शीतयुद्ध की उत्पत्ति

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
नाटो तथा वार्सा संधि के देश

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने कंधे से कन्धा मिलाकर धूरी राष्ट्रों- जर्मनी, इटली और जापान के विरूद्ध संघर्ष किया था। किन्तु युद्ध समाप्त होते ही, एक ओर ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका तथा दूसरी ओर सोवियत संघ में तीव्र मतभेद उत्पन्न होने लगा। बहुत जल्द ही इन मतभेदों ने तनाव की भयंकर स्थिति उत्पन्न कर दी।

शीतयुद्ध के लक्षण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही प्रकट होने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने-अपने संकीर्ण स्वार्थों को ही ध्यान में रखकर युद्ध लड़ रही थी और परस्पर सहयोग की भावना का दिखावा कर रही थी। जो सहयोग की भावना युद्ध के दौरान दिखाई दे रही थी, वह युद्ध के बाद समाप्त होने लगी थी और शीतयुद्ध के लक्षण स्पष्ट तौर पर उभरने लग गए थे, दोनों गुटों में ही एक दूसरे की शिकायत करने की भावना बलवती हो गई थी। इन शिकायतों के कुछ सुदृढ़ आधार थे।

रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी देश दो खेमों में बँट गये। इन दोनों पक्षों में आपसी टकराहट आमने सामने कभी नहीं हुई, पर ये दोनों गुट इस प्रकार का वातावरण बनाते रहे कि युद्ध का खतरा सदा सामने दिखाई पड़ता रहता था। बर्लिन संकट, कोरिया युद्ध, सोवियत रूस द्वारा आणविक परीक्षण, सैनिक संगठन, हिन्द चीन की समस्या, यू-2 विमान काण्ड, क्यूबा मिसाइल संकट कुछ ऐसी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने शीतयुद्ध की अग्नि को प्रज्वलित किया। सन् 1991 में सोवियत रूस के विघटन से उसकी शक्ति कम हो गयी और शीतयुद्ध की समाप्ति हो गयी।

शीतयुद्ध की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

अनुक्रम

सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना[संपादित करें]

याल्टा सम्मेलन 1945 में रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन के बीच में हुआ था, इस सम्मेलन में पोलैंड में प्रतिनिधि शासन व्यवस्था को मान्यता देने की बात पर सहमति हुई थी। लेकिन युद्ध की समाप्ति के समय स्टालिन ने वायदे से मुकरते हुए वहां पर अपनी लुबनिन सरकार को ही सहायता देना शुरू कर दिया। उसने वहां पर अमेरिका तथा ब्रिटेन के पर्यवेक्षकों को प्रवेश की अनुमति देने से इंकार कर दिया और पोलैंड की जनवादी नेताओं को गिरफ्तार करना आरम्भ कर दिया। उसने समझौते की शर्तों के विपरीत हंगरी, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया तथा बुल्गारिया में भी अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया, उसने धुरी शक्तियों के विरुद्ध पश्चिमी राष्ट्रों की मदद करने में भी हिचकिचाहट दिखाई। उसने चीन के साम्यवादी दल को भी अप्रत्यक्ष रूप से सहायता पहुंचाने का प्रयास किया। उसने मंचूरिया संकट के समय अपना समझौता विरोधी रुख प्रकट किया। इस तरह याल्टा समझौते के विपरीत कार्य करके सोवियत संघ ने आपसी अविश्वास व वैमनस्य की भावना को ही जन्म दिया जो आगे चलकर शीत युद्ध का आधार बनी।

सोवियत संघ और अमेरिका के वैचारिक मतभेद[संपादित करें]

युद्ध के समय ही इन दोनों महाशक्तियों में वैचारिक मतभेद उभरने लगे थे। सोवियत संघ, साम्यवाद को बढ़ावा देना चाहता था जबकि अमेरिका पूंजीवाद का प्रबल समर्थक था। सोवियत संघ ने समाजवादी आन्दोलनों को बढ़ावा देने की जो नीति अपनाई उसने अमेरिका के मन में अविश्वास की भावना को जन्म दे दिया। सोवियत संघ ने अपनी इस नीति को न्यायपूर्ण और आवश्यक बताया। इससे पूंजीवाद को गहरा आघात पहुंचाया और अनेक पूंजीवादी राष्ट्र अमेरिका के पक्ष में होकर सोवियत संघ की समाजवादी नीतियों की निंदा करने लगे। इस प्रकार पूंजीवाद बनाम समाजवादी विचारधारा में तालमेल के अभाव के कारण दोनों महाशक्तियों के बीच शीतयुद्ध का जन्म हुआ।

सोवियत संघ का एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरना[संपादित करें]

सोवियत संघ ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही अपने राष्ट्रीय हितों में वृद्धि करने के लिए प्रयास शुरू कर दिये थे। 1917 की समाजवादी क्रान्ति का प्रभाव दूसरे राष्ट्रों पर भी पड़ने की सम्भावना बढ़ गई थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान उसके शक्ति प्रदर्शन ने पश्चिमी राष्ट्रों के मन में ईर्ष्या की भावना पैदा कर दी थी और पश्चिमी शक्तियों को भय लगने लगा था कि सोवियत संघ इसी ताकत के बल पर पूरे विश्व में अपना साम्यवादी कार्यक्रम फैलाने का प्रयास करेगा। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तो वे चुप रहे लेकिन युद्ध के बाद उन्होंने सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति पर चिन्ता जताई। उन्होंने सोवियत संघ विरोधी नीतियां अमल में लानी शुरू कर दी। उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रों को सोवियत संघ के विरुद्ध एकजुट करने के प्रयास तेज कर दिए। इससे शीत-युद्ध को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक ही था।

ईरान में सोवियत हस्तक्षेप[संपादित करें]

सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद 6 महीने के अन्दर ही ईरान से अपनी सेनाएं वापिस बुलाने का समझौता किया था। युद्ध की समाप्ति पर पश्चिमी राष्ट्रों ने तो वायदे के मुताबिक दक्षिणी ईरान से अपनी सेनाएं हटाने का वायदा पूरा कर दिया लेकिन सोवियत संघ ने ऐसा नहीं किया। उसने ईरान पर दबाव बनाकर उसके साथ एक दीर्घकालीन तेल समझौता कर लिया। इससे पश्चिमी राष्ट्रों के मन में द्वेष की भावना पैदा हो गई। बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव पर ही उसने उत्तरी ईरान से सेनाएं हटाई। सोवियत संघ की इस समझौता विरोधी नीति ने शीत युद्ध को जन्म दिया।

टर्की में सोवियत हस्तक्षेप[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने टर्की में अपना दबाव बनाना आरम्भ कर दिया। उसने टर्की पर कुछ प्रदेश और वास्फोरस में एक सैनिक अड्डा बनाने के लिए दबाव डाला। अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी राष्ट्र इसके विरुद्ध थे। इस दौरान अमेरिका ने ट्रूमैन सिद्धान्त (Truman Theory) का प्रतिपादन करके टर्की को हर सम्भव सहायता देने का प्रयास किया ताकि वहां पर साम्यवादी प्रभाव को कम किया जा सके। इन परस्पर विरोधी कार्यवाहियों ने शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

यूनान में साम्यवादी प्रसार[संपादित करें]

1944 के समझौते के तहत यूनान पर ब्रिटेन का अधिकार उचित ठहराया गया था। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन ने अपने आर्थिक विकास के दृष्टिगत वहां से अपने सैनिक ठिकाने वापिस हटा लिये। सोवियत संघ ने यूनान में गृहयुद्ध छिड़ने पर वहां के साम्यवादियों मी मदद करनी शुरू कर दी। पश्चिमी शक्तियों परम्परागत सरकार का समर्थन करने के लिए आगे आई। अमेरिका ने मार्शल योजना और ट्रूमैन सिद्वान्त के तहत यूनान में अपनी पूरी ताकत लगा दी। इससे साम्यवादी कार्यक्रम को यूनान में गहरा धक्का लगा और सोवियत संघ का सपना चकनाचूर हो गया अतः इस वातावरण में शीतयुद्ध को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक ही था।

द्वितीय मोर्चे सम्बन्धी विवाद[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर के नेतृत्व में जब जर्मन सेनाएं तेजी से सोवियत संघ की तरफ बढ़ रही थी तो सोवियत संघ ने अपनी भारी जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए पश्चिमी राष्ट्रों से सहायता की मांग की। सोवियत संघ ने कहा कि पश्चिमी शक्तियों को जर्मनी का वेग कम करने के लिए सोवियत संघ में जल्दी ही दूसरा मोर्चा खोला चाहिए ताकि रूसी सेना पर जर्मनी का दबाव कम हो सके। लेकिन पश्चिमी शक्तियों ने जान बूझकर दूसरा मोर्चा खोलने में बहुत देर की। इससे जर्मन सेनाओं को रूस में भयानक तबाही करने का मौका मिल गया। इससे सोवियत संघ के मन पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध नफरत की भावना पैदा हो गई जो आगे चलकर शीत-युद्ध के रूप में प्रकट हुई।

तुष्टिकरण की नीति[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों ने धुरी शक्तियों (जापान, जर्मनीइटली) के आक्रमणों के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों की रक्षा करने की बजाय तुष्टिकरण की नीति अपनाई। उन्होंने जानबूझकर अपने मित्र राष्ट्रों को सहायता नहीं पहुंचाई और अपने मित्र राष्ट्रों को धुरी शक्तियों के हाथों पराजित और अपने मित्र राष्ट्रों को धुरी शक्तियों के हाथों पराजित होने देने के लिए बाध्य किया। इससे युद्ध पूर्व किए गए सन्धियों व समझौतों के प्रति अनेक मन में अविश्वास की भावना पैदा हुई जिससे आगे चलकर शीत युद्ध के रूप में परिणति हुई।

सोवियत संघ द्वारा बाल्कान समझौते की उपेक्षा[संपादित करें]

बाल्कान समझौते के तहत 1944 में पूर्वी यूरोप का विभाजन करने पर सोवियत संघ तथा ब्रिटेन में सहमति हुई थी। इसके तहत बुल्गारिया तथा रूमानिया पर सोवियत संघ का तथा यूनान पर ब्रिटेन का प्रभाव स्वीकार करने पर सहमति हुई थी। हंगरी तथा यूगोस्लाविया में दोनों का बराबर प्रभाव मानने की बात कही गई थी। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सोवियत संघ ने ब्रिटेन के प्रभाव की अपेक्षा करके अपने साम्यवादी प्रसार को तेज कर दिया और उन देशों में साम्यवादी सरकारों की स्थापना करा दी। इससे पश्चिमी राष्ट्रों ने गैर-समझौतावादी कार्य कहा। इससे सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों में दूरियां बढ़ने लगी और शीत युद्ध का वातावरण तैयार हो गया।

अमेरिका का परमाणु कार्यक्रम[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने गुप्त तरीके से अपना परमाणु कार्यक्रम विकसित किया और सोवियत संघ की सहमति के बिना ही उसने जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिरा दिए। अमेरिका ने अपनी युद्ध तकनीक की जानकारी सोवियत संघ को न देकर एक अविश्वास की भावना को जन्म दिया। इससे सोवियत संघ व पश्चिमी शक्तियों के बीच सहयोग के कार्यक्रमों को गहरा आघात पहुंचा। सोवियत संघ अमेरिका के परमाणु कार्यक्रम पर एकाधिकार को सहन नहीं कर सकता था। इससे उसके मन में यह शंका पैदा हो गई कि पश्चिमी राष्ट्रों को उससे घृणा है। इसी भावना ने शीतयुद्ध को जन्म दिया।

परस्पर विरोधी प्रचार[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दोनों महाशक्तियों एक दूसरे के खिलाफ प्रचार अभियान में जुट गई। 1946 में सोवियत रूस ने ‘कैनेडियन रॉयल कमीशन’ की रिपोर्ट में कहा कि कनाडा का साम्यवादी दल ‘सोवियत संघ की एक भुजा’ है। इससे सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में सोवियत संघ के साम्यवादी प्रचार की जोरदार निन्दा हुई। इससे सोवियत संघ भी सतर्क हो गया और उसने अमेरिका की जोरदार आलोचना करना शुरू कर दिया, मुनरो सिद्धान्त इसका स्पष्ट उदाहरण है जिसमें साम्यवादी ताकतों को पश्चिमी गोलार्द्ध में अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रति सचेत रहने को कहा गया। इसी तरह ट्रूमैन सिद्धान्त तथा अमेरिकन सीनेट द्वारा खुले रूप में सोवियत विदेश नीति की आलोचना की जाने लगी। इसके बाद सोवियत संघ ने अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी राष्ट्रों के विरुद्ध साम्यवादी ताकतों को इकट्ठा करने के लिए जोरदार प्रचार अभियान चलाया। इस प्रचार अभियान ने परस्पर वैमनस्य की शंका की भावना को जन्म दिया जो आगे चलकर शीतयुद्ध के रूप में दुनिया के सामने आया।

लैंड-लीज समझौते का समापन[संपादित करें]

द्वितीय विश्व के दौरान अमेरिका तथा सोवियत संघ में जो समझौता हुआ था उसके तहत सोवियत संघ को जो, अपर्याप्त सहायता मिल रही थी, पर भी अमेरिका ने किसी पूर्व सूचना के बिना ही बन्द कर दी। इस निर्णय से सोवियत संघ का नाराज होना स्वाभाविक ही था। सोवियत संघ ने इसे अमेरिका की सोची समझी चाल मानकर उसके विरुद्ध अपना रवैया कड़ा कर दिया। इससे दोनो महाशक्तियों में आपसी अविश्वास की भावना अधिक बलवती हुई और इससे शीतयुद्ध का वातावरण तैयार हो गया।

फासीवादी ताकतों को अमेरिकी सहयोग[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही अमरिका तथा अन्य पश्चिमी देश इटली से अपने सम्बन्ध बढ़ाने के प्रयास करने लग गए। इससे सोवियत संघ को शक हुआ कि इटली में फासीवाद को बढ़ावा देने तथा साम्यवाद को कमजोर करने में इन्हीं ताकतों का हाथ है। इससे सोवियत संघ को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में अपनी भूमिका सिमटती नजर आई। इस सोच ने दोनों के मध्य दूरियां बढ़ा दी।

बर्लिन विवाद[संपादित करें]

बर्लिन संकट (१९६१) के समय संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत रूस के टैंक आमने सामने

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही सोवियत संघ का पूर्वी बर्लिन पर तथा अमेरिका तथा ब्रिटेन का पश्चिमी बर्लिन पर अधिकार हो गया था। युद्ध के बाद पश्चिमी ताकतों ने अपने क्षेत्राधीन बर्लिन प्रदेश में नई मुद्रा का प्रचलन शुरू करने का फैसला किया। इस फैसलें के विरुद्ध जून 1948 में बर्लिन की नाकेबन्दी सोवियत संघ ने कर दी। इसके परिणामस्वरूप सोवियत संघ व अमेरिका या ब्रिटेन के बीच हुए प्रोटोकोल का उल्लंघन हो गया। इसके लिए सोवियत संघ को पूर्ण रूप से दोषी माना गया। सोवियत संघ अपना दोष स्वीकार करने को तैयार नहीं था। इससे मामला सुरक्षा परिषद् में पहुंच गया और दोनों महाशक्तियों के मध्य शीतयुद्ध के बादल मंडराने लग गए।

सोवियत संघ द्वारा वीटो पावर का बार-बार प्रयोग किया जाना[संपादित करें]

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। इस संस्था में पांच देशों को वीटो पावर प्राप्त हुई। सोवियत संघ ने बार-बार अपनी इस शक्ति का प्रयोग करके पश्चिमी राष्ट्रों के प्रत्येक सुझाव को मानने से इंकार कर दिया, इस तरह अमेरिका तथा पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में लाए गए प्रत्येक प्रस्ताव को हार का सामना करना पड़ा। इससे अमेरिका तथा पश्चिमी राष्ट्र सोवियत संघ की आलोचना करने लगे और उनसे परस्पर तनाव का माहौल पैदा हो गया जिसने शीत युद्ध को जन्म दिया।

संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित संकीर्ण राष्ट्रीय हित[संपादित करें]

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका तथा सोवियत संघ अपने अपने स्वार्थों को साधने में लग गए। वे लगातार एक दूसरे के हितों की अनदेखी करते रहे। इससे शक्ति राजनीति का जन्म हुआ। इससे प्रत्येक राष्ट्र एक दूसरे का शत्रु बन गया। दोनों महाशक्तियां अपना अपना प्रभुत्व बढ़ाने के प्रयास में अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का अखाड़ा बन गई। उनके स्वार्थमयी हितों ने धीरे धीरे पूरे विश्व में तनाव का वातावरण पैदा कर दिया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]