खीरा

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खीरे की लता, पुष्प एवं फल

खीरा (cucumber ; वैज्ञानिक नाम: Cucumis sativus) ज़ायद की एक प्रमुख फसल है।

सलाद के रूप में सम्पूर्ण विश्व में खीरा का विशेष महत्त्व है। खीरा को सलाद के अतिरिक्त उपवास के समय फलाहार के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके द्वारा विभिन्न प्राकर की मिठाइयॉं भी तैयार की जाती है। पेट की गड़बडी तथा कब्ज में भी खीरा को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। खीरा कब्ज़ दूर करता है। पीलिया, प्यास, ज्वर, शरीर की जलन, गर्मी के सारे दोष, चर्म रोग में लाभदायक है। खीरे का रस पथरी में लाभदायक है। पेशाब में जलन, रुकावट और मधुमेह में भी लाभदायक है। घुटनों में दर्द को दूर करने के लिये भोजन में खीरा अधिक खायें।

उन्नत जातियाँ[संपादित करें]

जापानीज लाग, ग्रीन पोइनसेट, खीरी पूना, फैजाबादी तथा कल्याणपुर मध्यम इत्यादि।

भूमि एवं जलवायु[संपादित करें]

यह हर प्रकार की भूमियों में जिनमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो,उगाया जाता है। इसकी खेती हल्की अम्लीय भूमियों जिनका पी.एच. 6-7 के मध्य हो, में की जा सकती है। अच्छी उपज हेतु जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। इसकी फसल जायद तथा वर्षा में ली जाती है। अत: उच्च तापक्रम में अच्छी वृद्धि होती है , यह पाले को नहीं सहन कर पाता, इसलिए इसको पाले से बचाकर रखना चाहिए।

बुवाई का समय[संपादित करें]

ग्रीष्म के लिए: फरवरी-मार्च

वर्षा के लिए: जून-जुलाई

पर्वतीय के लिए : मार्च - अप्रैल

बीज की मात्रा एवं बुवाई[संपादित करें]

प्रति हेक्टेयर बुवाई हेतु 2 से 2.5 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई लाइन में करते हैं। ग्रीष्म के लिए लाइन से लाइन की दूरी 1.5 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी ७75 सेमी. रखते है। वर्षा वाली फसल की वृद्धि अपेक्षाकृत कुछ अधिक होती है अत: इसकी दूरी बढा देना चाहिए इसमें लाइन से लाइन की दूरी 1.5 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 1.0 मीटर रखना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक[संपादित करें]

अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु खेत तैयार करते समय प्रतिहेक्टेयर 20-25 टन गोबर की सड़ी खाद मिला देना चाहिए। इसके प्रति हे. की दर से आवश्यक होता है। नत्रजन की 1/3 मात्रा फास्फोरस तथा पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय, 1/3 नत्रजन पौधों में 4-5 पत्तियों की अवस्था पर तथा 4/5 नत्रजन फल आने की प्रारम्भिक अवस्था पर दें।

सिंचाई एवं निराई[संपादित करें]

जायद में उच्च तापमान के कारण अपेक्षाकृत अधिक नमी की जरूरत होती है। अत: गर्मी के दिनों में हर सप्ताह हल्की सिंचाई करना चाहिए। वर्षा ऋतु में सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती है। खेत में खुरपी या हो के द्वारा खरपतवार निकालते रहना चाहिए। वर्षाकालीन फसल के लिए जडों में मिट्टी चढा देना चाहिए।

कटाई एवं उपज[संपादित करें]

यह बुवाई लगभग दो माह बाद फल देने लगता है। जब फल अच्छे मुलायम तथा उत्तम आकार के हो जायें तो उन्हें सावधानीपूर्वक लताओं से तोड़कर अलग कर लेते हैं इस तरह प्रति हे. 50 -60 कुन्टल फल प्राप्त किये जा सकते है।

प्रमुख कीट एवं व्याधियाँ[संपादित करें]

1. लाल कीडा: यह पत्तियों तथा फूलों को खाता है रोकने हेतु इण्डोसल्फान 4% चूर्ण 20-25 किग्रा./हे. भुरकें।

2. फल कीडा: यह कीडा यह कीडा फूल को खा जाता है। तथा फलों में छेद करके उनमे घुस जाता है। इनके उपचार हेतु इण्डोसल्फान ४% चूर्ण 20-25 किग्रा./हे. भुरकें

3. एन्थ्रेकनोज: इस रोग में पत्तियों एवं फलों पर लाल,धब्बे हो जाते है। बीज को बुवाई से पहले एग्रोसेन जी. एन. से उपचारित कर लेना चाहिए।

4. फ्यूजेरियम रूट हाट: इस रोग के प्रकोप से तने का आधार काला हो जाता है, बाद में पौधा सूख जाता है, बीज पर गर्म पानी का उपचार (55 डिग्री सेल्सियस से 15 मिनट) करके मरक्यूरिक क्लोराइड के 0.1 % घोल में डुबा लेना चाहिए।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

इतिहास एवं सन्दर्भ