलोग्राम (4,400 पाउन्ड) से 2,500 किलोग्राम (5,500 पाउन्ड)[1]
लॉन्च इतिहास
वर्तमान स्थिति सक्रिय
लॉन्च स्थल श्रीहरिकोटा
कुल लॉन्च
सफाल लॉन्च
असफल परीक्षण
आंशिक असफ़ल परीक्षण
अमिडन उड़ान १८ अप्रैल, २००१
बूस्टर (चरण ०)
No बूस्टर
इंजन एल४ओएच विकास
दबाव ६८० कि.न्यू.
कुल दबाव २,७२० कि.न्यू.
विशिष्ट आवेग २६२ से.
बर्न समय १६० सेकंड
ईंधन NO/UDMH
प्रथम चरण
इंजिन 1 S139
थ्रस्ट ४,७०० कि.न्यू.
विशिष्ट आवेग १६६ सेकंड
बर्न टाइम १०० सेकंड
ईंधन HTPB (ठोस)
द्वितीय चरण
इंजिन जीएस२ विकास
थ्रस्ट ७२० कि.न्यू.
विशिष्ट आवेग २९५ सेकंड (२.८९ कि.न्यू.सेकंड/कि.ग्रा.)
बर्न टाइम १५० सेकंड
ईंधन NO/UDMH
तृतीय चरण
इंजिन १ ICE (GSLV-II)
थ्रस्ट ७३.५ कि.न्यू.
विशिष्ट आवेग ४६० सेकंड (४.५ कि.न्यू.सेकंड/कि.ग्रा.)
बर्न टाइम ७२० सेकंड
ईंधन LOX/LH2

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (अंग्रेज़ी:जियोस्टेशनरी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, लघु: जी.एस.एल.वी) अंतरिक्ष में उपग्रह के प्रक्षेपण में सहायक यान होता है। ये यान उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। जीएसएलवी ऐसा बहुचरण रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक भार के उपग्रह को पृथ्वी से ३६,००० कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है। ये रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है। रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। अधिकतर काम के उपग्रह दो टन से अधिक के ही होते हैं। इसलिए विश्व भर में छोड़े जाने वाले ५० प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर निश्चित कि.मी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही इसकी की प्रमुख विशेषता है।[2]

यान की तकनीक

गत कुछ वर्षो से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी ) के बाद भारत ने उपग्रह भेजने में काफी सफलता प्राप्त की थी। जीएसएलवी अपने डिजाइन और सुविधाओं में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान यानि पीएसएलवी से बेहतर होता है। यह तीन श्रेणी वाला प्रक्षेपण यान होता है जिसमें पहला ठोस-आधार या पुश वाला, दूसरा तरल दबाव वाला यानि लिक्विड प्रापेल्ड तथा तीसरा क्रायोजेनिक आधारित होता है। पहली और दूसरी श्रेणी पीएसएलवी से ली गई है। आरंभिक जीएसएलवी यानों में रूस निर्मित क्रायोजेनिक तृतीय स्टेज का प्रयोग हो रहा था। किन्तु अब इसरो ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का आविष्कार किया है। १५ अप्रैल, २०१० को १०:५७ यूटीसी पर भारत पहली बार जीएसएलवी की सहायता से अपना पहला उपग्रह छोड़ा, जो असफल रहा। इसके बाद तीन अन्य उपग्रह भी छोड़े जाएंगे। जीएसएलवी के द्वारा से पांच हजार किलोग्राम का उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जा सकता है। भूस्थिर यानि जियोसिंक्रोनस या जियोस्टेशनरी उपग्रह वे होते हैं जो पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर स्थित होते हैं और वह पृथ्वी की गति के अनुसार ही उसके साथ-साथ घूमते हैं। इस तरह जहां एक ओर ध्रुवीय उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, वहीं भूस्थिर उपग्रह अपने नाम के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में एक ही स्थान पर स्थित रहता है। यह कक्षा पृथ्वी की सतह से ३५,७८६ किलोमीटर ऊपर होती है। इसरो के उपग्रह कृषि, जलस्रोतों, शहरी विकास, पर्यावरण, वन, खनिज और महासागरों के संबंध में शोध कार्य करते हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में वर्षो से कार्यरत इसरो १९९९ से उपग्रह प्रक्षेपण का कार्य कर रहा है।

क्रायोजेनिक्स

मुख्य लेख: क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन एवं क्रायोजेनिक्स

भौतिकी में अत्यधिक निम्न ताप उत्पन्न करने व उसके अनुप्रयोगों के अध्ययन को क्रायोजेनिक्स कहते है। क्रायोजेनिक का उद्गम यूनानी शब्द क्रायोस से बना है जिसका अर्थ होता है शीत यानी बर्फ की तरह शीतल। इस शाखा में शून्य डिग्री सेल्सियस से २५३ डिग्री नीचे के तापमान पर कां किया जाटा है। इस निम्न तापमान का उपयोग करने वाली प्रक्रियाओं और उपायों का क्रायोजेनिक अभियांत्रिकी के अंतर्गत अध्ययन करते हैं। जी.एस.एल.वी. रॉकेट में प्रयुक्त होने वाली द्रव्य ईंधन चालित इंजन में ईंधन बहुत कम तापमान पर भरा जाता है, इसलिए ऐसे इंजन क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कहलाते हैं। इस तरह के रॉकेट इंजन में अत्यधिक ठंडी और द्रवीकृत गैसों को ईंधन और ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस इंजन में हाइड्रोजन और ईंधन क्रमश: ईंधन और ऑक्सीकारक का कार्य करते हैं। ठोस ईंधन की अपेक्षा यह कई गुना शक्तिशाली सिद्ध होते हैं और रॉकेट को बूस्ट देते हैं। विशेषकर लंबी दूरी और भारी रॉकेटों के लिए यह तकनीक आवश्यक होती है।[2]

क्रायोजेनिक तकनीक का पहली बार प्रयोग लगभग पांच दशक पूर्व अमेरिका के एटलस सटूर नामक रॉकेट में सबसे पहले हुआ था। तब से अब तक क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन प्रौद्योगिकी में काफी सुधार हुआ है। अमेरिकी क्रायोजेनिक इंजनों में आर.एल.-१० नामक क्रायोजेनिक इंजन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है। जी.एस.एल.वी. रॉकेट एरियन में एसएम-७ क्रायोजेनिक इंजन लगाया जाता है। जापान द्वारा विकसित क्रायोजेनिक इंजन का नाम एल.ई-५ है। पहले भारत को रूस से यह तकनीक मिल रही थी। १९९८ में हुए पोखरण परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर पाबंदी लगा दी और रूस का रास्ता बंद हो गया। किन्तु भारत में इससे पहले से ही इस तकनीक पर काम हो रहा था।[2]


प्रक्षेपण इतिहास

यान वैरियैन्ट प्रक्षेपण तिथि प्रक्षेपण स्थल पेयलोड पेयलोड भार मिशन की स्थिति
D1 GSLV Mk.I(a) १८ अप्रैल, २००१ श्रीहरिकोटा एफ़.एल.पी. Flag of भारत GSAT-1 १,५४० कि.ग्रा. असफल, विकासाधीन उड़ान, ऊपरी चरण में पेलोड को योजनाबद्ध कक्षा से नीचे स्थापन करने के कारण, जिसे सही नहीं किया जा सका।[3]
D2 GSLV Mk.I(a) ८ मई, २००३ श्रीहरिकोटा FLP Flag of भारत GSAT-2 १,८२५ कि.ग्रा. सफल, विकासाधीन उड़ान[4]
F01 GSLV Mk.I(b) २० सितंबर, २००४ श्रीहरिकोटा FLP Flag of भारतEDUSAT १,९५० कि.ग्रा. सफल, प्रथम प्रचालन उड़ान[5]
F02 GSLV Mk.I(b) १० जुलाई, २००६ श्रीहरिकोटा SLP Flag of भारत INSAT-4C २,१६८ कि.ग्रा. असफल, दोनों रॉकेट एवं उपग्रह को बंगाल की खाड़ी के ऊपर नष्ट किया गया जब रॉकेट की दिशा अनुमत सीमा से बाहर बदल गयी।
F04 GSLV Mk.I(b) २ सितंबर, २००७ श्रीहरिकोटा SLP Flag of भारत INSAT-4CR २,१६० कि.ग्रा. आंशिक प्रक्षेपण असफलता, रॉकेट कप्रत्याशा से एपोजी नीचा एवं झुकाव ऊंचा रहा। रॉकेट का प्रदर्शन निम्नस्तरीय होने से एपोजी नीचा एवं झुकाव प्रत्याशा से अधिक रहा।[6] अपवहन से ट्रैकिंग असफ़ल हुई जिससे आयु कम हुई एवं प्रचालन काल के ५ वर्ष कम हुए।[7] अंत में २१६० कि.ग्रा. का पेलोड भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा में पहुंचा।[8][9]
योजनाबद्ध प्रक्षेपण
D3 GSLV MK.II १५ अप्रैल, २०१० श्रीहरिकोटा SLP GSAT-4  
F06 GSLV MK.II २०१० श्रीहरिकोटा Flag of भारतInsat-3D  
 ?? GSLV MK.?? २०१० श्रीहरिकोटा Flag of भारत आदित्य (अंतरिक्ष यान)  

चित्र दीर्घा

इन्हें भी देखें

बाहरी सूत्र

संदर्भ