रीवा रियासत

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रीवा के महाराजा की हाथी की सवारी (१९०३ के दिल्ली दरबार के समय)

रीवा भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित एक रजवाड़ा था, जो वर्तमान रीवा शहर के आसपास बसा हुआ था। रीवा बघेल राजवंश की राजधानी थी। यहा बघेल राजपूतो के एक महान १ाासक थे बघेल( बाघेला एवं बाघेल), बघेल राजवंश भगवान श्री २ामचंद्र और उनके भाई लक्ष्मण का अनुयायी था, बघेल राजवंश के दरबा२ो मे हमेशा दो २ाजसिहासन होते थे पहला २ाज सिंहासन भगवान राम के लिए होता था और दूसरा वहाँ के राजा के लिए||| बघेल राजवंशीयो के कुल देवता भगवान राम के अनुज श्री लक्ष्मण देव है

जब गुजरात से सोलंकी राजपूत मध्य प्रदेश आयें तो इनके साथ कुछ परिहार राजपूत एवं कुछ मुस्लिम भी आये परन्तु कुछ समय पश्चत सोलांकी राजा व्याघ्र देव ने सोलांकी से बघेल तथा परिहार से वरग्राही(श्रेष्ठता को ग्रहण करने वाला) वंश की स्थापना की। बघेल वंश की स्थापना व्याघ्र देव ने की जिसके कारण इन्हें व्याघ्र देव वंशज भी कहा जाता है।

यहाँ के सबसे प्रभावशाली राजा रामचंन्द्र सिंह बघेल थे, यह सम्राट अकबर के बहुत घनिष्ठ मित्र थे इन्होंने ही अकबर को महान गायक तानसेन को भेंट में दिया था|| बघेल राजाओ का सबसे अधिक शासनकाल रीवा मे ही रहा था, इस क्षेत्र में बघेल २ाजपूतो की जनसंख्या सबसे अधिक है,इस समय रीवा के महाराज श्री पुष्पराज सिंह बघेल हैं

इन्हें अग्निकुल का वंशज माना जाता है।इतिहास में समुपलब्ध साक्ष्यों तथा भविष्यपुरांण में समुपवर्णित विवेचन कर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय बनारस के विद्वानों के द्वारा बतौर प्रमाण यजुर्वेदसंहिता, कौटिल्यार्थशास्त्र, श्रमद्भग्वद्गीता, मनुस्मृति, ऋकसंहिता पाणिनीय अष्टाध्यायी, याज्ञवल्क्यस्मृति, महाभारत, क्षत्रियवंशावली, श्रीमद्भागवत, भविष्यपुरांण, रीवा राजवंश का सेजरा, रीवा राज्य का इतिहास, बघेल खण्ड की स्थापत्यकला, अजीत फते नायक रायसा और बघेलखण्ड का आल्हा तथा वरगाहितिप्राप्तोपाधिकानॉ परिहरवंशीक्षत्रियॉणॉ वंशकीर्तनम् नामक पुस्तक में बघेल (बाघेला,सोलांकी) तथा वरग्राही जिसे बघेली बोली में वरगाही ( बरगाही, परिहार) वंश का वर्णन किया गया है।।।