अरोड़ा

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अरोड़ा
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अन्य सम्बंधित समूह
Indo-Aryan peoples

अरोड़ा (पंजाबी: ਅਰੋੜਾ) या अरोड़-वंशी या अरोड़-वंश पंजाब का एक भारतीय-आर्यन समुदाय है। अरोड़ा एक व्यापारिक[1] समूह है। हिन्दुओं के चार वर्णों में से कुछ सूत्रों के अनुसार ये वैश्य[2] हैं तो कुछ के अनुसार ये क्षत्रिय[3][संदिग्ध ][4] हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता डा० हरगोबिन्द खुराना, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, लेफ्टिनेंट अरूण क्षेत्रपाल, कैप्टन विक्रम बत्रा, (दोनों परम वीर चक्र विजेता), स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले गगन नारंग अरोड़ा समुदाय के सदस्य हैं।

अरोड़ा शब्द का अर्थ है पाकिस्तान के सिंध प्रांत के पश्चिमोत्तर भाग में सिंधु नदी के तट पर स्थित 'अरोड़' नामक प्राचीन शहर से सम्बन्ध रखने वाले। अरोड़ा खत्री समूह के सामान ही होते हैं। दोनों समूह समान कार्यों में संलग्न हैं, इनका उच्चारण और भौतिक स्वरूप एक समान है, परंपरायें और अनुष्ठान आदि भी समान ही होते हैं। दोनों समुदायों के बीच उपनाम तथा उपसमुदाय लगभग एक जैसे ही हैं। दोनों समुदाय एक दूसरे के काफी निकट हैं से और दोनों समुदायों के बीच शादियां भी होती हैं। इतिहास में ये दोनों समूह कहां से अलग हो गए यह ज्ञात नहीं है। आनुवंशिक परीक्षण दिखाते है कि अरोड़ा, खत्री और राजपूत आनुवंशिक रूप से काफी सामान हैं तथा वे आनुवंशिक रूप से ब्राह्मणों से अधिक समीप हैं बजाय वैश्यों अथवा अनुसूचित जातियों के।[5] अरोड़ा और खत्री केन्द्रीय एशिया में व्यापार में लगे हुए थे।[6][7] उनके द्वारा बनाये गए काबुल के हिन्दू मंदिर तथा बाकू के अग्नि मंदिर अभी तक विद्यमान हैं।

1947 में भारत के विभाजन तथा इसकी आज़ादी से पहले अरोड़ा समुदाय मुख्य रूप से पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) में सिन्धु नदी तथा इसकी सहायक नदियों के तटों; उत्तर-पश्चिम के सीमावर्ती राज्यों (एनडब्ल्यूएफपी) सहित भारतीय पंजाब के मालवा क्षेत्र; सिंध क्षेत्र में (मुख्य रूप से सिन्धी अरोड़ा पर पंजाबी तथा मुल्तानी बोलने वाले अरोड़ा समुदाय भी हैं); राजस्थान में (जोधपुरी तथा नागौरी अरोड़ा/खत्रियों के रूप में); तथा गुजरात में बसा हुआ था। पंजाब के उत्तरी पोटोहर तथा माझा क्षेत्रों में खत्रियों की संख्या अधिक थी। भारत में आजादी तथा विभाजन के बाद, अरोड़ा मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, जम्मू, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गुजरात तथा देश के अन्य भागों में रहते हैं। विभाजन के बाद, अरोड़ा भारत और पाकिस्तान के कई हिस्सों के साथ पूरी दुनिया में चले गए।

उत्पत्ति[संपादित करें]

1842 में रेखाचित्र सुक्कुर जिले में रोहरी शहर

अरोड़ा नाम अरोड़ नमक स्थान से लिया गया है, जो पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में रोहरी तथा सुक्कुर नामक आधुनिक कस्बों से समीप स्थित था।[8]

अरोड़ रोहरी के 8 किलोमीटर (5.0 मील) पूर्व में स्थित है यह सिंधु के तट पर स्थित है, जहां से नदी पश्चिम की ओर एक तेज मोड़ लेती थी और यह के व्यापारिक केंद्र तथा एक समृद्ध शहर था। यह सिंध की प्राचीन राजधानी थी तथा इसके राजा दाहिर थे। वर्ष 711 में, शहर पर अरब जनरल मोहम्मद बिन कासिम ने अधिकार कर लिया और इसकी राजधानी को कोई 300 किलोमीटर (190 मील) दक्षिण की ओर हाला के निकट मंसूरा ले जाया गया। 10वीं सदी में इसे एक और झटका मिला जब सिंधु नदी ने अपना मार्ग बदल दिया और ऐसा शायद किसी बड़े भूकंप के कारण वर्ष 962 में हुआ।[9] सिंधु का वर्तमान मार्ग अरोड़ के पश्चिम में है। सुक्कुर और रोहरी के आधुनिक कस्बे नदी के दोनों किनारों पर स्थित हैं। अरोड़ अब एक छोटा सा धूल भरा शहर है।

अरोड़ा तीन मुख्य समूहों में बंटे हुए हैं: उत्तराधि, गुजराती तथा दखना। विभाजन के पूर्व 1947 में, वे केवल अपने समुदाय के भीतर ही विवाह करते थे; विभाजन के बाद उन्होंने अन्य अरोड़ा समुदायों के साथ साथ खत्रियों, भाटिया तथा सूद समुदायों बीच भी विवाह करने प्रारंभ कर दिए, पर गोत्र अलग होना आवश्यक था।[10]

अतीत में अरोड़ा को रोर नाम से भी जाना जाता था।[11]

इतिहास[संपादित करें]

भारतीय पौराणिक परंपरा के अनुसार अरोड़ा इक्ष्वाकु वंश के सूर्यवंश के समुदाय के लोग हैं। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार अयोध्या के राजा राम की आठवी पीढ़ी में एक वंशज थे देवानीक तथा देवानीक के तीन पुत्र थे।[12] देवानीक के तीन पुत्र थे अहिनाग (अनीह), रूप और रुरु। विशिष्ट रूप से रुरु को सभी अरोरा अपना पूर्वज मानते हैं। वहां से उनके कवियों द्वारा इस वंशावली को राजा दादरोर तक सुरक्षित रखा गया है। इसके साक्ष्य उपलब्ध हैं कि ग्रीक लोगों द्वारा प्रयुक्त सौविरास का नाम रोरुका की सौविरा राजधानी के नाम पर था।[13]

अरोड़ा राजधानियां[संपादित करें]

अरोड़ा कुल ने रोहरी से वर्ष 711 तक शासन किया, जो कि प्राचीन सिंध की राजधानी थी। प्राचीन काल में रोहरी को रोरुका तथा रोरिक नामों से भी जाना जाता रहा था। बौद्ध जातक कथाओं में मगध के राजा बिम्बिसार तथा रोरुका के राजा रुद्रायण के बीच उपहारों के आदान प्रदान के बारे में बात की गयी है।[14] बौद्ध इतिहास दिव्यवादाना में अंकित है कि राजनैतिक पहुंच के लिहाज से रोरहि पाटलिपुत्र से बराबरी करती थी।[15] टी. डब्ल्यू. रीस डेविड्स ने लिखा है कि सातवीं सदी ई.पू. में रोरुका भारत के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक था।[16]

रोरुका की स्थापना राजा रुरुक द्वारा की गयी थी जो काशी के राजा हरिश्चंद्र के बाद इक्ष्वाकु वंश के पांचवे शासक थे।[17][not in citation given] शहर की उम्र के बारे में जानने के लिए इक्ष्वाकु राजवंश की समय रेखा की खोज की जा सकती है। राजा रुरुक का जन्म राजा श्री राम से 29 पीढियां पहले हुआ था और सर्वाधिक रूढ़िवादी अनुमानों के अनुसार यह 2500 ई.पू था।[18] इसलिए, परंपरागत पौराणिक भारतीय सभ्यता की समय-रेखा के अनुसार राजा रुरुक 5500 ई.पू. में रहते थे।[19]

रुद्रायण के राज्य के बाद शीघ्र ही, उनके पुत्र शिखंडी के समय में, रोरुका एक प्रचंड रेत की आंधी से तबाह हो गयी थी।[20] यह घटना दोनों वृतांतों, बौद्ध (भल्लातिया जातक) तथा जैन (उदयन की कहानी तथा विताभय क़स्बा) में अंकित है। तब महान धज, रोर कुमार ने रोरी शंकर[21] (वर्तमान में रोहरी तथा सुक्कुर) का निर्माण 450 ई.पू. में करवाया।

अरोड़ का प्राचीन शहर एक प्राचीन तीर्थ स्थल था जहां भृतहरि, जो कि राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे, शंकर भगवान को श्रद्धा अर्पित करने आते थे। 711 ईसवीं में अरबों ने सिंध पर कब्ज़ा कर लिया, आक्रमणकारियों ने शिव के प्राचीन मंदिर को गिरा दिया, परन्तु रोहरी अभी भी सिंधियों का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।

बर्डिक संस्करण[संपादित करें]

बर्ड के इतिहास और लेखा के अनुसार, अरोड़ाओं की भारत में दो अन्य राजधानियां भी थीं। अरोरसा के राजा मुकन देव जिहोने मूलतः गुजरात के पालनपुर पर शासन किया था, बाद में अपना शासन क्षेत्र उत्तर की और बढ़ाया और वर्तमान दिल्ली के पास बादली, झज्जर में अपनी दूसरी राजधानी बनायी। जूनागढ़ में चट्टानों पर लिखे शिलालेख में रुद्रदमन I तथा उनके यौधेय क्षत्रियों के विरुद्ध वर्ष 150 के अभियानों का जिक्र है। वे कहते हैं कि राजा अरोड़ गुजरात से आया था और उसने हरियाणा में अपने शासन की स्थापना की।[22]

स्वर्ण युग[संपादित करें]

अरोड़ा इतिहास का स्वर्ण युग इसाई युग की शुरूआती शताब्दियों तथा उससे भी पहले की कुछ शताब्दियों को माना जाता है। अरोड़ा गुजरात, राजस्थान, हरियाणा तथा सिंध में सत्तारूढ़ थे। 5वीं शताब्दी में राय देवाजी के समय में उन्होंने अपने प्रभावक्षेत्र को अफगानिस्तान से कन्नौज तक के सम्पूर्ण क्षेत्र में एकीकृत कर लिया था।[23]

दक्षिणी राजस्थान में भैन्सरोरगढ़ का किला दूसरी शताब्दी ईसापूर्व में बनाया गया था कागारोल (कागा रोर) के अवशेष[24] जो वर्तमान आगरा के निकट हैं, यहां शासन करने वाले दूसरे अरोड़ा समुदाय की समय-रेखा को दर्शाते हैं। सर अलेक्जेंडर कनिंघम[25] द्वारा आगरा क्षेत्र में पाए गए सिक्के इस क्षेत्र के अरोड़ा शासकों तथा हस्तिनापुरइन्द्रप्रस्थ के शासकों के बीच के संबंधों को दर्शाते हैं। यहां के पास कनिंघम को मिले कुछ सिक्के तीसरी शताब्दी के आसपास के हैं, ऐसा उनकी पद्धति तथा उनमें प्रयुक्त संस्कृत से पता चलता है।[26]

एलॉर के चाच[संपादित करें]

700 ई. में ब्राह्मण राजवंश के अंदर सिंध

एलॉर के चाच (610-682)[27] एक ब्राह्मण राजमहल प्रबंधक तथा राय वंश के राय सहसी II के सचिव थे तथा उनके बाद सिंध का शासन इन्होने ही संभाला.[27] चाच का इतिहास सिंध के इतिहास के विषय की एक पुस्तक चाच नामा से सम्बंधित है।

चाच नामा के अनुसार राजा साहसी राय II के शासन के 35वें वर्ष में डेबल तथा ठाना पर एक अरबी आक्रमण हुआ। आक्रमण का उद्देश्य तटीय शहरों में लूटपाट करना था तथा इसे खलीफा उमर (634-644) द्वारा स्वीकृत नहीं क्या गया था, उन्होंने बाद में बहरीन के प्रशासक को बिना अनुमति आक्रमण करने के लिए पद से हटा दिया था। 644 में, सस्सानिद राजवंश को मुस्लिमों द्वारा हासिल किये जाने के बाद, रशीदन सेना ने मकरन में प्रवेश करके साहसी राय II को रासिल के युद्ध में पराजित कर दिया तथा मकरन तथा पूर्वी बलूचिस्तान को हड़प लिया। खलीफा उमर ने सिन्धु नदी के पार किसी भी हस्तक्षेप को स्वीकृत नहीं किया और अपने सेनापतियों को सिन्धु नदी के पश्चिम में ही रहने का आदेश दिया।[28][not in citation given] खलीफा उथमान इब्न अफ्फान (644-656) के शासनकाल में मुस्लिमों ने क़न्ज़बिल पर कब्ज़ा कर लिया जो उत्तरी सिंध में राय वंश का एक प्रमुख सैनिक गढ़ था। वर्ष 662 में, उम्मायद की खलीफाई के दौरान इसे राय शासन द्वारा दोबारा प्राप्त कर लिया गया और इसे रशीदन सेना द्वारा सबसे पूर्वी गढ़ के रूप में प्रयोग किया गया।

कहा जाता है की चाच के सम्बन्ध रानी सुहानादी के साथ विकसित हो गए थे और साहसी राय II की मृत्यु के पश्चात्, उन्होंने रानी के साथ मिलकर स्वयं शासक बनने के लिए षड़यंत्र रचाया। राणा महारथ जो चित्तोड़ के राजा थे, जो साहसी राय के भाई थे, ने राजसिंहासन पर दावा करते हुए चाच पर आक्रमण कर दिया। वर्ष 640 की एक लड़ाई में राणा एक षड़यंत्र से मार दिए गए।[27][29]

चाच ने तब अपने भाई चंद्रा को शासन चलने में सहायता करने को कहा और उनको एक सेना देकर बाकी शासन को भी उनके अधीन करने को कहा। कहा जाता है की उन्होंने व्यास नदी के दक्षिणी तट पर बाबियाह, इस्कंदाह और सिक्काह में लड़ाई लड़ी जहां "चाच राय ने किले को अपने कब्जे में ले लिया (सिक्काह के) तथा 5000 लड़कों को मरवा दिया जो उसके अन्दर थे, शहर के एनी लोगों को कैदी बना लिया, बहुत सा लूट का माल अपने कब्जे में ले लिया तथा बहुत से गुलाम पकडे."[30] उन्होंने मुल्तान में एक ठाकुर को नियुक्त कर दिया और कश्मीर से अपनी सीमा को सुलझाने के लिए बिना किसी के विरोध के चले गए।

बाद में उन्होंने शासन का विस्तार किया, सिन्धी नदी के किनारे के बौद्ध राज्यों को अपने अधिकार में ले लिया, यह शिखर पर पर पहुंचा ब्रह्मणाबाद के युद्ध में। वहां वह एक वर्ष रुके, अपने नियंत्रण को पक्का करने के लिए कुछ उपाय किये, जैसे रजा अघम की विधवा से शादी की; अपनी भतीजी का विवाह अघम के पुत्र सरहंद से करवाया; कुछ बंधक पकड़े; और जाट तथा लोहाना जाति के लोगों के हथियार रखने पर पाबन्दी लगायी।

उन्होंने जाट तथा लोहाना जाति के लोगों पर कुछ बंदिशें लगायीं जैसे घोड़े पर काठी लगा कर सवारी करना, उनको रेशम तथा वेलवेट पहनने पर रोक लगायी, उनके द्वारा सिरों पर अथवा पैरों में कुछ भी पहने जाने पर रोक लगायी, तथा उनको काला अथवा लाल दुपट्टा पहनने पर बाध्य किया।

फिर उन्होंने सस्सनिद क्षेत्र के अरमानबेलाह शहर की और रुख किया और तुरान से कंधार भी गए जहां से उन्होंने वापसी करने से पहले विजय प्राप्त की।

सिंधु नदी के किनारे कई स्थानों का नाम इस राजा के नाम पर है। उदाहरण के लिए, चाचपुर, चाचर, चाचरो, चाचगांव और चाची।[31]

चंदर[संपादित करें]

चच के उत्तराधिकारी उनके भाई, चंदर (671-679) थे।[32] चंदर एक बौद्ध तपस्वी था।[33] उसने अपने राज्य को कन्नौज के राणा सहिरस से बचाया। अरोड़ की राजधानी की एक लम्बी घेराबंदी के बाद राणा को एक बहस में संघर्ष के दौरान पकड़ लिया गया। बंधकों के साधन से शांति स्थापित की गयी। चंदर ने 8 वर्षों तक शासन किया।

राजा दाहिर[संपादित करें]

चाच के सबसे बड़े पुत्र दाहिर अपने चाचा चंदर के उत्तराधिकारी बने। उनके पिता का नाम सेलाजी होने की सूचना है। जब चाच ने रानी सुहानंदी से शादी की, तब इसके बारे में परस्पर विरोधी सूचनाएं हैं कि उनके राय से कोई संतान थी या नहीं और यह राणा महारथ से लड़ाई से पहले की बात है या बाद की। चाच के दो पुत्र थे, रानी सुहानंदी से (दाहिर व दहरसियाह), तथा एक पुत्री (बाई) अघम की विधवा से।

जनसांख्यिकी[संपादित करें]

विभाजन से पहले[संपादित करें]

1947 में भारत के विभाजन से पहले, अरोड़ा आमतौर से पंजाब के दक्षिण-पश्चिम भागों, डेरा गाज़ी खान जिला (तथा हाल ही में बना जिला राजनपुर), मुल्तान, बहावलपुर, उत्तरी सिंध, तथा डेरा इस्माइल खान संभाग जो कि उत्तर पश्चिम सीमान्त राज्य में हैं, में रहते थे। इस क्षेत्र की प्रमुख भाषा ल्हांडा है, जिसे अब पाकिस्तान में सेरैकी नाम से जाना जाता है। अरोड़ा लोग अलग अलग संख्या में उत्तर में और आगे बस गए, झांग, मिंवाली, लाहौर, अमृतसर, तथा लायलपुर (जिसे अब फैसलाबाद नाम से जाना जाता है) के जिलों में, साथ ही डेराजाट के दक्षिण में सुक्कुर, शिकारपुर जिला तथा कराची में भी रहने लगे। कोहट में, अरोड़ा वहां के मूल निवासी तथा अप्रवासी अरोड़ाओं में बंट गए; अधिकांश मूल निवासी हिन्दू थे जबकि अधिकांश अप्रवासी सिक्ख थे।[34]

पंजाब के आधे अरोड़ा दक्षिण-पश्चिम में डेरा गाज़ी खान, झांग, मिंवाली, मुज़फ्फरगढ़, मुल्तान व बहावलपुर में रहते थे।[35] भारत के इम्पीरियल गजट के अनुसार (1901), भारत के पंजाब प्रान्त में तीन मुख्य व्यापारिक समुदाय थे - अरोड़ा, बनिया तथा अहलूवालिया - ये क्रमशः दक्षिण-पश्चिम (मुल्तान प्रभाग), दक्षिण-पूर्व (वर्तमान हरियाणा को मिला कर दिल्ली प्रभाग), तथा पूर्वोत्तर (जलंधर प्रभाग) में प्रभावशाली थे; केन्द्रीय क्षेत्र (लाहौर प्रभाग) तथा उत्तर-पश्चिम (रावलपिंडी प्रभाग) में अरोड़ा तथा खत्री संख्या में लगभग बराबर थे।[35]

1901 की प्रान्त की जनगणना में (जिसमें दिल्ली शामिल है) इन समुदायों की संख्या इस प्रकार थी: अरोड़ा 653,000; बनिया 452,000; खत्री 436,000। बहावलपुर के पूर्व शाही राज्य में व्यावहारिक रूप से पूरा वाणिज्य अरोड़ा लोगों के हाथों में था, जबकि पटियाला में अहलूवालिया लोगों का वर्चस्व था। सरकारी कर्मचारियों में से अधिकांश अरोड़ा थे। 1901 की उसी जनगणना में अरोड़ा तथा खत्रियों के संख्या उत्तर-पश्चिम के सीमान्त प्रान्त में क्रमशः 69,000 व 34,000 थी; सिंध प्रान्त तथा खायरपुर के शाही राज्य में ओरडा तथा खत्री लोगों को लोहाना के रूप में गिना जाता था जिसे सिंध का व्यापारिक समुदाय माना जाता था। बहुत से अरोड़ा भारत सरकार के सभी विभागों में पदोन्नत किया गये जैसे अतिरिक्त सहायक आयुक्त, एकाउंटेंट, प्रोफेसर, डॉक्टर, सिविल सर्जन, इंजीनियर, सैन्य अधिकारियों, तथा अदालत के अधिकारियों के रूप में। 1947 में भारत में विभाजन के बाद, पाकिस्तान के अधिकांश हिंदू और सिक्ख अरोड़ा भारत पलायन कर गए।[35]

स्वतंत्रता[संपादित करें]

अरोड़ा लोग बाकियों से मिल कर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए। बहुत से लोगों को सत्याग्रह (अहिन्सत्मत प्रतिरोध) के लिए कैद किया गया। कुछ हिन्दू महासभा से जुड़ कर आज़ादी की लड़ाई की, जिसमें मदनलाल पाहवा शामिल हैं। चूंकि अरोड़ा मुख्यतः पश्चिमी पंजाब क्षेत्र से हैं, इसलिए इनमें से अधिकांश को भारत के विभाजन के समय भारत आना पड़ा।

विभाजन के बाद[संपादित करें]

चित्र:SaduBela.jpg
सिंधु नदी पर साधु बेला आश्रम

महाराजा रंजीत सिंह के समय से या उसके भी पहले से ही अरोड़ा लोग अमृतसर में आकर बस गए थे।[10] यह माना जाता है कि वे सिंध या मुल्तान से आकर लाहौर में बस गए और फिर उसके बाद अमृतसर में। यह निष्कर्ष इस बात से निकला गया है कि काफी लम्बे समय तक केंद्रीय पंजाब में रहने के बाद उन्होंने अपनी देसी भाषा ल्हांडा का प्रयोग बंद कर दिया।[10] अरोड़ा सिख अधिकतर बड़े शहरों में पाए जाते हैं, विशेषकर अमृतसर में। वे विभाजन के पूर्व से ही वहां रह रहे थे। उनके हिन्दू समकक्ष, जिनमे से अधिकांश पाकिस्तान से आकर बस गए थे, मात्र 100 से 400 मील कि दूरी को तय करने में एक महीने या उससे भी अधिक समय की यात्रा पूर्ण करके 1947 में भारत आ गए, वे भूख और प्यास से पीड़ित और बीमार थे और अधिकांशतः उनके पास वही एक मात्र वस्त्र था जिसे उन्होंने पहना हुआ था। अरोड़ा जाति के लोग न सिर्फ इन संकटों के उत्तरजीवी रहे बल्कि वे और समृद्ध भी हुए।[10] अमृतसर गैज़ेटियर यह दावा करता है कि अरोड़ा जाति के लोग बहुत ऊर्जावान और बुद्धिमान होते हैं। वे अधिकतर व्यवसाय और उद्योगों में लगे हुए हैं। एक ही शहर में बसे अपने समकक्षों की तुलना में वे व्यापारिक कौशल में उत्कृष्ट हैं। इस समुदाय के काफी लोग सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।[1] होशियापुर गैज़ेटियर कहता है "स्वतंत्रता से पूर्व, शहर में अरोड़ा जाति के लोगों की संख्या अधिक नहीं थी। 1947 में पकिस्तान से भारत आए गैर-मुस्लिम लोगों के साथ, वे भी यहां आकर बस गए, हालांकि वे छोटी संख्या में आये थे।अधिकतर अरोड़ा लोग पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में और फिरोजपुर नगर में बसे थे। पंजाब के पूर्वीय नगरों में उनकी संख्या उल्लेखनीय नहीं थी। इब्बेत्सों के अनुसार, अरोड़ा लोग रोर (पाकिस्तान के रोरी सुक्कुर, सिंध) के क्षत्रिय हैं। इनकी उत्पत्ति जहां से भी हो, मुख्य बात यह है कि कुछ निश्चित गुणों के मामले वे खत्रियों से मिलते जुलते हैं। कुछ ख़ास मामलों में, वे उनसे भी श्रेष्ठ होते हैं। वे भी कई समूहों और जातियों में विभक्त हैं, उचंदा, निचंदा आदि., लेकिन सामाजिक जीवन में, इन समूहों का कोई महत्व नहीं है। अन्य जातियों की ही तरह वे भी अपने समूहों के अंतर्गत विवाह करते हैं। वे खत्रियों में भी विवाह करते हैं। 1936 में खत्रियों द्वारा लाहौर (पाकिस्तान) में आयोजित ऑल इंडिया मीटिंग में यह तय किया गया कि अरोड़ा, सूद और भाटिया हर प्रकार से क्षत्रिय थे।[36]

विभाजन से पूर्व, अरोड़ा सिर्फ अपनी उपजाति में या सामान भौगोलिक क्षेत्र के सदस्यों से ही विवाह करते थे, अर्थात, उत्तराधि, दक्खन या दाहरा से। लेकिन विभाजन के बाद, घर वालों की मर्जी से होने वाले विवाहों का सामाजिक दायरा पंजाबी मूल के ही अन्य समुदायों तक विस्तृत किया गया, विशेषकर खत्री, भाटिया और सूद समुदायों में।[10] पंजाबियों के अन्य समुदायों के साथ अंतर्जातीय विवाह (विशेषरूप से ब्राह्मणों और बनिया लोगों के साथ) और भारत और विश्व के अन्य भागों में विवाह करना बहुत आम बात हो गयी और दिन प्रतिदिन यह बात और भी साधारण होती जा रही है। यह सभी उपजातियां भी इतने बढ़िया ढंग से मिश्रित हो गयीं कि अब इनकी ओर समग्र रूप से पंजाबी अरोड़ा कहकर संकेत किया जाता है या मात्र 'पंजाबी' समुदाय कहकर संकेत किया जाता है। अरोड़ा लोग (और सामान्यतया सभी पंजाबी), विशेषकर बड़े शहरों में रहने वाले अरोड़ा जाति के लोग और अधिक उदारवादी होते जा रहे हैं और इसी के साथ वर्ण व्यवस्था की अधिकाधिक अवहेलना कर रहे हैं। अब पंजाबियों में, विवाह संबंधों में प्राथमिक माने जाने वाले जाति के मुद्दे का स्थान सामाजिक आर्थिक प्रतिष्ठा ने लिया है।

भारतीय समाज में भूमिका[संपादित करें]

भारतीय अरोड़ा परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर विशेष महत्व देते हैं, वे लड़कियों की शिक्षा को भी सामान रूप से महत्त्वपूर्ण मानते हैं; इसी कारण वे समृद्ध हैं और नितांत भिन्न प्रकार के व्यवसायों में भी सफल हैं जैसे, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिक प्रबंधन, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी, उत्पादन, मनोरंजन, कला, सैन्य सेवा और नौकरशाही. 1947 में विभाजन के दौरान अल्पसंख्यक से भी कम संख्या में होने, राजनीतिक शक्ति आधार का अभाव होने, विभाजन से पूर्व के पंजाब और सिंध में इनकी उपेक्षा और दमन के सशक्त प्रयासों, अपने घर, व्यापार, संपत्ति और बैंक की जमा राशि (पंजाब & सिंध बैंक में, जिसका स्वामित्व और नियंत्रण तीन सिख खत्री परिवारों के हाथ में था) आदि सब कुछ गवां देने के बावजूद भी इन लोगों ने जो सफलता हासिल की है वह प्रशंसनीय है। जानकारी के अनुसार उस समय पंजाब के एक अन्य प्रसिद्ध बैंक (पंजाब नैशनल बैंक) ने पास बुक की प्रविष्टियों के आधार पर ही प्रवासियों की जमा राशि का भुगतान करने के द्वारा बहुत ही सकारात्मक भूमिका निभायी थी, अपने सभी अभिलेख पाकिस्तान में खो देने के बाद भी बैंक ने ऐसा किया था।[37]

अरोड़ा जाति के लोगों ने भारतीय सैन्य बल में भी पद प्राप्त किये. दिवंगत लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और जनरल जे.जे. सिंह भारतीय सैन्य बल की सेवाओं में योगदान करने वाले अरोड़ा जाति के दो प्रमुख सदस्य रहे हैं। हाल में हुए कारगिल युद्ध में भी अरोड़ा काफी प्रसिद्ध रहे थे। विक्रम बत्रा को भारत में युद्ध के नायक के रूप में घोषित किया गया था इसी प्रकार स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को भी, इन दोनों की ही संघर्ष के दौरान मृत्यु हो गयी थी।

धर्म[संपादित करें]

भारत के अधिकांश अरोड़ा हिन्दू हैं और सिख सम्प्रदाय में ये अल्पसंख्यक समूह के रूप में हैं, हालांकि सिख समुदाय के अन्दर वे काफी प्रभावशाली माने जाते हैं।[38] अपनी धार्मिक आस्था के मामले में अरोड़ा जाति के लोग बहुत ही सहिष्णु हैं। इनमे अधिकांश हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं; हालांकि, वे आर्य समाज की पवित्रता का भी आदर करते हैं और प्रायः ही आर्य समाज के मंदिरों, जैन मंदिरों और सिखों के गुरूद्वारे में जाते हैं। पिछली कई शताब्दियों से, एक हिन्दू अरोड़ा परिवार के सबसे बड़े बेटे ने 18वीं शताब्दी में सिख गुरुओं के प्रति पारिवारिक श्रद्धा के फलस्वरूप स्वेच्छा से धर्मान्तरण करके सिख धर्म को अपना लिया।[39] दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के क्षेत्रों में अधिकांश मंदिर अरोड़ा जाति के नियंत्रण में हैं। उन क्षेत्रों में जहां अरोड़ा जाति के लोगों की संख्या अधिक है, वहां पर अधिकांश शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, सनातन धर्म मंदिर, दुर्गा मंदिर और कृष्ण मंदिर का प्रबंधन अरोड़ा समुदाय द्वारा ही किया जाता है।

वर्ग[संपादित करें]

आनुवांशिक रूप से, भारत के अधिकांश सिन्धी हिन्दू भी अरोड़ा ही हैं (हालांकि उन्हें लोहाना वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया जाता है) और राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं। कई गुजराती (लोहाना वर्ग) और सिन्धी (खत्री सिन्धी) के कुलनाम अरोड़ा के कुलनामों के ही समान होते हैं। राजस्थान में, एक भिन्न खत्री समुदाय पाया जाता है। वे स्वयं को जोधपुरी और नागौरी खत्रियों के रूप में उप-वर्गीकृत करते हैं। उनके कुलनाम भी अरोड़ा लोगों के समान होते हैं। इनकी लगभग 84 जातियां और 201 उपजातियां हैं। अपने पंजाबी अरोड़ा भाईयों के सामान वे भी समृद्ध हैं और भारत के अनेक भागों तथा अन्य देशों में बस गए हैं। अभी भी कुछ सिन्धी हिन्दू अरोड़ा उत्तरी सिंध में रहते हैं; जिनमे से अधिकांश व्यवसायों में लगे हुए हैं।

अरोड़ा जाति के अंतर्गत तीन प्रमुख वर्ग हैं: उत्तराधि, दखना और गुजराती.[10] उत्तराधि अरोड़ा उत्तरी क्षेत्रों में रहा करते थे। दखना अरोड़ा दक्षिणी क्षेत्रों में समुद्र तट के समीप रहा करते थे और गुजराती अरोड़ा पश्चिम में गुजरात के निकट रहा करते थे।[40]

अरोड़ा जाति के लोग खत्रियों/खुराना के साथ आनुवांशिक और सांस्कृतिक समानता रखते हैं। अरोड़ा जाति का अस्तित्व पंजाब के पश्चिमी जिलों में था और ये मात्र सनातन धर्म या शिव लिंग की पूजा में विशवास रखते थे,[तथ्य वांछित] लेकिन पूर्वीय पंजाब के खत्री सिख तथा अन्य मतों का पालन करते थे। खत्रियों द्वारा ब्राहमणों की आलोचना की शुरुआत करने के बाद से,[तथ्य वांछित] अरोड़ा लोगों ने खत्री कुलनाम का प्रयोग बंद कर दिया. आनुवांशिक दृष्टि से समान एक अन्य समूह जो पाकिस्तान में रह रहा है, वह है मेनन.

अरोड़ा समुदाय का लोकनृत्य झूमर है, यह एक धीमी गति वाला और अर्थवत नृत्य है, खत्रियों का लोकनृत्य भांगड़ा है, जो एक आक्रामक शैली का नृत्य है।

प्रसिद्ध अरोड़ा[संपादित करें]

अरोड़ा समुदाय के लोगों ने भारत के विभाजन के बाद सभी मानवीय कार्य के क्षेत्रों पर अपनी छाप छोड़ी है तथा भारत के विकास में अमिट योगदान दिया है।

विज्ञान - विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने वाले अरोड़ा समुदाय के लोगों में विज्ञान का नोबेल से पुरस्कृत हर गोबिंद खुराना, प्रसिद्द जीव वैज्ञानिक सुंदर लाल होरा, नासा की अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला, तथा इसरो वैज्ञानिक सतीश धवन प्रमुख हैं। समीर अरोड़ा ने कंप्यूटर क्षेत्र के 13 पेटेंट अपने नाम कर रखे हैं। संजीव अरोड़ा) प्रिंसटन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर हैं जो प्रोबबिलिस्टिक चेकेबल प्रूफ्स (पीसीपी प्रमेय के सिद्धांत के प्रमाण देने के लिए) पर किये गए अपने मौलिक कार्य के लिए जाने जाते हैं।

रक्षा - 21 सिख रेजिमेंट के प्रमुख रविन जुनेजा, लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह अरोड़ा ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में पमुख भूमिका निभाई थी। अमृतसर के निकट खेमकरण क्षेत्र में जनरल अरोड़ा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने अपने से बेहतर पाकिस्तानी सेना (अमेरिकी पैटन एम 48 टैंकों से लैस) को हरा कर 300 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट तथा कब्ज़ा करते हुए खेमकरण सेक्टर को "पैटन टैंकों का कब्रिस्तान" बना दिया और इससे पाकिस्तानी की शक्ति और हौसले पर बहुत झटका लगा. भारतीय उच्च कमान ने उनको सतलज नदी के पीछे ठहर जाने का विकल्प दिया, ऐसा करने से आधा पंजाब पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता.

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपनी नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उनके नेतृत्व में 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके कारण पूर्वी क्षेत्र में युद्ध का अंत हो गया। 1971 युद्ध में सेकण्ड लेफ्टिनेंट अरूण क्षेत्रपाल को बहादुरी के लिए भारत में वीरता के सर्वोच्च पुरस्कार, परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया।

1999 में करगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने कारगिल के पहाड़ों में अपना जीवन त्याग दिया. उनको मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा (वीर चक्र) ने भी कारगिल युद्ध के दौरान अपनी मातृभूमि की सेवा में अपना जीवन त्याग दिया.

सरकार - हरप्रीत सिंह पृथी [आईआरएसएस]; श्री भगवंत सिंह नरूला आईपीएस (सेवा निवृत्त) ने भारतीय पुलिस सेवा में एक प्रतिष्ठित कैरियर बिताया. 1960 के स्नातक, वे गुजरात राज्य के पुलिस महानिदेशक के रूप में 1992 में सेवानिवृत्त हुए.

डॉ॰ अशोक धमीजा महाराष्ट्र कैडर के एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। उन्होंने कई चर्चित मामलों में भूमिका अदा की है और अब वे मुंबई उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय के अग्रणी वकीलों में से हैं। उनके द्वारा लिखी पुस्तकें हैं:

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, दूसरा संस्करण (2009), लेक्सिस-नेक्सिस बटर वर्थ्स वाधवा नागपुर, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित
  • संविधान संशोधन की आवस्यकता तथा मूलभूत विशिष्टताओं का सिद्धांत, (2007), वाधवा एंड कंपनी नागपुर, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित
  • जमानत, बांड, गिरफ्तारी और हिरासत के कानून, (2009), लेक्सिस-नेक्सिस बटर वर्थ्स वाधवा नागपुर, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित

उद्योग: पैरामाउंट सीमेंट के वरूण जुनेजा, ब्रिज मोहन मुंजाल तथा हीरो होंडा परिवार, करम चंद थापर, नरूला की खाद्य जोइंट की श्रृंखला, वीएलसीसी (वंदना लूथरा स्लिमिंग सेंटर), नई दिल्ली का बत्रा अस्पताल, बत्रा श्रृंखला की होमिओपैथी क्लिनिक, छाबड़ा555 अरोड़ा समुदाय के उद्यम कौशल के उदाहरण हैं। सिंगापुर में, करतार सिंह ठकराल ने अपने पारिवारिक व्यवसाय, ठकराल होल्डिंग्स/कॉर्प को बनाया.ठकराल सिंगापुर के 25वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं।[41]

कैपरो के लॉर्ड स्वराज पॉल भी अरोड़ा हैं (कुछ अरोड़ा परिवारों में पॉल को उपनाम के रूप में प्रयोग किया जाता है, जैसे नागपाल व काठपाल). बजाज मोटर्स का बजाज परिवार अरोड़ा वंश से है (राजस्थान में बसे अरोड़ा).

मनोरंजन : - शो बिजनेस में बहुत से अरोड़ा हैं, उदाहरण के लिए गुलज़ार (उनका असली नाम सम्पूरण सिंह कालरा है), कुलभूषण खरबंदा, राज बब्बर, विजय अरोड़ा, जस अरोड़ा, अक्षय कुमार (राजीव भाटिया), गोविंदा (गोविन्द अरुण आहूजा), पूजा बत्रा, शाइनी आहूजा, जूही चावला, गुलशन ग्रोवर, हरमन बवेजा, नितिन अरोरा, इलेक्ट्रोनिक संगीत निर्माता आदित्य अरोड़ा, मलाइका अरोड़ा, गायिका जसपिंदर नरूला तथा अन्य.

फैशन : मनीष अरोड़ा, रितु कुमार, रोहित गांधी, नीता लुल्ला और विजय अरोड़ा फैशन डिजाइनर हैं।

राजनीति : गोपाल सिंह कौमी पंजाब के एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी तथा शिरोमणि अकाली दल के नेता हैं। मदन लाल खुराना, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री, अरोड़ा हैं। अन्य अरोड़ा नेताओं में अशोक अरोड़ा हरियाणा राज्य के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और प्रीतम अरोड़ा, एआईसीसी की पूर्व सदस्य तथा आल इंडिया महिला कांग्रेस की उपाध्यक्ष शामिल हैं।[42]

मीडिया : खुशवंत सिंह, जो एक सिख इतिहासकार और सांसद तथा इलस्ट्रेटेड वीकली, सूर्या तथा हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक भी अरोड़ा वंश से हैं। अन्य मीडियाकर्मियों में शामिल हैं रविंदर सिंह चुग, रविंदर सिंह लड्डी, शिव खेड़ा, प्रभु चावला, विनोद दुआ, प्रीतम अरोड़ा,[43] और नलिन मेहता.

खेल : गौतम गंभीर, नयन मोंगिया, पीयूष चावला प्रख्यात क्रिकेटर हैं।

सामाजिक सेवा - मंदीप पुजारा एक युवा नेता हैं जिन्होंने भारत तथा एशियाई वुवओं का प्रतिनिधित्व अनेक मंचों पर सामाजिक बदलाव के लिए किया है, विशेष रूप से रोटरी इंटरनेशनल में.

धर्म : अवतार सिंह मक्कड़, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष, अरोड़ा हैं।

अरोड़ा समुदाय से बहुत से लोग सफल डॉक्टर, इंजीनियर, नेता, उद्यमी, चित्रकार, तथा खिलाड़ी हैं।

अरोड़ा कुलनाम[संपादित करें]

लगभग 1,500 गोत्र अरोड़ा में मौजूद हैं।

अरोड़ा के परिवार के नाम में शामिल यह भी हैं अहूजा, अल्रेजा, आर्य, अनेजा, असीजा, बजाज, बलाना, बखरू, बतरा, बवेजा, भठेजा, बसीजा, भूटानी, बुद्धिराजा, चावला, चरैपोत्रा, छाबरा, छाबरिया, चुघ, चुग्घा, धमीजा, दावर, दुरेजा, डूमरा, धींगरा, दुआ, गंभीर, गाबा, गांधी, गांदा (अब गांधी में परिवर्तित), गग्नेजा, गेरा, गिर्धर, गोगिया, गुलाटी, गुलियानी, गुगलानी, ग्रोवर, हंगल, हसिजा, झंदइ, जुनेजा, कलरा, कमरा, कटारिया, कथ्पाल, खरबंदा, खिर्बात, खुराना, खोराना, कुमार, खेर, लखीना, लाल, लेखी, लूना, लुल्ला, मदान, मखीजा, मक्कर, मलिक, मनचंदा, मनोचा, मेह्न्दिरत्ता, मेंदिरत्ता, मिद्ध, मिगलानी, मुंजल, नागपाल, नारंग, नरूला, निझावन, पाहवा, पहुजा, पपनेजा, प्रुथी, पुजारा, रहेजा, रहूरिया, राजपाल, रेहानी, सिदाना/सरदाना, सचदेव/सचदेवा, सलूजा, सेतिया/सेह्तिया, सिद्धार/श्रीदर, सिकरी, सिंधवानी, सुनेजा, तनेजा, ठकराल वसंत, वाधवा, टुटेजा और अन्य। विक्शनरी (Wictionary) पर एक पूरी सूची उपलब्ध है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • पंजाब में हिंदू धर्म
  • अग्रिम जाति
  • लोहाना
  • सिरैकी

संदर्भ[संपादित करें]

  1. (सी) धर्म और जाति
  2. B. Bills, David. "Appendix C" (Englich में). The shape of social inequality: Stratification and Ethnicity in Comparative Perspective. JAI Press Title. प॰ 253. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-7623-1178-1. http://books.google.co.uk/books?id=Lf3q3zePi2UC&pg=PA253&dq=Arora+Vaishya&hl=en#v=onepage&q=Arora%20Vaishya&f=false. अभिगमन तिथि: 22 November 2010. 
  3. एशियाई नाम के साथ सफलता: एक ...- गूगल बुक्स
  4. राजस्थान - गूगल बुक्स
  5. पॉप्युलेशन जेनेटिक स्टडीज़ ऑफ़ पीआई, टीएफ, जीसी एंड पीजीएम1 ... [एकटा ऐन्थ्रोपोगेनेट. 1984 - पबमेड परिणाम]
  6. आर.वी. रसेल द्वारा ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ डी सेन्ट्रल प्रोविन्सेस ऑफ़ इंडिया, आर.बी.एच. लाल, 1995 को पुनःप्रकाशित, एशियाई शैक्षिक सेवाएं
  7. स्कॉट कैमरून लेवी द्वारा द इन्डियन दियस्पोरा इन सेन्ट्रल एशिया एंड इट्स ट्रेड, 1550-1900, 2002 को प्रकाशित ब्रिल (BRILL)
  8. डेंजिल इबेट्सन, एडवर्ड मैकलगन, एच. ए. रोज़, अ ग्लौसरी ऑफ़ द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ द पंजाब एंड नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, 1911, पीपी 17 खंड द्वितीय
  9. इसोबेल शॉ, पाकिस्तान हैंडबुक, (गाइडबुक कं, हांगकांग, 1989), पीपी 117
  10. पंजाब राजस्व
  11. http://books.google.ca/books?id=Th3Mu-_RwjQC&pg=PA335&dq=arora+rors&hl=en&ei=qKLoTIrFH4qfnQfCv7S8DQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CCkQ6AEwAA#v=onepage&q=arora%20rors&f=false
  12. "भगवान राम के दो बेटे थे- लव और कुश. राम के वंश में वृद्धि इस रूप में- अतिथि, निषध, अनल, नाभ, पुण्डरीक, क्षेम्धंवा, देवानीक, अहिनाका, रुरु, परियात्रक, देवल, वंचल, उल्का, वज्रानाभ, शंखन, युश्हिताश्व, विश्वास, हिरन्यानम, पुष्य, ध्रुवसन्धि, सुदर्शन, अग्निवर्ण, शिघ्राग, मारू, प्रसुश्रुत, सुसन्धि, अमर्ष, सहसवान और विश्वभव. विश्वभव का बेटा ब्रिह्दल महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु के द्वारा मारा गया।" अध्याय चार से "सूर्यवंश का विवरण", 16 हिंदू पुराणों के सूचकांक [1]
  13. अलेक्जेंडर कैम्पेन इन सिंद एंड बलूचिस्तान एंड द सीज ऑफ़ द ब्राह्मिन टाउन ऑफ़ हर्माटेलिया, पेरी हर्मन लियोनार्ड एगर्मोंट द्वारा ओरियेंटेलिया लोवानिंसिया अनालेकटा के तीसरा खंड. पीटर्स प्रकाशक, 1975, पृष्ठ 170. ISBN 90-6186-037-7, 9789061860372
  14. रुद्रायण और भल्लातिया जकाता की कहानी
  15. "दिव्यवादना (तिब्बती संस्करण) रिपोर्ट: 'बुद्ध राजगृह में हैं। इस समय जम्बूद्वीप में दो महान नगर थे: पाटलीपुत्र और रोरुका। जब रोरुका का उदय होता है तो पाटलीपुत्र का पतन होता है; जब पाटलीपुत्र का उदय होता है तो रोरुका का पतन होता है।' यहां सिंध का रोरुका मगध साम्राज्य की राजधानी से प्रतिस्पर्धा कर रहा था।" कराची से के.आर. मल्काणी द्वारा द सिंध स्टोरी अध्याय 'सिंधु इज डिवाइन', प्रकाशक: सिंधी अकादमी (1997), ISBN 81-87096-01-2
  16. कैलाश चंद जैन द्वारा लॉर्ड महावीरा एंड हिज़ टाइम्स, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन द्वारा 1992 को प्रकाशित. पृष्ठ 317. ISBN 81-208-0805-3
  17. 16 हिन्दू पुराणों के सूचकांक
  18. दार्शनिक रिसर्च के भारतीय परिषद के जर्नल में एक कागज प्रकाशित. 2000, पीपी 1-24, "भारतीय संस्कृति के कालानुक्रमिक ढांचे पर", लुसियाना राज्य विश्वविद्यालय के सुभाष काक महाभारत के युद्ध के लिए 1924 ईपू की एक तिथि निर्धारित करते हैं। पार्जिटर की सूची के अनुसार, इस तिथि का प्रयोग करते हुए और श्री राम तथा महाभारत के युद्ध के बीच में 30 पीढ़ियों (20 वर्ष प्रति पीढ़ी के अनुसार) के अस्तित्व को मानते हुए, हमें दसरथी राम के लिए 2524 ईपू का एक समय प्राप्त होता है। श्री राम के अस्तित्व से 29 पीढ़ियों पूर्व जाने पर, हम 3104 ईपू में पहुंच जाते हैं जोकि राजा रुरुक का समय था और इस प्रकार हम यह सुरक्षित निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं कि रोरुका (रुरुका) की स्थापना 3100-3000 ईपू के मध्य हुई थी।
  19. WebCite query result
  20. अलेक्जेंडर कैम्पेन इन सिंद एंड बलूचिस्तान एंड द सीज ऑफ़ द ब्राह्मिन टाउन ऑफ़ हर्माटेलिया, पेरी हर्मन लियोनार्ड एगर्मोंट द्वारा ओरियेंटेलिया लोवानिंसिया अनालेकटा के तीसरा खंड, पीटर्स प्रकाशक, 1975, पृष्ठ 174 ISBN 90-6186-037-7, 9789061860372
  21. डॉ॰ राज पाल सिंह द्वारा रोड़ इतिहास की झाला (हिन्दी में), पाल प्रकाशन, यमुनानगर (1987). पृष्ठ 14.
  22. रूद्रदमन के जूनागढ़ रॉक इन्स्क्रिप्शन
  23. इलियट, हेनरी मियेर्स. द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, एज़ टोल्ड बाई इट्स ओन हिसटोरियन. मुहम्मद की अवधि. खंड 1, अदामंत मीडिया निगम, ISBN 0-543-94726-2, पृष्ठ 405
  24. "इस महल के नीचे गड़े हुए पुराने किले की स्थापना रोर राजा द्वारा की गयी थी, जो राजा खानगर के पुत्र थे", पृष्ठ 210-212, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, वर्ष 1871-72 की रिपोर्ट, संस्करण IV, एलेक्सेंडर कनिंघम के नेतृत्व में ऐ.सी.एल. कर्लियेल द्वारा समावेशित आगरा सर्किल.
  25. सर अलेक्जेंडर कनिंघम (ब्रिटिश सेना अधिकारी और पुरातत्त्वविद् - ब्रिटानिका ऑनलाइन विश्वकोश
  26. पृष्ठ 96, पुरातत्त्वविद् सर्वे ऑफ इंडिया, 1871-72 वर्ष की रिपोर्ट, खंड चतुर्थ, ए.सी.एल कार्लिल द्वारा घेरा हुआ आगरा चक्र, अलेक्जेंडर कनिंघम के पर्यवेक्षण के अंतर्गत
  27. विंक, पृष्ठ. 153
  28. इम्पीरियल गैज़ेटीर2 ऑफ़ इंडिया, खंड 6, पृष्ठ 275 - इम्पीरियल गैज़ेटीर ऑफ़ इंडिया - डिगिटल साउथ एशिया लाइब्रेरी
  29. चाचनामा राणा की मृत्यु को चाच के साथ हुए एकलौते ऐसे द्वन्द युद्ध के रूप में याद करता है जहां चाच ने छल किया और विजय के लिए आरूढ़ हुए।
  30. द चचनमः, एन एशियंट हिस्ट्री ऑफ़ सिंद, गिविंग द हिन्दू डाउन टू द अरब कन्कुएस्ट . फ़ारसी मिर्जा कलिच्बेग फ्रेदंबेग द्वारा अनुवादित, कमिशनर्स प्रेस, 1900. धारा 10
  31. पृष्ठ. 653 एडवर्ड बल्फोर द्वारा द साइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडिया एंड ऑफ़ इसटर्न एंड सदर्न एशिया
  32. विंक, पृष्ठ. 153
  33. पृष्ठ. 151 आन्द्रे विंक द्वारा अल-हिंद, द मेकिंग ऑफ़ द इंडो-इस्लामिक वर्ल्ड
  34. सिख विरासत विभिन्न संप्रदाएं
  35. डी. इबेट्सन, ई.मैकलगन, एच. ए. रोज़, " अ ग्लौसरी ऑफ़ द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ द पंजाब एंड नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस", 1911, पीपी 17 खंड द्वितीय
  36. अध्याय Iii
  37. प्रकाश टंडन पंगुइन द्वारा बैंकिंग सेंचरी
  38. http://www.britannica.com/EBchecked/topic/1195135/Arora
  39. http://punjabrevenue.nic.in/gaz_ldh8.htm
  40. डी. इबेट्सन, ई.मैकलगन, एच. ए. रोज़, अ ग्लौसरी ऑफ़ द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ द पंजाब एंड नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, 1911, पीपी 17 खंड द्वितीय
  41. #25 करतार सिंह ठकराल - Forbes.com
  42. कांग्रेस सन्देश दिसंबर, 2001
  43. हिन्दी बुक सेंटर से हिन्दी पुस्तकें, हिन्दी किताबों के निर्यातक
  • 20 जुलाई 1888 को आयोजित अरोर बैंस के शॉर्ट एथनोग्राफिकल इतिहास, "प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द जनरल मीटिंग ऑफ़ द अरोर बैंस पंचायत", लाहोर.

बाहरी लिंक्स[संपादित करें]

साँचा:Wiktionary pipe

साँचा:Ethnic groups, tribes and clans of the Punjab