"तैमूरलंग": अवतरणों में अंतर

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'''तैमुर लंग''' (अर्थात तैमूर लंगड़ा) (जिसे 'तिमुर' (8 अप्रैल 1336 – 18 फ़रवरी 1405) जिसे 'तिमुर' (तिमुर = लोहा) के नाम से भी जाना जाता था चौदहवी शताब्दी का एक शासक था जिसने महान [[तैमूरी राजवंश]] की स्थापना की थी। उसका राज्य पश्चिम [[एशिया]] से लेकर मध्य एशिया होते हुए [[भारत]] तक फैला था। उसकी गणना संसार के महान्‌ और निष्ठुर विजेताओं में की जाती है। वह बरलस तुर्क खानदान में पैदा हुआ था। उसका पिता तुरगाई बरलस तुर्कों का नेता था। भारत के [[मुग़ल]] साम्राज्य का संस्थापक [[बाबर]] तिमुर का ही वंशज था।
 
हालांकि सिकंदर की तरह तैमूरलंग राजपरिवार में पैदा नहीं हुए, बल्कि उनका जन्म एक आम परिवार में हुआ था। तैमूरलंग एक मामूली चोर थे, जो मध्य एशिया के मैदानों और पहाड़ियों से भेड़ों की चोरी किया करते थे।
 
चंगेज़ ख़ान की तरह तैमूरलंग के पास कोई सिपाही भी नहीं था। लेकिन उन्होंने आम झगड़ालू लोगों की मदद से एक बेहतरीन सेना बना ली जो किसी अचरज से कम नहीं था।
 
जब तैमूरलंग 1402 में सुल्तान बायाजिद प्रथम के खिलाफ युद्ध मैदान में उतरे, तब उनके पास भारी भरकम सेना थी जिसमें अर्मेनिया से अफगानिस्तान और समरकंद से लेकर सर्बिया तक के सैनिक शामिल थे।
 
"
वह एक योद्धा थे, जो एक किसान से एशिया के सिंहासन पर काबिज हुआ। उसकी विकलांगता ने उसके रवैये और हौसले को प्रभावित नहीं किया। उसने अपनी दुर्बलताओं पर भी विजय प्राप्त कर ली थी।"
 
तैमूरलंग अपने जीवन में इन मुश्किलों से पार पाने में कामयाब रहे लेकिन सबसे हैरानी वाली बात यह है कि वे विकलांग थे। आपको भले यकीन नहीं हो लेकिन हकीक़त यही है कि उनके शरीर का दायां हिस्सा पूरी तरह से दुरुस्त नहीं था। हादसे में हुए विकलांग
 
जन्म के समय उनका नाम तैमूर रखा गया था। तैमूर का मतलब लोहा होता है। आगे चलकर लोग उन्हें फारसी में मजाक मजाक में तैमूर-ए-लंग (लंगड़ा तैमूर) कहने लगे.
 
इस मजाक की शुरुआत भी तब हुई जब युवावस्था में उनके शरीर का दाहिना हिस्सा बुरी तरह घायल हो गया था। इसके बाद यही नाम बिगड़ते बिगड़त तैमूरलंग हो गया।
 
लेकिन तैमूरलंग के सफ़र में उनकी शारीरिकविकलांगता आड़े नहीं आई, जबकि वह जमाना ऐसा था जब राजनीतिक सत्ता हासिल करने क लिए शारीरिक सौष्ठव भी जरूरी था।
 
युवा तैमूरलंग के बारे में कहा जाता है कि वह महज एक हाथ से तलवार पकड़ सकते थे। ऐसे में ये समझ से बाहर है कि तैमूरलंग ने खुद को हाथ से हाथ की लड़ाई और घुडसवारी और तीरंदाज़ी के लायक कैसे बनाया होगा.
 
इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि तैमूरलंग बुरी तरह घायल होने के बाद विकलांग हो गए थे। हालांकि इस बात पर अनिश्चितता जरूर है कि उनके साथ क्या हादसा हुआ था।
 
वैसे अनुमान यह है कि यह हादसा 1363 के करीब हुआ था। तब तैमूरलंग भाड़े के मजदूर के तौर पर खुर्शान में पड़ने वाले खानों में काम कर रहे थे, दक्षिण पश्चिम अफगानिस्तान में स्थित इस हिस्से को आजकल मौत का रेगिस्तान कहा जाता है।
 
एक अन्य स्रोत- लगभग शत्रुता वाला भाव रखने वाले 15वीं शताब्दी के सीरियाई इतिहासकार इब्ने अरब शाह के मुताबिक एक भेड़ चराने वाले चरवाहा ने भेड़ चुराते हुए तैमूरलंग को अपने तीर से घायल कर दिया था। चरवाहे का एक तीर तैमूर के कंधे पर लगा था और दूसरा तीर कूल्हे पर.
 
सीरियाई इतिहासकार ने तिरस्कारपूर्ण अंदाज में लिखा है,“पूरी तरह से घायल होने से तैमूरलंग की गरीबी बढ़ गई। उसकी दुष्टता भी बढ़ी और रोष भी बढ़ता गया।”
 
स्पेनिश राजदूत क्लेविजो ने 1404 में समरकंद का दौरा किया था। उन्होंने लिखा है कि सिस्तान के घुड़सवारों का सामना करते हुए तैमूरलंग घायल हुए थे।
 
उनके मुताबिक, “दुश्मनों ने तैमूरलंग
को घोड़े से गिरा दिया और उनके दाहिने पैर
को जख्मी कर दिया, इसके चलते वह जीवन भर
लंगड़ाते रहे, बाद में उनका दाहिना हाथ भी जख्मी
हो गया। उन्होंने अपने हाथ की दो उंगलियां गंवाई थी।”
 
सोवियत पुरातत्वविदों का एक दल जिसका नेतृत्व
मिखाइल गेरिसिमोव कर रहे थे, ने 1941 में
समरकंद स्थित तैमूरलंग के खूबसूरत मक़बरे क
ो खुदवाया था और पाया कि वे लंगड़े थे लेकिन 5 फुट 7 इंच का उनका शरीर कसा हुआ था।
 
उनका दाहिना पैर, जहां जांघ की हड्डी और घुटने मिलते हैं, वह जख्मी था। इसके चलते उनका दाहिना पैर बाएं पैर के मुकाबले छोटा था। यही वजह है कि उनका नाम 'लंगड़ा' तैमूर पड़ गया था। विकलांगता नहीं बनी बाधा
 
चलते समय उन्हें अपने दाहिने पांव को घसीटना पड़ता था। इसके अलावा उनका बायां कंधा दाएं कंधे के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा ऊंचा था। उनके दाहिने हाथ और कोहनी भी बाद में
ज़ख्मी हो गए।
 
"
पूरी तरह से घायल होने से तैमूरलंग की गरीबी बढ़ गई। उसकी दुष्टता भी बढ़ी और रोष भी बढ़ता गया।"
 
इब्ने अरब शाह, 15वीं सदी के सीरियाई इतिहासकार
 
बावजूद इसके 14वीं शताब्दी के उनके दुश्मन जिनमें तुर्की, बगदाद और सीरिया के शासक शामिल थे, उनका मजाक उड़ाते थे लेकिन युद्ध में तैमूरलंग को हरा पाना मजाक उड़ाने जितना आसान कभी नहीं रहा.
 
तैमूरलंग के कट्टर आलोचक रहे अरबशाह ने भी माना है कि तैमूरलंग में ताकत और साहस कूट कूट कर भरा हुआ था और ्हें देखकर दूसरों में भय और आदेश पालन का भाव मन में आता था। कभी नहीं हारे तैमूरलंग
 
18वीं शताब्दी के इतिहासकार एडवर्ड गिब्बन ने भी तैमूरलंग
की काफी प्रशंसा की है। गिब्बन के मुताबिक तैमूरलंग की सैन्य
काबलियत को कभी स्वीकार नहीं किया गया।
 
गिब्बन ने लिखा है, “जिन देशों पर उन्होंने अपनी विजय पताका फहराई, वहां भी जाने अनजाने में तैमूरलंग के जन्म, उनके चरित्र, व्यक्तित्व और यहां तक कि उनके नाम तैमूरलंग के बारे में भी झूठी कहानियां प्रचारित हुईं.”
 
गिब्बन ने आगे लिखा है, “ लेकिन वास्तविकता में वह एक योद्धा थे, जो एक किसान से एशिया के सिंहासन पर काबिज हुआ। विकलांगता ने उनके रवैये और हौसले को प्रभावित नहीं किया। उन्होंने अपनी दुर्बलताओं पर भी विजय प्राप्त कर ली थी।”
 
जब तैमूरलंग का 1405 में निधन हुआ था, तब चीन के राजा मिंग के ख़िलाफ युद्ध के लिए वे रास्ते में थे। तब तक वे 35 साल तक युद्ध के मैदान में लगातार जीत हासिल करते रहे.
 
अपनी शारीरिक दुर्बलताओं से पार पा कर विश्व विजेता बनने का ऐसा दूसरा उदाहरण नजर नहीं आता.
 
== परिचय ==

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