विद्युत

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वायुमण्डलीय विद्युत

विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है। विद्युत से अनेक जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है।

विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है। विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।


विद्युत का आधार[संपादित करें]

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति ही विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि।


विद्युत आवेश[संपादित करें]

जब विद्युत और चुम्बकत्व का एक साथ अध्ययन किया जाता है तो इसे विद्युत चुम्बकत्व कहते हैं। विद्युत को अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है किन्तु सरल शब्दों में कहा जाये तो विद्युत आवेश की उपस्थिति तथा बहाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न उस सामान्य अवस्था को विद्युत कहते हैं जिसमें अनेकों कार्यों को सम्पन्न करने की क्षमता होती है। विद्युत चल अथवा अचल इलेक्ट्रान या प्रोटान से सम्बद्ध एक भौतिक घटना है। किसी चालक में विद्युत आवेशों के बहाव से उत्पन्न उर्जा को विद्युत कहते हैं।

इतिहास[संपादित करें]

ईसा से लगभग ६०० वर्ष पूर्व यूनान निवासी थेलीज़ इस बात से परिचित थे कि कुछ वस्तुएँ रगड़ने के पश्चात हलकी वस्तुओं को आकर्षित करती हैं। इसका उल्लेख थीआफ्रैस्टस (Theophrastus) ने ३२१ ई.पू. में तथा प्लिनि (Pliny) ने सन् ७० में किया था। इस आकर्षण शक्ति का अध्ययन १६ वीं शताब्दी में विलियम गिलबर्ट (१५४०-१६०३ ई.) द्वारा हुआ तथा उन्होंने इसे 'इलेक्ट्रिक' कहा। आधुनिक शब्द 'इलेक्ट्रॉन' का उपयेग [[यूनानी भाषा] में अंबर के लिए किया जाता है। 'इलेक्ट्रिसिटी' शब्द का उपयोग सन् १६५० में वाल्टर शार्ल्टन (Walter Charlton) ने किया। इसी समय राबर्ट बायल (१६२७-१६९१ ई.) ने पता लगाया कि आवेशित वस्तुएँ हल्की वस्तुओं को शून्य में भी आकर्षित करती हैं, अर्थांत् विद्युत् के प्रभाव के लिए हवा का माध्यम होना आवश्यक नहीं है। सन् १७२९ में स्टीफ़न ग्रे (Stephen Gray, सन् १६९६-१७३६) ने अपने प्रयोगों के आधार पर कहा कि यह आकर्षण शक्ति किसी वस्तु के एक भाग से दूसरे भाग को संचारित की जा सकती है। ऐसी वस्तुओं को देसाग्युलियर्स (Desaguliers, १६८३-१७४४) ने 'चालक' (Conductor) कहा। सभी प्रकार की धातुएँ इस श्रेणी में आती हैं। वे वस्तुएँ जिनमें इस शक्ति को संचारित नहीं किया जा सकता, विद्युतरोधी (Insulator) कहलाती हैं। इस श्रेणी में अंबर, मोम, सूखी हवा, सूखा काँच, रबर, लाख इत्यादि हैं।

वस्तुओं की रगड़ के कारण विद्युत् दो प्रकार की होती है, घनात्मक एवं ऋणात्मक। पहले इनके क्रमश: काचाभ (vitreous) तथा रेजिनी (resionous) नाम प्रचलित थे। सन् १७३७ में डूफे (Du Fay, १६९९-१७३९) ने बताया कि सजातीय आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं तथा विजातीय आकर्षित करते हैं। १७४५ में क्लाइस्ट (Kleist) ने क्यूमिन (Kummin) में, मसेनब्रूक (Musschen brock) ने लाइडेन (Leyden) में, तथा विलियम वाटसन (William Watson) ने लंदन में कहा कि विद्युत् का संचय भी किया जा सकता है, इनके प्रयोगों तथा विचारों ने प्रसिद्ध संचायक लीडेन जार (Leydenjar) को जन्म दिया। लगभग इसी समय विद्युत् को पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करने के प्रयत्न भी जारी थे तथा विभिन्न प्रकार के विद्युत यंत्रों का आविष्कार हुआ। विलिय वटसन का विचार था कि विद्युत् एक प्रकार का प्रत्यास्थ तरल (Elastic fluid) होती है जो प्रत्येक वस्तु में विद्यमान होती है। आवेशविहीन वस्तुओं में यह साधारण मात्रा में होती है अत: इसका निरीक्षण नहीं किया जा सकता। वाटसन के तरल सिद्धांत के अनुसार विद्युत् एक वस्तु से दूसरी वस्तु में चली जाती है। अमरीकी वैज्ञानिक तथा राजनीतिज्ञ बेंजामिन फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin, सन् १७०६-१७९०) ने इस सिद्धांत का समर्थन कर, विस्तार किया। फ्रैंकलिन ने कहा कि विद्युत् न तो उत्पन्न की जा सकती है, न नष्ट ही। फ्रैंकलिन ने लीडेन जार का अध्ययन कर उसकी क्रिया को समझाने की चेष्टा की। पर फ्रैंकलिन का सबसे प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण वह प्रयोग था, सिसमें उन्होंने सिद्ध किया कि मेघों से मेघगर्जन के समय विद्युत् तथा साधारण विद्युत् के गुण समान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विद्युत् के कण एक दूसरे पर बल डालते हैं।

फ्रैंकलिन के पश्चात् एपीनुस (Aepinus, सन् १७२४-१८०२) ने इन विचारों को लिया तथा इसका आभास दिया कि दो वस्तुओं का बल उनके बीच की दूरी बढ़ाने पर घट जाता है। इस सिद्धांत का विस्तार जाजेफ प्रीस्टलि (Joseph Priestley, सन् १७३३-१८०४) तथा हेनरी कैवेंडिश (Hernry Cavendish, सन् १७३१-१८१०) ने किया। फिर कूलॉम (Coulomb, सन् १७३६-१८०६) ने खोज की कि दो आवेशों के बीच का बल, उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युतक्रमानुपाती तथा आवेशों के गुणनफल के समानुपाती होता है। विद्युत् का यह मूल नियम अब भी 'कूलॉम का बलनियम' कहा जाता है। सन् १८३७ में माइकल फैराडे (Faraday, सन् १७९१-१८६७) ने किन्हीं दो आवेशित वस्तुओं के बीच के विद्युत् बल पर माध्यम के प्रभाव का अध्ययन किया तथा पता लगाया कि यदि माध्यम हवा के स्थान पर कोई और विद्युतरोधी हो तो विद्युत् बल घट जाता है, विद्युत्रोधी के इस गुण को उन्होंने 'विशिष्ट पारवैद्युतता' (Specific Inductive capacity) अथवा पराविद्युत (Dielectric) कहा। उन्होंने अपने बर्फ के बरतनवाले प्रसिद्ध प्रयोग (icepile experiment) द्वारा दर्शाया कि यदि किसी आवेशित चालक का एक बरतन में लाया जाए, तो बरतन के अंदर की ओर विजातीय आवेश प्रेरित होता है तथा बाहर की ओर सजातीय अवेश। फैराडे ने पराविद्युत् का गहन अध्ययन किया तथा उनके विभिन्न प्रभावों को समझाने के लिए विद्युत् बल रेखाओं का विचार उपस्थित किया तथा आवेशित वस्तुओं के बीच के खाली स्थान को 'क्षेत्र' कहा। फैराडे के क्षेत्र सिद्धांत को गणित की सहायता से गाउस (Gauss) ने आगे बढ़ाया।

अठ्ठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में आवेशों के चलन (अर्थात् विद्युत् प्रवाह) के संबंध में कई प्रयोग तथा सिद्धांत प्रकाश में आने लगे थे। सन् १७८० में इटली के ल्युगी गैलवानी (Luigi Galvani, सन् १७३७-१७९८) ने मेढक के उपर विद्युत् प्रवाह के कई प्रयोग किए। सन् १८०० में वोल्टा (Volta, सन् १७४५-१८२७) ने तनु अम्ल अथवा लवण विलयन से भीगी हुई दो असमान धातुओं में विद्युत् प्रभाव पाए तथा उनसे विद्युद्धारा प्राप्त की। इस विद्युत् प्रवाह को कई गुना करने के लिए उन्होंने ऐसी कई असमान धातुओं के जोड़ों को लेकर एक पुंज बनाया जिसे वोल्टीय पुंज (Volta's pile) कहते हैं। वोल्टा द्वारा इन प्रयोगों के अनुसार विद्युद्धारा प्राप्त करने के लिए 'वोल्टीय सेल' की रचना हुई। उसी वर्ष इंग्लैंड में निकल्सन (Nicholson) तथा कार्लाइल (Carlisle) ने इस बात का पता लगाया कि यदि पानी में विद्युत्धारा प्रवाहित की जाए तो पानी के हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन को जाता है। ऐसे अपघटन को वैद्युत् अपघटन (Electrolysis) कहते हैं। क्रुकशैक (Cruick shank, १७४५-१८००) ने पता लगाया कि विलयन के धातुलवण भी इसी प्रकार अपघटित किए जा सकते हैं। इसके पश्चात् फैराडे ने इस क्रिया का नियमित अध्ययन किया तथा 'फैराडे के नियमों' की स्थापना की। इन नियमों अथवा इनसे संबंधित प्रयोगों के आधार पर विद्युत धारा उत्पादन करनेवाले विभिन्न प्रकार के सेल तथा संचायकों की रचना की गई है।

सन् १८२० में हैंस क्रिश्चियन अरस्टेड (Hans Christian Oersted, सन् १७७१-१८५१) ने खोज किया कि एक तार में प्रवाहित विद्युत् धारा के साथ उससे संबंधित एक चुंबकीय क्षेत्र भी होता है। इस महत्वपूर्ण खोज को किप्रो (Biot, सन् १७७४-१८६२) तथा सावार (Savart, सन् १७९१-१८४१) ने और ऐंपियर (Ampere, सन् १७७५-१८३६) ने गणित एवं प्रयोगों की सहायता से आगे बढ़ाया। ऐंपियर ने यह दिखाया कि दो समांतर तारों में विद्युत् धारा की दिशा समान होने पर आकर्षण तथा विपरीत होने पर प्रतिकर्षण होता है। आरस्टेड के सिद्धांतों को फैराडे ने विकसित किया तथा विद्युत्-चुंबकीय प्रेरण के नियमों की स्थापना की। प्रेरण का अध्ययन बाद में नाइमन (Neumann) तथा वेबर (Weber) ने भी किया परंतु प्ररेणा संबंधी विचारों का महत्वपूर्ण उपयोग क्लार्क मैक्सवेल (Clerk Maxwell, सन् १८३१-१८७९) ने सन् १८५१ में किया तथा 'मैक्सवेल समीकरणों' की स्थापना कर विद्युच्चुंबकीय सिद्धांतों को गणित की सहायता से एक सुलझा हुआ रूप दिया। आधुनिक भौतिकी में इन समीकरणों का विशेष स्थान है।

सन् १८२२ में जेबेक (Seebeck, सन् १७७०-१८३१) ने देखा कि यदि एक परिपथ में दो असमान धातुओं को जोड़ दिया जाए और एक जोड़ को गरम किया जाए तो परिपथ में विद्युत् प्रवाहित होती है। ऐसी विद्युत् को 'ऊष्मा विद्युत्' कहते हैं।

सन् १८२६ में जार्ज साइमन ओम (George Simon ohm, सन् १७८७-१८५४) ने प्रसिद्ध 'ओम के नियम' की स्थापना की। सन् १८४१ में जूल (Joule) ने विद्युत् के ऊष्मा प्रभाव का अध्ययन किया तथा बतलाया कि किसी सेल की रासायनिक ऊर्जा, जो परिपथ में धारा प्रवाहित करती है, उस परिपथ में उत्पादित ऊष्मा उर्जा के बराबर होती है। हेल्म होल्टज़ (Helm holtz, सन् १८२१-१८९४), विलियम टॉमसन, केलविन, लार्डं, (William Thomson, Kelvin Lord, सन् १८४७-१८५३) आदि ने विद्युत् ऊर्जा संबंधी अन्य सिद्धांतों का विकास किया। सन् १८४८ में किर्खहाफ़ (Kirchoff, सन् १८२४-१८८७) ने विद्युद्धारा संबंधी नियमों को प्रस्तुत किया। सन् १८५१ में लार्ड केलविन ने ऊष्मा विद्युत् का ऊष्मागतिकी के सिद्धातों द्वारा विश्लेषण किया। सन् १८५५ में मैक्सवेल द्वारा विद्युत् तथा प्रकोशतरंग संबंधी विचारों की नींव पड़ी। सन् १८८४ में जॉन हेनरी पांइटिंग (John HenryPoynting) ने विद्युत् चुंबकीय क्षेत्र में ऊर्जा प्रवाह का अध्ययन किया। सन् १८८६ में हाइन्रिख हेर्ट्स (Heinrich Hertz, १८५७-१८९४) की सहायता से मैक्सवेल के सिद्धांतों को प्रायोगिक समर्थन मिला। इसके पश्चात् विद्युच्चुंबकीय तरंगों के विषय में कई वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित हुआ। मारकोनी ने सन् १८९६ में इनका प्रयोग संदेश भेजने में किया। इसी समय के लगभग भारत के जगदीशचंद्र बसु, (१८५८-१९३७) ने उच्च आवृत्तिवाली विद्युच्चंबकीय तरंगों का जनन किया तथा इनके गुणों को प्रकाश के सिद्धांतों से समझाने की चेष्टा की। इसके पश्चात् इस विषय की पर्याप्त प्रगति हुई जिसे फलस्वरूप रेडियो, टेलिविजन तथा 'इलेक्ट्रॉनिकी' का क्षेत्र विकसित हुआ।

हेर्ट्स के अन्य प्रयोगों ने 'प्रकाशविद्युत्' की भी खोज की जिसको आइंसटीन (Einstein) ने क्वांटम सिद्धांतों द्वारा सन् १९०५ में समझाया। सन् १८९५ में तथा उसी समय के लगभग भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी आंदोलन आया। सन् १८९५ में रंटगेन (Roentgen) ने 'एक्सरे' का, १८९६ में बेक्रेल ने (Becquerel) ने रेडियोसक्रियता (Radio activity) का तथा १८९७ में सर जे.जे. टॉमसन (Sir J.J. Thomson) ने 'इलेक्ट्रान' का आविष्कार किया। टामसन् ने गैसों में से विद्युद्विसर्जन के विषय का भी अध्ययन किया। इस विषय में इनसे पहले, आरंभ में (सन् १८५० एवं उसके बाद) गाइसलर (Geissler), प्लकर (Plucker), हिटॉर्फ (Hitlorf), गोल्डस्टीन (Goldstein) आदि ने कार्य किया था।

बाद के वैज्ञानिकों में से प्रमुख हैं जे.एस. टाउनसेंड (J.S. Townsend) तथा उनके साथी। सन् १९०२ में रिचर्डसन् (Richardson) ने 'तापायनिक' विषय की नींव डाली। 'तापायन धारा' के सिद्धांत पर रेडियो वाल्व तथा इलेक्ट्रॉनिकी के अन्य वाल्वों की रचना हुई है। बीसवीं शताब्दी में एक के पश्चात् एक महत्वपूर्ण खोजों का ताँता बँध गया जिनके परिणाम स्वरूप आज के हाइड्रोजन बम, संगलन ऊर्जा (Fusion energy), 'स्पुतनिक' तथा अन्य उपग्रह इत्यादि। इनके पनपने में किसी न किसी रूप में विद्युत् के सिद्धांतों का उपयोग हुआ है।

बाह्य सूत्र[संपादित करें]