श्री लक्ष्मण किला

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

श्री लक्ष्मण किला भारत के अयोध्या में स्थित एक आश्रम है।[1] इसे श्री रामानन्द सम्प्रदाय की रसिकोपासना के आचार्यपीठ के रूप में जाना जाता है। मिथिला-भाव के प्राधान्य से श्रीसीताराम की उपासना और उसके माध्यम से आत्मोद्धार का मार्ग उपलब्ध कराना संस्था का मूल उद्देश्य है।

स्थापना[संपादित करें]

रसिकोपासना के अाचार्य, श्री लक्ष्मण किला के संस्थापक

आश्रम की स्थापना तत्कालीन रीवा राज्य के दीवान दीनबन्धु पाण्डेय जी के द्वारा करायी गयी। रीवा नरेश विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके पुत्र रघुराज प्रताप सिंह स्वामी श्रीयुगलानन्य शरण के भक्त थे। ऐकान्तिक साधना में रत रहने वाले स्वामी जी महाराज ने मंदिर निर्माण की उनकी प्रार्थना स्वीकार न की तो राज्य के दीवान ने अपने विशेष आग्रह से इसकी अनुमति प्राप्त की। ईस्वी सन् १८६५ में आरंभ होकर १८६८ में सरयू-तट पर भव्य मंदिर निर्मित हुआ जिसमें राम लक्ष्मण जानकी के साथ हनुमान विराजमान हुए। मंदिर बनाने के उपरान्त दीनबन्धु ने विराजमान सरकार के भोग राग के निमित्त अपनी जागीर से दो हजार बीघे की जमींदारी श्री लक्ष्मण किला को दान की। कुछ भौगोलिक परिवर्तनों के बावजूद रीवा जनपद में मनगवां के समीप रामपुर मौजे में आज भी ठाकुर जी की भूमि पर आश्रम के द्वारा कृषि-कार्य सम्पादित होता है।

संस्थापक आचार्य[संपादित करें]

श्री लक्ष्मण किला के संस्थापक रसिकोपासना के महान आचार्य युगलानन्य शरण है। स्वामी जी महाराज का प्रादुर्भाव ईस्वी सन १८१८ में नालन्दा (बिहार) के ईसराम पुर (इस्लामपुर) ग्राम में हुआ। सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे स्वामी जी का जीवन भगवदीय अलौकिकताओं से परिपूर्ण रहा। काशी में विद्याध्ययन के उपरान्त आपने श्री चित्रकूट धाम में निवास किया। आपने रसिकोपासना में तत्सुख सुखित्व के प्रवर्तक स्वामी श्री युगलप्रिया शरण जी महाराज 'जीवाराम जी ' जी से उपासना की दीक्षा प्राप्त की। आपके शिष्य पं॰ जानकीवर शरण जी महाराज से मिलकर स्वामी विवेकानन्द बहुत प्रभावित हुए।

सन्दर्भ[संपादित करें]