मूली

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मूली वा मूलक भूमी के अन्दर पैदा होने वाली सब्ज़ी है। वस्तुतः यह एक रूपान्तिरत प्रधान जड़ है जो बीच में मोटी और दोनों सिरों की ओर क्रमशः पतली होती है। मूली पूरे विश्व में उगायी एवं खायी जाती है। मूली की अनेक प्रजातियाँ हैं जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। कुछ प्रजातियाँ तेल उत्पादन के लिये भी उगायी जाती है।

मूली से घरेलू चिकित्सा[संपादित करें]

मूली कच्ची खायें या इस के पत्तों की सब्जी बनाकर खाएं, हर प्रकार से बवासीर में लाभदायक है। गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब का बनना बन्द हो जाए तो मूली का रस दो औंस प्रति मात्रा पीने से वह फिर बनने लगता है। मूली खाने से मधुमेह में लाभ होता है। एक कच्ची मूली नित्य प्रातः उठते ही खाते रहने से कुछ दिनों में पीलिया रोग ठीक हो जाता है। गर्मी के प्रभाव से खट्टी डकारें आती हो तो एक कप मूली के रस में मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है। मासिक धर्म की कमी के कारण लड़कियों के यदि मुहाँसे निकलते हों तो प्रातः पत्तों सहित एक

मुली के पत्तो की सब्जी भी बनाते हैं। कोमल मूली का अचार भी बनाया जाता है। बहुत से लोग मुली के पत्ते काटकर उसमें चने का आटा डालकर स्वादिष्ट सब्जी बनाते हैं। कुछ लोग उसकी मुठिया (मुटकुळी)और थालिपीठे भी बनाते हैं।

शास्त्रीय मतअनुसार उसमें प्रोटिन, कर्बोहायड्रेट,फॉस्फरस और लोह होता है।उसकी राख क्षारयुक्त होती है।मुली उष्ण गुणधर्म की है।मुली के ताजे पत्तों के रस और बिजो से युरीन स्वच्छ होती है। पथरी भी ठीक होती है। भोजन में कच्ची मुली खाना चाहिए। कोमल मुली खाने से अच्छी भूक लगती है।अन्न भी अच्छी तरह से पचता है। मुली में ज्वरनाशक गुण है इस कारण बुखार आने पर मुली की सब्जी खाना लाभदायक होता है। इससे खूप फरक पडता है। ठंड में भूक बढ़ती है। एेसे समय मुली खानी चाहिए क्योंकि इससे गॅसेस की परेशानी भी कम होती है। मुली के पत्तो का रस पीने से पेशाब और शौच साफ होती है। बवासीर के मरीज को मुली के पत्तों की अथवा उसका रस दिया तो फायदा होता है। मुली के कंद की अपेक्षा त्याच्या पानाच्या रसात अधिक गुणधर्म आढळतात. मुली के पत्के पचने में हलके, रुची निर्माण करनेवाले और गरम होते हैं। वह कच्चे खाए तो पित्त बढता है, पर यही सब्जी घी में बनाई तो सब्जी के पौष्टिक गुणधर्म में बढ़ोतरी होती है। सब्जी, कोशिंबीर और थालिपिठ,मुठीया के लिए सफेद मुली स्वच्छ धोकर कद्दूकस करके या कीसकर उसमें नारीयल का कीस और बारीक कटी हरी धनिया मिक्स करे इसके उपरांत स्वादनुसार मिश्रण में नमक और शक्कर डालें।कम तेलपर जिरे, हिंग, राई और कढीपत्ते की बगार करके वह किसे हुए मुलीपर डाले इस कोशिंबिर में हलदी न डाले। इस प्रकार लाल मुली की कोशिंबीर भी कर सकते हैं। इस कोशिंबिर में मीठा दही डालने से स्वाद और बढता है। मुली की सब्जी करते समय मुली पत्तेसहीत धोकर बारीक काट ले। प्याज़ बारीक काट ले उसमें दो चमचे तुअर की दाल गरम पानी में भिगोकर रखे। तेल की बगार में लहसुन की कली पीसकर डाले। उस पर बगार में हरी मिरची, हलदी, तूअर दाल और बारीक कटा प्याज़ डाल कर बगार अच्छी तरह भूने। अच्छी तरह भूमी प्याज़ पर मुली की कटी सब्जी डाले। थोडा पानी का छिडकाव करके पतीलेपर ढ़क्कन रखे। ढ़क्कन पर पानी डालकर भापपर सब्जी पकाएं। सब्जी पकने पर उसमें थोडी शक्कर डालकर और नमक डालकर सब्जी में थोडासा {{सब्जिया}खोबरा तेल डाले।

  • मुली के थालिपीठ(मुठीया) रुचकर लगते है। दो मध्यम आकार की मुली किसकर ले। किसने पर उसमें रस निचोड़करघ ले। कीस निचोडने पर उसमें रहनेवाला उग्रपना कम होता है। कीस में एक बारीक कटा प्याज़, एक कटोरी चावल का आटा, ज्वार का आटा, बेसन, अाधा चमचा धनिया जिरे पावडर, पाव चम्मच हल्दी अर्धा चम्मच शक्कर, नारीयल के टुकड़े,बारीक कटी हरी मिर्च अाधी कटोरी बारीक कटी हरी धनिया और स्वाद के अनुसार नमक एेसी सब सामग्री एकत्र करके छान ले आवश्यकतानुसार पानी डालकर मिश्रण गूंद ले फिर प्लास्टिक के कागजपर अथवा केले के पत्ते पर थालीपीठ बनाएं।दोनो तरफ से अच्छी तरह से सेंके और दही के साथ परोसे।
  • सावन सोमवार को मुली खाना अच्छा होता है।

यह उपवास छोड़ते समय खाना चाहिए।