काकड़

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भारतीय काकड़
Barking Deer - Kolkata 2011-05-03 2429.JPG
संरक्षण स्थिति
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: जंतु
संघ: रज्जुकी
वर्ग: स्तनपायी
गण: द्विखुरीयगण
उपगण: ढोर
कुल: सर्विडी
उपकुल: सर्विनी
प्रजाति: मुनटिऍकस
जाति: ऍम. मुनटिऍक
द्विपद नाम
मुनटिऍकस मुनटिऍक
ज़िमरमॅन, १७८०
भारतीय काकड़ के आवास का क्षेत्र
भारतीय काकड़ के आवास का क्षेत्र
पर्याय

[1]

  • Cervus moschatus
  • Cervus muntjak
  • Cervus pleiharicus
  • Muntiacus bancanus
  • Muntiacus rubidus

काकड़ या कांकड़ (Barking Deer) एक छोटा हिरन होता है। यह हिरनों में शायद सबसे पुराना है, जो इस धरती में १५०-३५० लाख वर्ष पूर्व देखा गया और जिसके जीवाश्म फ्रा़ंस, जर्मनी और पोलैंड में पाये गये हैं।
आज की जीवित प्रजाति दक्षिणी एशिया की मूल निवासी है और भारत से लेकर श्रीलंका, चीन, दक्षिण पूर्वी एशिया (इंडोचाइना और मलय प्रायद्वीप के उत्तरी इलाके)।[1] यह कम आबादी में पूर्वी हिमालय और म्यानमार में भी पाया जाता है। ऊष्णकटिबंधीय इलाकों में रहने के कारण इसका कोई समागम मौसम नहीं होता है और वर्ष के किसी भी समय में यह समागम कर लेते हैं; यही बात उस आबादी पर भी लागू होती है जिसे शीतोष्णकटिबन्धीय इलाकों में दाख़िल किया गया है।
नर के दोबारा उग सकने वाले सींग होते हैं, हालांकि इलाके की लड़ाई में वह अपने लंबे श्वानदंतों (Canine teeth) का इस्तेमाल करते हैं।
काकड़ क्रम विकास के अध्ययन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनकी विभिन्न प्रजातियों के गुणसूत्र में काफ़ी घटबढ़ देखी गयी है। जहाँ भारतीय काकड़ में सबसे कम गुणसूत्र पाये जाते हैं: नर में ७ तथा मादा में सिर्फ़ ६, वहीं चीनी कांकड़ में ४६ गुणसूत्र होते हैं।

भारतीय काकड़[संपादित करें]

सामान्य मुनटिऍक, लाल मुनटिऍक[2] या भारतीय काकड़ काकड़ की सबसे ज़्यादा पाई जाने वाली जाति है। इसके बाल छोटे और मुलायम होते हैं। बालों का रंग भूरा या स्लेटी होता है और कभी-कभी उनमें सफ़ेदी भी झलकती है। इस जाति को सर्वभक्षी की संज्ञा दी गयी है क्योंकि यह फल, कोमल टहनी, बीज, चिड़िया के अण्डे, छोटे जीव और यहाँ तक की जानवरों के शव भी खाता है। खतरे का आभास होने पर यह जो ध्वनि निकालता है वह भोंकने के समान होती है, इसीलिए इसको अंग्रेज़ी में बार्किंग डियर भी कहते हैं। यह जाति काकड़ की ११ ज्ञात जातियों में से एक है और एशिया के कई भागों में फैली हुयी है। विशेषतः यह दक्षिणी एशिया में विस्तृत रूप से पाया जाता है फिर भी एशिया का सबसे कम जाने जाना वाले जानवरों में से एक है। जीवाश्मिक प्रमाण बताते हैं कि यह कम-से-कम १२,००० वर्षों से धरती में है। तब से इसने दक्षिणी एशिया में आखेट, भोजन तथा खाल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नर भारतीय काकड़ के छोटे सींग होते हैं जिसकी एक ही शाखा होती है और जो लगभग १५ से.मी. तक लंबे हो जाते हैं। हर वर्ष यह उसके सिर पर हड्डीनुमा गांठ से प्रस्फुटित होते हैं। नर अपने क्षेत्र रक्षण के मामले में अत्यधिक संवेदनशील होते हैं तथा अपने आकार के विपरीत काफ़ी उग्र हो सकते हैं। वह क्षेत्र रक्षण के लिए एक दूसरे से काफ़ी संघर्ष करते हैं और अपने सींग के अलावा बाहर निकले हुये ऊपरी श्वानदन्तों का अधिक प्रयोग करते हैं तथा अपने बचाव के लिए ढोल जैसे परभक्षी से भी भिड़ने का माद्दा रखते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Timmins, R.J., Duckworth, J.W., Hedges, S., Pattanavibool, A., Steinmetz, R., Semiadi, G., Tyson, M. & Boeadi (2008). Muntiacus muntjak. 2008 संकटग्रस्त प्रजातियों की IUCN लाल सूची. IUCN 2008. Retrieved on 5 April 2009. Database entry includes a brief justification of why this species is of least concern.
  2. Wilson, Don E.; Reeder, DeeAnn M., सं (2005). "Muntiacus muntjak". Mammal Species of the World (3rd ed.). Baltimore: Johns Hopkins University Press, 2 vols. (2142 pp.). प॰ 667. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8018-8221-0. OCLC 62265494. http://www.bucknell.edu/msw3/browse.asp?id=14200405.