जीववैज्ञानिक वर्गीकरण

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आधुनिक विचार के अनुसार जीवों की तीन प्रमुख श्रेणियां - यूकार्योटा, यूबैक्टिरिया एवं आर्किआ

जीव जगत के समुचित अध्ययन के लिये आवश्यक है कि विभिन्न गुणधर्म एवं विशेषताओं वाले जीव अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाऐं। इस तरह से जीवों एवं पादपों के वर्गीकरण को वर्गिकी या वर्गीकरण विज्ञान कहते हैं। अंग्रेजी में वर्गिकी के लिये दो शब्द प्रयोग में लाये जाते हैं - टैक्सोनॉमी (Taxonomy) तथा सिस्टेमैटिक्स (Systematics)। कार्ल लीनियस ने 1735 ई. में सिस्तेमा नातूरै (Systema Naturae) नामक पुस्तक सिस्टेमैटिक्स शब्द के आधार पर लिखी थी।[1] आधुनिक युग में ये दोनों शब्द पादप और जंतु वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त होते हैं।

वर्गिकी का कार्य आकारिकी, आकृतिविज्ञान (morphology) क्रियाविज्ञान (physiology), परिस्थितिकी (ecology) और आनुवंशिकी (genetics) पर आधारित है। अन्य वैज्ञानिक अनुशासनों की तरह यह भी अनेक प्रकार के ज्ञान, मत और प्रणालियों का सश्लेषण है, जिसका प्रयोग वर्गीकरण के क्षेत्र में होता है। जीवविज्ञान संबंधी किसी प्रकार के विश्लेषण का प्रथम सोपान है सुव्यवस्थित ढंग से उसका वर्गीकरण; अत: पादप, या जंतु के अध्ययन का पहला कदम है उसका नामकरण, वर्गीकरण और तब वर्णन।

जीवन वृक्ष

जैविक वर्गीकरण का इतिहास[संपादित करें]

जन्तुजगत का वर्गीकरण

वर्गीकरण विज्ञान का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव का इतिहास। समझ बूझ होते ही मनुष्य ने आस पास के जंतुओं और पौधों को पहचानना तथा उनको नाम देना प्रारंभ किया। यूनान (ग्रीस) के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपाक्रेटीज (46-377 ईसा पूर्व) ने और डेमॉक्रीटस (465-370 ईसा पूर्व), ने अपने अध्ययन में जंतुओं को स्थान दिया है। स्पष्ट रूप से अरस्तू (384-322 ईसा पूर्व) ने अपने समय के ज्ञान का उपयुक्त संकलन किया है। अरस्तू (ऐरिस्टॉटल) उल्लेख में वर्गीकरण का प्रारंभ दिखाई पड़ता है। इनका मत है कि जंतु अपने रहन सहन के ढंग, स्वभाव और शारीरिक आकार के आधार पर पृथक किए जा सकते हैं। उन्होंने पक्षी, मछली, ह्वेल, कीट आदि जंतुसमूहों का उल्लेख किया है और छोटे समूहों के लिए कोलियॉप्टेरा (Coleoptera) और डिप्टेरा (Diptera) आदि शब्दों का भी प्रयोग किया है। इस समय के वनस्पतिविद अरस्तू की विचारधारा से आगे थे। उन्होंने स्थानीय पौधों का सफल वर्गीकरण कर रखा था। ब्रनफेल्स (Brunfels, 1530 ई.) और बौहिन (Bauhim, 1623 ई.) पादप वर्गीकरण को सफल रास्ते पर लानेवाले वैज्ञानिक थे, परंतु जंतुओं का वर्गीकरण करनेवाले इस समय के विशेषज्ञ अब भी अरस्तू की विचारधारा के अंतर्गत कार्य कर रहे थे।

आधुनिक वर्गीकरण[संपादित करें]

Linnaeus
1735[2]
Haeckel
1866[3]
Chatton
1925[4]
Copeland
1938[5]
Whittaker
1969[6]
Woese et al.
1990[7]
Cavalier-Smith
1998[8]
2 kingdoms 3 kingdoms 2 empires 4 kingdoms 5 kingdoms 3 domains 6 kingdoms
(not treated) Protista Prokaryota Monera Monera Bacteria Bacteria
Archaea
Eukaryota Protoctista Protista Eucarya Protozoa
Chromista
Vegetabilia Plantae Plantae Plantae Plantae
Fungi Fungi
Animalia Animalia Animalia Animalia Animalia
वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रणाली के विभिन्न स्तर। जीवन डोमेन जगत संघ वर्ग गण कुल वंश प्रजाति

जीववैज्ञानिक वर्गीकरण की आठ मुख्य श्रेणियां। मध्यवर्ती लघु श्रेणियां नहीं दिखाई गयी हैं.

वर्तमान समय में 'अन्तर्राष्ट्रीय नामकरण कोड' द्वारा जीवों के वर्गीकरण की सात श्रेणियाँ (Ranks) पारिभाषित की गयी हैं। ये श्रेणियाँ हैं- जगत (kingdom), संघ (phylum/division), वर्ग (class), गण (order), कुल (family), वंश (genus) तथा जाति (species). हाल के वर्षों में डोमेन (Domain) नामक एक और स्तर प्रचलन में आया है जो 'जगत' के रखा ऊपर है। किन्तु इसे अभी तक कोडों में स्वीकृत नहीं किया गया है। सात मुख्य श्रेणियों के बीच में भी श्रेणियाँ बनाई जा सकती हैं जिसके लिये 'अधि-' (super-), 'उप-' (sub-) या 'इन्फ्रा-' (infra-) उपसर्गों का प्रयोग करना चाहिये। इसके अलावा जन्तुविज्ञान तथा वनस्पति विज्ञान के वर्गीकरण की श्रेणियों में मामूली अन्तर भी है (जैसे - 'आदिम जाति' (ट्राइब))।

इस समय साधारण तौर से काम लाई जानेवाली श्रेणियाँ निम्नलिखित है :

  • जगत (Kingdom),
  • संघ (Phylum),
  • उपसंघ (Subphylum),
  • अधिवर्ग (Superclass),
  • वर्ग (Class)
  • उपवर्ग (Subclass),
  • सहगण या कोहऑर्ट (Cohort),
  • अधिगण (Superorder),
  • गण (order),
  • उपगण (Suborder),
  • अधिकुल (Superfamily),
  • कुल (Family),
  • उपकुल (Subfamily),
  • आदिम जाति (Tribe),
  • वंश (Genus),
  • उपवंश (Subgenus),
  • जाति (Species) तथा
  • उपजाति (Subspecies)

पारजैविक वर्गिकी[संपादित करें]

परजीवियों में वृहत भिन्नता, जीव वैज्ञानिकों के लिये उनका वर्णन करना तथा उन्हें नामावली बद्ध करना एक बड़ी चुनौती उपस्थित करती है। हाल ही में हुए विभिन्न जातियों को पृथक करने, पहचानने व विभिन्न टैक्सोनॉमी पैमानों पर उनके विभिन्न समूहों के बीच संबंध ढूंढने हेतु डी.एन.ए. प्रयोग पारजैवज्ञों के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण व सहायक रहे हैं।

वर्गीकरण श्रेणियां[संपादित करें]

वर्गीकरण की कुल आठ श्रेणियां (रैंक) हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. The Evolution and Extinction of the Dinosaurs, David E. Fastovsky, David B. Weishampel, pp. 68, Cambridge University Press, 2005, ISBN 978-0-521-81172-9, ... Biological classification ... The categories that he established - now a memorized mantra - are (in order of decreasing size), kingdom, phylum, class, order family, genus, species ...
  2. Linnaeus, C. (1735). Systemae Naturae, sive regna tria naturae, systematics proposita per classes, ordines, genera & species. 
  3. Haeckel, E. (1866). Generelle Morphologie der Organismen. Reimer, Berlin. 
  4. Chatton, É. (1925). "Pansporella perplexa. Réflexions sur la biologie et la phylogénie des protozoaires". Annales des Sciences Naturelles - Zoologie et Biologie Animale 10-VII: 1–84. 
  5. Copeland, H. (1938). "The kingdoms of organisms". Quarterly Review of Biology 13: 383–420. doi:10.1086/394568. 
  6. Whittaker, R. H. (January 1969). "New concepts of kingdoms of organisms". Science 163 (3863): 150–60. Bibcode 1969Sci...163..150W. doi:10.1126/science.163.3863.150. PMID 5762760. 
  7. Woese, C.; Kandler, O.; Wheelis, M. (1990). "Towards a natural system of organisms: proposal for the domains Archaea, Bacteria, and Eucarya.". Proceedings of the National Academy of Sciences of the United States of America 87 (12): 4576–9. Bibcode 1990PNAS...87.4576W. doi:10.1073/pnas.87.12.4576. PMC 54159. PMID 2112744. http://www.pnas.org/cgi/reprint/87/12/4576. 
  8. Cavalier-Smith, T. (1998). "A revised six-kingdom system of life". Biological Reviews 73 (03): 203–66. doi:10.1111/j.1469-185X.1998.tb00030.x. PMID 9809012. http://journals.cambridge.org/action/displayAbstract?fromPage=online&aid=685.