सातवाहन

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सातवाहन साम्राज्य

 

1ली शताब्दी ईसा पूर्व–2री शताब्दी ईसवी
Satavahana
गौतमीपुत्र शातकर्णी के अधीन सातवाहन साम्राज्य की सीमाएँ
राजधानी प्रतिष्ठान, अमरावती
भाषाएँ प्राकृत, तेलगू, तमिल, संस्कृत[1][2][3][4][5]
धार्मिक समूह हिन्दू, बौद्ध
शासन राजतंत्र
सम्राट
 -  100-70 ईसा पूर्व सीमुक (प्रथम)
 -  दुसरी शताब्दी ईसवी विजय (अन्तिम)
ऐतिहासिक युग पुरातन
 -  स्थापित 1ली शताब्दी ईसा पूर्व
 -  अंत 2री शताब्दी ईसवी
पूर्ववर्ती
अनुगामी
मौर्य साम्राज्य
कानव राजवंश
पश्चिमी क्षत्रप
आन्ध्रा इक्ष्वांकु
चुटू राजवंश
पल्लव राजवंश
आज इन देशों का हिस्सा है:  India
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सातवाहन वंश, प्राचीन भारत का एक महान राजवंश है। सातवाहन राजाओं ने 300 वर्षों तक शासन किया। सातवाहन वंश की स्थापना 60 ईसा पूर्व राजा सिमुक ने की थी। सातवाहन राजासिमुक, शातकर्णी, गौतमीपुत्र शातकर्णी, वशिस्थिपुत्र, पुलुमावी शातकर्णी, यज्ञश्री शातकारणी प्रमुख राजा थे। प्रतिष्ठान सातवाहन वंश की राजधानी रही , यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में है। सातवाहन साम्राज्य की राजकीय भाषा प्राकृत व लिपि ब्राह्मी थी। इस समय अमरावती कला का विकास हुआ था। सातवाहन राजवंश के समय समाज मातृसत्तात्म था, अर्थात राजाओं के नाम उनकी माता के नाम पर (गौतमीपुत्र शातकारणी) रखने की प्रथा थी, लेकिन सातवाहन राजकुल पितृसत्तात्मक था क्योंकि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी वंशानुगत ही होता था। सातवाहन राजवंश के द्वारा अजन्ता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण किया गया था। सातवाहन राजाओं ने चांदी, तांबे, सीसे, पोटीन और कांसे के सिक्कों का प्रचलन किया। ब्राह्मणों को भूमि दान करने की प्रथा का आरम्भ सर्वप्रथम सातवाहन राजाओं ने किया था जिसका उल्लेख नानाघाट अभिलेख में है।

वर्दिया वंश[संपादित करें]

राजा शालीवाहन को अनेक वरदान प्राप्त थे इसलिए वह वर्दिया (वरदान प्राप्त करने वाला) कहलाए।

गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी (70ई0-95ई0)[संपादित करें]

लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी के नेतृत्व में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया। गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे महान शासक था राजा शालीवाहन ने ईश्वर की तपस्या के फलस्वरूप कई वरदान प्राप्त किए और वर्दिय(वरदान प्राप्त करने वाला)कहलाए और लगभग 25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया अपितु एक विशाल साम्राज्य की भी स्थापना की। गौतमी पुत्र के समय तथा उसकी विजयों के बारें में हमें उसकी माता गौतमी बालश्री के नासिक शिलालेखों से सम्पूर्ण जानकारी मिलती है। कुछ विशेषज्ञों द्वारा गौतमिपुत्र सत्कर्णी को राजा शालीवाहन भी माना जाता है। उन्होंने पूरे भारत को एकजुट कर दिया और विदेशी हमलावरों के खिलाफ बचाया।

उसके सन्दर्भ में हमें इस लेख से यह जानकारी मिलती है कि उसने क्षत्रियों के अहंकार का मान-मर्दन किया। उसका वर्णन शक, यवन तथा पल्लव शासकों के विनाश कर्ता के रूप में हुआ है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्षहरात वंश के शक शासक नहपान तथा उसके वंशजों की उसके हाथों हुई पराजय थी। जोगलथम्बी (नासिक) समुह से प्राप्त नहपान के चान्दी के सिक्कें जिन्हे कि गौतमी पुत्र शातकर्णी ने दुबारा ढ़लवाया तथा अपने शासन काल के अठारहवें वर्ष में गौतमी पुत्र द्वारा नासिक के निकट पांडु-लेण में गुहादान करना- ये कुछ ऐसे तथ्य है जों यह प्रमाणित करतें है कि उसने शक शासकों द्वारा छीने गए प्रदेशों को पुर्नविजित कर लिया। नहपान के साथ उनका युद्ध उसके शासन काल के 17वें और 18वें वर्ष में हुआ तथा इस युद्ध में जीत कर र्गातमी पुत्र ने अपरान्त, अनूप, सौराष्ट्र, कुकर, अकर तथा अवन्ति को नहपान से छीन लिया। इन क्षेत्रों के अतिरिक्त गौतमी पुत्र का ऋशिक (कृष्णा नदी के तट पर स्थित ऋशिक नगर), अयमक (प्राचीन हैदराबाद राज्य का हिस्सा), मूलक (गोदावरी के निकट एक प्रदेश जिसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी) तथा विदर्भ (आधुनिक बरार क्षेत्र) आदि प्रदेशों पर भी अधिपत्य था। उसके प्रत्यक्ष प्रभाव में रहने वाला क्षेत्र उत्तर में मालवा तथा काठियावाड़ से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक तथा पूवै में बरार से लेकर पश्चिम में कोंकण तक फैला हुआ था। उसने 'त्रि-समुंद्र-तोय-पीत-वाहन' उपाधि धारण की जिससे यह पता चलता है कि उसका प्रभाव पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी सागर अर्थात बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिन्द महासागर तक था। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले गौतमी पुत्र शातकर्णी द्वारा नहपान को हराकर जीते गए क्षेत्र उसके हाथ से निकल गए। गौतमी पुत्र से इन प्रदेशों को छीनने वाले संभवतः सीथियन जाति के ही करदामक वंश के शक शासक थे। इसका प्रमाण हमें टलमी द्वारा भूगोल का वर्णन करती उसकी पुस्तक से मिलता है। ऐसा ही निष्कर्ष 150 ई0 के प्रसिद्ध रूद्रदमन के जूनागढ़ के शिलालेख से भी निकाला जा सकता है। यह शिलालेख दर्शाता है कि नहपान से विजित गौतमीपुत्र शातकर्णी के सभी प्रदेशों को उससे रूद्रदमन ने हथिया लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णी ने करदामक शकों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर रूद्रदमन द्वारा हथियाए गए अपने क्षेत्रों को सुरक्षित करने का प्रयास किया।

पतन[संपादित करें]

तीसरी शताब्दी तक सातवाहन वंश की शक्ति बहुत कमजोर हो चुका था । लगभग 225 ई. में यह राजवंश समाप्त हो गया था । इनके पतन में कई शक्तियों ने योगदान दिया । पश्चिम में नासिक के आसपास के क्षेत्र पर अमीरों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया । पूर्वी प्रदेश में  इक्षावाकुओं ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर दिया था । दक्षिण पूर्वी प्रदेश का क्षेत्र पल्लवों ने अपने अधिकार में कर लिया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Nagaswamy, N (1995), Roman Karur, Brahad Prakashan, OCLC 191007985, मूल से 20 जुलाई 2011 को पुरालेखित
  2. Mahadevan 2003, पृष्ठ 199–205
  3. Panneerselvam, R (1969), "Further light on the bilingual coin of the Sātavāhanas", Indo-Iranian Journal, 4 (11): 281–288, डीओआइ:10.1163/000000069790078428
  4. Yandel, Keith (2000), Religion and Public Culture: Encounters and Identities in Modern South India, Routledge Curzon, पृ॰ 235, 253, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-7007-1101-5
  5. Carla M. Sinopoli 2001, पृ॰ 163.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]