सरसों का तेल

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सरसों का तेल

सरसों के तेल शब्द का इस्तेमाल तीन भिन्न प्रकार के तेलों के लिए किया जाता है जो सरसों के बीज से बने होते हैं।

  • बीज को दबाकर बनाया गया एक वसायुक्त वनस्पति तेल,
  • एक गंध तेल जो बीज को पीस कर, उसे पानी में मिलाकर और आसवन द्वारा उदवायी तेल को निकाल कर बनाया जाता है।
  • सरसों के बीज के सार को दूसरे वनस्पति तेल के साथ मिश्रित कर बनाया गया एक तेल, जैसे सोयाबिन तेल।hgghjjjuh

घानी का तेल[संपादित करें]

तेल निकालने के लिए सरसों के बीज को पीसती हुई बैल चालित चक्की

सहिजन (हॉर्सरैडिश) या वसाबी की तरह इस तेल की गंध तीव्र होती है, इसका स्वाद कषाय होता है और अक्सर इसका उपयोग उत्तर प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम और भारत के अन्य क्षेत्रों और बांग्लादेश में खाना पकाने के लिए किया जाता है। उत्तर भारत में मुख्य रूप से इसका इस्तेमाल पकौड़े को तलने के लिए किया जाता है। बंगाल में खाना पकाने के लिए इस तेल को पारंपरिक रूप से पसंद किया जाता है, हालांकि सनफ्लावर जैसे तटस्थ-स्वाद वाले तेलों का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह तेल लगभग 30% सरसों के बीज से बना होता है। इसका उत्पादन काले सरसों (ब्रैसिका निग्रा, भूरे रंग के भारतीय सरसों (ब्रैसिका जुनसिया) और सफेद सरसों (''ब्रैसिका हिर्टा) से किया जा सकता है।

सरसों के तेल में 60% मोनोअनसेचुरेटेड फैटी एसिड होता है जिसमें 42% इरुसिक एसिड और 12% ओलेक एसिड होता है, इसमें 21% पोलीअनसेचुरेटेड होता है, जिसमें से 6% ओमेगा-3 अल्फा-लिनोलेनिक एसिड और 15% ओमेगा -6 लिनोलेनिक एसिड होता है और 12% संतृप्त वसा होता है।[1]

केनोला (रेपसीड) और शलजम समेत ब्रैसिका परिवार के सभी बीज की ही तरह सरसों के बीज में भी ओमेगा-3 (6-11%) का उच्च स्तर होता है और एक आम, सस्ता, पौधा आधारित ओमेगा-3 फैटी एसिड (नीचे दिए गए लिंक में इंडो-मेडिटैरियन आहार को देंखे) बड़े पैमाने पर उत्पादन स्रोत हैं (इसलिए शाकाहारी). सन (अलसी) तेल में पौधा-आधारित 55% ओमेगा-3 होता है लेकिन एक टेबल या खाना पकाने के तेल के रूप में असामान्य है। सोयाबीन तेल में 6% ओमेगा-3 होता है, लेकिन 50% ओमेगा-6 से भी अधिक फैटी एसिड शामिल होता है जो ओमेगा-3 के गुणों के साथ बराबरी करता है। रेपसीड और सरसों के तेल के अलावा, पश्चिमी और भारतीय भोजन में पौधा-आधारित ओमेगा-3 के कुछ अन्य सामान्य स्रोत हैं। खासकर जब ओमेगा-6 का सेवन कम रखा जाता है, मनुष्य एक सीमित मात्रा में ओमेगा-3 पौधों को फिश ओमेगा-3, इकोसेपेनटेनोएक एसिड में परिवर्तित कर सकता है जो कि शाकाहारियों के लिए उपयोगी-स्त्रोत होता है।

भारत में, सरसों के तेल को खाना पकाने से पहले जलने तक गरम किया जाता है; ऐसा गंध को कम करने और स्वाद को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। बहरहाल, अधिक देर तक गरम होने के परिणामस्वरूप तेल में ओमेगा-3 समाप्त हो जाता है और स्वास्थ्य में इसकी अद्वितीय भूमिका कम हो जाती है। पश्चिमी देशों में, अक्सर इसकी बिक्री भारतीय आप्रवासियों के निमित्त दुकानों में "केवल बाह्य इस्तेमाल के लिए" होती है, चूंकि उत्तर भारत में सरसों के तेल का प्रयोग रगड़ने और मालिश (आयुर्वेद को देंखे) के लिए भी किया जाता है, ऐसा माना जाता है कि इससे रक्त परिसंचरण, मांसपेशी विकास और त्वचा की बनावट में सुधार होता है; यह तेल जीवाणुरोधी भी होता है। कभी-कभी लैंगिक संसर्ग से पहले भी पुरूष अपने यौन शक्ति को बनाए रखने या अपने पौरूष को बढ़ाने के लिए पुरूष गुप्तांगों में इस तेल का इस्तेमाल करते हैं।[2]

स्वास्थ्य पर प्रभाव[संपादित करें]

मानव स्वास्थ्य पर खाद्य तेलों के इरूसिक एसिड के प्रभाव विवादास्पद रहे हैं। हालांकि मनुष्यों के स्वास्थ्य पर इसका अभी तक कोई नकारात्मक प्रभाव प्रलेखित नहीं है।[3] इरूसिक एसिड और ओलेक एसिड का चार बटे एक मिश्रण लोरेंजों तेल का निर्माण करता है; जो तंत्रिका जीव विज्ञान के एक दुर्लभ विकार एड्रेनोलिकोडिसट्रॉफी के लिए एक प्रयोगात्मक उपचार है।

सरसों के तेल में इरूसिक एसिड की अधिकता के कारण एक समय के लिए संयुक्त राज्य, कनाडा और यूरोपीय संध में मानव उपभोग के लिए इसे अनुपयुक्त माना जा रहा था। चूहों पर प्रारंभिक अध्ययन के कारण ऐसा माना जा रहा था। चूहों पर बाद के अध्ययन में पता चला कि वनस्पति वसा (चाहे उसमें इरूसिक एसिड हो या न हो) को वे पचाने में मनुष्य और सुअरों की अपेक्षा कम सक्षम होते हैं।[4][5][6] चैरिटन एट एल व अन्य ने बताया कि चूहों में: "इरुसिल-CoA के लिए इरुसिक एसिड का अकुशल सक्रियण और इरुसिक एसिड के लिए ट्राइग्लिसराइड लिपेज़ की न्यून स्तरीय गतिविधि और बीटाऑक्सिडेशन के एन्जाइम्स, शायद कार्डिएक लिपिड के संचयन और धारण में योगदान देते हैं।[7] इस प्रक्रिया को पूरी तरह समझने से पहले यह विश्वास किया जाने लगा कि इरूसिक एसिड और सरसों का तेल दोनों मनुष्य के लिए बेहद विषाक्त हैं।

महामारी विज्ञान के अध्ययन[कृपया उद्धरण जोड़ें] का सुझाव है कि, जिन क्षेत्रों में अभी भी पारम्परिक तरीके से सरसों का तेल प्रयोग किया जाता है, वहां सरसों का तेल हृदय रोगों के खिलाफ कुछ हद तक रक्षण कर सकता है। इस मायने में "पारंपरिक" का अर्थ यह है कि तेल का ताजा प्रयोग किया जाता हो और वनस्पति वसा, कुल केलोरिक सेवन का एक छोटा सा प्रतिशत हो. यह अभी भी अनिश्चित है कि यह प्रभाव रक्त प्लेटलेट्स को कम चिपचिपा बनाने के लिए इरूसिक एसिड की स्वतः प्रकृति के कारण है या α-लिनोलेनिक एसिड के यथोचित उच्च प्रतिशत की उपस्थिति के कारण, या ताज़े अपरिष्कृत तेल के गुणों के एक संयोजन के कारण. तिरछी परिणामों के अन्य कारणों से हुए प्रारम्भिक मौतों की संभावना को शामिल न करने के क्रम में वैसे महामारी विज्ञान अध्ययन में सावधानी बरतने की जरूरत है। यह तथ्य कि प्रारम्भिक स्पर्शोन्मुख कोरोनरी रोग को पोस्ट मोर्टेम में आसानी से पता लगाया जा सकता है और सरसों के तेल में यह अनुपस्थित होता है जो इस अवधारणा को मजबूत करता है कि सरसों का तेल सुरक्षात्मक होता है।[8]

ऐसी पहचान की गई है कि पारंपरिक समाजों में शिशु की मालिश के लिए सरसों के तेल का उपयोग त्वचा की अखंडता और पारगम्यता को नुकसान पहुंचाता है।

पानी के साथ बीज के मिश्रण से बना सरसों का तेल[संपादित करें]

मसाला सरसों का तीखापन तब फलित होता है जब पिसे सरसों के बीज को पानी, सिरका, या अन्य तरल पदार्थो के साथ मिश्रित किया जाता है (या जब उसे चबाया जाता है). इन हालातों के तहत, एंजाइम मिरोसिनेज और एक ग्लुकोसिनोलेट के बीच एक रासायनिक अभिक्रिया होती है जिसे काले सरसों (ब्रेसिका निग्रा) के बीज से सिनिग्रीन के रूप में जाना जाता है या भारतीय भूरे सरसों (ब्रेसिका जुन्सिया) एलिल आइसोथियोसाइनेट का उत्पादन करते हैं। आसवन के द्वारा एक अत्यंत तीखे स्वाद वाले गंध तेल का उत्पादन किया जा सकता है, कभी-कभी इसे सरसों का उदवायी तेल भी कहा जाता है, जिसमें 92% से भी अधिक एलिल आइसोथियोसाइनेट शामिल होता है। न्यूरॉन्स संवेदी में आयन चैनल TRPA1 के सक्रियण के कारण एलिल आइसोथियोसाइनेट में तीखापन होता है। सफेद सरसों (ब्रेसिका हिर्टा), एलिल आइसोथियोसाइनेट का उपज नहीं करता है लेकिन एक अलग और मामूली आइसोथियोसाइनेट का उपज करता है।[9]

एलिल आइसोथियोसाइनेट, शाकाहारी के खिलाफ प्रतिरोधक के रूप में एक पौधा के लिए कार्य करता है. चूंकि स्वयं यह पौधे के लिए ही हानिकारक है, इसे मिरोसिनेज एंजाइम से अलग ग्लुकोसिनोलेट के एक हानिरहित रूप में रखा जाता है। शाकभक्षी जैसे ही पौधे को चबाता है, हानिकारक एलिल आइसोथियोसाइनेट का उत्पादन होता है। एलिल आइसोथियोसाइनेट, सहिजन और वासबी के तीखे स्वाद के लिए जिम्मेदार होता है। इसका उत्पादन कृत्रिम रूप से किया जा सकता है, कभी-कभी इसे सिंथेटिक मस्टर्ड ऑएल के रूप में भी जाना जाता है।

सम्मिलित एलिल आइसोथियोसाइनेट की वजह से ऐसा होता है, इस प्रकार के सरसों के तेल विषैले होते हैं और श्लेष्म झिल्ली और त्वचा को परेशान करते हैं। बहुत छोटी मात्रा में, अक्सर इसका इस्तेमाल खाद्य उद्योग द्वारा स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। उत्तरी इटली में, उदाहरण के लिए, फल मसाले में इसका इस्तेमाल किया जाता है जिसे मोस्टराडा कहा जाता है।

बिल्लियों और कुत्तों को विकर्षित करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। यह अल्कोहल को भी अप्राकृतिक कर देता है और इसे इंसानों के लिए सेवन के अयोग्य कर देता है, इसीलिए अल्कोहल पेय पर करों के संग्रह से परहेज किया जाता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

इस प्रकार के सरसों के तेल की सीएएस संख्या 8007-40-7 है और शुद्ध एलिल आइसोथियोसाइनेट का कैस संख्या 57-06-7 है।

उत्तर भारतीय सांस्कृतिक गतिविधियों में सरसों के तेल का प्रयोग[संपादित करें]

एक समय था जब उत्तर भारत में खाना पकाने के लिए सरसों का तेल काफी लोकप्रिय था। 20वीं सदी के मध्य के बाद से वनस्पति तेलों की बड़े पैमाने पर उपलब्धता के कारण सरसों के तेल की लोकप्रियता में थोड़ी गिरावट आई. यह अभी भी जटिल रूप से संस्कृति में समाहित है, इसका इस्तेमाल इन संदर्भों में किया जाता है:

  • जब पहली बार कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति घर में आता है तब प्रवेशद्वार के दोनों किनारों में इसका प्रयोग किया जाता है (उदाहरण के लिए, एक नव विवाहित जोड़े या बेटा या बेटी जब एक लंबी अनुपस्थिति के बाद घर आते हैं, या परीक्षा या किसी चुनाव में सफलता प्राप्त करने के बाद)
  • पंजाबी शादियों में पारम्परिक जग्गो बर्तन ईंधन में इस्तेमाल किया जाता है।
  • घर में बनाए जाने वाले सौंदर्य प्रसाधन के हिस्से के रूप में मेइयान के दौरान प्रयोग किया जाता है।
  • दीपावली जैसे उत्सवों पर मिट्टी के दीये जलाने के लिए ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  • बालों में प्रयोग किया जाता है। बालों के लिए अत्यंत फायदेमंद माना जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. एंट्री फॉर मस्टर्ड ऑएल इन द यूएसडीए नेशनल न्यूट्रिएंट डाटाबेस फॉर स्टैंडर्ड रेफ्रेंस, रिलीज़ 22
  2. http://www.popcouncil.org/pdfs/ebert/culturenorms.pdf
  3. फुड स्टैंडर्ड ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड (जून 2003) इरूसिक एसिड इन फुड : ए टॉक्सिलॉजिकल रिव्यू एंड रिस्क एसेसमेंट तकनीकी रिपोर्ट श्रृंखला नं 21; पेज 4 पैराग्राफ 1 : ISBN 0-642-34526-0, ISSN 1448-3017
  4. Hulan HW, Kramer JK, Mahadevan S, Sauer FD (1976). "Relationship between erucic acid and myocardial changes in male rats". Lipids. 11 (1): 9–15. PMID 1250074. डीओआइ:10.1007/BF02532578. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  5. Kramer JK, Farnworth ER, Thompson BK, Corner AH, Trenholm HL (1982). "Reduction of myocardial necrosis in male albino rats by manipulation of dietary fatty acid levels". Lipids. 17 (5): 372–82. PMID 7098776. डीओआइ:10.1007/BF02535197. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  6. de Wildt DJ, Speijers GJ (1984). "Influence of dietary rapeseed oil and erucic acid upon myocardial performance and hemodynamics in rats". Toxicol. Appl. Pharmacol. 74 (1): 99–108. PMID 6729825. डीओआइ:10.1016/0041-008X(84)90275-8. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  7. Charlton KM, Corner AH, Davey K, Kramer JK, Mahadevan S, Sauer FD (1975). "Cardiac lesions in rats fed rapeseed oils". Can. J. Comp. Med. 39 (3): 261–9. PMC 1277456. PMID 1170010. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  8. Rastogi T, Reddy KS, Vaz M; एवं अन्य (2004). "Diet and risk of ischemic heart disease in India". Am. J. Clin. Nutr. 79 (4): 582–92. PMID 15051601. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  9. "Mustard". A Guide to Medicinal and Aromatic Plants. Center for New Crops and Plant Products, Purdue University. अभिगमन तिथि 3 जनवरी 2009.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]