शतावर
| शतावर, शतावरी एस्पैरागस ऑफ़ीशिनैलिस |
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ऑस्ट्रिया में जंगली शतावरी
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| वैज्ञानिक वर्गीकरण | ||||||||||||||
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| द्विपद नाम | ||||||||||||||
| Asparagus officinalis ली. |
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| शतावरी/ऐस्पैरागस पोषक मूल्य प्रति 100 ग्रा.(3.5 ओंस) |
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| उर्जा 20 किलो कैलोरी 90 kJ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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| प्रतिशत एक वयस्क हेतु अमेरिकी सिफारिशों के सापेक्ष हैं. स्रोत: USDA Nutrient database |
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शतावर (अंग्रेज़ी:एस्पैरागस ऑफ़ीशिनैलिस) एक औषधीय पौधा होता है। इसकी कंदिल जडें मधुर तथा रसयुक्त होती हैं। इसका उपयोग स्त्री रोगों जैसे प्रसव के उपरान्त दूध का न आना, बांझपन, गर्भपात आदि में किया जाता है। यह जोडों के दर्द एवं मिर्गी में भी लाभप्रद होता है। इसका उपयोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढाने के लिए भी किया जाता है। शतावर जंगल में स्वतः उत्पन्न होती है। चूंकि इसका औषधीय महत्व भी है अतः अब इसका व्यावसायिक उत्पादन भी है। इसकी लतादार झाडी की पत्तियां पतली और सुई के समान होती है| इसका फल मटर के दाने की तरह गोल तथा पकने पर लाल होता है।
शतावर के पौधे को विकसित होने एवं कंद के पूर्ण आकार प्राप्त करने में तीन वर्ष का समय लगता है। इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें जल की निकासी अच्छी तरह होती हो तथा जिसमें ज्यादा पानी न ठहरता हो| चूंकि यह एक कंदयुक्त पौधा है अतः दोमट रेतीली मिट्टी में इसे असानी से खोदकर बिना क्षति पहुंचाए इसके कंद प्राप्त किए जा सकते हैं। काली मिट्टी में जल धारण क्षमता अधिक होने के कारण कंद खराब होने की संभावना बढ जाती है। शतावर के पौधौं को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। शुरुआत में पौधे लगने तक हफ्ते में एक बार तथा जब पौधे बडे हो जाएं तब एक एक माह के अन्तराल में हल्की सिंचाई की जानी चाहिए। मध्यप्रदेश के पन्ना में सारंग मंदिर की पहाडियों से लेकर कालिंजर और काल्दा पठार तक प्राकृतिक ऱूप से उपजने वाला और औषधीय गुणों से भरपूर शतावर प्रचुर मात्रा में मिलता है। वहां के ग्रामीण अंचलों में शतावर को नारबोझ के नाम से भी जाना जाता है।
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