नीम

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"आज़ादीराख्ता ईन्दीका"
आज़ादीराख्ता ईन्दीका
आज़ादीराख्ता ईन्दीका
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: पादप
विभाग: माग्नोल्योफ़्इउता
गण: Sapindales
कुल: Meliaceae
वंश: Azadirachta (आज़ादीराख्ता)
जाति: A. indica
द्विपद-नामकरण
Azadirachta indica आज़ादीराख्ता ईन्दीका

नीम भारतीय मूल का एक सदाबहार वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यानमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण तथा उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। इसका वानस्पतिक नाम ‘Melia azadirachta अथवा Azadiracta Indica’ है।

वर्णन[संपादित करें]

फूल व पत्तियाँ कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत.

नीम एक तेजी से बढ़ने वाला सदाबहार पेड़ है जो 15-20 मी (लगभग 50-65 फुट) की ऊंचाई तक पहुंच सकता है और कभी कभी 35-40 मी (115-131 फुट) तक भी ऊंचा हो सकता है। नीम एक सदाबहार पेड़ है लेकिन गंभीर सूखे में इसकी अधिकतर या लगभग सभी पत्तियां झड़ जाती हैं। इसकी शाखाओं का प्रसार व्यापक होता है।

तना अपेक्षाकृत, सीधा और छोटा होता और व्यास मे 1.2 मीटर तक पहुँच सकता है। इसकी छाल, कठोर, विदरित (दरारयुक्त) या शल्कीय होती है और इसका रंग सफेद-धूसर या लाल भूरा भी हो सकता है। रसदारु भूरा-सफेद और अंत:काष्ठ लाल रंग का होता है जो वायु के संपर्क मे आने से लाल-भूरे रंग मे परिवर्तित हो जाता है। जड़ प्रणाली मे एक मजबूत मुख्य मूसला जड़ और अच्छी तरह से विकसित पार्श्व जड़ें शामिल होती हैं।

20-40 सेमी (8 से 16 इंच) तक लंबी प्रत्यावर्ती पिच्छाकार पत्तियां जिनमे, 20 से लेकर 31 तक गहरे हरे रंग के पत्रक होते हैं जिनकी लंबाई 3-8 सेमी (1 से 3 इंच) तक होती है। अग्रस्त (टर्मिनल) पत्रक प्राय: उनुपस्थित होता है। पर्णवृंत छोटा होता है। कोंपलों (नयी पत्तियाँ) का रंग थोड़ा बैंगनी या लालामी लिये होता है। परिपक्व पत्रकों का आकार आमतौर पर असममितीय होता है और इनके किनारे दंतीय होते हैं।


फूल सफेद और सुगन्धित होते हैं और एक लटकते हुये पुष्पगुच्छ जो लगभग 25 सेमी (10 इंच) तक लंबा होता है मे सजे रहते हैं। इसका फल चिकना (अरोमिल) गोलाकार से अंडाकार होता है और इसे निंबोली कहते हैं। फल का छिलका पतला तथा गूदा रेशेदार, सफेद पीले रंग का और स्वाद मे कड़वा-मीठा होता है। गूदे की मोटाई 0.3 से 0.5 सेमी तक होती है। गुठली सफेद और कठोर होती है जिसमे एक या कभी कभी दो से तीन बीज होते हैं जिनका आवरण भूरे रंग का होता है।

पेड़ों की व्यवसायिक खेती को लाभदायक नहीं माना जाता। मक्का के निकट तीर्थयात्रियों के लिए आश्रय प्रदान करने के लिए लगभग 50000 नीम के पेड़ लगाए गए हैं।[तथ्य वांछित]

नीम का पेड़ बहुत हद तक चीनीबेरी के पेड़ के समान दिखता है, जो एक बेहद जहरीला वृक्ष है।

हरेली पर्व के अवसर पर नीम के साथ छत्तीसगढ़ का एक ग्रामीण

पारिस्थितिकी[संपादित करें]

नीम का पेड़ सूखे के प्रतिरोध के लिए विख्यात है। सामान्य रूप से यह उप-शुष्क और कम नमी वाले क्षेत्रों उन में फलता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 से 1200 मिमी के बीच होती है। यह उन क्षेत्रों मे भी फल सकता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 से कम होती है पर उस स्थिति मे इसका अस्तित्व भूमिगत जल के स्तर पर निर्भर रहता है। नीम कई अलग अलग प्रकार की मिट्टी में विकसित हो सकता है, लेकिन इसके लिये गहरी और रेतीली मिट्टी जहाँ पानी का निकास अच्छा हो, सबसे अच्छी रहती है। यह उष्णकटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय जलवायु मे फलने वाला वृक्ष है और यह 22-32° सेंटीग्रेड के बीच का औसत वार्षिक तापमान सहन कर सकता है। यह बहुत उच्च तापमान को तो बर्दाश्त कर सकता है, पर 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान मे मुरझा जाता है। नीम एक जीवनदायी वृक्ष है विशेषकर तटीय, दक्षिणी जिलों के लिए। यह सूखे से प्रभावित (शुष्क प्रवण) क्षेत्रों के कुछ छाया देने वाले (छायादार) वृक्षों मे से एक है। यह एक नाजुक पेड़ नहीं हैं और किसी भी प्रकार के पानी (मीठा या खारा) में जीवित रहता है। तमिलनाडु में यह वृक्ष बहुत आम है और इसको सड़कों के किनारे एक छायादार पेड़ के रूप मे उगाया जाता है, इसके अलावा लोग अपने आँगन मे भी यह पेड़ उगाते हैं। शिवकाशी (सिवकासी) जैसे बहुत शुष्क क्षेत्रों में, इन पेड़ों को भूमि के बड़े हिस्से में लगाया गया है और इनकी छाया मे आतिशबाजी बनाने के कारखाने का काम करते हैं।

उपयोग[संपादित करें]

नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली है।

१- नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।

२- नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।

३- नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। हां पत्तियां अवश्य कड़वी होती हैं, लेकिन कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना पड़ता है मसलन स्वाद।

४- नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।

५- नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।

६- नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालो में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।

७- नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (नेत्रशोथ या कंजेक्टिवाइटिस

८- नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।

९- नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।

१०- नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।

विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग[संपादित करें]

१. प्रसव एवं प्रसूता काल में नीम का उपयोग

१.१ नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री के कमर में बांधने से बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है। किन्तु बच्चा पैदा होते ही नीम की जड़ को कमर से खोलकर तुरन्त फेंक देने का सुझाव दिया जाता है। यह प्रयोग देश के कुछ ग्रामीण अंचलों में होते देखा गया है। परीक्षणों के बाद आयुर्वेद ने भी इसे मान्यता दी है।

१.२ प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है, गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है, भूख लगती है, दस्त साफ होता है, ज्वर नहीं आता, यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता। यह आयुर्वेद का मत है।

१.३ आयुर्वेद के मतानुसार प्रसव के छ: दिनों तक प्रसूता को प्यास लगने पर नीम के छाल का औटाया हुआ पानी देने से उसकी प्रकृति अच्छी रहती है। नीम के पत्ते या तने के भीतरी छाल को औंटकर गरम जल से प्रसूता स्त्री की योनि का प्रक्षालन करने से प्रसव के कारण होने वाला योनिशूल (दर्द) और सूजन नष्ट होता है। घाव जल्दी सूख जाता है तथा योनि शुद्ध तथा संकुचित होता है।

१.४ प्रसव होने पर प्रसूता के घर के दरवाजे पर नीम की पत्तियाँ तथा गोमूत्र रखने की ग्रामीण परम्परा मिलती है। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि घर के अन्दर दुष्ट आत्माएं अर्थात संक्रामक कीटाणुओं वाली हवा न प्रवेश करे। नीम पत्ती और गोमूत्र दोनों में रोगाणुरोधी (anti bacterial) गुण पाये जाते हैं। गुजरात के बड़ौदा में प्रसूता को नीम छाल का काढ़ा एवं नीम तेल पिलाया जाता है, इससे भी स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

२. मासिक धर्म, सुजाक एवं सहवास क्षत में नीम

२.१ आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल ४ माशा तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औंटकर, जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है। एक अन्य वैद्य के अनुसार नीम छाल २ तोला सोंठ, ४ माशा एवं गुण २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।

२.२ स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है। एक बड़े व चौड़े बर्तन में नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, बैठने से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही सुझाव दिया जाता है। इससे सूजन भी उतर जाता है और पेशाब ठीक होने लगता है।

२.३ नीम पत्ती को गरम कर स्त्री के कमर में बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट या पुरूषप्रसंग के समय होने वाला दर्द नष्ट होता है।

२.४ नीम के पत्तों को पीस कर उसकी टिकिया तवे पर सेंककर पानी के साथ लेने से सहवास के समय स्त्री योनि के अन्दर या पुरूष लिंग में हुए क्षत भर जाते हैं, दर्द मिट जाता है।

३. प्रदर रोग (Leocorea) में नीम

३.१ प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है। रक्त प्रदर एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।

३.२ श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होता है। यह आयुर्वेद ग्रंथ 'गण-निग्रह' का अभिमत है।

३.३ रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।

३.४ प्रदर रोग में (कफ होने पर) नीम का मद एवं गुडची का रस शराब के साथ लेने से लाभ होता है।

४. घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर में नीम

४.१ घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।

४.२ घाव चाहे छोटा हो या बड़ा नीम की पत्तियों के उबले जल से धोने, नीम पत्तियों को पीस कर उसपर छापने और नीम का पत्ता पीसकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। फोड़े-फुंसी व बलतोड़ में भी नीम पत्तियाँ पीस कर छापी जाती हैं।

४.३ दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर छापने से लाभ होता है।

४.४ गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है।

४.५ नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।॥

४.६ नीम का मरहम लगाने से हर तरह के विकृत, विषैले एवं दुष्ट घाव भी ठीक होते हैं। इसे बनाने की विधि इस प्रकार है-नीम तेल एक पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस एक सेर, नीम की जड़ के छाल का चूर्ण एक छटाक, नीम पत्तियों की राख ढाई तोला। एक कड़ाही में नीम तेल तथा पत्तियों का रस डालकर हल्की आँच पर पकावें। जब जलते-जलते एक छटाक रह जाय तब उसमें मोम डाल दें। गल जाने के बाद कड़ाही को चूल्हे पर से उतार कर और मिश्रण को कपड़े से छानकर गाज अलग कर दें। फिर नीम की छाल का चूर्ण और पत्तियों की राख उसमें बढ़िया से मिला दें। नीम का मरहम तैयार।

४.७ हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भष्म लगाने से लाभ होता है।

४.८ छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।

५. उकतव (एक्जिमा), खुजली, दिनाय में नीम

५.१ रक्त की अशुद्धि तथा परोपजीवी (Parasitic) कीटाणुओं के प्रवेश से उकवत, खुजली, दाद-दिनाय जैसे चर्मरोग होते हैं। इसमें नीम का अधिकांश भाग उपयोगी है।

५.२ उकवत में शरीर के अंगों की चमड़ी कभी-कभी इतनी विकृत एवं विद्रूप हो जाती है कि एलोपैथी चिकित्सक उस अंग को काटने तक की भी सलाह दे देते हैं, किन्तु वैद्यों का अनुभव है कि ऐसे भयंकर चर्मरोग में भी नीम प्रभावकारी होता है। एक तोला मजिष्ठादि क्वाथ तथा नीम एवं पीपल की छाल एक-एक तोला तथा गिलोय का क्वाथ एक तोला मिलाकर प्रतिदिन एक महीने तक लगाने से एक्जिमा नष्ट होता है।

५.३ एक्जिमा में नीम का रस (जिसे मद भी कहते हैं) नियमित कुछ दिन तक लगाने और एक चम्मच रोज पीने से भी १०० प्रतिशत लाभ होता है। सासाराम (बिहार) के एक मरीज पर इसका लाभ होते प्रत्यक्ष देखा गया। खुजली और दिनाय में भी नीम का रस समान रूप से प्रभावकारी है।

५.४ कुटकी के काटने से होने वाली खुजली पर नीम की पत्ती और हल्दी ४:१ अनुपात में पीसकर छापने से खुजली में ९७ प्रतिशत तक लाभ पाया गया है। यह प्रयोग १५ दिन तक किया जाना चाहिए।

५.५ नीम के पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से भी दाद मिट जाता है।

५.६ वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता, रक्त शुद्ध रहता है। रक्त विकार दूर करने में नीम के जड़ की छाल, नीम का मद एवं नीम फूल का अर्क भी काफी गुणकारी है। चर्मरोग में नीम तेल की मालिश करने तथा छाल का क्वाथ पीने की भी सलाह दी जाती है।

६. जले-कटे में नीम

६.१ आग से जले स्थान पर नीम का तेल लगाने अथवा नीम तेल में नीम पत्तों को पीस कर छापने से शान्ति मिलती है। नीम में प्रदाहक-रोधी (anti-inflammatory) गुण होने के कारण ऐसा होता है।

६.२ नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर उसमें जले हुए अंग को डुबोने से भी शीघ्र राहत मिलती है।

६.३ नीम के तेल एवं पत्तियों में anticeptic गुण होते हैं। कटे स्थान पर इनका तेल लगाने से टिटनेस का भय नहीं होता।

७. कुष्ठरोग में नीम

७.१ दुनियाँ में २५ करोड़ से भी अधिक और भारत में पचासों लाख लोग कुष्ट रोग के शिकार हैं। सैकड़ों कोढ़ नियंत्रण चिकित्सा केन्द्रों के बावजूद इस रोग से पीड़ितों की संख्या में मामूली कमी आयी है। यह रोग एक छड़नुमा 'माइक्रोबैक्टेरिया लेबी' से होता है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संक्रामक किस्म का रोग है। इसमें डैपसोन रिफैमिसीन और क्लोरोफाजीमिन नामक एलोपैथी दवा दी जाती है। लेकिन इसे नीम से भी ठीक किया जा सकता है।

७.२ प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य एक छटाक नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का मद पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।

८. धवल रोग (Leucoderma) में नीम

८.१ शरीर के विभिन्न भागों में चकते के रूप में चमड़ी का सफेद हो जाना, फिर पूरे शरीर की चमड़ी का रंग बदल जाना, धवल रोग है। इसका स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता, इसके होने का कारण भी बहुत ज्ञात नहीं, किन्तु यूनानी चिकित्सा का मत है कि यह रक्त की खराबी, हाजमें की गड़बड़ी, कफ की अधिकता, पेट में कीड़ों के होने, असंयमित खान-पान, मानसिक तनाव, अधिक एंटीबायोटिक दवाइयों के सेवन आदि से होता है।

८.२ नीम की ताजी पत्ती के साथ बगुची का बीज (Psora corylifolia) तथा चना (Circerarietinum) पीसकर लगाने से यह रोग दूर होता है।

९. बवासीर

९.१ प्रतिदिन नीम की २१ पत्तियों को मूंग की भिंगोई और धोयी हुई दाल मे पीसकर बिना कोई मशाला डाले पकौड़ी बनाकर २१ दिन तक खाने से हर तरह का बवासीर निर्बल होकर गिर जाता है। पथ्य में सिर्फ ताजा मट्ठा, भात एवं सेंघा नमक लिया जाना चाहिए।

९.२ नीम बीज का पाउडर शहद में मिलाकर दिन में दो बार खाने से भी कुछ दिनों में बवासीर नष्ट हो जाते हैं। यह प्रयोग बुन्देलखण्ड के आदिवासियों द्वारा करते देखा गया है। इसमें नीम के टूसे बवासीर पर बांधने की सलाह दी जाती है।

१०. आँख की बीमारी में नीम

१०.१ नीम की हरी निबोली का दूध आँखों पर लगाने से रतौंधी दूर होती है। आँख में जलन या दर्द हो तो नीम की पत्ती कनपटी पर बांधने से आराम मिलता है। नीम के पत्ते का रस थोड़ा सुसुम कर जिस ओर आंख में दर्द हो, उसके दूसरी ओर कान में डालने से लाभ होता है। दोनों आँख में दर्द हो तो दोनों कान में सुसुम तेल डालना चाहिए।

१०.२ नीम के फूल छाँव में सुखाकर समान भाग कलमी शोरे के साथ पीसकर कपड़े से छानकर आँख में आँजन करने से फूली, धुंध, माडा, रतौंधी आदि दूर होते हैं, आँखों की ज्योति बढ़ती है।

१०.३ नीम की पत्तियों का रस तथा लाल फिटकिरी जल में मिलाकर उससे धोने से आँख का जाला साफ होता है तथा स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है।

१०.४ दु:खती आँख में नीम पत्तियों का रस शहद में मिलाकर लगाने से भी दर्द दूर होता है और साफ दिखाई पड़ता है। नीम की लकड़ी जलाकर उसकी राख का सूरमा भी लगाने से इसमें लाभ होता है।

१०.५ नीम की निबोली (फल) का रस, लोहे के किसी पात्र में रगड़कर और हल्का गर्म कर पलकों पर लेप करने से नेत्र का धुंधलापन दूर होता है।

१०.६ शुष्ठी और नीम के पत्तों को सेंधा नमक के साथ पीसकर नेत्र पलकों पर लगाने से सूजन, जलन, दर्द तथा आंखो का गड़ना समाप्त होता है।

१०.७ नीम की पत्तियों तथा लोधरा का पाउडर कपड़े में बांधकर पानी में कुछ देर छोड़ दें, फिर उस पानी से आँख धोने से नेत्र-विकार दूर होते हैं।

१०.८ नीम काजल : नीम की पीली सूखी पत्तियाँ ७ नग, नीम के सूखे फलों का चूर्ण एक माशा, नीम तेल एक तोला, साफ महीन कपड़ा ४ इंच। कपड़े पर नीम की सूखी पत्तियाँ तथा फलों का चूर्ण रखकर, हाथ से मसलकर तथा लपेटकर बत्ती बना लें। एक मिट्टी के दीपक में नीम का तेल डालकर उसमें बत्ती डूबो कर जला दें। जब बत्ती अच्छी तरह जलने लगे, तब उस पर एक ढकनी लगाकर काजल एकत्र कर लें। इसको आँखों में लगाने से हर प्रकार के नेत्र रोग दूर होते हैं और आँखों की ज्योति बढ़ती है। नीम के फूलों का भी काजल लगाने से लाभ होता है।

१०.९ नीम का तेल आँखों में आँजने और नीम का मद ६ तोला दो तीन दिन तक प्रात: पीने से भी रतौंधी दूर होती है। किन्तु मद को दो-तीन दिन से अधिक नहीं पीना चाहिए।

१०.१० नीम की पत्तियों का रस आँख में टपकाने से भी नेत्र के जलन व विकार नष्ट होते हैं।

११ कान रोग में नीम

११.१ नीम का तेल गर्म कर एवं थोड़ा ठंढ़ा कर कान में कुछ दिन तक नियमित डालने से बहरापन दूर होता है।

११.२ कान-दर्द या कान-बहने में नीम तेल कुछ दिन तक कान में नियमित डालने से ठीक होता है।

११.३ कान के घाव एवं उससे मवाद आने में नीम का रस (मद) शहद के साथ मिलाकर डालने या बत्ती भिंगोकर कान में रखने से मवाद निकलना बन्द होता है और घाव सूखता है।

१२. नाक तथा दाँत की बीमारी में नीम

१२.१ नीम की पत्तियाँ तथा अजवाइन दोनों पीसकर कनपट्टियों पर लेप करने से नकसीर बन्द होता है।

१२.२ मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है।

१२.३ नीम का दातुन नित्य करने से दाँतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं। इससे चित्त प्रसन्न रहता है।

१३. बालों के जुंए, भूरापन तथा कील-मुहांसा में नीम

१३.१ पुराने समय में स्त्रियाँ नीम के तने का भीतरी छाल घिसकर चेहरे पर लगाती थीं, जिससे त्वचा कोमल तथा कील-मुहांसों से मुक्त होता था।

१३.२ बालों में नीम का तेल लगाने से जुएं तथा रूसी नष्ट होते हैं।

१३.३ नीम तेल नियमित सिर में लगाने से गंजापन या बाल का तेजी से झड़ना रूक जाता है। यह बालों को भूरा होने से भी बचाता है। नीम तेल से हेयर आयल तथा हेयर लोशन भी बनाये जाते हैं। मार्गो या नीम साबुन भी इसमें लाभप्रद है। किन्तु नीम तेल या उससे बने साबुन, तेल, लोशन आदि लगाने से माथे में गर्मी भी होती है, अत: बहुत जरूरी होने पर ही इनका प्रयोग करना चाहिए।

१४. पेट-कृमि में नीम

१४.१ आंत में पड़ने वाली सफेद कृमि या केचुए को जड़ से नष्ट करने में संभवत: नीम जैसा गुणकारी कोई अन्य औषधि नहीं है। नीम की पत्ती १५-२० नग तथा काली मिर्च १० नग थोड़े से नमक के साथ पीसकर एक गिलास जल में घोलकर खाली पेट ३-४ दिन तक पी लेने से इन कृमियों से कम से कम २-३ वर्ष तक के लिए मुक्ति मिल जाती है।

१४.२ बैगन या किसी दूसरे साग के साथ नीम की पत्तियों की छौंक लगाकर खाने से भी कृमि नष्ट होती है। सिर्फ नीम की पत्तियों का चूर्ण १०-१५ दिन खा लेने से भी लाभ होता है।

१४.३ एक अन्य मत के अनुसार दस ग्राम नीम के पत्ते, दस ग्राम शुद्ध हींग के साथ कुछ दिन नियमित सेवन करने से भी पेट के सभी प्रकार के कीड़े मर जाते हैं।

१५. मलेरिया में नीम

१५.१ नीम वृक्ष मलेरिया-रोधी के रूप में प्रसिद्ध है। इसकी छाया में रहने और इसकी हवा लेने वालों पर मलेरिया का प्रकोप नहीं होता, यह ग्रामीण अनुभव है। इस वृक्ष के आस-पास मलेरिया तथा अन्य संक्रामक बीमारियों के वायरस भी जल्दी नहीं आते। यह वायरस-विरोधी (anti Viral) वृक्ष है। अत: घर के आस-पास नीम वृक्ष लगाने और स्वच्छता रखने की सलाह दी जाती है।

१५.२ मलेरिया मुख्यत: मच्छरों के काटने से होता है। सर्दी, कंपकपाहट, तेज बुखार, बेहोशी, बुखार उतरने पर पसीना छूटना, इसके प्रमुख लक्षण हैं। इस रोग में नीम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार पिलाने अथवा नीम के जड़ की अन्तर छाल एक छटाक ६० तोला पानी में १८ मिनट तक उबालकर और छानकर ज्वर चढ़ने से पहले २-३ बार पिलाना चाहिए। इससे ज्वर उतर जाता है। १५.३ नीम तेल में नारियल या सरसो का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से भी मच्छरों के कारण उत्पन्न मलेरिया ज्वर उतर जाता है।

१६. सामान्य एवं विषम ज्वर में नीम

१६.१ नीम के अन्तर छाल का चूर्ण, सोंठ तथा मीर्च का काढ़ा विषम ज्वर में देने से लाभ होता है। इसमें नीम के तेल की मालिश करने तथा प्रमाण से रोगी को पिलाने से भी लाभ होता है। छाल की अपेक्षा तेल का प्रभाव जल्द होता बताया गया है। सूजनयुक्त ज्वर या उष्मज्वर में नीम का छाल अधिक उपयोगी पाया गया है। नीम पत्तों को पीस-छान कर भी रोगी को पिलाया जा सकता है। ये सारी औषधियाँ रोगी को कुछ खिलाने से पहले दी जानी चाहिए।

१६.२ मलेरियस ज्वर में नीम तेल की ५-१० बूंद दिन में दो बार देने से अच्छा लाभ होते देखा गया है। जीर्ण ज्वर में नीम का छाल एक तोला १० छटांक पानी में औंटकर, जब एक छटाक रह जाय तो छानकर प्रात: काल पिलाने से कुछ ही दिनों में अन्दर रहने वाला ज्वर विल्कुल निकल जाता है।

१६.३ तेज सिहरनयुक्त ज्वर के साथ कै होने पर नीम की पत्ती के रस शहद एवं गुड़ के साथ देने से लाभ होता है। नीम का पंचांग (पता, जड़ फूल, फल और छाल) को एक साथ कूटकर घी के साथ मिलाकर देने से भी लाभ होता है। यह सुश्रुत एवं काश्यप का मत है। १६.४ साधारण बुखार में नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पानी में छानकर पिलाने से बुखार उतर जाता है। साधारण या विषम ज्वर में नीम के पत्तों की राख रोगी के शरीर पर मालिश करना लाभदायक होता है।

१७. चेचक में नीम

१७.१ इसकी भयंकरता के कारण इस रोग को दैवी प्रकोप माना जाता रहा है। यह जब उग्र रूप धारण करता है तब बड़े-बड़े चिकित्सकों की भी कुछ नहीं सुनता। आयुर्वेद में चेचक के रोकथाम के जो निदान बातये गये हैं उनमें नीम का उपयोग ही सर्वाधिक वर्णित है। इसके सेवन से या तो चेचक निकलता ही नहीं अथवा निकलता भी है तो उग्र नहीं होता, क्रमश: शान्त हो जाता है। नीम में चूंकि दाहकता शान्त करने के शीतल गुण हैं, इसलिए यह लोक जीवन में शीतला देवी के रूप में भी पूजित है।

१७.२ चेचक कभी निकले ही नहीं, इसके लिए आयुर्वेद मत में उपाय है कि चैत्र में दस दिन तक प्रात:काल नीम की कोमल पत्तियाँ गोल मिर्च के साथ पीस कर पीना चाहिए। नीम का बीज, बहेड़े का बीज और हल्दी समान भाग में लेकर पीस-छानकर कुछ दिन पीने से भी शीतला/चेचक का डर नहीं रह जाता।

१७.३ चेचक निकलने पर रोगी को स्वच्छ घर में नीम के पत्तों पर लिटाना, घर में नीम की ताजा पत्तियों की टहनी का बन्दनवार लटकाना तथा नीम का चंवर बनाकर रोगी को हवा देना चाहिए। बिस्तरे की पत्तियाँ नित्य बदल देनी चाहिए। रोगी को यदि अधिक जलन महसूस हो तो नीम की पत्तियों को पीसकर पानी में घोलकर तथा मथानी से मथकर उसका फेन चेचक के दानों पर सावधानी पूर्वक लगाना चाहिए। इससे भी राहत नहीं मिलने पर नीम की कोमल पत्तियाँ पीसकर चेचक के दानों पर हल्का लेप चढ़ाना चाहिए। नीम के बीज की गिरी को पीसकर भी लेप करने से दाहकता शीघ्र कम होती है। रोगी को प्यास लगने पर नीम के छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में बुझाकर उस पानी को छान कर पिलाना चाहिए। नीम की पत्तियों को पानी में औंटकर पिलाने से भी दाहकता शान्त होती है। इससे चेचक का विष एवं ज्वर भी कम होता है, चेचक के दाने शीघ्र सूखते हैं। चेचक के दाने ठीक से न निकलने पर भी बेचैनी होती है। अत: नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पिलाने से वह शीघ्र निकल आते हैं। जब दाने सूख जांय तब नीम का पत्ता जल में उबालकर रोगी को कुछ दिन नियमित स्नान और नीम तेल की मालिश करनी चाहिए। इससे चेचक के दाग भी मिट जाते हैं। नीम बीज की गिरी पानी में गाढ़ा पीस कर दाग पर लगाना भी फायदेमंद होता है। चेचक होने पर कई रोगियों के कुछ बाल भी झड़ जाते हैं। इसमें नीम तेल माथे पर लगाने से बाल पुन: उग आते हैं।

१७.४ चेचक में भूलकर भी नीम के अलावे कोई दूसरा इलाज करना बैद्यों ने मना किया है।

१८. प्लेग में नीम

१८.१ वायरस कीटाणुओं से होने वाला यह एक संक्रामक बीमारी है। मिट्टी, जल और वायु के प्रदूषण से इसके कीटाणु (पिप्सू) संक्रमित होते हैं, जो पहले चूहों में लगते हैं, फिर चूहों से मिट्टी, खाद्य पदार्थ, जल एवं वायु के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। तेज बुखार, साँस लेने में कठिनाई, खून की उल्टियाँ, आँत में दर्द, बगल तथा गले में सूजन अथवा गांठे पड़ जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। आयुर्वेद में इसे ग्रन्थिक या वातलिकार ज्वर कहा जाता है। यह बहुत तेजी से फैलता है। इसके वायरस शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर व्यक्ति को अपनी चपेट में तुरन्त ले लेते हैं।

१८.२ प्लेग फैलते ही स्वस्थ लोगों को नीम के पत्ते पीस कर नित्य पीते रहना चाहिए, इससे प्लेग का उनपर असर नही होता। प्लेग के शिकार रोगी को नीम का पंचाग (बीज, छाल, पत्ता, फूल, गोद) कूटकर पानी मे छानकर दस-दस तोले की मात्रा हर पन्द्रह मिनट पर देनी चाहिए। तत्काल नीम के पांचों अंग न मिले तो जो भी मिले उसी को देना चाहिए। १८.३ शरीर के जोड़ों पर नीम की पत्तियों की पुल्टिस बांधने तथा आस-पास नीम की लकड़ी-पत्तों की घूनी करने से भी प्लेग का शमन होता है।

१९. हैजा में नीम

१९.१ यह अशुद्ध/दूषित जल के उपयोग से फैलने वाला संक्रामक रोग है। इसकी अभी कोई कारगार दवा इजाद नहीं हुई है। इसके जीवाणु पहले आंत में प्रतिक्रिया करते हैं। तत्काल उपाय न होने पर देखते-देखते रोगी मर जाता है। ग्लूकोज या नमक चीनी का घोल तुरन्त दिया जाना लाभदायक होता है। इसके फैलने पर व्यक्ति को पानी उबालकर पीना चाहिए, मांस-मंछली वर्जित करना चाहिए, खुले स्थान के मल को मिट्टी से ढक देना या लैट्रिन की विधिवत सफाई होती रहनी चाहिए। हैजा 'विब्रियो कैलेरा' नामक जीवाणु से संक्रमित होता है। कूड़े-कचड़ों के सड़न में इनका निवास अधिक होता है। इस बैक्टेरिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने मल द्वारा हैजे के करोड़ों जीवाणु वातावरण में छोड़ता है, उससे जल, मिट्टी, खाद्य पदार्थ तथा वायु संक्रमित होते हैं। मक्खियाँ भी इसके संवाहक बनती हैं। उल्टी-दस्त, हाथ-पांव में ऐठन और तेज प्यास इसके प्रमुख लक्षण हैं।

१९.२ नीम के पत्तों को पीसकर, गोला बनाकर तथा कपड़े में बांधकर ऊपर सनी हुई मिट्टी का मोटा लेप चढ़ाकर उसे आग के धूमल (भभूत) में पकाना चाहिए, जब वह लाल हो जाय तब थोड़ी-थोड़ी देर पर उस पके हुए गोले को अर्क गुलाब के साथ रोगी को देने से दस्त, वमन एवं प्यास रूकता है। नीम तेल की मालिश से शरीर का ऐंठन कम होता है। हैजे में नीम तेल पानी के साथ पीने से भी लाभ होता है। नीम छाल का काढ़ा पतले दस्त में भी लाभकारी होता है।

२०. पिलिया/जौंडिस में नीम

२०.१ नीम का रस (मद) या छाल का क्वाथ शहद में मिलाकर नित्य सुबह लेने से पिलिया में लाभ होता है। मोथा और कियू (Costus speciosus) के जूस में नीम का छाल मिलाकर उसका क्वाथ देने से भी यह रोग नष्ट होता है।

२१. मधुमेह/डायबिटीज में नीम

२१.१ हार्मोन की कमी के कारण रक्त में शर्करा की अधिकता और बार-बार पेशाब लगना, अधिक प्यास, कमजोरी, पैरो में झुनझुनी तथा बेहोशी भी इंसुलिन आधारित मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं। व्यायाम की कमी तथा आहार में प्रोटीन के अभाव से भी मधुमेह होता है, जिसका आधार इंसुलिन नहीं होता। इसमें घबराहट, नसों में दर्द, कमजोरी, थकान, शरीर का सूखना, वजन घटना, अधिक भूख, प्यास और पेशाब का लगना, कभी-कभी अंधापन भी इस रोग के लक्षण हैं।

२१.२ नीम के तने की भीतरी छाल तथा मेथी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से मधुमेह की हर स्थिति में लाभ मिलता है।

२२. गठिया, बातरोग, साइटिका, जोड़ों में दर्द (अर्थराइटीस) में नीम

२२.१ इन रोगों में नीम तेल की मालिश, नीम की पत्तियों को पीसकर एवं गर्म कर जोड़ों पर छापने, नीम का मद पीने, नीम के सूखे बीज का चूर्ण हर तीसरे दिन महीने भर खाने से काफी लाभ मिलता है। नीम के छाल को पानी के साथ पीस कर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करने से भी दर्द दूर होता है।

२३. सूजन, लकवा, चोट-मोच में नीम

२३.१ नीम के छाल का अर्क २ से ४ तोले तक नित्य पीने और इसके सेवन के २ घंटे बाद तत्काल बनी रोटी घी के साथ खाने से लकवा अर्द्धांश में लाभ होता है। पक्षाघात वाले अंगों पर नीम तेल की मालिश करने की भी सलाह दी जाती है।

२३.२ चोट लगने के कारण आयी मोच और गिल्टियों के सूजन पर नीम की पत्तियों का बफारा देने से लाभ होता है।

२४. कफ, पित्त, दमा, रक्त एवं हृदय विकार तथा पथरी में नीम

२४.१ नीम तथा वक के छाल का काढ़ा कफ में लाभदायक होता है।

२४.२ नीम का फूल, इमली तथा शहद के साथ खाने से कफ एवं पित्त दोनों का शमन होता है।

२४.३ नीम का शुद्ध तेल ३० से ६० बूंद तक पान में रखकर खाने से दमा से छुटकारा मिलता है। नीम के २० ग्राम पत्ते को आधा लीटर पानी में उबालकर जब एक कप रह जाय, कुछ दिन पीते रहने से भी दमा जड़ से नष्ट होता है।

२४.४ नीम का मद, नीम के जड़ की छाल, नीम की कोमल पत्तियाँ अथवा पंचांग (पत्ते, जड़, फूल, फल एवं छाल) का काढ़ा इनमें से किसी का भी सेवन करने से रक्त-विकार दूर होता है। पित्त का भी शमन होता है और हृदय रोग की भी आशंका नहीं होती है। २४.५ नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है। नीम के जड़ की छाल का काढ़ा त्रिदोषों - कफ, वात, पित्त का शमन करता है।

२४.६ नीम की पत्तियों की राख २ माशा जल के साथ नियमित कुछ दिन तक खाते रहने से पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।

२५. मन्दाग्नि, वायुरोग, पशु-हाजमा में नीम

२५.१ नीम की पकी निबोली अथवा नीम का फूल कुछ दिन नित्य खाने से मंदाग्नि में काफी लाभ होता है।

२५.२ नीम तेल ३० बूंद पान के साथ खाने से वायु विकार तथा पेट का मरोड़ दूर होता है।

२५.३ पशु हाजमा में नीम की पत्तियाँ गुड़ तथा नमक के साथ कूटकर खिलाने से लाभ होता है। इससे आंत के कीड़े भी मरते हैं।

२६. वमन, विरेचन तथा नशा एवं विष उतारने में नीम

२६.१ नीम बीज जल के साथ खिलाने पर वमन होता है। यह मृदु विरेचक है।

२६.२ कई वर्षों तक लगातार हर साल १०-१५ दिन तक नीम की पत्तियों का सेवन किये हुए व्यक्ति को सर्प, बिच्छू आदि के विष का असर नहीं होता। नीम बीज का चूर्ण गर्म पानी के साथ पीने से भी विष उतरता है।

२६.३ हड्डी, बिच्छू तथा मधुमक्खी के काटने पर नीम की पत्तियों को पीसकर छापनी चाहिए। इसको पीने से संखिया का विष भी उतर जाता है। नीम पत्तों का तेज अर्क अफीम के विष का नाशक है। कच्ची या पक्की निबोली गर्म पानी से पिलाने पर उल्टी होती है, इससे विष का असर नष्ट होता है।

२७. लू से बचाव में नीम

२७.१ नीम के पंचांग (पत्ता, जड़, फूल, फल एवं छाल) तथा मिश्री एक-एक तोला पानी के साथ पीसकर पीने से लू का प्रभाव नष्ट होता है। नीम की पत्ती पीसकर नीम के रस के साथ माथे पर छापने से भी लू का असर कम होता है।

२७.२ चैत्र में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती एवं काली मिर्च पीने वाले व्यक्ति को गर्मी में लू नहीं लगती, शरीर में ढंठक बनी रहती है, कोई फोड़ा-फूंसी, चर्मरोग भी नहीं होता।

२८. एड्स रोग में नीम

२८.१ अभी कुछ ही वर्ष पहले नीम से असाध्य रोग एड्स के वायरस (एच.आई.वी.) प्रतिरोधी कुछ एनजाइम्स की खोज की गई है। भविष्य में नीम से बने एड्स विरोधी टीके आने वाले हैं। नीम छाल से एक ऐसा रसायन तैयार किया गया है जो एड्स को रोकने में काफी प्रभावकारी सिद्ध हुआ है।

२९. अरूचिनाश तथा शुद्धिकरण में नीम

२९.१ नीम की कोमल पत्तियाँ घी में भूनकर खाने से भयंकर अरूचि भी नष्ट होती है।

२९.२ पुराने देशी घी या तेल को शुद्ध करने के लिए गर्म करते समय नीम की पत्तियाँ डाली जाती हैं।

२९.३ अधिक नीम के सेवन से उत्पन्न हुए विकार दूध या सेंधा नमक खाने से दूर होते हैं।

२९.४ नीम की पत्तियों से उबला जल या नीम तेल पानी में मिलाकर फर्श धोने से वातावरण शुद्ध होता है।

२९.५ शवदाह के बाद लौटने या कोई घृणित चीज देखने से उत्पन्न हुए चित्त विकार नीम की पत्तियाँ/टूसे चबाने से दूर होते हैं।

३०. अतिसार, पेचीस में नीम

३०.१ मेघालय की खासी और जैतिया आदिवासी नीम की पत्ती अतिसार (दस्त), पेचिस, क्षयरोग (यक्ष्मा, तपेदिक) और हृदय रोग में व्यवहार करते हैं।

३१. कुपोषण में नीम विटामिन 'ए' का एक समृद्ध स्रोत है। विटामिन 'ए' की कमी से भी रतौंधी के अलावे फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद, चमड़ी का खुरदुरा हो जाना या सिकुड़ जाना, हाथ-पाँव, कन्धं तथा जाँघों में फुंसियाँ निकल आना, जुकाम, खाँसी, निमोनिया, स्वाँस की बीमारी, पाचन सम्बन्धी रोग आदि होते हैं। इन कुपोषण-जनित रोगों में नीम का विभिन्न रूपों में उपयोग किया जाता है।

३२. कैलेस्ट्रोल नियंत्रण में नीम

कैलेस्ट्रोल रक्त में पाया जाने वाला पीले रंग का एक मोमी पदार्थ है। जब रक्त में यह अधिक हो जाता है, तब रक्त-वाहिनी धमनियों के अन्दर यह जमने लगता है, थक्का बनाकर रक्त-प्रवाह को अवरुद्ध करता है। कैलेस्ट्रोल दो तरह के होते हैं- एच.डी.एल. और एल.डी.एल.। इसमें पहला स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, दूसरा बुरा। बुरा कैलेस्ट्रोल अधिक वसायुक्त पदार्थ (तेल, घी, डालडा), माँस, सिगरेट तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पैदा होता है। बुरा कैलेस्ट्रोल की वृद्धि से रक्त दूषित होता है, उसका प्रवाह रुकता है और हार्ट अटैक का दौरा पड़ता है। नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है। कोयम्बटूर के एक आयुर्वेदीय अनुसंधान संस्थान में पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया कि २०० ग्राम तक नीम पत्तियों के प्रयोग से कैलेस्ट्रोल की मात्रा काफी कम हो जाती है। लीवर की बीमारी में भी नीम पत्ती का सेवन लाभदायक पाया गया है।

३३. नीम के अधिक सेवन से नपुंसकता

३३.१ एक स्वस्थ व्यक्ति को अनावश्यक रूप से नीम का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, इससे नपुंसकता आती है। बहुत से साधु-संत प्रबल कामशक्ति को जीतने के लिए बारहो मास नीम का सेवन करते हैं। प्रात:काल उषापान करने वाले स्वस्थ व्यक्ति को नीम का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। नीम का दातुन इसमें अपवाद है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

जीतेन्द्र कुमार गुप्ता