अश्वगंधा
| अश्वगंधा विथेनिया सोम्नीफेरा |
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तालकटोरा उद्यान में अश्वगंधा
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| वैज्ञानिक वर्गीकरण | ||||||||||||||||||
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| द्विपद नाम | ||||||||||||||||||
| Withania somnifera (L.) Dunal[1] |
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| पर्याय | ||||||||||||||||||
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Physalis somnifera |
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अवश्गंधा एक पौधा है जो खानदेश, बरार, पश्चिमीघाट एवं अन्य अनेक स्थानों में मिलता है। हिंदी में इसे साधारणतया असगंध कहते हैं। लैटिन में इसका नाम वाइथनिया सोम्निफ़ेरा है। यह पौधा दो हाथ तक ऊँचा हाता है और विशेषकर वर्षा ऋतु में पैदा होता है, किंतु कई स्थानों पर बारहों मास उगता है। इसकी अनेक शाखाएँ निकलती हैं और घुँघची जैसे लाल रंग के फल बरसात के अंत या जाड़े के प्रारंभ में मिलते हैं। इसकी जड़ लगभग एक फुट लंबी, दृढ, चेपदार और कड़वी होती है। बाजार में गंधी जिसे असगंध या असगंध की जड़ कहकर बेचते हैं, वह इसकी जड़ नहीं, वरन् अन्य वर्ग की लता की जड़ होती है, जिसे लैटिन भाषा में कॉन्वॉल्वुलस असगंधा कहते हैं। यह जड़ जहरीली नहीं होती किंतु अश्वगंध की जड़ जहरीली होती है। अश्वगंधा का पौधा चार पाँच वर्ष जीवित रहता है। इसी की जड़ से असगंध मिलती है, जो बहुत पुष्टिकारक है।
राजनिघंटु के मतानुसार अश्वगंधा चरपरी, गरम, कड़वी, मादक गंधयुक्त, बलकारक, वातनाशक और खाँसी, श्वास, क्षय तथ व्रण को नष्ट करने वाली है इसकी जड़ पौष्टिक, धातुपरिवर्तक और कामोद्दीपक है; क्षयरोग, बुढ़ापे की दुर्बलता तथा गठिया में भी यह लाभदायक है। यह वातनाशक तथा शुक्रवृद्धिकर आयुर्वेदिक औषधियों में प्रमुख है; शुक्रवृद्धिकारक होने के कारण इसको शुक्रला भी कहते हैं।
रासायनिक विश्लेषण से इसमें सोम्निफ़ेरिन और एक क्षारतत्व तथा राल और रंजक पदार्थ पाए गए हैं। इसमें निद्रा लानेवाले और मूत्र बढ़ानेवाले पदार्थ भी प्रचुर मात्रा में होते हैं।
अनुक्रम |
[संपादित करें] उपयोग
इसका ताजा तथा सूखा फल औषधि के काम में आता है, किंतु सिंध, पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सरहदी प्रांत, अफगानिस्तान तथा ब्लूचिस्तान में इसे रेनेट के स्थान पर दूध जमाने के काम में लाते हैं। इसका पाचक द्रव नमक के पानी में जल्दी आ जाता है (100 भाग पानी में 5 भाग नमक का होना चाहिए)। इस पानी के उपयोग से दही शीघ्र जमता है, जो पेट में पाचक अम्ल के समान लाभ पहुँचाता है। कुछ वैद्यों ने इस वनस्पति की जड़ को प्लेग में उपयोगी पाया है।
वैद्य असगंध से चूर्ण, घृत, पाक इत्यादि बनाते हैं और औषधि के रूप में इसका उपयोग गठिया, क्षय, बंध्यत्व, कटिशूल, नारू नामक कृमि, वातरक्त इत्यादि रोगों में भी करते हैं। इस प्रकार असगंध के अनेक और विविध उपयोग हैं।
[संपादित करें] प्रजातियाँ
आमतौर पर इसकी स्थानीय किस्में ही उगाई जाती हैं जिनसे न केवल उपज कम मिलती है, बल्कि जङों की गुणवता भी निम्न कोटि की होती है अब अश्वगंधा की कुछ उन्नत किस्में भी उपलब्ध हैं अत: उन्हें ही उगाना चाहिए जिनके लक्षणों का उल्लेख नीचे किया गया है
- जवाहर अश्वगंधा २०
इस किस्म से ४३२ किलोग्राम सूखी जङें और १५६ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है इसकी सूखी जङों में ०.४१ प्रतिशत क्षाराभ मिलते हैं
- डब्ल्यू० एस० ९०-१००
इस किस्म से ५४८ किलोग्राम सूखी जङें, ५४६ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है यह किस्म पत्ता धब्बारोधी किस्म है
- डब्ल्यू० एस० ९०-१३५
इश किस्म से ५२३ किलोग्राम सूखी जङें, १८१ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर मिल जाते हैं यह किस्म भी पत्ता धब्बारोधी किस्म है इसकी सूखी जङों से ०.४५ प्रतिशत क्षाराभ प्राप्त हो जाते हैं
- डब्ल्यू० एस० ९०-१३४
इसकी सूखी जङों में ०.२६ प्रतिशत क्षाराभ पाये जाते हैं
- डब्ल्यू० एस० ९०-११७-
डब्ल्यू० एस० ९०-१२५- इसकी सूखी जङों में ०.२७ प्रतिशत क्षाराभ पाये जाते हैं
[संपादित करें] संदर्भ
- ↑ "Withania somnifera information from NPGS/GRIN". http://www.ars-grin.gov/cgi-bin/npgs/html/taxon.pl?102407. अभिगमन तिथि: 2008-02-16.
- Saleeby, J. P. "Wonder Herbs: A Guide to Three Adaptogens", Xlibris, 2006. (This book comments on this and other adaptogens)
[संपादित करें] बाहरी सूत्र
- अश्वगन्धा (असगंध) : अमृततुल्य जड़ी (वेबदुनिया)
- डील के जालस्थल पर इसके लिए कृषि सुझाव
- Withania somnifera Photos (Google Images)
- Monograph By Todd Caldecott
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