कृष्णचंद्र गांधी

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कृष्णचंद्र गांधी का जन्म विजयादशमी, 1921 को मेरठ, (उ.प्र.) में श्री मुरारीलाल मित्तल के घर में हुआ था। छात्रावस्था में वे सर्दियों में भी नहाकर केवल धोती पहनकर ध्यान करते थे। यह सादगी देखकर लोग उन्हें ‘गांधी जी’ कहने लगे। तब से उनका यही नाम प्रचलित हो गया। उन्होंने कभी मोजा, पाजामा, स्वेटर आदि नहीं पहना। घोर सर्दी वे एक शॉल में निकाल लेते थे।[1][2]

कृष्णचंद्र गांधी
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जन्म विजयादशमी, 1921
मृत्यु 24 नवम्बर, 2002
राष्ट्रीयता भारतीय
प्रसिद्धि कारण विद्या भारतीसरस्वती शिशु मंदिर

स्वयंसेवक[संपादित करें]

1943 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने। सुगठित शरीर होने के कारण शाखा के शारीरिक कार्यक्रम उन्हें बहुत भाते थे। संघ में घोष के साथ ही उन्हें घुड़सवारी व तैराकी भी बहुत प्रिय थी। 1944 में बी.ए. करने के बाद वे प्रचारक बन गये। अल्पव्ययी कृष्णचंद्र गांधी ने कभी तेल व नहाने का साबुन प्रयोग नहीं किया। कभी अंग्रेजी दवा नहीं ली तथा कभी निजी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए। उन्होंने कभी चश्मा नहीं लगाया तथा अंतिम समय तक उनके दांत भी सुरक्षित थे। जीवन के अंतिम कुछ दिन छोड़कर उन्होंने किसी से अपनी सेवा भी नहीं कराई।

1945 में कृष्णचंद्र गांधी मथुरा में जिला प्रचारक थे। वहां वे बाढ़ के दिनों में उफनती यमुना को तैरकर पार करते थे। अनेक स्वयंसेवकों को भी उन्होंने इसके लिए तैयार किया। मथुरा का संघ कार्यालय (कंस किला) पहले एक बड़ा टीला था। उसे खरीदकर खुदाई कराई, तो नीचे सचमुच किला ही निकल आया। अब उसे ‘केशव दुर्ग’ कहते हैं।

श्रम और श्रमिकों के प्रति अतिशय प्रेम, आदर व करुणा के कारण वे कभी रिक्शा पर नहीं बैठे। यदि किसी के साथ साइकिल पर जाना हो, तो वे स्वयं ही साइकिल चलाते थे। वे कहते थे कि मानव की सवारी तो तब ही करूंगा, जब चार लोग मुझे शमशान ले जाएंगे।

शिशु मंदिर योजना के जनक[संपादित करें]

1952 में गांधी जी गोरखपुर में विभाग प्रचारक थे। उन दिनों नाना जी देशमुख भी वहीं थे। इन दोनों ने प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस के आशीर्वाद से वहां पहला सरस्वती शिशु मंदिर खोला।[3] आज वह बीज वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी देश में 50,000 से भी अधिक शाखाएं हैं। इसके बाद भाऊराव ने उन्हें इसके विस्तार का काम सौंप दिया।

फिर तो कृष्णचंद्र गांधी और शिशु मंदिर एकरूप हो गये। लखनऊ में सरस्वती कुंज, निराला नगर तथा मथुरा में शिशु मंदिर प्रकाशन उन्हीं की देन हैं। वे सदा गोदुग्ध का ही प्रयोग करते थे। लखनऊ में उनकी प्रिय गाय उनके लिए किसी भी समय दूध दे देती थी। यही नहीं, उनके बाहर जाने पर वह दूध देना बंद कर देती थी।

कृष्णचंद्र गांधी कहते थे, ‘‘व्यक्ति कुछ नहीं है। ईश्वर की प्रेरणा से यह सब संघ ने किया है।’’

उत्तर प्रदेश के बाद उन्हें पूर्वोत्तर भारत में भेजा गया। हाफलांग में उन्होंने नौ जनजातियों के 10 बच्चों का एक छात्रावास प्रारम्भ किया, जो अब उधर के सम्पूर्ण काम का केन्द्र बना है। रांची के 'सांदीपनि आश्रम' में रहकर उन्होंने वनवासी शिक्षा का पूरा स्वरूप तैयार किया तथा प्राची जनजाति सेवा न्यास, मथुरा के माध्यम से उसके लिए धन का प्रबंध भी किया।

शरीरांत[संपादित करें]

स्वास्थ्य काफी ढल जाने पर उन्होंने मथुरा में ही रहना पसंद किया। जब उन्हें लगा कि अब यह शरीर लम्बे समय तक शेष नहीं रहेगा, तो उन्होंने एक बार फिर पूर्वोत्तर भारत का प्रवास किया। वहां वे सब कार्यकर्ताओं से मिलकर अंतिम रूप से विदा लेकर आये। इसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। यह देखकर उन्होंने भोजन, दूध और जल लेना बंद कर दिया। शरीरांत से थोड़ी देर पूर्व उन्होंने श्री बांके बिहारी मंदिर का प्रसाद ग्रहण किया था।

24 नवम्बर, 2002 को सरस्वती शिशु मंदिर योजना के जनक श्री कृष्ण चंद्र गांधी ने मथुरा में ही अपनी देह श्रीकृष्णार्पण कर दी।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "पूर्वोत्तर जनजाति शिक्षा समिति", विकिपीडिया, 2021-01-23, अभिगमन तिथि 2021-02-05
  2. "विद्या भारती शिक्षा समिति त्रिपुरा", विकिपीडिया, 2021-01-04, अभिगमन तिथि 2021-02-05
  3. "केसी गांधी ने खोला था RSS का पहला सरस्वती शिशु मंदिर". Navbharat Times. अभिगमन तिथि 2021-02-05.