अपस्मार

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'अपस्मार'
मिरगी, मिर्गी, एपिलेप्सी
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
Spike-waves.png
आईसीडी-१० G40.-G41.
आईसीडी- 345
डिज़ीज़-डीबी 4366
मेडलाइन प्लस 000694
ईमेडिसिन neuro/415 
एम.ईएसएच D004827

मिर्गी (प्राचीन ग्रीक क्रिया ἐπιλαμβάνειν से लिया गया जिसका अर्थ "दबोचना, काबू करना या पीड़ित करना" है)[1] लंबे समय से चलने वाला तंत्रिका संबंधी विकार का एक समूह है जिसकी पहचान मिर्गी के दौरे से की जाती है।[2] ये दौरे वे घटनाएँ हैं जो कि लगातार कंपन की संक्षिप्त और लगभग पता न लगा पाने वाली घटनाओं से काफी लंबी अवधि तक हो सकती हैं।[3] मिर्गी में, दौरे बार-बार पड़ते हैं और उनका कोई तत्काल अंतर्निहित कारण नहीं होता[2]जबकि ऐसे दौरे जो किसी एक विशेष कारण से होते हैं उन्हें मिर्गी का प्रतीक होना नहीं माना जाता है।[4]

ज्यादातर मामलों में कारण अज्ञात हैं, तथापि कुछ लोगों में मस्तिष्क की चोट, स्ट्रोक, मस्तिष्क कैंसर, और नशीली दवाओं और शराब के दुरुपयोग और अन्य कारणों के परिणामस्वरूप मिर्गी विकसित होती है। मिर्गी के दौरे अत्यधिक और असामान्य कॉर्टिकल मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिका गतिविधि का परिणाम हैं।[4] निदान में आम तौर पर अन्य स्थितियों को निकाल देना शामिल होता है जो कि इसी तरह के लक्षणों का कारण बन सकती हैं (जैसे कि सिंकोप) और साथ ही साथ पता लगाना कि, क्या कोई तत्काल कारण मौजूद हैं। मिर्गी की पुष्टि अक्सर एक इलैक्ट्रोएनस्फैलोग्राम (मस्तिष्क की विद्युतीय गतिविधि का एक चित्रमय रिकॉर्ड) के साथ की जा सकती है।

मिर्गी को ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन दवाई के साथ लगभग 70% मामलों में दौरों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।[5] उन लोगों में जिनके दौरों पर दवाई का कोई असर नहीं होता है, शल्यक्रिया, न्यूरोस्टीम्यूलेशन या आहार में बदलावों पर विचार किया जा सकता है। सभी मिर्गी के लक्षण जीवन भर के लिए नहीं होते, और लोगों की एक बड़ी संख्या में इस हद तक सुधार हुआ है कि उन्हें दवा की जरूरत नहीं रह जाती।

दुनिया भर के लगभग 1% लोगों (65 मिलियन) को मिर्गी रोग है,[6] और लगभग 80% मामले विकासशील देशों में होते हैं। [3] मिर्गी का होना लोगों की उम्र बढ़ने के साथ-साथ और सामान्य हो जाता है।[7][8] विकसित दुनिया में, नए मामलों की शुरुआत शिशुओं और बुजुर्गों में सबसे अधिक पाई जाती है;[9] विकासशील देशों में अंतर्निहित कारणों की आवृत्ति में अंतर होने के कारण,[10] यह बड़े बच्चों और युवा बालिगों में पाया जाता है। सभी लोगों में से लगभग 5–10% को 80 साल की उम्र तक एक आकरणी दौरा पड़ेगा,[11] और एक दूसरे दौरे का सामना करने की संभावना 40 और 50% के बीच है।[12] मिर्गी से पीड़ित दुनिया के कई क्षेत्रों में या तो उनकी संचालन करने की क्षमता प्रतिबंधित है या अस्वीकृत है,[13] पर अधिकतर दौरे के बिना कुछ समय के बाद संचालन करने की क्षमता वापस प्राप्त कर लेने में सक्षम हो जाते हैं।

संकेत और लक्षण

दौरा पड़ने के बारे में एक वीडियो
एक ऐसा व्यक्ति जिसने एक दौरा पड़ने के दौरान अपनी जीभ के किनारे को काट लिया है

मिर्गी को बार-बार पड़ने वाले दौरों के दीर्घकालिक जोखिम द्वारा पहचाना जाता है।[14] ये दौरे उस व्यक्ति की उम्र और इसमें सम्मिलित दिमाग के हिस्से पर निर्भर करते हुए कई तरीकों में मौजूद हो सकते हैं।[14][15]

दौरे

दौरों की सबसे सामान्य किस्म (60%) ऐंठन वाली होती है।[15] इनमें से दो तिहाई केन्द्रीय दौरा(रों) की तरह शुरु होते हैं, (जो फिर सामान्यीकृय) बन सकते हैं) एक तिहाई सामान्यीकृत दौरों के रूप में शुरु होते हैं।[15] बाकी के 40% दौरे गैर-ऐंठन वाले होते हैं। इस प्रकार का एक उदाहरण बेसुध दौरा होता है, जो चेतना के एक घटे हुए स्तर को प्रस्तुत करता है और आम तौर पर लगभग 10 सेकंडों के लिए रहता है।[16][17]

फोकल दौरों से पहले अक्सर कुछ अनुभव होते हैं, जिन्हें एक औरा कहा जाता है।[18] इनमें शामिल हो सकते हैं: संवेदी (दृश्यमान, सुनना या गंध), मानसिक, स्वायत्त, या मोटर अद्भुत घटना।[16] मरोड़ की गतिविधि एक विशिष्ट मांसपेशी समूह में शुरु हो सकती है और आस-पास के मांसपेशी समूहों में फैल सकती है जिस में उसे एक जैकसोनियन मार्च के नाम से जाना जाता है।[19] स्वचालन हो सकते हैं; ये गतिविधियाँ बिना जान-बूझे उत्पन्न हुई गतिविधियाँ हैं और अधिकतर होठों से चपचप करने जैसी सरल दोहराव वाली गतिविधियाँ हो सकती हैं या और जटिल गतिविधियाँ हो सकती हैं जैसे कि कुछ उठाने के प्रयास करना।[19]

सामान्यता दौरों की छह मुख्य किस्में हैं: टॉनिक-क्लोनिक, टॉनिक, क्लॉनिक, मायोक्लॉनिक, एबसेन्स, और एटॉनिक दौरे[20] इन सभी में होश खो बैठना शामिल है और आम तौर पर ये बिना किसी चेतावनी के होते हैं।[21] टॉनिक-क्लॉनिक दौरे अंगों के एक संकुचन के साथ मौजूद होते हैं जिनके बाद कमर का चापाकार में फैलने के साथ उनका विस्तार होता है जो लगभग 10-30 सेकेंड तक रहता है (टॉनिक चरण)।[21] छाती की मांसपेशियों के संकुचन की वजह से एक रोने की आवाज सुनी जा सकती है।[21] इसके बाद एक साथ अंगों का कंपन होता है (क्लॉनिक चरण)।[21] टॉनिक दौरे मांसपेशियों के निरंतर संकुचन का निर्माण करते हैं।[21] एक व्यक्ति अक्सर नीला पड़ जाता है क्योंकि उसके श्वास बंद हो जाते हैं।[21] क्लॉनिक दौरे में अंगों में एक साथ कंपन होता है।[21] कंपन के रुक जाने के बाद व्यक्ति को सामान्य होने में 10-30 मिनट तक का समय लग सकता है; यह अवधि “पॉस्टिक्टल चरण” कहलाती है।[21]

एक दौरा पड़ने के दौरान आंत्र या मूत्राशय पर नियंत्रण की कमी हो सकती है।[3] दौरा पड़ने के दौरान जीभ को सिरे से या किनारों से काटा जा सकता है।[22] टॉनिक-क्लॉनिक दौरे में, किनारों से काटा जाना अधिक सामान्य है।[22] साइकोजैनिक गैर-मिर्गी वाले दौरों में जीभ का काटा जाना अपेक्षाकृत सामान्य होता है।[22]

मायोटॉनिक दौरों में कुछ क्षेत्रों में या पूरे शरीर में मांसपेशियों की ऐंठन होना शामिल होता है।[21] एबसेंस दौरे केवल सिर के हल्के से मुड़ने या आंख के झपकने जितने हल्के हो सकते हैं।[16] वह व्यक्ति गिरता नहीं है और इसके खत्म होने के एकदम बाद पर सामान्य हो जाता है।[16] एटॉनिक दौरे में एक सेकेंड से अधिक मांसपेशी की गतिविधि का न होना शामिल होता है।[19] यह आमतौर पर शरीर के दोनों ओर होता है।[19]

मिर्गी वाले लगभग 6% लोगों को ऐसे दौरे पड़ते हैं जो विशिष्ट घटनाओं और रीफ्लैक्स दौरे के तौर पर जाने जाते हैं।[23] रीफ्लैक्स मिर्गी से प्रभावित लोगों को ऐसे दौरे पड़ते हैं जो विशिष्ट उत्तेजनाओं के कारण शुरु होते हैं।[24] आम शुरुआती कारणों में चमकती हुई लाइटें और अचानक शोर शामिल हैं।[23] कुछ किस्म की मिर्गी में, दौरे अक्सर नींद के दौरान पड़ते हैं[25] और अन्य किस्मों में वे लगभग हमेशा सोते समय ही पड़ते हैं।[26]

पॉस्टिक्टल

एक दौरे के सक्रिय भाग के बाद, चेतना के सामान्य स्तर के वापस आने से पहले, आम तौर पर एक भम्र की अवधि होती है जिसे पॉस्टिक्टल अवधि के तौर पर जाना जाता है।[18] यह लगभग 3 से 15 मिनट चलती है[27] लेकिन घंटों तक रह सकती है।[28] अन्य आम लक्षणों में शामिल हैं: थकान महसूस होना, सिरदर्द, बोलने में कठिनाई, और असामान्य व्यवहार।[28] एक दौरा पड़ने के बाद साइकोसिस अपेक्षाकृत सामान्य है, जो 6-10% लोगों को होता है।[29] अक्सर लोगों को याद नहीं रहता कि इस समय के दौरान क्या हुआ था।[28] एक फोकल दौरा पड़ने के बाद, स्थानीयकृत कमजोरी, जिसे टोड का लकवा के तौर पर जाना जाता है, हो सकती है।[30] जब ऐसा होता है तो यह आम तौर पर कुछ सेकेंडों से मिनटों तक रहती है पर यह कभी-कभी एक से दो दिन तक भी रह सकती है।[30]

मनोसामाजिक

मिर्गी के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं।[15] इन प्रभावों में सामाजिक अलगाव, दोषारोपण, या विकलांगता शामिल हो सकते हैं।[15] इनका परिणाम कम शैक्षिक उपलब्धि और बदतर रोजगार परिणाम हो सकते हैं।[15] इस तरह की स्थिति वाले लोगों में सीखने में कठिनाईयाँ आम तौर पर पाई जाती हैं, और खास तौर पर मिर्गी वाले बच्चों में यह पाई जाती है।[15] मिर्गी के साथ जुड़ा कलंक अभी इस रोग से प्रभावित परिवारों पर असर डाल सकता है।[3]

कुछ विकार मिर्गी से प्रभावित लोगों में अक्सर होते हैं, जो आंशिक रूप से मौजूदा मिर्गी रोग पर निर्भर होते हैं। इनमें शामिल हैं: अवसाद, चिंता विकार, और माइग्रेनs[31] ध्यान में कमी सक्रियता विकार आम जनता में बच्चों की तुलना में मिर्गी से प्रभावित बच्चों को तीन से पांच गुना अधिक प्रभावित करता है।[32] ADHD और मिर्गी एक बच्चे के व्यवहार, शिक्षा, और सामाजिक विकास पर महत्वपूर्ण असर छोड़ते हैं।[33] ऑटिस्म वाले लोगों में भी मिर्गी का होना आम बात है।[34]

कारण

मिर्गी मात्र एक बीमारी नहीं है बल्कि यह एक लक्षण है, जो विभिन्न विकारों का परिणाम हो सकती है।[15] परिभाषा के अनुसार दौरा अचानक और किसी गंभीर रोग जैसे किसी तात्कालिक कारण के बिना होता है।[6] मिर्गी का अंतःनिहित कारण आनुवांशिक या संरचनात्मक अथवा उपापचयी समस्याओं के रूप में पहचाना जा सकता है लेकिन 60%[3][15] मामलों के कारण अज्ञात होते हैं।[35] आनुवांशिक, जन्मजात और विकास संबंधी परिस्थितियां युवाओं के बीच अधिक आम हैं, जबकि मस्तिष्क ट्यूमर और दौरे अधिक उम्र के लोगों के बीच।[15] अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के परिणामस्वरूप भी दौरे पड़ सकते हैं;[20] यदि वे किसी विशिष्ट कारण के सीधे आसपास पड़ते हैं जैसे दौरे, सिर की चोट, विषाक्त अंतर्ग्रहण या चपापचयी समस्या तो उनको गंभीर लक्षणात्मक दौरे कहा जाता है और उनको विस्तृत वर्गीकरण में रखा जाता है न कि केवल मिर्गी में।[6][36] गंभीर लक्षणात्मक दौरों के बहुत से कारण बाद वाले दौरों का कारण बन सकते हैं जिस स्थिति में इसे द्वितीयक मिर्गी कहा जाता है।[3]

आनुवांशिक

आनुवांशिकी को अधिकांश मामलों में शामिल पाया गया है, फिर वह चाहे प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष।[37] कुछ मिर्गी के रोग एकल जीन विकार के कारण होते हैं (1-2%);अधिकांश एकाधिक जीन तथा वातावरणीय कारकों के कारण होते हैं।[37] एकल जीन विकार मे से प्रत्येक विरले होते हैं जिनमें से 200 का वर्णन किया गया है।[38] शामिल जीन में से कुछ आयन चैनल, एन्ज़ाइम, GABA तथा जी प्रोटीन- युग्मित रिसेप्टर को प्रभावित करते हैं।[21]

समान जुड़वों में से यदि एक प्रभावित है तो इस बात की 50-60% संभावना है कि दूसरा भी प्रभावित होगा।[37] असमान जुड़वों में ऐसा जोखिम 15% है।[37] ये जोखिम फोकल दौरों से सामान्य दौरों में अधिक हैं।[37] यदि दोनो जुड़वां प्रभावित हैं तो अधिकांश बार उनमें समान मिर्गी संबंधी सिंड्रोम होगें (70-90%)।[37] आम जनसंख्या की तुलना में मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति के नजदीकी संबंधियों में जोखिम पाँच गुना तक होता है।[39] डाउन सिंड्रोम वालो में से 1 से 10% औरएंजलमैन सिड्रोम वालों में से 90% लोगों को मिर्गी होती है।[39]

द्वितीयक

मिर्गी दूसरी कई परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हो सकती है जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: ट्यूमर, दौरे, सिर की चोट, पूर्व में हुए केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के संक्रमण, वंशानुगत असमान्यताएं तथा जन्म के समय मस्तिष्क क्षति के परिणामस्वरूप।[3][20] मस्तिष्क में होने वाले ट्यूमर से प्रभावित हुए लोगों में से लगभग 30% को मिर्गी होती है जो कि कुल मामलों का लगभग 4% होता है।[39] टेम्पोरल लोब में जिन लोगों को ट्यूमर होता है उनमें जोखिम सबसे अधिक होता है।[39] अन्य आम घावों में जैसे कि सेरेब्रल कैवरनस मैलफॉर्मोशन्सऔर आर्टियोवेनस मैलफॉर्मेशन्स में जोखिम 40साँचा:Endash60% तक होता है।[39] जिन लोगों क दौरा पड़ चुका होता है उनमें से 2-4% लोगों में मिर्गी विकसित होती है।[39] यूनाइटेड किंगडम में दौरों के कारण, मिर्गी के 15% मामले होते हैं[15] और ऐसा विश्वास किया जाता है कि 30% बुजुर्गों में यह कारण होता है।[39] मिर्गी के 6 से 20% मामले सिर की चोटों के कारण होते हैं।[39] दिमाग पर हल्की चोट जोखिम को दोगुना कर देती है जबकि दिमाग पर गंभीर चोट जोखिम को सात गुना तक बढ़ा देती है।[39] वे जिनको उच्च क्षमता वाली बंदूक की गोलियों से चोट पहुँची हो उनमें यह जोखिम लगभग 50% तक बढ़ जाता है।[39]

मस्तिष्क ज्वर के कारण मिर्गी होने का जोखिम 10% से कम होता है; वह रोग संक्रमण के दौरान आम तौर पर दौरे पैदा करती है।[39] हरपीस सिम्पलेक्स इन्सेफलाइटिस में दौरे का जोखिम लगभग 50%[39] तक होता है जिसके बाद मिर्गी होने का उच्च जोखिम होता है (25% तक)।[40][41]पोर्क टेपवर्म से संक्रमण के चलते न्यूरोसिस्टोसरकोसिस हो सकता है जो कि उन जगहों पर आधे मिर्गी के दौरों के लिए आम है जहाँ पर इस परजीवी की उपस्थिति आम है।[39] सेरेब्रल मलेरिया, टोक्सोप्लासमोसिस और टोक्सोक्लैरिएसिसजैसे संक्रमणों के बाद भी मिर्गी हो सकती है।[39] अत्यधिक अल्कोहल के इस्तेमाल से भी मिर्गी का जोखिम बढ़ता है: वो लोग जो 6 इकाई अल्कोहल प्रतिदिन लेते हैं उनमें जोखिम ढ़ाई गुना तक बढ़ जाता है।[39] अन्य जोखिमों में अल्ज़ाइमर रोग, मल्टिपल स्क्लेरोसिस, ट्यूबेरस स्क्लेरोसिस और ऑटोइम्यून इन्सेफिलाइटिसशामिल है।[39] वैक्सीन (टीकाकरण) लेने से मिर्गी का जोखिम नहीं बढ़ता है।[39] कुपोषण एक ऐसा कारक है तो विकासशील देशों में काफी देखा जाता है, हालांकि यह अस्पष्ट है कि इसका मिर्गी से कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं।[10]

लक्षण

मिर्गी के ऐसे कई सिन्ड्रोम हैं जो आम तौर पर शुरुआत की उम्र के आधार पर समूहों में रखे गए हैं: नवजात अवधि, बचपन, वयस्क और वे जिनमें उम्र को लेकर कोई बहुत मजबूत संबंध नहीं हैं।[20] अतिरिक्त रूप से ऐसे समूह हैं जो लक्षणों के विशिष्ट बनावटों के आधार पर समूहों में रखे गए हैं, वे जिनमें विशिष्ट चपापचय या संरचनात्मक कारण या अज्ञात कारण शामिल हैं।[20] मिर्गी के किसी मामले को किसी विशेष सिंड्रोम में वर्गीकृत करने की क्षमता अक्सर बच्चों में होती है।[36] कुछ प्रकारों में निम्नलिखित शामिल है: बिनाइन रोलैन्डिक इपिलेप्सी (2.8 प्रति 1,00,000), चाइल्डहुड एबसेन्स इपिलेप्सी (0.8 प्रति 1,00,000) और जुवैनाइल मायोक्लॉनिक इपिलेप्सी (0.7 प्रति 1,00,000)।[36] फेब्राइल दौरे और बिनाइन नियोनेटल दौरे मिर्गी के प्रकार नहीं हैं।[20]

क्रियाविधि

सामान्य रूप से विद्युतीय गतिविधि गैर-तुल्यकालिक है।[16] मिर्गी के दौरों में, मस्तिष्क में संरचनात्मक या प्रकार्यात्मक समस्याओं के कारण,[3] न्यूरॉन्स का एक समूह असमान्य, अत्यधिक,[15] तथा तुल्यकालिक रूप से हमला करना शुरु कर देता है।[16] जिसके परिणामस्वरूप पैरॉक्साइसमल डीपोलराइज़ेशन शिफ्टके नाम से जाने वाली में विध्रुवण की तरंग शुरु हो जाती है।[42]

सामान्य तौर परउत्तेजक न्यूरॉन के हमले के बाद यह कुछ समयावधि के लिए अधिक प्रतिरोधी बन जाता है।[16] ऐसा कुछ हद तक निरोधात्मक न्यूरॉन्स के प्रभाव के कारण, उत्तेजक न्यूरॉन के भीतर विद्युतीय बदलावों के कारण तथा एडेनोसाइनके नकारात्मक प्रभावों के कारण होता है।[16] मिर्गी में इस अवधि के दौरान उत्तेजक न्यूरॉन्स के हमले का प्रतिरोध कम होने लगता है।[16] यह आयन चैनलों में परिवर्तन या निरोधात्मक न्यूरॉन्स के सही तरीके से काम न करने के कारण हो सकता है।[16] फिर इस प्रकार से इससे एक विशिष्ट क्षेत्र बनता है जिससे दौरा विकसित हो सकता है, जिसे “सीज़र फोकस” कहते हैं।[16] मिर्गी की एक और क्रियाविधि, उत्तेजक परिपथों का ऊपर की ओर विनियमन या प्रतिरोधात्मक परिपथों का नीचे के ओर विनियमन हो सकता है जो कि मस्तिष्क में चोट के कारण हो।[16][43] ये द्वितीयक मिर्गी इपिलेप्टोजेनेसिसके नाम से जाने जाने वाली प्रक्रियाओं के माध्यम से होती है।[16][43]रक्त–मस्तिष्क बाधा की विफलता भी एक कारण तंत्र है क्योंकि यह मस्तिष्क में रक्त में तत्वों को जाने की अनुमति देती है।[44]

फोकल दौरे एक मस्तिष्क के गोलार्द्ध में शुरु होते हैं जबकि सामान्य दौरे दोनो गोलार्द्धों में शुरु होते हैं।[20] कुछ प्रकार के दौरे मस्तिष्क की संरचना को बदल सकते हैं जबकि कुछ अन्य कम प्रभाव छोड़ते हैं।[45] गिल्योसिस, न्यूरॉन संबंधी हानि तथा मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्र का अपक्षय मिर्गी से जुड़े हैं लेकिन यह अस्पष्ट है कि क्या मिर्गी ये बदलाव लाती है या इन बदलावों के कारण मिर्गी होती है।[45]

निदान

एक ईईजी मिर्गी के दौरे के केन्द्र को खोजने में मदद कर सकती है।

मिर्गी का निदान आमतौर पर दौरे तथा आसपास की घटनाओं के वर्णन पर किया जाता है।[15] इलेक्ट्रोइन्सेफलोग्राम तथा न्यूरोइमेजिंग निदान के लिए चिकित्सी परीक्षण का आम हिस्सा हैं।[15] हालांकि विशिष्ट मिर्गी सिन्ड्रोम का पता लगाने के लिए अक्सर प्रयास किए जाते हैं लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो पाता है।[15] कठिन मामलों में वीडियो तथा ईईजी निगरानी उपयोगी हो सकते हैं।[46]

परिभाषा

व्यवहारिक रूप से मिर्गी को ऐसे दो या अधिक मिर्गी के दौरों में निर्धारित किया जाता है, जो 24 से अधिक घंटों से पृथक होते हैं, जिनके स्पष्ट कारण नहीं होते हैं; जहां पर किसी मिर्गी के दौरे को मस्तिष्क में असमान्य विद्युतीय गतिविधि के परिणामस्वरूप होने वाले अस्थायी चिह्न तथा लक्षण के रूप में परिभाषित किया जाता है।[6] इसे एक ऐसे विकार के रूप में भी देखा जा सकता है जिसमें लोगों को कम से कम एक मिर्गी को दौरा पड़ा हो तथा आगे ऐसा दोबारा होने का जोखिम हो।[6]

मिर्गी के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय लीग तथा मिर्गी के लिए अंतर्राष्ट्रीय ब्यूरोसाँचा:Emdashजो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन[47]साँचा:Emdashके सहयोगी हैं उन्होने 2005 के अपने संयुक्त कथन में मिर्गी को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है, "मस्तिष्क का एक विकार है जो मिर्गी का दौरा उत्पन्न करने के लिए स्थायी गड़बड़ी तथा इस परिस्थिति के न्यूरोबायोलॉजिक, संज्ञानात्मक, मनोवैज्ञानिक, और सामाजिक परिणाम द्वारा पहचाना जाता है। मिर्गी की परिभाषा के लिए कम से कम एक मिर्गी के दौरे का होना जरूरी है।"[48][49]

वर्गीकरण

दौरों से प्रभावित लोगों को दौरे के प्रकार, अंतर्निहित कारण,मिर्गी के सिन्ड्रोम तथा दौरे को दौरान आसपास की घटनाएं व समय के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।[46] दौरों के प्रकार इस आधार पर संगठित किया जाता है कि क्या दौरे का स्रोत मस्तिष्क के भीतर, स्थानीय है (फोकल दौरा) या फैला हुआ (सामान्य दौरा)है।[20] सामान्य दौरों को शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर विभाजित किया जाता है तथा इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: टॉनिक-क्लॉनिक (महामिर्गी), अनुपस्थिति (मृदु मिर्गी), मायोक्लॉनिक, क्लॉनिक, टॉनिक, तथा एटॉनिक दौरे।[20][50] कुछ दौरे जैसे कि मिर्गी से जुड़ी ऐठन अज्ञात प्रकार के हैं।[20]

फोकल दौरों (जिनको पहले आंशिक दौरे[15]कहा जाता था) को सरल आंशिक या जटिल आंशिक दौरों में बांटा जाता था।[20] अब ऐसा अनुशंसित नहीं है, बल्कि अब यह पसंद किया जाता है कि किसी दौरे के दौरान क्या हुआ।[20]

प्रयोगशाला परीक्षण

वयस्कों के लिए, इलेक्ट्रोलाइट, रक्त ग्लूकोस तथा कैल्शियम स्तर की जांच महत्वपूर्ण है जिससे कारणों के रूप में उनकी भूमिका के महत्व को नकारा जा सके।[46] इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम दिल की धड़कन से संबंधित समस्याओं की संभावना को नकारने के लिए उपयोग किया जाता है।[46] केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र संक्रमण के निदान के लिए लंबर पंचर उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसकी जरूरत नियमित तौर पर नहीं होती है।[11] बच्चों में अतिरिक्त परीक्षणों जैसे यूरिन बायोकेमिस्ट्री और चयापचय संबंधी विकार की उपस्थिति को देखने के लिए रक्त परीक्षण की जरूरत पड़ सकती है।[46][51]

दौरा पड़ने के 20 मिनट के भीतर उच्च रक्त प्रोलैक्टिन स्तर जानकारी, साइकोजेनिक गैर-मिर्गी दौरों के विपरीत, किसी मिर्गी के दौरे के पुष्टि के लिए काफी उपयोगी हो सकती है।[52][53] सीरम प्रोलैक्टिन स्तर आंशिक दौरों की जांच के लिए कम उपयोगी है।[54] यदि यह सामान्य हो तो भी मिर्गी का दौरा संभव है[53] और सीरम प्रोलैक्टिन स्कोप से मिर्गी के दौरे को पृथक नहीं करता है।[55] इसे मिर्गी के निदान के नियमित हिस्से के रूप में अनुशंसित नहीं किया जाता है।[46]

ईईजी

एक इलेक्ट्रोइनसेफलोग्राम(EEG), दौरे के बढ़े जोखिम का सुझाव देने वाली मस्तिष्क गतिविधि दर्शाने में सहायक हो सकता है। यह केवल उन लोगों के लिए अनुशंसित है जिनमें लक्षणों के आधार पर मिर्गी के दौरे पड़ने की संभावना हो। मिर्गी के निदान में इलेक्ट्रोएनसेफलोग्राफ उपस्थित दौरे या सिन्ड्रोम के प्रकार की पहचान करने में सहायक होता है।सन्दर्भ त्रुटि: <ref> टैग के लिए समाप्ति </ref> टैग नहीं मिला[56] लगभग पांच में से एक व्यक्ति जिनको मिर्गी क्लीनिक में देखा गया है उनको PNES[11] होता है और जिनको PNES होता है उनमे से लगभग 10% को मिर्गी होती है।[57] केवल दौरे के मामलों के आधार पर दोनो को पृथक कर पाना अक्सर कठिन हो जाता है।[57]

बच्चों में ऐसे व्यवहार हो सकते हैं जिनको आसानी से गल्ती से मिर्गी समझा जा सकता है, इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: श्वसन-रुकने के मौके, बिस्तर गीला करना, रात का भय, टिक और कंपकपी के दौरे[56] गैस्ट्रोएसोफैजिएल रीफ्लक्स नवजात की पीठ में ऐंठन पैदा कर सकता है और सिर को एक ओर घुमा सकता है, जिसे टॉनिक-क्लॉनिक दौरे का भ्रम हो सकता है।[56]

रोकथाम

जबकि कई सारे मामले रोकथाम योग्य नहीं होते हैं, सिर की चोटों को बचाने के प्रयास, जन्म के दौरान अच्छी देखभाल और वातावरणीय परजीवियों जैसे कि पोर्ट फीताकृमि की कमी प्रभावी हो सकती है।[3] मध्य अमरीका में पोर्ट फीताकृमि को कम करने के प्रयासों ने मिर्गी के नए मामलों में 50% तक कमीं की है।[10]

प्रबंधन

मिर्गी के उपचार मे आम तौर पर दूसरे दौरे के होने के पश्चात दैनिक रूप से दवा को उपयोग किया जाता है,[15][46] लेकिन अधिक जोखिम वाले लोगों के लिए दवा की शुरुआत पहले दौरे के बाद भी की जा सकती है।[46] कुछ मामलों में विशेष आहार,[न्यूरोउत्तेजक]] को दाखिल करना या मस्तिष्क शल्य क्रिया की जरूरत हो सकती है।

प्राथमिक उपचार

टॉनिक-क्लॉनिक दौरे वाले व्यक्ति को एक ओर करवट देने और स्वास्थ्य लाभ स्थिति में रखने से तरलों के फेफड़े में प्रवेश का जोखिम कम हो जाता है।[58] मुँह में उंगली रखने, जीभ काटने से बचाव वाला ब्लॉक या जीभ दबाने वाला रखना अनुशंसित नहीं है क्योंकि इसके कारण किसी व्यक्ति को उल्टी हो सकती है या बचाने वाले को काटे जाने का खतरा हो सकता है।[18][58] खुद को घायल करने से बचाव के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।[18] रीढ़ के बचाव की आमतौर पर जरूरत नहीं पड़ती है।[58]

यदि कोई दौरा 5 मिनट से अधिक रहता है या एक ही घंटे में बिना सामान्य हुए, दो से अधिक दौरे पड़ते हों तो इसे चिकित्सीय चिकित्सीय आपातस्थिति कहा जाता है और इसे स्टेटस एपिलेप्टिकसकहा जाता है।[46][59] इसके लिए वायुमार्ग को खुला व सुरक्षित रखने के लिए चिकित्सीय सहायता की जरूरत पड़ सकती है;[46]इसके लिए नैसो फैरेन्जिएल उपयोगी हो सकता है।[58] घर पर दौरे के लिए आरंभिक दवा मिडाज़ोलाम है जिसे मुँह में रखा जाता है।[60] डाइज़ेपाम भी गुदा मार्गसे उपयोग की जा सकती है।[60] अस्पताल में, अंतःशिरीय लोराज़ेपाम को बेहतर माना जाता है।[46] यदि two doses of बेंज़ोडाइज़ेपाइन की दो खुराक प्रभावी न हों तो अन्य दवाएं जैसे कि फेनिटॉएन की अनुशंसा की जाती है।[46] आपेक्षिक स्टेटस एपिलेप्टिकस जो कि आरंभिक उपचार को प्रतिक्रिया नहीं देता है उसके लिए आमतौर पर सघन देखभाल इकाई में भर्ती करना पड़ता है और अधिक मजबूत एजेंटों जैसे थायोपेंटोन या प्रोपोफॉलआदि से उपचार की जरूरत पड़ती है।[46]

दवाएं

आक्षेपरोधी

मिर्गी का मुख्य उपचार आक्षेपरोधी दवाएं हैं, जो कि जीवन भर चलती हैं।[15] आक्षेपरोधी का चुनाव दौरे के प्रकार, मिर्गी सिन्ड्रोम, उपयोग की गयी अन्य दवाओं, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं तथा व्यक्ति की उम्र व जीवनशैली पर निर्भर करता है[60] आरंभिक रूप से एकल दवा की अनुशंसा की जाती है;[61] यदि यह प्रभावी न हो तो अन्य एकल दवाओं की अनुशंसा की जाती है।[46] यदि एकल दवा प्रभावी न हो तभी दो दवाएं अनुशंसित की जाती हैं।[46] आधे लोगों में पहला एजेंट प्रभावी होता है; एक दूसरा एकल एजेंट लगभग 13% में और तीसरा या दो एजेंट 4%लोगों में कभी कभार प्रभावी होते हैं।[62] आक्षेपरोधी उपचार के बावजूद लगभग 30% लोगों में दौरे पड़ने जारी रहते हैं।[5]

<!—प्रकार के आधार पर दवाएं --> बहुत सारी दवाएं उपलब्ध हैं। फोकल तथा सामान्यीकृत दौरों, दोनो के लिए फेनिटॉएन, कार्बामाज़ापीन और वैल्प्रोएट बराबर रूप से प्रभावी दिखती है।[63][64] नियंत्रित स्राव कार्बामाज़ापीन तथा साथ ही तात्कालिक कार्बामाज़ापीन प्रभावी दिखती हैं और उनके पश्च प्रभाव भी कम दिखते हैं।[65] यूनाइटेड किंगडम में कार्बामाज़ापीन या लेमाट्रोजीन को फोकल दौरों के लिए पहली पंक्ति के उपचार के रूप में तथा लेवेटिरासीटम और वैल्प्रोएट को लागत तथा पश्च प्रभावों के मामलों के चलते दूसरी पंक्ति के उपचार के रूप में अनुशंसित किया जाता है।[46] वैल्प्रोएट को प्रथम पंक्ति तथा लेमाट्रोजीन को द्वितीय पंक्ति के उपचार के रूप में सामान्यीकृत दौरों के लिए अनुशंसित किया जाता है।[46] जिनमें दौरे अनुपस्थित हों उनके लिए ईथोसोक्सेमाइड या वैल्प्रोएट की अनुशंसा की जाती है; वैल्प्रोएट मायक्लोनिक दौरों व टॉनिक या एटॉनिक दौरों में में विशेष रूप से प्रभावी होती है।[46] यदि दौरे किसी विशेष उपचार से अच्छी तरह से नियंत्रण में हो तो रक्त में नियमित तौर पर दवा के स्तर की जांच करना आम तौर पर यह आवश्यक नहीं होता है।[46]

<!—विकासशील दुनिया--> सबसे कम महंगा आक्षेपरोधी फेनोबारबिटल है जो कि लगभग $5 USD प्रति वर्ष का पड़ता है।[10] विकासशील देशों में विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे प्रथम पंक्ति की अनुशंसा प्रदान करता है और यह वहाँ पर आम तौर पर उपयोग किया जाता है।[66][67] हालांकि इन तक पहुँच कठिन हो सकती है क्योंकि कुछ देशों में इसे नियंत्रित दवाके रूप में चिह्नित किया गया है।[10]

<!—पश्च प्रभाव --> 10 से 90% लोगों में पश्च प्रभाव देखे गए हैं जो कि इस बात पर निर्भर करता है कि आंकड़े किससे और कैसे एकत्र किए गए हैं।[68] सबसे बड़े विपरीत प्रभाव खुराक से संबंधित हैं तथा हल्के हैं।[68] मूड का बदलाव, उनींदापन या चाल में अस्थिरता आदि कुछ उदाहरण हैं।[68] कुछ दवाओं में ऐसे पश्च प्रभाव हैं जो कि खुराक से संबंधित नहीं हैं जैसे कि लालिमा, यकृत विषाक्तता या अस्थिमज्जा का दमन[68] पश्च प्रभावों के कारण लगभग एक चौथाई लोग उपचार बंद कर देते हैं।[68] कुछ दवाएं, गर्भावस्था के दौरान उपयोग किये जाने पर जन्म दोषों से संबंधित होती हैं।[46] वैल्प्रोएट विशेष रूप से ध्यान देने वाली है विशेष रूप से पहली तिमाहीके दौरान।[69] इसके बावजूद, एक बार प्रभावी होने पर उपचार जारी रहता है क्योंकि उपचार नहीं की गयी मिर्गी का जोखिम, दवाओं के जोखिम से अधिक होता है।[69]

<!—घटाते हुए कम करना --> धीरे-धीरे दवा को रोकना कुछ ऐसे लोगों में सही हो सकता है जिनको दो से चार वर्ष तक दौरा न पड़ा हो; हालांकि एक तिहाई लोगों में अक्सर पहले 6 महीनों में यह फिर से होता है।[46][70] दवाओं को रोकना लगभग 70% बच्चों और 60% वयस्कों के मामलों में संभव होता है।[3]

शल्य क्रिया

मिर्गी की शल्यक्रिया उन लोगों के लिए एक विकल्प हो सकती है जिनमें अनिय उपचारों के बावजूद फोकल दौरे एक समस्या बने रहते हैं।[71] इन अन्य उपचारों में दो या तीन दवाओं का परीक्षण भी शामिल है।[72] शल्यक्रिया का लक्ष्य दौरों में पूरा नियंत्रण करना है[73]और इसे 60-70% मामलों में हासिल किया जा सकता है।[72] आम प्रक्रियाओं में निम्नलिखित शामिल है: एक अग्रवर्ती टेम्पोरल लोब के माध्यम से हिप्पोकैम्पस को काटकर बाहर करना, ट्यूमर को निकालना और नियोकोर्टेक्स के हिस्सों को निकालना।[72] कुछ प्रक्रियाओं जैसे कि कॉर्पस कैलोस्टॉमी को शल्यक्रियाओं की संख्या में कमी लाने के प्रयास में किया जाता है कि न कि परिस्थितियों का इलाज करने के लिए।[72] शल्यक्रिया के बाद, कुछ मामलों में दवाएं धीरे-धीरे हटा दी जाती है।[72]

न्यूरोस्टिम्युलाइजेशन, उन लोगों के लिए एक अन्य विकल्प हो सकता है जिनके लिए शल्यक्रिया संभव नहीं है।[46] इसके तीन प्रकार उन लोगों में प्रभावी देखे गए हैं जो दवाओं को प्रतिक्रिया नहीं देते हैं:वेगास नर्व स्टिम्युलेशन, एंटेरियर थेलामस स्टिम्युलेशन और क्लोस्ड-लूप रेस्पॉन्सिव स्टिम्युलेशन[74]

अन्य

एक केटोजेनिक आहार (उच्च-वसा, निम्न-कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त -प्रोटीन) 30-40% बच्चों में शल्यक्रिया की संख्या को कम करता है।[75]लगभग 10% कुछ वर्षों तक आहार को ले पाने में सक्षम होते हैं, 30% को कब्ज़ हो जाता है और अन्य कई तरह के पश्च प्रभाव आम हैं।[75] अन्य स्वाभाविक आहारों को सहन करना आसान था तथा वे प्रभावी हो सकते हैं।[75] यह आहार क्यों काम करता है यह अभी भी अस्पष्ट है।[76] व्यायाम को दौरों से बचाने के लिए उपयोगी क्रिया के रूप में प्रस्तावित किया जाता है[77] कुछ आंकड़े इस दावे का समर्थन करते हैं।[78]

परिहार चिकित्सा में प्रेरकों को कम करना या हटाना शामिल होता है। उदाहरण के लिए, वे लोग जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होते हैं उनके लिए छोटा टेलीविजन उपयोग करना, वीडियों गेम से बचना या गहरे रंग के चश्मों का उपयोग उपयोगी हो सकता है।[79] कुछ लोग दावा करते हैं कि दौरे प्रतिक्रिया कुत्ते, जो कि एक प्रकार के सेवा कुत्ते होते हैं, दौरों का अनुमान लगा सकते हैं।[80] हालांकि इसके साक्ष्य बेहद कम हैं।[80] ऑपेरेन्ट आधारित बायोफीडबैक जो कि ईईजी तरंगों पर आधारित होते हैं इस मामले में उन लोगों में समर्थन करते हैं तो दवाओं पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।[81] हालांकि मनोवैज्ञानिक विधियों को दवाओं से प्रतिस्थापित नहीं किया जाना चाहिए।[46]

वैकल्पिक चिकित्सा

वैकल्पिक चिकित्सा जिसमें [[एक्यूपंचर],[82] मनोवैज्ञानिक दखल,[83] विटामिन,[84] तथायोग,[85] शामिल है किसी भी तरह के भरोसेमंद साक्ष्य से समर्थित नहीं हैं। कनाबिस का उपयोग भी साक्ष्य समर्थित नहीं है।[86] मेलाटोनिन भी अपर्याप्त रूप से साक्ष्य समर्थित है।[87]

रोग-निदान

2004 में प्रति 1,00,000 निवासियों में मिर्गी के लिए अक्षमता-समायोजित जीवन अवधि██ no data ██ <50 ██ 50-72.5 ██ 72.5-95 ██ 95-117.5 ██ 117.5-140 ██ 140-162.5 ██ 162.5-185 ██ 185-207.5 ██ 207.5-230 ██ 230-252.5 ██ 252.5-275 ██ >275

मिर्गी का पूर्ण उपचार संभव नहीं है, लेकिन केवल चिकित्सा से ही 70% मामलों में दौरों को प्रभावी रूप से रोका जा सकता है।[5] सामान्य दौरे वाले लोगों में से लगभग 80% से अधिक चिकित्सा द्वारा अच्छी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है जबकि फोकल दौरे वाले लोगों में यह केवल 50% लोगों में सही है।[74] पहले 6 माह में पड़ने वाले दौरों की संख्या, दीर्घअवधि परिणाम का पहला पूर्वानुमान है।[15] खराब परिणाम के जोखिम बढ़ाने वाले अन्य कारकों में निम्नलिखित शामिल हैं: आरंभिक उपचार में थोड़ी प्रतिक्रिया, सामान्य दौरा, दौरों का पारिवारिक इतिहास, मनोवैज्ञानिक समस्याएं, ईईजी पर सामान्य इपिलेप्टिफॉर्म प्रदर्शित करने वाली तरंगे।[88] विकासशील देशों में 75% लोग या तो उपचार रहित रह जाते हैं या उनका उपयुक्त उपचार नहीं होता है।[3] अफ्रीका में 90% लोगों को उपचार नहीं मिलता है।[3] इसका कुछ हद तक कारण उपयुक्त उपचार की अनुपस्थिति या इसका बहुत महँगा होना है।[3]

उत्तरजीविता

मिर्गी से पीड़ित लोगों में मृत्युका जोखिम अधिक होता है।[89] यह सामान्य जनसंख्या से 1.6 और 4.1 गुने के बीच होता है[90] और यह अक्सर निम्नलिखित से संबंधित होता है: दौरों का अंतःनिहित कारण, स्टेटस एपीलेप्टीकस, आत्महत्या, ट्रॉमा और मिर्गी में अचानक मृत्यु की संभावना (SUDEP)।[89] स्टेटस एपीलेप्टिकस से होने वाली मृत्यु मुख्य रूप से एक अंतःनिहित समस्या है न कि चिकित्सा की छूट गयी खुराकें।[89] मिर्गी पीड़ित लोगों में आत्महत्या का जोखिम दो से छः गुना तक बढ़ जाता है।[91][92] इसका कारण अस्पष्ट है।[91] SUDEP, सामान्य टॉनिक-क्लॉनिक दौरों की आवृत्ति से आंशिक रूप से जुड़ा दिखता है[93] तथा मिर्गी से जुड़ी मौतों के लगभग 15% मामले इससे जुड़े होते हैं।[88] यह अस्पष्ट है कि इसके जोखिम को कैसे कम करें।[93] मिर्गी के कारण मृत्यु-दर में अधिकतम वृद्धि बुजुर्गों में होती है।[90] किसी अज्ञात कारण से होना वाली मिर्गी में थोड़ा जोखिम बढ़ता है।[90] ऐसा आंकलन है कि यूनाइटेड किंगडम में मौतों का 40-60% रोकी जा सकती है।[15] विकासशील दुनिया में बहुत सारी मृत्यु उपचार न की गयी मिर्गी के कारण होती है जो कि स्टेटस एपिलेप्टिकस का कारण होती है।[10]

महामारी-विज्ञान

मिर्गी सबसे अधिक आम गंभीर मस्तिष्क संबंधी विकार[94] है जो पूरे विश्व के लगभग 65 मिलियन लोगों को होता है।[6] यह 20 की उम्र तक के लोगों की जनसंख्या के 1% और 75 की उम्र तक के लोगों की 3% जनसंख्या को होता है।[8] महिलाओं की अपेक्षा यह पुरुषों में अधिक आम है, हालांकि अंतर छोटा है।[10][36] इस रोग से पीड़ित अधिकांश (80%) लोग विकासशील दुनियामें हैं।[3]

वर्तमान समय में सक्रिय मिर्गी से पीड़ित लोगों की संख्या 5-10 प्रति 1000 की सीमा में है, जबकि सक्रिय मिर्गी से पीड़ित लोगों को ऐसे लोगों के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनको पिछले 5 बरसों में कम से कम एक दौरा पड़ा हो।[36][95] मिर्गी का विस्तार हर बरस, विकासशील देशों में 1,00,000 में 80-140 लोगों को तथा विकसित देशों में यह संख्या 40-70 प्रति 1,00,000 है।[3] गरीबी एक प्रकार का जोखिम है जिसमें गरीब देश से होना तथा किसी के देश के भीतर दूसरों से गरीब होना शामिल है।[10] विकसित दुनिया में मिर्गी आम तौर पर युवा या फिर बुजुर्गों में शुरु होती है।[10] विकासशील देशों में इसकी शुरुआत बड़े बच्चों और युवा वयस्कों में अधिक आम है जिसका कारण ट्रॉमा तथा संक्रामक रोगों की उच्च दर है।[10] 1970 से 2003 के बीच, विकसित देशों में बच्चों में प्रतिवर्ष मामलों की संख्या कम हो गयी है तथा बुजुर्गों में बढ़ गयी है।[95] इसके लिए बुजुर्गों में दौरों के कारण बेहतर उत्तरजीविता एक कारण है।[36]

इतिहास

सबसे प्राचीन चिकित्सा रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि इतिहास दर्ज करना शुरु किए जाने के समय से मिर्गी, लोगों को प्रभावित कर रही है।[96] संपूर्णप्राचीन इतिहास में इस स्थिति को धार्मिक अवस्था माना जाता था।[96] मिर्गी के दौरे का दुनिया का सबसे पुराना विवरणअकाडिनी (प्राचीन मेसोपोटामिया में उपयोग की जाने वाली भाषा) के पाठ में मिलता है जिसे लगभग ईसा पूर्व 2000 में लिखा गया था।[1] पाठ में जिस व्यक्ति का विवरण है उसे चंद्रमा के देवता के प्रभाव में बताया गया है और उस पर झाड़-फूंककी गयी है।[1]मिर्गी के दौरों को हम्मूराबी की संहिता (ईसा पूर्व 1790) में उस कारण के रूप में बताया गया है जिसके चलते खरीदे गये गुलाम की वापसी हो सकती है[1] और एडविन स्मिथ पेपाइरस (ईसा पूर्व 1700)लोगों में मिर्गी के दौरों के मामलों का वर्णन किया गया है।[1]

विकार के सबसे पुराने ज्ञात दस्तावेज़ साक्किकू हैं जो कि ईसा पूर्व 1067-1046 के बीच के बेबीलोनिया क्यूनिफॉर्म चिकित्सा पाठ हैं।[96] यह पाठ चिह्नों, लक्षणों, विस्तृत उपचार तथा संभावित परिणामों को बताता है[1] और विभिन्न प्रकार के दौरों की विशेषताओं का वर्णन करता है।[96] चूंकि बेबीलोनिया के लोगों में रोग को लेकर जीववैज्ञानिक समझ नहीं थी इसलिए उन लोगों ने दौरों को बुरी आत्माओं से ग्रसित होने के रूप में देखा और धार्मिक विधियों से इसके उपचार को सही माना।[96] लगभग ईसा पूर्व 900 में पुनर्वसु अत्रेय ने मिर्गी को होश खोने के रूप में समझाया;[97] इस परिभाषा को चरक संहिता (लगभग ईसापूर्व 400 में)के आयुर्वेदिकपाठ में आगे बढ़ाया गया था। [98]

हिप्पोक्रेटीस, 17वीं शताब्दी पीटर पॉल रूबेन्स के द्वारा बनायी गयी एक प्राचीन मूर्ति

प्राचीन ग्रीक में लोगों में रोग के बारे में परस्पर विरोधी विचार थे। वे मिर्गी को आध्यात्मिक रूप से अधिकार (किसी के) में होने की दशा के रूप में मानते थे, साथ ही वे इसे प्रतिभा व दिव्यता से जुड़ी अवस्था भी मानते थे। उनके द्वारा दिए गए नामों में से एक “पवित्र रोग” था। मिर्गी पौराणिक कथाओं में भी प्रकट होता है: यह चाँद की देवी सेलेने और आर्टेमिस से संबंधित है जो इस रोग से उन लोगों को पीड़ित करती थी जिनसे वे रुष्ट होती थीं। ग्रीक लोगों को लगता था महत्वपूर्ण चरित्र जैसे कि जूलियस सीज़र और हरक्यूलिस को यह रोग था।[1] इस दिव्य और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण अपवाद हिप्पोक्रेटीस मत था। पाँचवी सदी ईसा पूर्व में हिप्पोक्रेटीस ने इस विचार को खारिज किया था कि यह आत्माओं द्वारा उत्पन्न रोग है। अपने ऐतिहासिक काम पवित्र रोग पर में उन्होने प्रस्तावित किया कि मिर्गी का कोई दिव्य आधार नहीं था बल्कि यह मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली, चिकित्सीय रूप से उपचार की जा सकने वाली एक बीमारी है।[1][96] उन्होने रोग के दिव्य कारण पर जोर देने वालों को अंधविश्वासी जादू में विश्वास के माध्यम से अज्ञानता फैलाने का दोषी कहा।[1] हिप्पोक्रेटिस ने प्रस्तावित किया कि आनुवंशिकता एक महत्वपूर्ण कारण थी और बताया कि शुरुआती उम्र में रोग के उपस्थित होने पर परिणाम भयावह हो सकते थे तथा इस रोग से जुड़े शारीरिक गुणों तथा सामाजिक शर्म को भी वर्णित किया।[1] इसे एक दिव्य रोग कहने की बजाय इसे महान रोग (ग्रेट डिसीस) का नाम दिया जिससे इसके आधुनिक नाम ग्रैंड माल को आधार मिला जिसे सामान्य दौरों के लिए उपयोग किया जाता है।[1] उनके काम ने हालांकि इस रोग के शारीरिक मूल का वर्णन किया, लेकिन उनके काम को उस समय स्वीकार नहीं किया गया।[96] कम से कम 17वीं सदी तक बुरी आत्माओं को इसके लिए दोष दिया जाता रहा था।[96]

अधिकांश संस्कृतियों में मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों लांछित, त्यागा और यहाँ तक कि जेल में भी डाला जाता था; आधुनिक तंत्रिकाविज्ञान के जन्म स्थान सॉलपेट्रिया में, जीन-मार्टिन कार्कोट ने मिर्गी से पीड़ित लोगों को ऐसे मानसिक रोगियों के साथ देखा था जो कि जीर्ण सिफलिस से पीड़ित और आपराधिक पागल थे।[99] In प्राचीन रोम में मिर्गी को मॉर्बस कॉमिटियलिस ('असेंबली हॉल का रोग') के नाम से जाना जाता था तथा इसे ईश्वरीय श्राप के रूप में देखा जाता था। उत्तरी इटली में परम्परागत रूप से मिर्गी को संत वेलेंटाइन का व्याधि के रूप में भी जाना जाता था।[100]

1800 के मध्य में पहला दौरा-रोधी उपचार, ब्रोमाइड पेश किया गया था।[68] पहला आधुनिक उपचार, फेनोबार्बिटल 1912 में विकसित किया गया था और फेनीटॉइन 1938 में उपयोग किया जाने लगा।[101]

समाज तथा संस्कृति

कलंक

मिर्गी से पीड़ित लोगों के साथ, पूरी दुनिया में कलंक का अनुभव जुड़ा होता है।[102] यह लोगों को आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से प्रभावित कर सकता है।[102] भारत और चीन में मिर्गी के कारण विवाह के लिए इंकार भी किया जा सकता है।[3] कुछ क्षेत्रों में लोग अभी भी इस बात पर विश्वास करते हैं कि मिर्गी का उपचार संभव है।[10] अफ्रीका के दूसरे हिस्सों की तरह तंज़ानिया में, मिर्गी को बुरी आत्माओं, विचक्राफ्ट या जहर दिए जाने से जोड़ा जाता है तथा इसे छूतवाला माना जाता है[99] जिसके लिए कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।[10] 1970 से पहले यूनाइटेड किंगडम में एक कानून था जो लोगों को मिर्गी पीड़ितों से शादी करने से रोकता था।[3] इस कलंक के कारण कुछ लोग इस बात से इंकार करते हैं कि उनको कभी दौरा भी पड़ा था।[36]

अर्थशास्त्र

अमरीका में दौरे के चलते एक बिलियन डॉलर की प्रत्यक्ष आर्थिक लागत आती है।[11] मिर्गी के परिणाम स्वरूप यूरोप में 2004 में लगभघ 15.5 बिलियन यूरो की आर्थिक लागत आंकी गयी।[15] भारत में मिर्गी के कारण जीडीपी का 0.5% या 1.7 बिलियन डॉलर लागत आंकी गयी।[3] अमरीका में यह आकस्मिक विभाग जाने की कुल संख्याओं का लगभग 1% हिस्सा है (बच्चों के लिए लगभग 2%)।[103]

वाहन

मिर्गी से पीड़ित लोगों के साथ मोटर वाहन टक्करोंकी संभावना दोगुनी होती है इसी कारण से दुनिया के कई क्षेत्रों में उनको वाहन चलाने की अनुमति नहीं होती है या उनको यह अनुमति कुछ शर्तों को पूरा करने के साथ दी जाती है।[13] कुछ स्थानों में चिकित्सकों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य होता है कि वे लाइसेंस प्रदान करने वाली संस्था को उस व्यक्ति के बारे में सूचित करें जिसे दौरा पड़ा हो जबकि कुछ अन्य जगहों पर चिकित्सकों से यह अपेक्षा की जाती है वे विषयित लोगों को अपनी इस दशा के बारे में उपयुक्त संस्था को अपने आप सूचित करें।[13] चिकित्सकों द्वारा सूचित करने को जरूरी मानने वाले देशों में स्वीडन, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क तथा स्पेन शामिल हैं।[13] विषयित व्यक्तियों द्वारा अपने आप सूचित करने को जरूरी मानने वाले देशों में यूके, न्यूज़ीलैंड शामिल है और यदि व्यक्ति स्वयं रिपोर्ट न करे तो चिकित्सक स्वयं सूचित कर सकते हैं।[13] कनाडा, संयुक्त राज्य अमरीका तथा ऑस्ट्रेलिया में सूचित करने की जरूरत राज्यों या प्रांतों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।[13] यदि दौरे अच्छी तरह से नियंत्रित हों तो अधिकांश वाहन चलाने की अनुमति देना ठीक मानते हैं।[104] वाहन चलाने की अनुमति हासिल करने लिए दौरों से मुक्त होने के बाद की जरूरी अवधि, देशओं के अनुसार भिन्न-भिन्न है।[104] बहुत से देशों में यह अवधि 1 से 3 वर्षों तक की होती है।[104] संयुक्त राज्य अमरीका में यह अवधि, राज्यों के अनुसार तीन माह से लेकर एक वर्ष के बीच हैं।[104]

दौरों या मिर्गी से पीडित लोगों को आम तौर पर पायलट लाइसेंस नहीं दिया जाता है।[105] कनाडा में यदि किसी व्यक्ति को एक से अधिक दौरा न पड़ने पर पाँच साल की अवधि के बाद सभी परीक्षण सामान्य होने पर सीमित लाइसेंस देने पर विचार किया जाता है।[106] फैब्राइल तथा दवा संबंधी दौरों को पर भी विचार किया किया जा सकता है।[106] संयुक्त राज्य अमरीका में, संघीय उड्डयन प्रशासन मिर्गी से पीड़ित लोगों को वाणिज्यिक लाइसेंस की अनुमति नहीं देता है।[107] बेहद कम अवसरों पर किन्ही ऐसे व्यक्तियों के लिए अपवाद स्वरूप निर्णय लिए जा सकते हैं जिनको एक पृथक दौरा या फैब्राइल दौरा पड़ा हो और जो चिकित्सा/दवा के बिना वयस्क वय में दौरे से मुक्त रहे हों।[108] यूनाइटेड किंगडम में एक पूर्ण राष्ट्रीय निजी पायलट लाइसेंस के लिए पेशेवर लाइसेंस जितने मानकों को पूरा करना होता है।[109] इसके लिए पूरे 10 सालों तक चिकित्सा/दवा के बिना दौरा मुक्त होने की आवश्यकता होती है।[110] जो लोग इस आवश्यकता को पूरा नहीं करते हैं वे पाँच सालों तक दौरामुक्त रहने पर सीमित लाइसेंस हासिल कर सकते हैं।[109]

समर्थन करने वाले संगठन

मिर्गी से पीड़ित लोगों तथा परिवारों को समर्थन प्रदान करने के लिए बहुत सारे गैर-लाभ संगठन उपस्थित हैं। यूके में इनमें यूके व आयरलैंड की संयुक्त मिर्गी काउंसिल भी शामिल है।[46] परपल डे की स्थापना 2008 में 28 मार्च को की गयी थी जो कि मिर्गी के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए किया गया था[111] Other efforts to increase knowledge include the "Out of the Shadows" campaign, a joint effort by the World Health Organization, the International League Against Epilepsy and the International Bureau for Epilepsy.[3]

शोध

दौरों की भविष्यवाणी, ईईजी के आधार पर मिर्गी संबंधी दौरे के पड़ने के पहले उनकी भविष्यवाणी करने के प्रयास से संदर्भित हैं।[112] 2011 तक मिर्गी की भविष्यवाणी करने से संबंधित कोई प्रणाली विकसित नहीं की जा सकी थी।[112] किंडलिंग मॉडल जिसमें उन घटनाओं से बार-बार अनावरण जो कि आसानी से दौरे पड़ने का कारण बनती हैं, उनको मिर्गी के एनीमल मॉडलों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है।[113]

जीन उपचार को कुछ प्रकार की मिर्गी के अध्ययन में उपयोग किया जा रहा है।[114] प्रतिरक्षा प्रकार्य को पलटने वाली चिकित्सा जैसे कि अंतःशिरीय इम्युनोग्लोब्यूलिन साक्ष्य के आधार पर बेहद कम समर्थित हैं।[115] 2012 तक गैर-आक्रामक स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी की मिर्गी के कुछ प्रकारों के लिए मानक शल्यक्रिया से तुलना की जाती थी।[116]

अन्य पशु

मिर्गी अन्य पशुओं जैसे कुत्तों तथा बिल्लियों में भी होती है तथा कुत्तों में यह सबसे आम मस्तिष्क विकार है।[117] इसका उपचार आम तौर पर गैर आपक्षेपकारियों द्वारा किया जाता है जैसे कि कुत्तों में फेनोबार्बिटॉल या ब्रोमाइड तथा बिल्लियों में फेनोबार्बिटॉल।[118] जबकि घोड़ो में सामान्य दौरों का निदान काफी आसान है, गैर-सामान्य दौरों में यह अधिक कठिन हो सकता है तथा ईईजी का उपयोग किया जा सकता है।[119]

संदर्भ

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अतिरिक्त अध्ययन

वाह्य कड़ियां


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'अपस्मार'
मिरगी, मिर्गी, एपिलेप्सी
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
Muu.jpg
आईसीडी-१० G40.-G41.
आईसीडी- 345
डिज़ीज़-डीबी 4366
मेडलाइन प्लस 000694
ईमेडिसिन neuro/415 
एम.ईएसएच D004827

अपस्मार या मिर्गी (वैकल्पिक वर्तनी: मिरगी, अंग्रेजी: Epilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है।[1] दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है।[2] इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है।[3] १७ नवंबर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।[4][5][6]

इतिहास

मिरगी मानव सभ्यता की ज्ञात सबसे पुरानी बीमारियों में गिनी जाती है। इस रोग के अभिन्न लक्षणों और इनसे जुड़ी अनिश्चितता के कारण इसका रहस्य सदा से ही बना आया है। अधिकांशतः आत्मनियंत्रण का ह्रास आंशिक होता है, व दौरे के समय चेतनता का कुछ अंश बना रहता है। किंतु इस समय होने वाली हरकतें व अनुभूतियाँ किसी अलौकिक सत्ता के होने का इशारा करती रही हैं। रोग को वैज्ञानिक दृष्टिकोण मात्र एक शताब्दी से मिला है। लिखित भाषा में मिर्गी शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम प्राचीन मिस्र देश के भोज पत्रों में मिलता है। इन्हें पत्रों को पैपाइरस कहते हैं। चित्रलिपि के इस रूप का रोमन लिपि में रूपान्तरण है। इसमें बनी मानवकृत्ति से यह संदेश मिलता है कि एक प्रेतात्मा मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर ऐसा मुछ करती है।[7]

प्राचीन

इस रोग को अनेक ऊपरी शक्तियों से जोड़कर भी देखा जाता रहा है। ये शक्तियां अच्छी और बुरी दोनों हो सकती हैं, और यही तय करता है रोगी के साथ समाज का बर्ताव। उसे किसी स्थानीय देवता के प्रतिनिधि रूप में भी देखा जाता रहा है व कई बार उससे घृणा की जा सकती है, दुत्कारा जा सकता है। भारत में आज भी अनेक स्त्रियों या पुरुषों में देवी आती है जिस समय उसकी कुछ हरकतें मिर्गी से मेल खाती हैं, किन्तु वास्तव में उसका मिर्गी से कोई सम्बन्ध नहीं ज्ञात हुआ है। लोग उसके आगे श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, पूजा करते हैं। व्यक्ति के मन की अतृप्त भावनाएंपोषित होती हैं। समाज में प्रतिष्ठा व मान्यता मिलती है। ऐसा मात्र एशिया या अफ्रीका के पिछड़े समझे जाने वाले क्षेत्रों ही नहीं देखा जाता बल्कि आधुनिक यूरोप, अमेरिका आदि महाद्वीपों में भी पुरातन काल से यही धारणा रही है कि ये अवस्था शरीर के भीतर से अपने आप नहीं आती बल्कि कोई है जो बाहर से कठपुतली की भांति नियंत्रित करता है।

२००२ में अपस्मार का प्रति १,००,००० व्यक्ति फैलाव
██ आंकड़े नहीं ██ ५० से कम ██ 50-72.5 ██ 72.5-95 ██ 95-117.5 ██ 117.5-140 ██ 140-162.5 ██ 162.5-185 ██ 185-207.5 ██ 207.5-230 ██ 230-252.5 ██ 252.5-275 ██ २७५ से अधिक

प्राचीन महान भारतीय चिकित्साशास्त्र चरक संहिता में अपस्मार विस्तृत वर्णन मिलता है। इस रोग को शारीरिक रोगों के समान ही मानकर इसके अनेक कारणों की सूची भी दी गई है व औषधियों द्वारा उपचार भी सुझाया। गया है। कुछ शताब्दी ईसा पूर्व, यूनान के महान चिकित्सक हिप्पोक्रेटीज ने भी मिर्गी को दैवीय प्रकोप नहीं समझा है बल्कि अन्य रोगों के समान उसके भी शारीरिक कारण ढूंढने का उल्लेख किया हैं। यूनानी पुराण कथाओं में डेल्फी का मंदिर प्रसिद्ध जहां पुजारिन आसन पर बैठकर तंद्रा में कुछ बोलती रहती थी, जिसे भविष्यवाणी समझा जाता था। ओल्डन्यू टेस्टामेण्ट में भी कई स्थानों पर मिर्गी का उल्लेख आता है जहां उसे पवित्र रोग कहा गया क्योंकि वह ईश्वर प्रदत्त है। बाईबिल में उद्धरण आते हैं कि ईसा मसीह ने मिर्गी-रोगियों का उद्धार किया।[7] [क]सेन्टपॉल का का जन्म ईसा बाद की पहली शताब्दी में हुआ था। वे यहूदी थे व ईसाईयों के कट्टर विरोधी। बाईबल में प्राप्त अनेक उद्धरणों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि उन्हें यदा-कदा मिर्गी के दौरे आते थे। [ख]

मध्यकाल

मध्यकाल के फ्रांस मे जोन ऑफ आर्क नामक महानायिका को अजीब कुछ आवाजें सुनाई देने व दृश्य दिखाई देने का उल्लेख है। वैज्ञानिक शब्दावली में ये विभ्रम (हैल्यूसीनेशन) कहलाता है और मस्तिष्क के रोगों के कारण होता है।[7] संभवतः उसके मस्तिष्क के बायें गोलार्ध व टेम्पोरलआस्सीपिटल खण्ड में विकृति रही होगी।[ग] प्राचीन संस्कृत साहित्य में महाकवि माघ ने मिर्गी की तुलना सागर से की है।[घ] शेक्सपीयर साहित्य में भी कई बार अनेक स्थलों पर मिर्गी का उल्लेख आता है। उनकी ऑथेलो नामक रचना के नायक को मिर्गी का दौरा पडता है तथा दो अन्य पात्र कैसियो व इयागो उसकी हंसी उडाते हैं।[च] उन्नीसवीं शताब्दी के महानतम लेखक फेदोर मिखाईलोविच दास्तोएवस्की को २७ वर्ष की आयु में साईबेरिया में कारावास की सजा भुगतते समय दौरे में बढ़ोत्तरी की शिकायत आयी।[छ] दास्तोएवस्ककी ने उपन्यास द ईडियट में अपनी बीमारी को नायक प्रिस मिखिन पर आरोपित कर दिया है। [ज]टेम्पोरल खण्ड से उठने वाले आंशिक जटिल (सायकोमोटर) दौरों में यह अधिकता से होता है। इसे फ्रेंच भाषा में देजा-वू कहते हैं। प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि लार्ड टेनीसन व गद्यकार चार्ल्स डिकेन्सन ने भी देजा-वू को भावनाओं में व्यक्त किया है।[झ][ट] हालैण्ड के विश्वविख्यात चित्रकार विन्सेन्ट वान गाग को भी मिर्गी रोग था उसके बावजूद वे श्रेष्ठ कोटि के कलाकार थे।

आधुनिक

[7]

कारण

मानव मस्तिष्क कई खरब तंत्रिका कोशिकाओं से निर्मित होता है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता कार्य-कलापों को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क के समस्त कोषों में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है।[3] मिर्गी रोग दो प्रकार का हो सकता है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम के नायक माईक एडवर्डसन के अनुसार ग्राही तंत्रों से मिलने वाले संकेतों में गड़बड़ी के कारण ही मिर्गी और पी.एम.टी.की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नए अध्ययन में यह भी पाया कि मस्तिष्क में ग्राही तंत्रों की संख्या बहुत कम होती है लेकिन ये मानवीय चेतना के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके अनुसार ग्राही तंत्रों की रचना के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर ली गई है, अतः इसमें गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं तैयार करना अब आसान हो गया है।[8]

दौरे के समय

दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये। कई मामलों में मिरगी की स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग होती है। दोनों की स्थिति में अंतर का प्रमुख कारण महिलाओं और पुरुषों में शारीरिक और सामाजिक अंतर का होना होता है। जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये। दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते। दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है। उसमें जितना समय लगना है, वह लगेगा ही।[2] ये ध्यान-योग्य है कि रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये। ये गन्दे अंधविश्वास हैं व बदबू व कीटाणु फैलाते हैं। इस समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है। रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है।

मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था में व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बड़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये। यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये। मिर्गी रोगी का विवाह हो सकता है एवं वे प्रजनन भी कर सकते हैं। उनके बच्चे स्वस्थ होंगे या उन्हें मिर्गी होने की अधिक संभावना नहीं होती। गर्भवती होने पर महिला को दौरे रोकने की गोलियाँ नियमित लेते रहना चाहिये[9] क्योंकि इन गोलियों से अधिकतर मामलों में बुरा असर नहीं पडता। गोलियाँ खाने वाली महिला स्तनपान भी करा सकती है।

रोग की संभावना

मिर्गी किसी को भी हो सकती है, बालक, वयस्क, वृद्ध, पुरुष, स्त्री, सब को। दिमाग पर जोर पडने से मिर्गी नहीं होती। कई लोग खूब दिमागी काम करते हैं परन्तु स्वस्थ रहते हैं। मानसिक तनाव या अवसाद से मिर्गी नहीं होती है। अच्छे भले, हंसते-गाते इंसान को भी मिर्गी हो सकती है। मेहनत करने और थकने से भी मिर्गी नहीं होती, वरन ये आराम करने वाले को भी हो सकती है। कमजोरी या दुबलेपन से मिर्गी नहीं होती बल्कि खाते पीते पहलवान को भी हो सकती है, न ही मांसाहार करने से मिर्गी होती है, बल्कि शाकाहारी लोगों को भी उतनी ही संभावना से मिर्गी हो सकती है।[2] मिर्गी का एक कारण सिर की चोट भी है। सामान्यत: महिलाओं में इसका प्रभाव प्रजनन शक्ति में देखने में आता है। हालांकि, इसका ये अर्थ नहीं होता है कि मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों को बच्चा नहीं होता, ऐसा बिल्कुल नहीं है।[9] मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों के बच्चे सामान्य होते हैं। चिकित्सकों के अनुसार जन्म के दौरान चोट लगना भी मिरगी रोग का एक कारण होता है। मिर्गी खानदानी रोग नहीं है और बहुत कम मामलों में इसका खानदानी प्रभाव देखा जाता है जो कि एक संयोग हो सकता है। ९० प्रतिशत मामलों में खानदानी असर नहीं होता। मिर्गी के अधिकांश रोगियों का दिमाग अच्छा होता है व अनेक रोगी बुद्धिमान व चतुर होते हैं। लगभग सभी रोगी समझदार होते हैं। पागलपन व दिमागी गड़बड़ियां बहुत कम मामलों में देखी जाती हैं।[2] मनोचिकित्सकों के अनुसार इस रोग से ग्रसित व्यक्ति आम लोगों की तरह अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

उपचार

मिरगी का उपचार दवाओं और शल्य-क्रिया के द्वारा किया जा सकता है, पर इस रोग का उपचार लगातार कराने की आवश्यकता रहती है। कभी-कभी इस रोग का उपचार तीन से पांच वर्ष तक चलता है। सामान्यतया मिर्गी का रोगी ३-५ वर्ष तक औषधि लेने के बाद स्वस्थ हो जाता है, परंतु यह सिर्फ ७० प्रतिशत रोगियों में ही संभव हो पाता है। अन्य ३० प्रतिशत रोगियों के लिए ऑपरेशन आवश्यक होता है। मिर्गी रोगियों में आवाज बदल जाने, चक्कर आने, जबान लड़खड़ाने की समस्या पाई जाती है। ऐसे रोगियों को सिर्फ ऑपरेशन से ही ठीक किया जा सकता है।[10] इस ऑपरेशन से पूर्व रोगी के मस्तिष्क का एम आर आई परीक्षण किया जाता है, जिसके द्वारा यह ज्ञात होता है कि मस्तिष्क का कौन-सा भाग प्रभावित है। उसके बाद शल्य-क्रिया द्वारा प्रभावित भाग को निकाल दिया जाता है। इसके बाद रोगी एक-दो साल औषधि लेने के बाद पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है।

आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र में ये ऑपरेशन गामा नाइफ रेडियो सर्जरी के प्रयोग से लेज़र किरण द्वारा किया जाता है, जिसमें बिना चीर-फाड़ के ही लेज़र के उपयोग से विकृत भाग को हटा दिया जाता है।[10]

टीका टिप्पणी

क.    ^  प्रभु मेरे बालक पर कृपा करो। उसे मिर्गी है। वह बहुत पीडा भोगता है। कभी वह आग में गिर जाता है तो कभी पानी में (मेथ्यू १७ः१५) एक मसीहा ने लिखा मैंने ईश्वर के रहने की तमाम जगहों को इतनी सी देर में देख लिया। जितनी देर में एक घडा पानी भी खाली नहीं किया जा सकता।
ख.    ^  एक पत्र में उन्होंने लिखा कि उन्हें एक अजीब असामान्य से दौरे में आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई थीं - मैं नहीं जानता कि मैं शरीर के अन्दर था या बाहर। मुझे ईश्वर ने कुछ पवित्र रहस्य बताये कि जिन्हें होंठ दुहरा नहीं सकते। सेन्टपाल के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी उनका धर्मान्तरण। लगभग ३० वर्ष की उम्र में वे येरूशलम से दमिश्क पैदल जा रहे थे। उद्देश्य था दमिश्क के ईसाईयों को सजा देना। मार्ग में अजीब घटा। एक तीव्र प्रकाश हुआ। वे जमीन पर गिर पडे। उन्हें कुछ आवाजें सुनाई दीं जो ईसा मसीह के समान थी। वे उठे परन्तु अन्धे हो चुके थे। दमिश्क पहुंचने के तीन दिन बाद उनकी रोशनी फिर लौटी। उनका मन बदल चुका था।ईसाई धर्म अंगीकार कर लिया। अनेक न्यूरालाजिस्ट ने सेन्टपाल के जीवन पर उपलब्ध ईसाई धर्म साहित्य का गहराई से अध्ययन किया है तथा वे मत के हैं कि सेन्टपाल को एपिलेप्सी का दौरा आया होगा। उनके धर्मान्तरण में मिर्गी का कुछ प्रभाव जरूर था।
ग.    ^  जोन आफ आर्क में एक बार लिखा मुझे दायीं होर से, गिरजाघर की तरफ से आवाज आयी। ईश्वर का आदेश था। आवाज के साथ सदैव प्रकाश भी आता है। प्रकाश की दिशा भी वहीं होती है जो ध्वनि की। अनुमान लगा सकते हैं कि उसके मस्तिष्क के बायें गोलार्ध व टेम्पोरल व आस्सीपिटल खण्ड में विकृति रही होगी।
घ.    ^  दोनों भूमि पर पडे हैं, गरजते हैं, भुजाएं हिलाते हैं व फेन पैदा करते हैं। (शिशुपाल वध - ७वीं शताब्दी ईसा पश्चात्)। : महाकवि माघ
च.    ^  जूलियस सीजर का एक अंश उद्धृत है -

कैसियस: धीरे बोलो, फिर से कहो, क्या सच ही सीजर मूच्र्छित हो गये थे ?
कास्का: हां ! रोम के सम्राट ऐन ताजपोशी के समय चक्करघिन्नी के समान घूमे और गिर पडे। मुंह से झाग निकल रहा था। बोल बन्द था।
व्रूटस: यह ठीक उसी बीमारी के समान लगता है जिसे मिर्गी कहते हैं। होश में आने के बाद जूलियस ने क्या कहा ?
कास्का: बोले यदि मैंने कोई ऐसी वैसी बात कही हो तो ... उसे मेरी कमजोरी व बीमारी माना जाए। और इसी बेहोशी के दौरे के कारण वह बाद में बडी देर तक उदास बना रहा।


छ.    ^  डायरी में उन्हें अजीब, भयावह, रोचक पूर्वाभास होता है, हर्षातिरेक का। देखो हवा में कैसा शोर भर गया है। स्वर्ग मानों धरती पर गिरा आ रहा है और उसने मुझे समाहित कर लिया है। मैंने ईश्वर को छू लिया है। पैगम्बर साहब को होने वाले रुहानी इलहाम की भी ऐसी ही अवस्था थी।
ज.    ^  वह मास्को की सडकों पर बेमतलब घूमता रहता है और बताता है कभी-कभी सिर्फ पांच-छः सेकण्ड के लिये मुझे शाश्वत संगीत की अनुभूति होती है। सब कुछ निरपेक्ष और निर्विवाद लगता है भयावह रूप से पारदर्शी लगता है। कभी दिमाग में अचानक आग लग उठती है। बादलों की सी तेजी से जीवन की चैतन्यता का प्रभाव दस गुना बढ जाता है। फिर पता नहीं क्या होता है।
झ.    ^  प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि लार्ड टेनीसन व गद्यकार चार्ल्स लिखित निम्न अंश देजा वू की भावना को अभिव्यक्‍त करते हैं -

कुछ-कुछ है या कि लगता है, रहस्यमयी रोशनी सा मुझे छूता है।
जैसे कि भूले हूए सपनों की झलकें हों, कुछ यहाँ की हों, कुछ वहां की हों,
कुछ किया था, न जाने कहाँ की हों, सीमा उनकी भाषा से परे की हो।
- लार्ड टेनीसन


ट.    ^  हम सब लोगों के दिल दिमाग पर कभी-कभी एक अजीब सी अनुभूति हावी होती है कि जो कुछ कहा जा रहा है या किया जा रहा है वह सब किसी अनजाने सुदूर अतीत में पहले भी कहा जा चुका है या किया जा चुका है तथा यह भी कि चारों ओर जो वस्तुएें परिस्थितियाँ चेहरे विद्यमान हैं वे किसी धुंधले भूतकाल में पहले भी घटित हो चुकी हैं तथा यह भी यकायक याद हो आता है कि अब आगे क्या कहा जाएगा।

- चार्ल्स डिकन्सन

संदर्भ

  1. मिरगी।हिन्दुस्तान लाइव।१८ नवंबर, २००९
  2. मिर्गी के बारे में खास-खास और सच्ची बातें।वेब दुनिया।१६ मई, २००८।अपूर्व पुराणिक
  3. मिर्गी से डरें नहीं, उसे समझें।वेब दुनिया।डॉ.वोनोद गुप्ता।
  4. एपिलेप्सी फैक्ट्स(अंग्रेज़ी)
  5. वर्ल्ड एपिलेप्सी डे सिलिब्रेटेड ऍट जहांगीर हॉस्पिटल।द टाइम्स ऑफ इंडिया।(अंग्रेज़ी)
  6. मिरगी रोग हो सकता है जानलेवा।याहू जागरण।१७ नवंबर, २००९
  7. इतिहास, धर्म व कला के आईने में मिर्गी।माई वेब दुनिया।अपूर्व पुराणिक।१६ मई, २००८
  8. ग्राही तंत्रों की बनावट मिर्गी का कारण।दैनिक भास्कर।११ मार्च, २००८
  9. गर्भावस्था एवं मिर्गी रोग ।वेबदुनिया।डॉ.टी.एन.दूबे
  10. मिर्गी का इलाज ऑपरेशन से।वेबदुनिया।

बाहरी कड़ियाँ