बाइबिल

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बाइबिल (अथवा बाइबल, Bible, अर्थात "किताब") ईसाई धर्म(मसीही धर्म) की आधारशिला है और ईसाइयों (मसीहियों) का पवित्रतम धर्मग्रन्थ है। इसके दो भाग हैं : पूर्वविधान (ओल्ड टेस्टामैंट) और नवविधान (न्यू टेस्टामेंट)। बाइबिल का पूर्वार्ध अर्थात् पूर्वविधान यहूदियों का भी धर्मग्रंथ है। बाइबिल ईश्वरप्रेरित (इंस्पायर्ड) है किंतु उसे अपौरुषेय नहीं कहा जा सकता। ईश्वर ने बाइबिल के विभिन्न लेखकों को इस प्रकार प्रेरित किया है कि वे ईश्वरकृत होते हुए भी उनकी अपनी रचनाएँ भी कही जा सकती हैं। ईश्वर ने बोलकर उनसे बाइबिल नहीं लिखवाई। वे अवश्य ही ईश्वर की प्रेरणा से लिखने में प्रवृत्त हुए किंतु उन्होंने अपनी संस्कृति, शैली तथा विचारधारा की विशेषताओं के अनुसार ही उसे लिखा है। अत: बाइबिल ईश्वरीय प्रेरणा तथा मानवीय परिश्रम दोनों का सम्मिलित परिणाम है।

मानव जाति तथा यहूदियों के लिए ईश्वर ने जो कुछ किया और इसके प्रति मनुष्य की जो प्रतिक्रिया हुई उसका इतिहास और विवरण ही बाइबिल का वण्र्य विषय है। बाइबिल गूढ़ दार्शनिक सत्यों का संकलन नहीं है बल्कि इसमें दिखलाया गया है कि ईश्वर ने मानव जाति की मुक्ति का क्या प्रबंध किया है। वास्तव में बाइबिल ईश्वरीय मुक्तिविधान के कार्यान्वयन का इतिहास है जो ओल्ड टेस्टामेंट में प्रारंभ होकर ईसा के द्वारा न्यू टेस्टामेंट में संपादित हुआ है। अत: बाइबिल के दोनों भागों में घनिष्ठ संबंध है। ओल्ड टेस्टामेंट की घटनाओं द्वारा ईसा के जीवन की घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार की गई है। न्यू टेस्टामेंट में दिखलाया गया है कि मुक्तिविधान किस प्रकार ईसा के व्यक्तित्व, चमत्कारों, शिक्षा, मरण तथा पुनरुत्थान द्वारा संपन्न हुआ है; किस प्रकार ईसा ने चर्च की स्थापना की और इस चर्च ने अपने प्रारंभिक विकास में ईसा के जीवन की घटनाओं को किस दृष्टि से देखा है कि उनमें से क्या निष्कर्ष निकाला है।

बाइबिल में प्रसंगवश लौकिक ज्ञान विज्ञान संबंधी बातें भी आ गई हैं; उनपर तात्कालिक धारणाओं की पूरी छाप है क्योंकि बाइबिल उनके विषय में शायद ही कोई निर्देश देना चाहती है। मानव जाति के इतिहास की ईश्वरीय व्याख्या प्रस्तुत करना और धर्म एवं मुक्ति को समझना, यही बाइबिल का प्रधान उद्देश्य है, बाइबिल की तत्संबंधी शिक्षा में कोई भ्रांति नहीं हो सकती। उसमें अनेक स्थलों पर मनुष्यों के पापाचरण का भी वर्णन मिलता है। ऐसा आचरण अनुकरणीय आदर्श के रूप में नहीं प्रस्तुत हुआ है किंतु उसके द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य कितने कलुषित हैं और उनको ईश्वर की मुक्ति की कितनी आवश्यकता है।

पुराना नियम[संपादित करें]

इसमें प्राचीन यहूदी धर्म और यहूदी लोगों की गाथाएँ, पौराणिक कहानियाँ, मिथक (ख़ास तौर पर सृष्टि) आदि का वर्णन है। इसकी मूलभाषा इब्रानी और अरामी थी।

नया नियम[संपादित करें]

ये ईसा मसीह के बाद की है, जिसे ईसा के शिष्यों ने लिखा था। इसमें ईसा (यीशु) की जीवनी, उपदेश और शिष्यों के कार्य लिखे गये हैं। इसकी मूलभाषा कुछ अरामी और अधिकतर बोलचाल की प्राचीन ग्रीक थी। इसमें ख़ास तौर पर चार शुभसंदेश (सुसमाचार) हैं जो ईसा की जीवनी का उनके चार शिष्यों द्वारा वर्णन है : मत्ती, लूका, युहन्ना और मरकुस।

यहूदी बाइबिल[संपादित करें]

यहूदी धर्म की धर्मपुस्तक भी बाइबिल (इब्रानी : तनख़) ही है, पर उसमें सिर्फ़ पुराना नियम शामिल है।

विषयसूची[संपादित करें]

बाइबिल कुल मिलाकर 72 ग्रंथों का संकलन है - पूर्वविधान में 45 तथा नवविधान में 27 ग्रंथ हैं।

पूर्वविधान की सामग्री[संपादित करें]

  • (1) ऐतिहासिक ग्रंथ पेंतातुख, जोसुए अथवा यहोशू, न्यायाधीश, रूथ, सामुएल, राजा, पुरावृत्त (पैरालियोमेनोन), एज्रा (एस्ट्रास), नेहेमिया, एस्तर, तोबियास, यूदिथ, मकाबी।
  • (2) शिक्षाप्रधान ग्रंथ - इययोव, भजनसंहिता, नीतिवचन, उपदेशक (एल्केसिआस्तेस) श्रेष्ठगीत, प्रज्ञा, एल्केसियास्तिकस अथना सिराह।
  • (3) नबियों के ग्रंथ : यशयाह, जेरेमिया, विलापगीत, बारूह, ऐजेकिएल, अथवा यहेजकेल, दानिएल और बारह गौण नबी अर्थात् ओसेआ अथवा होशे, जोएल, योएल आमोस, ओबद्याह, योना, मिकेयाह, नाहूम, हाबाकुक, सोफ़ोनिया, हग्गै, जाकारिआ, मलाकी

नवविधान की सामग्री[संपादित करें]

नवविधान के प्रथम पाँच ग्रंथ ऐतिहासिक हैं अर्थात् चारों सुसमाचार (गास्पैल) तथा ऐक्ट्स आव दि एपोसल्स (ईसा) के पट्ट शिष्यों के कार्य। अंतिम ग्रंथ एपोकालिप्स (प्रकाशना) कहलाता है। इसमें सुसमाचार लेखक संत योहन प्रतीकात्मक शैली में चर्च के भविष्य तथा मुक्तिविधान की परिणति का चित्र अंकित करते हैं। नवविधान के शेष 21 ग्रंथ शिक्षा प्रधान हैं, अर्थात् संत पाल के 14 पत्र, संतपीटर के दो पत्र, सुसमाचार लेखक संत योहन के तीन पत्र, संत याकूब और संत जूद का एक एक पत्र। संत पाल के पत्र या तो किसी स्थानविशेष के निवासियों के लिए लिखे गए हैं (कोरिंथियों तथा थेस्सालुनीकियों के नाम दो दो पत्र; रोमियों, एफिसियों, फिलिपियों और कुलिसियों के नाम एक एक पत्र) या किसी व्यक्तिविशेष को (तिमोथी के नाम दो और तितुस तथा फिलेमोन के नाम एक एक पत्र)। इब्रानियों के नाम जो पत्र बाइबिल में सम्मिलित हैं, इनकी प्रामाणिकता के विषय में संदेह नहीं है किंतु संत पाल के विचारों से प्रभावित होते हुए भी इनका लेखक कोई दूसरा ही होगा।

बाइविल के प्रामाणिक ग्रंथों की उपर्युक्त सूची में से पूर्वविधान के कुछ ग्रंथ इब्रानी बाइबिल में सम्मिलित नहीं थे, अर्थात् तोबियास, यूदिथ, मकाबी, प्रज्ञा सिराह और दानिएल एवं एस्तेर के कुछ अंश। यहूदी और बहुत से प्रोटेस्टैंट संप्रदाय इन ग्रंथों को अप्रमाणित मानकर अपनी बाइबिल में स्थान नहीं देते।

भाषा और रचनाकाल[संपादित करें]

प्राय: समस्त पूर्वविधान की मूल भाषा इब्रानी है। अनेक ग्रंथ यूनानी भाषा में तथा थोड़े से अंश अरामेयिक (इब्रानी बोलचाल) में लिखे गए हैं। समस्त नवविधान की भाषा कोइने नामक यूनानी बोलचाल है।

बाइबिल का रचनाकाल 1400 ई.पू. से सन् 100 ई. तक माना जाता है। इसके बहुसंख्यक लेखकों में से मूसा सबसे प्राचीन हैं, उन्होंने लगभग 1400 ई.पू. में पूर्वविधान का कुछ अंश लिखा था। पूर्वविधान की अधिकांश रचनाएँ 900 ई.पू. और 100 ई.पू. के बीच की है। समस्त नवविधान 50 वर्ष की अवधि में लिखा गया है अर्थात् सन् 50 ई. से सन् 100 ई. तक।

बाइबिल में जो ग्रंथ सम्मिलित किए गए हैं वे एक ही शैली में नहीं, अनेक शैलियों में लिखे गए हैं - इसमें लोककथाएँ, काव्य और भजन, उपदेश और नीतिकथाएँ आदि अनेक प्रकार के साहित्यिक रूप पाए जाते हैं। अध्ययन तथा व्याख्यान करते समय प्रत्येक अंश की अपनी शैली का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।

अनुवाद[संपादित करें]

शताब्दियों से बाइबिल के अनुवाद का कार्य चला आ रहा है। इसराएली लोग इब्रानी बाइबिल क्रा छायानुवाद अरामेयिक बोलचाल में किया करते थे। सिकंदरिया के यहूदियों ने दूसरी शताब्दी ई.पू. में इब्रानी बाइबिल का यूनानी अनुवाद किया था जो सेप्टुआर्जिट (सप्तति) के नाम से विख्यात है। लगभग सन् 400 ई. में संत जेरोम ने समस्त बाइबिल की लैटिन अनुवाद प्रस्तुत किया था जो वुलगाता (प्रचलित पाठ) कहलाता है और शताब्दियों तक बाइबिल का सर्वाधिक प्रचलित रूप रहा है। आधुनिक काल में इब्रानी तथा यूनानी मूल के आधार पर सहस्त्र से भी अधिक भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद हुआ है। पूर्वविधान का सर्वोत्तम प्रामाणिक इब्रानी पाठ किट्टल द्वारा (सन् 1937 ई.) तथा यूनानी पाठ राल्फस द्वारा (1914 ई.) प्रस्तुत किया गया है। नव विधान के अनेक उत्तम प्रामाणिक यूनानी पाठ मिलते हैं, जैसे टिशनडार्फ, वेस्टकोट होर्ट, नेस्टले, वोगेल्स, मेर्क और सोटर के संस्करण।

यूनानी बाइबिल की प्राचीन हस्तलिपियों का विवरण इस प्रकार है -

  • (1) वाटिकानुस (चौथी श.ई.; रोम मे सुरक्षित);
  • (2) सिनाइटिकुस (चौथी श.ई.; ब्रिटिश म्युजियम);
  • (3) एलेक्सैंड्रिकुस (पाँचवीं श.ई.; ब्रिटिश म्युजियम);
  • (4) एफ्राएम (पाँचवीं श.ई.; पेरिस का लूग्र म्यूजियम)।

इनके अतिरिक्त 15 संपूर्ण तथा 4000 से अधिक आंशिक नवविधान की यूनानी हस्तलिपियाँ प्राप्त हैं जिनका लिपिकाल सन् 200 ई. तथा 700 ई. के बीच है। नवविधान की प्राचीनतम हस्तलिपि सन् 214 डे. का पैपीरस चेस्टर बीरी है। अंग्रेजी भाषा के निम्नलिखित अनुवाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं - ऑयॉराइज़द वर्शन अथवा किंग जेम्स बाइबिल (सन् 1811ई.); हुए वर्शन (1609 ई.); काफ्राटर्निटी वर्शन (1941 ई.) आर.ए. नीक्स बाइब्रिल (1944ई.); न्यू इंग्लिश बाइबिल (1961 ई.)। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रोटेस्टैंट मिशनरी कैरे ने बाइबिल का हिंदी अनुवाद तैयार किया था; "धर्मशास्त्र" के नाम से इसके बहुत से संस्करण छप चुके हैं और उसमें संशोधन भी होता रहा है। 2009 में यहोवा के साक्षियों ने एक हिंदी अनुवाद, नयी दुनिया अनुवाद मसीही यूनानी शास्त्र, छापा और यह अनुवाद उनके वेब साईट में भी उपलब्द है।

व्याख्या[संपादित करें]

बाइबिल ईश्वर प्रेरित भी है और साधारण मनुष्यों की रचना भी है; अत: इसकी व्याख्या में इस दोहरे कर्तृत्व का ध्यान रखना आवश्यक है।

मनुष्य की कृति होने के कारण अन्य लौकिक साहित्य की तरह बाइबिल का अध्ययन किया जाना चाहिए; अत:

  • (1) पाठानुसंधान के नियमों के अनुसार शुद्ध पाठ का निर्धारण करना है;
  • (2) परोक्ष एवं प्रत्यक्ष संदर्भ के अनुसार शब्दों तथा वाक्यों का अर्थ लगाना है;
  • (3) इस कार्य में समानांतर रचनाओं, प्राचीन अनुवादों तथा प्रामाणिक व्याख्याओं का सहारा लेना है; और
  • (4) विभिन्न लेखकों के समय, स्थान, शैली तथा उद्देश्य का ध्यान रखना है।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बाइबिल के व्याख्याता के लिए बाइबिल में उल्लिखित देशों की विस्तृत जानकारी के अतिरिक्त भाषाविज्ञान, इतिहास, भूगोल, पुरातत्व, धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन जैसी अनेक सहायक विधाएँ अत्यंत आवश्यक हैं।

बाइबिल ईश्वर की प्रेरणा से लिखी गई है, अत: इसकी व्याख्या करते समय

  • (1) इसके धार्मिक उद्देश्य की रक्षा होनी चाहिए
  • (2) इसकी शिक्षा निभ्र्रांत सिद्ध हो जानी चाहिए क्योंकि ईश्वर भ्रांति नहीं सिखला सकता;
  • (3) धर्म तथा नैतिकता के प्रश्नों के विषय में ईसा (ईश्वर) द्वारा स्थापित चर्च की आधिकारिक व्याख्या दी जानी चाहिए।
  • (4) प्रत्येक व्याख्या को ईसाई धर्म के सामूहिक सत्य के साथ सामंजस्य रखना चाहिए।

उपर्युक्त नियमों के दोहरे पक्ष का संतुलन रखना आवश्यक है। चर्च की परंपरा के अनुसार ही बाइबिल की वैज्ञानिक व्याख्या सार्थक हो सकती है।

अंग्रेजी साहित्य में बाइबिल[संपादित करें]

भौगोलिक दृष्टि से बाइबिल का प्रभाव बहुत ही विस्तृत है। शायद यह एक आकस्मिकता हो। मूलत: एक दमित जनता के धर्म के रूप में ईसाइयत अनेक परीक्षणों के पश्चात् अपने विजितों का धर्म बनी।

बाइबिल का प्राचीन धर्मनियम (टेस्टामेंट) आध्यात्मिकता की दृष्टि से कुरान और इस्लाम से संयुक्त है और एक चुने हुए विशिष्ट जनसमूह से संबद्ध है। मूसा अथवा ईसा, अब्राहम या सुलेमान मुस्लिमों में श्रद्धेय नाम हैं। बाइबिल इससे भिन्न है। यह कई ग्रंथों का निचोड़ है। यह यहूदी जनता की समूची कहानी है और शायद प्राचीन लोगों में यहूदियों के अनुभव सर्वाधिक वैविध्यपूर्ण हैं। यह ऐसी जाति थी जो खूँखार कबीलों से घिरी थी और जो स्वयं भी कम खूँखार न थी। कभी कभी उन्हें नीचा दिखाया गया, विजित किया गया और गुलाम भी बनाया गया। इस जाति ने कभी अपने शत्रुओं को विजित किया तथा उनकी शक्ति आजमाई, फिर भूमिसात् कर डाला (सैमुअल परिच्छेद 8:2)।

यह एक ऐसी ही जनता की आकांक्षा और प्रेरणा तथा जय और पराजय है जिसका वर्णन बाइबिल में अद्भुत सजीवता के साथ किया गया है। उसने हमें अपने अब्राहम और मूसा जैसे महान् नेताओं, दाऊद और सुलेमान जैसे महान् राजाओं तथा महान् अवतारों के विषय में ज्ञान कराया है जिन्होंने समय समय पर उत्पन्न होकर अपने दृढ़ वचनों द्वारा अनुचित मार्ग पर आरूढ़ जनता को टोका। सेवानोरोला तक तो यही क्रम रहा है। उन्होंने उनकी हिंसापरायण वृत्ति को स्वयं भोग लिया, आलस्य और क्रूरता की निंदा की जिसकी ओर जनता स्वभावत: अभिमुख थी। बाइबिल (प्राचीन धर्मनियम) ने अब्राहम सरीखे रक्तपिपासु, भयंकर हिंसक राजाओं और असभ्य रानियों के विषय में भी दर्शाया है। यह जनता की ऐतिहासिक घटनाओं और तिथियों की संहिता है। किसी ग्रंथ की अपरिहार्य लघु सीमाओं में यह वस्तुत: एक जातीय इतिहास होते हुए भी आश्चर्यचकित कर देनेवाले सत्यों से परिपूर्ण हैं।

प्राचीन धर्मनियम की समाप्ति के साथ उसमें एक आकस्मिक परिवर्तन होता दिखाई देता है। इतिहास वही रहता है किंतु उसकी प्रकृति बदल जाती है। यहूदियों का भयंकर ईश्वर हटा दिया जाता है और कल्पना में भारतीय ढंग का एक स्नेही ईश्वर उभड़ आता है। कदाचित् एक ऐसी ही प्रवृत्ति के प्रथम धुँधले चित्र स्वयं प्राचीन धर्मनियम के हृदयदेश के मध्य कुछ अवतारों में, विशेषकर इसैयाह आदि में पाए जाते हैं।

किंतु ईश्वर के संबंध में यह इब्रानियो की कोई आनुपातिक कल्पना नहीं है। उनकी भावना नेत्र के लिए नेत्र की थी। लेकिन जब ईसा ने उनसे कहा कि वे उनके दाएँ गाल पर थप्पड़ जमानेवाले के सामने अपना बायाँ गाल भी फेर दें, वे ऐसे क्रांतिकारी दर्शन और हिंसा के निपट अस्वीकार की बातें न समझ सके। इस प्रकार उन्होंने इस नवीन धार्मिक धारणा के लेखक को अमान्य घोषित कर दिया और अंतत: उन्हें शूली दे दी। किंतु उस दिन गलगोथा नामक स्थान पर क्रॉस से प्रवाहित रक्तबिंदुओं की धारा ने एक नए धर्म को जन्म दिया। ईसाई जन उसको अपने लिए जैसे एक प्रतीक रूप में देखते हैं और ईसा के वचनों का उपदेश देते हैं। इस प्रकार, बुनियादी तौर पर धैर्य और प्रेम ने त्वरा और घृणा पर विजय प्राप्त की। कोई नहीं सोचता था कि रोम के अंदर गुप्त तथा सुसज्जित कंदराओं या कुटियों में मिले समवेत रूप से मंद उच्चारित गायन में सम्मिलित होनेवाले लोग, जो पहले भयंकर रोमन पर्वों की जमातों के प्रसन्नार्थ ही उपयुक्त थे, एक न एक दिन केवल रोम की राजकीय शक्ति को ही नहीं हिला देंगे, अपितु आगामी दिनों में एक महत्तर और अधिक गौरवशाली रोम जैसे सनातन नगर का निर्माण करेंगे।

फिर ईसाई लोग क्रॉस रूपी शस्त्र से सुसज्जित होकर तमाम रोम में फैल गए। यद्यपि यहाँ वह रोमन सैन्यदल नहीं था बल्कि तालपत्रों से युक्त पादरी और भिक्षापात्र लिए संत थे, जो हजारों की संख्या में हँसते हँसते मृत्यु की भेंट चढ़ गए, उन्होंने यूरोप के विकराल और असभ्य जनों के बीच बाइबिल के संदेशों का प्रचार किया। बाइबिल (नवीन धर्मनियम) के शब्दों ने उन असभ्यों का आंशिक रूप से सभ्य बनाया।

इस प्रकार चर्च या ईसाई धर्म संस्थान कम से कम हजार वर्षों तक, अपनी संपूर्ण व्याप्ति के साथ यूरोप के मन पर अधिकार किए रहा। यहाँ तक कि साधारण से साधारण आचार अथवा विचार-कल्पना पर भी ईसाइयत की छाप रखती पड़ती थी। किंतु वही चर्च जो मूलत: अत्याचार और दमन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए विकसित हुआ था, अब स्वयं जुल्म और निरंकुशता का सबसे बड़ा वाहक यंत्र बन गया।

पुन: बाइबिल जनता को संकटमुक्त करने के लिए आगे आई। यह अपने आप में एक विरोधाभास है। जब चर्च अपनी असीम शक्ति के कारण मान्य हो गया था और पादरियों ने क्रॉस को विस्मृत कर दिया तथा महंथ लोग अनुचित लाभ उठाने लगे थे जनता बेदॉव होकर पुन: ईश्वरी वचनों को ढूँढ़ने लगी।

मूल रूप से इब्रानी और अराभेइक में (जिसमें संभवत: नवीन धर्म नियम के कुछ अंश ग्रीक में लिखे गए थे) लिखी जाकर यह 400ई. में सेंट जेरोम सी. द्वारा लैटिन में अनूदित हुई और यह प्रामाणिक अनुवाद रोमन खैथोलिक गिरजाघरों द्वारा उपयोग में लाया गया। किंतु लैटिन सर्वसामान्य लोगों की भाषा न थी, दूसरे ईसाई धर्मगुरु भाषाओं या फूहड़ बोलियों में हुए बाइबिल के अनुवादों से बहुत चिढ़ते थे।

यह केवल इसीलिए ही नहीं कि ईसाई धर्मगुरु अपने विशेषाधिकार की स्थिति बनाए रखना चाहते थे, यद्यपि वहाँ इसकी अधिकता थी, वे डरते यह थे कि कहीं बोलचाल की भाषा में अनूदित होने से उसके वचन ईश्वरीय वचनों की शक्ति और आशय न खो दें। केवल एक चिरपरिचित मुहावरा पूज्य भाव और भक्ति को उत्तेजित करनेवाला अत्युत्तम माध्यम नहीं है अथवा अनिवार्य रूप से गहन सत्यों का सर्वोपरि संप्रेषक नहीं है।

किसी न किसी प्रकार चर्च के दुराचरण से ही धर्म और धार्मिक संस्थान में नया संघर्ष आरंभ हो गया। इस अवधि में, साथ ही साथ भूमध्यसागर के पूर्वी तटों पर एक नई शक्ति का उदय हो रहा था और इस्लाम के उमड़ते ज्वार के पूर्व अनेक ईसाई मतावलंबी पश्चिम की ओर बढ़ चढ़ आए थे। यद्यपि वास्तविक पुनर्जागरण कई दशकों बाद आया तथापि ईसाई धर्म के ये विद्वान् और उपासक उसके अग्रदूत थे। उन्होंने लोगों को अनिर्दिष्ट उत्तेजनाओं से भर दिया।

इंग्लैड में पहले पहल अपनी आवाज बुलंद करनेवाले "लोलार्ड" थे। यह एक संप्रदाय था जो जनता में ईसा मसीह के उपदेशों की शिक्षा देता था और चर्च तथा मठ के विचार का विरोध करता था। उनका नेता विक्लिफ़ अद्भुत साहस और पांडित्यसंपन्न व्यक्ति था। उसने अनुभव किया कि विचारपरिवर्तन के लिए लोगों को ईसा के उपदेशवचनों की जानकारी आवश्यक है। इसके लिए जनभाषा में बाइबिल का अनुवाद आवश्यक हो गया। इस प्रकार उस काल की नवीन चेतना विक्लिफ़ की आवाज में ध्वनित हुई।

विक्लिफ़ उस समय हुआ था जब अँग्रेजी गद्य में बाइबिल के पूर्ण ऐश्वर्य और सौदर्य को अभिव्यक्त करने की बहुत ही कम शक्ति थी। इसका अपना अनुवाद बहुत ही रुक्ष है। शायद अँग्रेजी बोलचाल के संगीत के लिए उसके पास कान ही नहीं था। इब्रानी पद्य की कुछ अपनी निजी विशेषताओं के कारण उसके मूल संस्करण में एक ऐसी भव्यता भी थी और प्रयोग से कहीं अधिक महत्व हिब्रूवाली बाइबिल के शब्दसौंदर्य का था जो कुछ प्राचीन अनुवादों में सहज ही खो गया था। वाक्यखंड में संज्ञा का एक विशेष स्थान होता है और विभक्तियों की आज जैसी अनिवार्यता उस समय थी भी नहीं, क्योंकि यह एक महान् वास्तविक कल्पना थी जो यहूदियों की अपनी थी तथा शब्दों के प्रति उनका संवेदन मर्मस्पर्शी था।

इस प्रकार कुछ शब्दों में ही सामथ्र्य और तीव्रता होती थी क्योंकि वे शब्द लागू न होकर बीज रूप में होते थे। इसके अतिरिक्त प्राचीन धर्मनियम की विषयवस्तु व्यापक रूप से सुगम है। विषयवस्तु के रुचिकर होने और अल्प-समय-साध्य होने के गुणों के कारण इसकी गाथाएँ, वर्णन, नाट्यगीतियाँ (जाब की पुस्तक) भविष्यवाणियाँ, सूक्तियाँ, लघु कथाएँ (रूथ के अध्ययन की कथा) सभी ने मिलकर एक सावयव आकार-प्रकार धारण कर लिया था। अंत में नवीन धर्म नियम (न्यू टेस्टामेंट) में ईसा के वचन हैं। अत: उन्हें समझने में थोड़ी भी चूक अथवा भ्रम हो जाने पर न केवल उलझन ही बढ़ जाती है बल्कि संपूर्ण आशय ही भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं कि गिरजाघरों ने अनुवादों को उचित नहीं समझा।

फिर भी विलियम टिंडेन ने बाइबिल के अंग्रेजी अनुवाद का प्रथम प्रामाणिक प्रयास किया। उसने मूल इतालीय (इटैलियन) संस्करण का उपयोग किया जो पंद्रहवीं शताब्दी में इटली में तैयार किया गया था तथा चौदहवीं शताब्दी में किए गए विक्लिफ़ के अनुवाद का सहारा भी लिया था। अनुवाद के लिए उसने सरलतम आंग्ल शब्दों को चुना और इस प्रकार जनसाधारण की भाषा से नैकट्य स्थापित करते हुए अपना अनुवाद प्रस्तुत किया (1525)। टिंडेल ने इरैस्मस और लूथर (1522-32) और ज़िं्वग्ली (1524-29) के जूरिख संस्करण का भी उपयोग किया था। फिर भी टिंडेल की सहजता कहीं कहीं अटपटे प्रयोगों से संबद्ध थी। किंतु टिंडेल की बाइबिल के निकट होकर ही कबरडेल एक महान् धर्मोपदेशक था। वह टिंडेल की स्पष्टता को निबाहने में सफल हुआ है किंतु उसने उसे वाग्मीयता से भर दिया है। इसी नाते वह गद्य का असाधारण शिल्पी सिद्ध हो जाता है।

कवरडेल के पश्चात् सन् 1611 तक इस दिशा में कई प्रयास किए गए। सात वर्षों के अथक परिश्रम से प्रामाणिक संस्करण प्रस्तुत हुआ। 47 विद्वानों, विशपों ने लैसलॉट ऐंडÜजु की अध्यक्षता में, वेस्टमिंस्टर के दो विश्वविद्यालयों में, इस कार्य को तीन खंडों में पूरा किया।

विद्वानों ने बुद्धिमत्तापूर्वक टिंडेल की स्पष्टता और कवरडेल की लयात्मक वाक्पटुता को काफी हद तक छोड़ दिया। उन्होंने अन्य अनुवादों से भी सहायता ली और इस प्रकार अपने प्रामाणिक अनुवाद को एक सुव्यवस्थित सौंदर्य तथा संगीतात्मक स्वर माधुरी प्रदान की जिसका अँग्रेजी भाषा में दुबारा पाया जाना संभव नहीं है। इससे केवल यही भर नहीं हुआ कि उसमें इब्रानी का सहज सौंदर्य और तात्विक शक्ति अक्षुण्ण रही बल्कि उचित शब्दों में, उसे एक "चित्रात्मक" और गीतात्मक गुण प्राप्त हो गया जो अत्युत्तम अंग्रेजी प्रतिभा का परिणाम है। यह जनता की बोली में घुलमिल गया है। विद्वानों का कहना है कि उसके 93ऽ शब्द अंग्रेजी के हैं। उसका शब्द कभी भी प्राप्त या सीखा हुआ नहीं है तथा अनुवाद में गृहीत शब्द बिलकुल ही नहीं है।

आशय का स्पष्ट होना जरूरी भी था क्योंकि ईश्वरी पुस्तक माने जाने वाले ग्रंथ में दुरूहता की कोई गुंजायश नहीं होनी चाहिए थी। यद्यपि शैली बोलचाल की ही होनी आवश्यक थी ताकि लोग समझ सकें, तथापि गँवारूपन के लिए बिलकुल ही स्थान न था। फिर, शब्दों का सरल होना भी जरूरी या और यथा अवसर सौंदर्य तथा संयम भी अपेक्षित था। प्रामाणिक अनुवाद में इन सभी गुणों का प्राचुर्य था।