भारत में कुपोषण

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संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है. दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है. राजस्थान और मध्य प्रदेश में किए गए सर्वेक्षणों में पाया गया कि देश के सबसे गरीब इलाकों में आज भी बच्चे भुखमरी के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस ओर ध्यान दिया जाए तो इन मौतों को रोका जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने भारत में जो आंकड़े पाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर से कई गुना ज्यादा हैं. संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति को "चिंताजनक" बताया है. भारत में फाइट हंगर फाउंडेशन और एसीएफ इंडिया ने मिल कर "जनरेशनल न्यूट्रिशन प्रोग्राम" की शुरुआत की है. भारत में एसीएफ के उपाध्यक्ष राजीव टंडन ने इस प्रोग्राम के बारे में बताते हुए कहा कि कुपोषण को "चिकित्सीय आपात स्थिति" के रूप में देखने की जरूरत है. साथ ही उन्होंने इस दिशा में बेहतर नीतियों के बनाए जाने और इसके लिए बजट दिए जाने की भी पैरवी की. नई दिल्ली में हुई कॉन्फ्रेंस में सरकार से जरूरी कदम उठाने पर जोर दिया गया. राजीव टंडन ने सरकार से कुपोषण मिटाने को एक "मिशन" की तरह लेने की अपील की है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अगर चाहें, तो इसे एक नई दिशा दे सकते हैं. एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है. रिपोर्ट में लिखा गया है, "भारत में अनुसूचित जनजाति (28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है." वहीं महाराष्ट्र में राजमाता जिजाऊ मिशन चलाने वाली वंदना कृष्णा का कहना है कि राज्य सरकार कुपोषण कम करने के लिए कई कदम उठा रही है, पर साथ ही उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि दलित और आदिवासी इलाकों में अभी भी सफलता नहीं मिल पाई है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बच्चों को खाना ना मिलने के साथ साथ, देश में खाने की बर्बादी का ब्योरा भी दिया गया है.

आज के समय में कुपोषण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। यहां तक की विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लेक डेथ नामक महामारी से की है। जिसने 18 वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। कुपोषण को क्यों इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैं? विश्व बैंक जैसी संस्थायें क्यों इसके प्रति इतनी चिंतित है? सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है और हममें से अधिकतर सोचते हैं कि यह चिकित्सा का विषय है। वास्तव में कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनैतिक कारणों का परिणाम है। जब भूख और गरीबी राजनैतिक एजेडा की प्राथमिकता नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण सतह पर उभरता है। भारत का उदाहरण ले जहां कुपोषण उसके पड़ोसी अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसीयों जैसे बांगलादेश और नेपाल से भी अधिक है। बंगलादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक की यह उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है।

5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्युदर प्रति हजार : तुलनात्मक तालिका

बंगलादेश

77

ब्राजील

36

चीन

09

मिश्र

41

भारत

93

इंडोनेशिया

45

मैक्सिकों

29

नाईजेरिया

183

पाकिस्तान

109

जिन क्षेत्रों में अत्यमधिक अल्पै पोषण है वहां कुपोषित महिलायें या किशोरी बालिकायें उन बच्चोंद को जन्मन देती हैं जो पैदा होते ही वृद्धिबाधित या पतले होते हैं। इस प्रकार अल्पप पोषण एक पीढ़ी तक खौफनाक उत्त राधिकार के रूप में हस्तांणतरित होता है। ये बच्चेद आने वाले वर्षों मे वृद्धि की भरपाई नहीं कर पाते। वे जल्द‍ ही बीमार होने, देर से स्कू ल में प्रवेश करने, सीख नहीं पाने की संभावना से ग्रसित होते हैं और बड़े होकर कम उत्पाशदक वयस्के बन जाता है। इस प्रकार कुपोषण एक भयंकर ‘टाईम बम’ है।

क्या है कुपोषण ?

यह एक ऐस चक्र है जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की नियति दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। यह नियति लिखी जाती है गरीबी और भुखमरी की स्याही से। इसका रंग स्याह उदास होता है और स्थिति गंभीर होने पर जीवन में आशा की किरणें भी नहीं पनप पाती हैं। कुपोषण के मायने होते हैं आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूध्द करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का हास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं।

कुपोषण वास्तव में घरेलू खाद्य असुरक्षा का सीधा परिणाम है। सामान्य रूप में खाद्य सुरक्षा का अर्थ है सब तक खाद्य की पहुंच, हर समय खाद्य की पहुंच और सक्रिय और स्वस्थ्य जीवन के लिए पर्याप्त खाद्य। जब इनमें से एक या सारे घटक कम हो जाते हैं तो परिवार खाद्य असुरक्षा में डूब जाते है। खाद्य सुरक्षा सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करती है। भारत का उदाहरण ले जहां सरकार खाद्यान्न के ढेर पर बैठती है (एक अनुमान के अनुसार यदि बोरियों को एक के उपर एक रखा जाए तो आप चांद तक पैदल आ-जा सकते हैं)। पर उपयुक्त नीतियों के अभाव में यह जरूरत मंदों तक नहीं पहुंच पाता है। अनाज भण्डारण के अभाव में सड़ता है, चूहों द्वारा नष्ट होता है या समुद्रों में डुबाया जाता है पर जन संख्या का बड़ा भाग भूखे पेट सोता है।

कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता हैं। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 महीने से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप वृध्दि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और 15 पाइंट तक आईक्यू का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चे घटी हुई सिखने की क्षमता के कारण खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा तथा घटी हुई कमाऊ क्षमता तथा जीवन पर्यंत शोषण के शिकार हो जाते है। इस कारण बड़ी संख्या में बच्चें बाल श्रमिक या बाल वैश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाते हैं। बड़े होने पर वे अकुशल मजदूरों की लम्बी कतार में जुड़ जाते हैं जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनता है।

कुपोषण जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 माह से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। 6 माह से 3 वर्ष की उम्र में बच्चे के लिए मॉ का दूध पर्याप्त नहीं होता। बच्चा खुद खा पाने या मांग पाने में असमर्थ होता है। उसको बार-बार नरम भोजन की जरूरत होती है जो उसे कोई वयस्क ही खिला सकता है। माताओं को अजीविका कमाने के साथ-साथ और भी कई घरेलू काम करने पड़ते हैं जैसे-पकाना, पानी लाना, सफाई करना आदि। उनमें इतनी ऊर्जा या समय नहीं बचता कि वह बच्चे को बार-बार खिला सके। परिवार में भी अन्य वयस्क इसे सिर्फ मॉ की जिम्मेदारी समझते हैं। बचपन में कुपोषित बच्चे को बाद में सुधार की संभावना बहुत कम होती है। मध्यान्ह भोजन, छात्रवृत्ति, बाल श्रमिकों के लिए विशेष स्कूल आदि सहायक तो है किन्तु पहले 6 वर्षों के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते। कुपोषण मुख्यत: 6 रूपों में नजर आता है जो क्रमश: - 1. जन्म के समय कम वजन, 2. बचपन में बाधित विकास, 3. अल्प रक्तता, 4. विटामिन ए की कमी, 5. आयोडिन कमी संबंधित बिमारियां, 6. मोटापा।

बच्चों में कुपोषण मुख्यत: दो प्रकार का होता है :

सूखे वाला कुपोषण सूजन वाला कुपोषण कुपोषण के सूचक

बच्चे की उम्र एंव ऊंचाई के अनुरूप उसका वजन कम होना। उसके हाथ-पैर पतले और कमजोर होना और पेट बढ़ा होना। बच्चे को बार-बार संक्रमण होना और बीमार होना। कुपोषण और स्वास्थ के संबध

500 लाख से ज्यादा ऐसे परिवार हैं जो अति गरीब की श्रेणी में आते हैं। इसका मतलब यह है कि आधी आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है। यह सिध्द हो चुका है कि पर्याप्त भोजन नहीं मिलने पर शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और वह शीघ्र ही बीमारियों की चपेट में आ जाता है। जन्म के समय ढाई किलो से कम वजन होने पर बच्चे के बहुत कम उम्र में मरने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है। जबकि जहां कुपोषण ज्यादा होता है वहां खसरा से होने वाली मौतों की दर सामान्य से चार सौ गुना ज्यादा होती है।

3 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा किये गये अध्ययन से पता चलता है कि मध्यप्रदेश भारत में कुपोषण का सबसे ज्यादा शिकार राज्य है और यहां बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत क्षीण हो चुकी है। कुपोषित बच्चों पर दस्त का प्रकोप सामान्य से 4 गुना अधिक होता है। खून की कमी की शिकार औंरतों में मातृत्व सम्बन्धी मौतें स्वस्थ्य औरतों की तुलना में पांच गुना ज्यादा होती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि कुल मरीजों में से करीब तीन-चौथाई की रूग्णता का कारण कुपोषण या उससे जुड़ी अन्य दिक्कतें हो सकती हैं।

बच्चों में कुपोषण के कारण एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। जो बच्चे इसके चंगुल में फंस जाते हैं वे दस्त, खसरा, कुकरखांसी, टीबी, और निमोनिया जैसे संक्रामक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। कुपोषित बच्चों में ये बीमारियां ज्यादा गंभीर होती हैं और उनकी अवधि लम्बी होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। दस्त की समस्या से कुपोषण की गंभीरता को सही ढंग से समझा जा सकता हैं वैसे तो दस्त एक सामान्य बीमारी है जिसके बारे में माना जाता था कि पानी में गंदगी के कारण यह बीमारी फैलती है परन्तु बाद में पता चला कि दस्त का समय दूध छुड़ाने की अवधि से मेल खाता है। यह अवधि बच्चों को तरल आहार देने से लेकर स्तनपान समाप्त होने के तीन महीने बाद तक चलती है। यही वह समय होता है जब आम तौर पर बच्चे कुपोषण के शिकार होते है। यह भी देखा गया है कि दूध छुड़ाने में दस्त के तीन गुना अधिक शिकार होते हैं। कम पोषित बच्चे दस्त के अधिक शिकार क्यों होते हैं, जब इसका जैविक अध्ययन किया गया तो पता चला कि बच्चों की छोटी आंत की अंदरूनी सतह पर प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण बैक्टीरिया की संख्या बढ़ जाती है। इन बैक्टिरिया के कारण उत्पन्न जहरीले पदार्थों से सोडियम को सोखने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। बच्चा इसे सहन नहीं कर पाता है और दस्त की समस्या जन्म ले लेती है। यह पाया गया है कि दस्त के दौरान बच्चा प्रतिदिन 600 कैलारी तक गंवा सकता है। ऐसी स्थिति में कम पोषित बच्चे की स्थिति तो और भी ज्यादा खराब हो जाती है। महाराष्ट्र में किये गये एक अध्ययन से पता चला है कि कुपोषण स्वयं भी रोगों और मुत्यु का बड़ा कारण है। वहां कुपोषण और एनीमिया 31.9 प्रतिशत ब्रोंकोन्यूमोनिया 21.3 प्रतिशत, आंत्रशोथ 20.2 प्रतिशत मृत्यु के सबसे बड़े कारण थे।

इसी तरह जन्म के समय कम वजन जीवन भर की अस्वस्थता का बड़ा कारण होता है। गर्भावस्था के समय उचित आहार न मिलने और अब घरेलू हिंसा की शिकार होने के कारण महिलाओं के साथ-साथ बच्चों की स्थिति भी खराब हो रही है। स्त्री के प्रति घरेलू हिंसा के कारण बच्चों में स्नायु तंत्र से सम्बन्धित रोगों को प्रतिशत बढ़ा है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान की एक रपट के अनुसार वे सभी बच्चे जिनका जन्म के समय वजन कम था, अधिकांश गरीब परिवारों से आते थे। एक तिहाई बच्चों की मौत जन्म के समय कम वजन के कारण ही होती है। इसी तरह कमजोरी के कारण बच्चों पर तपेदिक (टीबी) जैस संक्रामक रोगों के बढ़ते प्रभाव को भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

खसरे के संदर्भ में गरीबी और कुपोषण के परस्पर सम्बन्धों को ज्यादा स्पष्ट किया गया है। यह एक आम रोग है, और कभी ही जानलेवा साबित होता है परन्तु गरीबी में यह अक्सर जानलेवा होता है। जब यह रोग होता है तब बुखार और खांसी होती है, चौथे दिन त्वचा पर लाल दाने दिखने लगते हैं। इलाज होने पर दसवें दिन तक यह दाने ठीक हो जाते हैं। परन्तु कुपोषित बच्चे के संदर्भ में खसरा दूसरा ही रूप दिखाता है। उन बच्चों में लालदाने बढ़ कर चकत्तो का रूप ले लेते हैं और उनका रंग बैंगनी तक हो जाता है। कुछ दिनों में त्वचा पपड़ीदार हो जाती है और झड़ने लगती है। चमड़ी के झड़ने की यह प्रक्रिया इस हद तक बढ़ सकती है कि कुपोषित बच्चे को प्योडर्मा नामक छूत की बीमारी हो जाती है। बच्चे को ब्रोन्काइटिस और निमोनिया भी हो सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि कम पोषित बच्चे के लिये खसरे के कारण मृत्यु का खतरा 400 गुना ज्यादा होता है। हम यदि यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि गांवों में दस्त, खांसी, निमोनिया, बुखार और टीबी के कारण बच्चे मर रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि इन कारणों की बुनियाद में भुखमरी से उत्पन्न हुआ कुपोषण ही है, और कुछ नहीं।

मध्यप्रदेश में कुपोषण

जहां तक मध्यप्रदेश का संदर्भ है कुपोषण की स्थिति काफी चिंताजनक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 55 प्रतिशत बच्चे कम वजन के है। और 55 प्रतिशत बच्चों की मौते कुपोषण के कारण होती है। (स्त्रोत-यूनिसेफ और महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रकाशन-बाल संजीवनी के अनुसार) कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु है जैसे मध्यप्रदेश में देश में सर्वाधिक कम वजन के बच्चे हैं और यह स्थिति 1990 से यथावत है।

मध्यसप्रदेश में बच्चोंव की स्थिति

कुपोषण की दर 64 प्रतिशत से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गयी है। (1 से 3 वर्ष) 3 वर्ष की आयु के बच्चोंश में 4 में से 3 बच्चेु अनीमिया से ग्रसित हैं। 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में 1000 में से 4 बच्चेु रतौधी से ग्रसित है। स्रोत- महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र./ युनिसेफ भोपाल

कुपोषण की मध्याप्रदेश की एक गंभीर जन स्वा्स्य्नि समस्याो है

सारे राज्यों में से सर्वाधिक कम वजन के बच्चे‍ यहां पर हैं। सर्वाधिक कम वजन के बच्चोंे की संख्याज सन् 1990 से बदली नहीं। कुपोषण विकास और सीखने की क्षमता के लिए एक खतरा है। बच्चों में कुपोषण की स्थिति राज्यख की अर्थ व्यावस्था पर भारी बोझ है। स्रोत- महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र./ युनिसेफ भोपाल

कुपोषण नियंत्रण पर प्रस्तावित पहल

कुपोषण के निहित कारण

प्रस्तावित पहल

घरों में खाद्य संकट

कृषि को अधिक उत्पादक बनाना ताकि बेहतर पोषण उपलब्ध हो सके। आय वर्धन कार्यक्र्रमों को गरीबों एवं कुपोषितों के लिए और अधिक लक्षित करना। खाद्यान्न के दरों को नियंत्रित रखना। खाद्य असुरक्षा की सतत निगरानी करना। महिला और बच्चों की देखरेख

समाज और घर में महिलाओ की भूमिका को मजबूत करना। स्वास्थ्य जल और स्वच्छता

लोक स्वास्थ्य का विस्तार करना। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ना। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पोषण को भी सम्मिलित करना। उचित मात्रा में गुणवत्ता पूर्ण पानी की पहुंच बढ़ाना। अच्छे स्तर की स्वच्छता सुनिश्चित करना। आर्थिक विकास

गरीबी कम करने वाली आर्थिक वृध्दि के प्रभाव को बढ़ाना। लोकतंत्र को बढ़ावा देना और मानव अधिकारों की रक्षा करना। वैश्वीकरण

वैश्वीकरण के खतरों से गरीबों की रक्षा करना और उन्हे अधिक अवसर और दक्षता प्रदान करना। कुपोषण नियंत्रण में समेकित बाल विकास सेवा की भूमिका

भारत में समेकित बाल विकास सेवा एक मात्र कार्यक्रम है जो सीधे कुपोषण निवारण के लिये जिम्मेदार है। यह आंगनवाड़ियों के एक विस्तृत नेटवर्क द्वारा संचालित होता है जिसमें पूरक पोषण, स्कूल पूर्व शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बच्चों, गर्भवति एवं धात्री महिलाओं और कुपोषित बालिकाओं तक पहुंचाना अपेक्षित है। किन्तु आंगनवाड़ियों की प्रभाविता कई कारणों से बाधित होती है। केन्द्रों की अपर्याप्त संख्या, कम मानदेय प्राप्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये झूलाघर की अनउपलब्धता जैसी समस्यायें धरातल पर नजर आती है। वृहद स्तर पर राजनैतिक इच्छा शक्ति और बजट प्रावधान में कम प्राथमिकता इसे प्रभावित करती है। वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 3000 करोड़ रूपयों का प्रावधान सकल घरेलू उत्पाद का 1/10वां हिस्सा भी नहीं हैं। यह तथ्य और स्पष्ट होता है जब हम इसकी तुलना रक्षा के लिये किये गये आवंटन से करते हैं। यदि संसद में बच्चों के लिए उठाये जाने वाले प्रश्नों को देखे तो तो यह दोनों सदनों में उठाये गए प्रश्नों का मात्र 3 प्रतिशत होता है। आश्चर्य की बात नहीं है-बच्चें मतदाता नहीं होते!

मध्यप्रदेश में आदिवासी क्षेत्रों में मात्र 49784 आंगनवाड़ी केन्द्र है जबकि वास्तविक आवश्यकता 1.10लाख्र केन्द्रों की है। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में अब भी 16849 केन्द्रों की जरूरत है।

कुपोषण इस प्रकार एक जटिल समस्या है। घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हम ब्राजील से सीख सकते हैं जहां भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में जहां गरीबों के कल्याण को नजर अंदाज किया जाता है, खाद्य असरुक्षा बढ़ने के आसार नजर आते हैं। हम किस प्रकार सरकार के निर्णय को स्वीकार कर सकते है जब वह लाखों टन अनाज पशु आहार के लिए निर्यात करती है और महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कुपोषण से मौतों की मूक दर्शक बनी रहती है। आज के समय में किसानों को खाद्यान्न से हटकर नगदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के कारण खाद्य संकट और गहरा सकता है और देश को फिर से खाद्यान्नों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। हाल ही में जनवितरण प्रणाली को समाप्त करने के सरकार के प्रयास इस ओर इशारा करते हैं।

कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियां निर्धारित न हो और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता न दी जाए तो कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।

सन् 1975 में यह मानते हुए कि कुपोषण और सतत बरकार रहने वाली भुखमरी की स्थिति को मिटाये बिना स्वएस्य् सत उत्पािदक और समता मूलक समाज स्था पित नहीं किया जा सकता है, समकित बाल विकास परियोजना शुरू की गई। तब एक व्यानपक नजरिये को आधार बनाकर आंगनवाड़ी कार्यक्रम की शुरूआत की गई थी। एक लंबे दौर तक इस कार्यक्रम को दोयम दर्जे का महत्व दिया जाता रहा है। 31 साल गुजर गये किन्तुक बचपन की भुखमरी को समाप्त‍ नहीं किया जा सका।