शोभा राम

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शोभा राम बुद्धा राम कुमावत (English: Shobha Ram Buddha Ram Kumawat | जन्म: 07 जनवरी, 1914; कठुमर, अलवर रियासत, ब्रिटिश भारत | मृत्यु: 23 मार्च, 1984) भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनेता थे । बाबू शोभाराम राजस्थान का एकीकरण के प्रथम चरण मत्स्य संघ (United States of Matsya) के प्रधान मंत्री, राजस्थान सरकार के प्रथम राजस्व मंत्री, अलवर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से प्रथम सांसद, कृषि व वित्त मंत्री, लोक लेखा समिति अध्यक्ष और अपैक्स बैंक के अध्यक्ष जैसे पदों पर थे । ये स्वतंत्रता से पूर्व अलवर प्रजामण्डल अध्यक्ष थे और बाद में Rajasthan Pradesh Congress Committee के प्रदेशाध्यक्ष भी बने थे । बाबू शोभा राम कुमावत ने सन् 1942 में वकालत छोड़ कर भारत छोड़ो आन्दोलन में राम चन्द्र उपाध्याय और कृपा दयाल माथुर के साथ बढ़ - चढ़ कर भाग लिया था ।अंगूठाकार|शोभा राम कुमावत

शिक्षा[संपादित करें]

राज ॠषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय, अलवर (तत्कालीन राज ऋषि कॉलेज)

विक्रमजीत सिंह सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर (तत्कालीन सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर)

महात्मा गांधी के साथ भूख हड़ताल[संपादित करें]

1943 में महात्मा गांधी ने पूना के आगा खान पैलेस में भूख हड़ताल की घोषणा की । इसका बाबू शोभाराम पर जादुई प्रभाव पड़ा और वे आठ दिन बाद ही भूख हड़ताल पर बैठ गए । शोभाराम की भूख हड़ताल 13 दिन तक चली और महात्मा गांधी की हड़ताल के साथ ही टूटी । इस घटना से शोभाराम सर्वप्रिय नेता के रूप में उभरे ।

प्रजामण्डल में स्वतंत्रता का सफर[संपादित करें]

प्रजामण्डल के विस्तार के लिए बाबू शोभाराम ने गाँव - गाँव साथियों के साथ दौरा कर सभाएं की । इसका असर यह हुआ कि जनता का मनोबल ऊपर उठा । प्रजामंडल के सदस्य सामन्तशाही के नुमाईंदे व पुलिस की ओर से अन्याय वाले स्थान पर पहुँचते । इस दौर में प्रजामंडल के नेत़ृत्व में राजनीतिक गतिविधियों का सिलसिला शुरू हुआ । वर्ष 1943 से अलवर रियासत में आंदोलन जोर पकड़ने लगा । बाबू शोभाराम कुमावत के साथ मास्टर भोलानाथ, लाला काशी राम, फूल चनंद गोठड़िया एवं अन्य कार्यकर्ता भी अलख जगाने में जुटे थे । उन्हीं दिनों रामजी लाल अग्रवाल भी कानपुर, इन्दौर आदि स्थानों पर छात्र व मजदूर आंदोलन का अनुभव लेकर लौटे और प्रजामंडल के सहयोग में जुट गए । वर्ष 1944 में गिरधर आश्रम में राजस्थान एवं मध्य भारत की रियासतों के प्रजामंडल कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हुआ । इनमें लोकनायक जय प्रकाश नारायण, गोकुलभाई भट्ट जैसे बड़े नेता आए । अब जब भी कन्हीं प्रजा पर जुल्म हुआ, विरोध का स्वर मुखर हुआ । प्रजामंडल ने जागीर माफी जुल्म, कस्टम टैक्स, तंबाकू पर टैक्स, उत्पादन पर बढ़े कर, युद्धकोष की जबरन वसूली, पुलिस व राजस्व अधिकारियों की ज्यादती के विरोध में आन्दोलन किए । इस कार्य में कृपा दयाल माथुर, राम चन्द्र उपाध्याय, व अन्य कार्यकर्ताओं का साथ मिला । इसी तरह थानागाजी में तहसीलदार रिश्वतखोरी मामले का भी प्रजामंडल ने विरोध किया । इस आंदोलन में पं. हरि नारायण शर्मा, लक्ष्मी नारायण खण्डेलवाल व अन्य लोग थानागाजी पहुँचे और सभा की ।

अलवर कृषक आन्दोलन का नेतृत्व[संपादित करें]

1 व 2 अप्रेल 1941 को अलवर राज्य प्रजामण्डल के अध्यक्ष शोभाराम कुमावत ने राजगढ़, अलवर में 'जागीर माफी प्रजा कांफ्रेंस' का आयोजन किया । इस कांफ्रेंस का उद्घाटन श्री सत्यदेव विद्यालंकार ने किया । इस कांफ्रेंस द्वारा बेगार, लाग-बाग, भू-राजस्व की ऊँची दरें समाप्त की जाने की माँग की । प्रजामंडल द्वारा आयोजित कांफ्रेंस से क्रुद्ध हो छोटे जागीरदारों व माफीदारों ने अपने किसानों को जोतों से बेदखल कर दिया तथा उन्होंने या तो अपनी भूमि का प्रबंध स्वयं किया अथवा भूमि खाली छोड़ दी गई थी । प्रजामंडल के नियमित प्रयासों के उपरान्त भी जागीर माफी किसानों के मामले में सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की । 2 फरवरी, 1946 को शोभाराम के नेतृत्व में प्रजामंडल ने इसी संदर्भ में राजगढ़, अलवर के खेड़ा मंगल सिंह नामक गाँव में एक सभा आयोजित की । भवानी सहाय शर्मा, शोभा राम कुमावत, रामजी लाल अग्रवाल, लाला काशी राम सहित अनेक नेता बन्दी बना लिए गए । 8 फरवरी, 1946 को अलवर प्रजामंडल ने सम्पूर्ण राज्य में 'दमन विरोधी दिवस' मनाया । जय नारायण व्यास को इस मामले की जाँच हेतु नियुक्त किया गया था । अन्त में हीरा लाल शास्त्री की मध्यस्थता में प्रजामण्डल और महाराजा के बीच समझौता हुआ, जिसके फलस्वरूप 10 फरवरी, 1946 को आन्दोलनकारी रिहा कर दिये गए ।

मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री[संपादित करें]

ब्रिटेन से आज़ादी के बाद, राजस्थान राज्य के एकीकरण के प्रथम चरण में अलवर, भरतपुर, धौलपुरकरौली रियासत व चीफशिप नीमराणा को मिलाकर मत्स्य संघ ( United States of Matsya ) का निर्माण किया व इसका उद्घाटन 18 मार्च, 1948 को केन्द्रिय मंत्री एन. वी. गाडगिल ( Narhar Vishnu Gadgil ) द्वारा किया गया था । धौलपुर महाराजा उदयभानु सिंह को राजप्रमुख और अलवर राज्य प्रजामण्डल के प्रमुख नेता श्री शोभाराम कुमावत को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) बनाया गया था । अलवर मत्स्य संघ की राजधानी बनायी गई थी ।

राजनैतिक जीवन[संपादित करें]

भारत की स्वतंत्रता के बाद 18 मार्च, 1948 को राजस्थान का एकीकरण के प्रथम चरण मत्स्य संघ के प्रधान मंत्री बनाये गयें । पं. हीरा लाल शास्त्री की सरकार में राजस्थान के प्रथम राजस्व मंत्री बनें । बाबू शोभा राम सन् 1952 से 1962 तक अलवर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दो बार सांसद रहें । सन् 1956 से 1957 तक Rajasthan Pradesh Congress Committee ( भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राजस्थान ) के प्रदेशाध्यक्ष बने । शोभा राम 1966 में नगर विकास न्यास ( UIT ), अलवर के प्रथम अध्यक्ष बने । सन् 1967 में रामगढ़ विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और दो बार कृषि मंत्री बने । 1972 में भी रामगढ़ से निर्वाचित हुए और राज्य मंत्रिमण्डल में वित्त मंत्री बनाये गयें । ये लोक लोखा लेखा समिति और अपैक्स बैंक के अध्यक्ष भी बनाये गये थे । राजस्थान में सहकारिता आन्दोलन की जाँच के लिए शोभाराम कुमावत के नेतृत्व में शोभाराम कमेटी बनायी गई थी ।


राजनैतिक पदावधि[संपादित करें]

⦁ प्रधान मंत्री, मत्स्य संघ, राजस्थान का एकीकरण (18 मार्च, 1948)

⦁ प्रथम राजस्व मंत्री, राजस्थान सरकार (08 अप्रैल, 1949 से 05 जनवरी, 1951 तक)

संसद सदस्य, अलवर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र (प्रथम लोक सभा - 17 अप्रैल 1952 से 4 अप्रैल 1957 तक, द्वितीय लोक सभा - 5 अप्रैल 1957 से 31 मार्च 1962 तक)

⦁ पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी (सन् 1956 से 1957 तक)

⦁ प्रथम अध्यक्ष, नगर विकास न्यास, अलवर (सन् 1966 से सन् 1967 तक)

⦁ पूर्व कृषि मंत्री, राजस्थान सरकार (05 सितंबर, 1967 से 22 जून 1968 तक)

⦁ पूर्व कृषि मंत्री, राजस्थान सरकार (22 जून 1968 से 10 जुलाई, 1971 तक)

⦁ पूर्व वित्त मंत्री, राजस्थान सरकार (10 जुलाई 1971 से 16 मार्च, 1972 तक)

उपसंहार[संपादित करें]

जन - जन के नायक, स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी, शोभा राम कुमावत ने ही राजस्थान की राजनीति के बीज बोयें । बाबू शोभा राम अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अन्य जातियों के चहेता थे, सभी वर्ग का सम्मान करते थे और सभी वर्ग भी उनका सम्मान करते थे । बाबू शोभा राम कुमावत जी को राजस्थान की राजनीति का चाणक्य और अलवर का गांधी कहा जाता है ।