गुरुदत्त (उपन्यासकार)

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गुरुदत्त हिन्दी के महान उपन्यासकार थे। वे उन रचनाकारों में से थे जिनकी कृतियाँ कालातीत हैं। उसका मुख्य कारण है उनकी रचनाओं का सोद्देश्य होना।

परिचय[संपादित करें]

गुरुदत्त के उपन्यासों में कतिपय ऐसे विशेष तत्त्व हैं जो कथाकार को लोकप्रियता की चरमसीमा तक पहुँचने में सदैव सहायक होते हैं। उपन्यासों की घटनात्मकता, स्वभाविक चित्रण, समाज के कटु और नग्न सत्य, इतिहास की वास्तविकता दृष्टि, घटनाओं की आकस्मिकताएँ तथा अनूठी वर्णन-शैली आदि लोकप्रियता को बढ़ाने वाले तत्त्व पाठकों के लिए विशेष आकर्षण बनते हैं। वर्ग-संघर्ष, यौनाकर्षण, चारित्रिक पतनोत्थान, व्यर्थ का दिखावा और चकाचौंध में छिपी कटुता, नग्नता और भ्रष्टाचार का सुन्दर अंकन उनके उपन्यासों को जनमानस के निकट ले जाता है। यही उनकी कृतियों के अत्यधिक लोकप्रिय होने का प्रधान कारण रहा है।

उनकी यह दृढ़ धारणा थी कि आदिकाल से भारतवर्ष में निवास करने वाला आर्य-हिन्दू समाज ही देश की सुसम्पन्नता और समृद्धि के लिए समर्पित हो सकता है क्योंकि उसका ही इस देश की धरती से मातृवत् सम्बन्ध है। उनका विचार था कि शाश्वत धर्म के रूप में यदि किसी को मान्यता मिलनी चाहिए तो वह एकमात्र ‘वैदिक धर्म’ ही हो सकता है।

उन्होंने जिन-जिन ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है उनमें तत्कालीन संस्कृति, सभ्यता और घटनाओं के चित्रण के साथ-साथ उनकी अपनी कल्पना मुखर बनकर घटनाओं के क्रम विपर्यय और आकस्मिक रोमांच का भी निर्माण करती है। उनके द्वारा ऐसे नये पात्रों को प्रस्तुत किया जाता है, जिनका भले ही उपन्यास से दूर का भी सम्बन्ध न हो परन्तु जो उपन्यास के दृष्टिकोण को सबल रूप से प्रस्तुत कर सकें और समय-समय तथा स्थान स्थान पर ऐतिहासिक शैथिल्य का बौद्धिक विश्लेषण भी करते रहें।

गुरुदत्त का सभी प्रकार के उपन्यासों के रचनाक्रम में विशिष्ट दृष्टिकोण स्पष्ट परिलक्षित होता है। यही बात उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में भी देखने में आती है। वह दृष्टिकोण है अपनी रचनाओं के माध्यम से अपनी बात अर्थात् अपना विशिष्ट दृष्टिकोण पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करना। इतिहास क्योंकि पूर्वयुगीन राजाओं अथवा बादशाहों, राज्यों और राष्ट्रीय महापुरुषों की कथाओं से सम्बन्धित होता है, इसलिए इस वर्ग के उपन्यासों में उन्होंने अपनी मनन परिधि को भी राजा और प्रजा तथा राज्य के पारस्परिक सम्बन्धों तक सीमित किया है। अपनी कृतियों में उन्होंने राजा और राज्य का अन्तर, राजा और प्रजा का पारस्परिक सम्बन्ध तथा राज्य की सुरक्षा और विकास का एकमात्र साधन एवं बल, इन तीन प्रश्नों का विश्लेषण करके इनका अनुकूल उत्तर देने का प्रयास किया है। वे राजा और प्रजा के पारस्परिक सम्बन्ध को शासन और शासित का नहीं मानते, अपितु वे राजा को प्रजा के प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित करने का यत्न करते हैं। उन्होंने इस उपन्यास की घटनाओं के बौधिक विश्लेषण को विशेष स्थान दिया है। सामान्यता कथा कहते-कहते अनेक गम्भीर बातों की ओर भी उन्होंने संकेत किये हैं।

उन्होंने जिस विद्या एवं विषय पर अपनी लेखनी चलाई, उसे पूर्णता प्रदान की है। उनकी कृति को आद्योपान्त पढ़ने के उपरान्त पाठक के मन में कोई संशय बचा नहीं रह जाता, यही उनकी विशेषता थी। अपनी इन रचनाओं के माध्यम से वे जन-जन के मानस में सदा विद्यमान रहेंगे।

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