वार्ता:प्लेट विवर्तनिकी

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यह पृष्ठ प्लेट विवर्तनिकी लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें।

लेखन संबंधी नीतियाँ

प्लेट के लिये "तख्ता" शब्द के प्रयोग के संबंध में[संपादित करें]

इस पृष्ठ पर और अन्य कई पृष्ठों पर भी प्लेट (Plate) के लिए तख्ता शब्द का इस्तेमाल हुआ है। मेरे विचार में हमें इसे देवनागरी लिपि में प्लेट ही लिखना चाहिये। कारण कि यह शब्द अब हिंदी में भी उतना ही प्रचलित है और मैंने अपनी जानकारी में हमेशा हिंदी की किताबों में भी प्लेट शब्द का प्रचलन ही देखा है। सदस्यों की राय जानना चाहता हूँ। धन्यवाद ! --सत्यम् मिश्र (वार्ता) 08:02, 27 जून 2014 (UTC)

शब्दावली आयोग के अनुसार इस पृष्ठ का नाम भी "प्लेट विवर्तनिकी" के स्थान पर प्लेट विवर्तिनिकी होना चाहिए जिसे अनुनाद जी ने परिवर्तित किया था। इसके अतिरिक्त "तख़्ता" शब्दों का प्रयोग Hunnjazal जी ने किया है जो अभी लम्बे अवकाश पर हैं। मुझे जहाँ तक याद है इसके स्थान पर हिन्दी में पटल अथवा परत जैसा शब्द काम में लिया जाता है।☆★संजीव कुमार (✉✉) 09:09, 27 जून 2014 (UTC)
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा Plate के लिये 'प्लेट' और 'पट्टिका' दिया है। मेरे विचार से दोनों का प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु 'तख्ता' इस सन्दर्भ में भद्दा लगता है।---- अनुनाद सिंहवार्ता 09:36, 27 जून 2014 (UTC)
मैं अनुनाद जी के सुझाव से सहमत हूँ। साथ ही मैं मानता हूँ कि यदि प्लेट शब्द प्रयोग किया जाता है तो बहुवचन में प्लेट्स प्रयोग होना चाहिए, प्लेटें या प्लेटों नहीं। मेरे विचार से अंग्रेजी से आयातित शब्दों को यदि इस प्रकार प्रयोग किया जाए तो उन्हें हिंदी में आसानी से ढाला जा सकता है। हालाँकि प्लेट शब्द बहुत कॉमन है और प्लेटें/प्लेटों में कोई हर्ज़ भी नहीं है लेकिन बहुत से ऐसे आयातित शब्द हैं जिन्हें इस तर्ज़ पर हिन्दी में नहीं ढाला जा सकता। एसे में बहुवचन का भी अंग्रेजी रूप प्रयोग करना बहुत सुगम है। --मनोज खुराना वार्ता 11:34, 27 जून 2014 (UTC)
यहाँ मैं तीन उद्धरण दे रहा हूँ पहला NCERT की कक्षा सात की भूगोल की पुस्तक से है; दूसरा प्रतिष्ठित TMH प्रकाशन द्वारा छपी और डी॰ आर॰ खुल्लर द्वारा लिखित है जो स्नातक स्तर के बाद की प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु है; और तीसरा प्रो॰ माजिद हुसैन जी की पुस्तक से है जो स्नातक से ऊपर के स्तर की परीक्षाओं हेतु है। इसके अलावा प्रो॰ सविन्द्र सिंह कि पुस्तक "भौतिक भूगोल" (आनलाइन स्रोत उपलब्ध नहीं) जो पूरे भारत में ८० के दशक से स्नातक और परास्नातक स्तर पर विद्यार्थी पढ़ते हैं भी देख सकते हैं। इन सर्वाधिक प्रचलित पुस्तकों में प्लेट, प्लेटें, प्लेटों का प्रयोग मिलेगा। शब्दकोष में कुछ और भी हों पर वह प्रचलन में नहीं है। हिंदी में भूगोल पढ़ने वालों में इन शब्दों की व्यापकता का अनुमान उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है।..... दूसरी बात, तख्ता/तख्ती उर्दू विकी पर मिला मुझे और कहीं नही.... तीसरे मुझे 'प्लेट्स' के प्रयोग पर कोई आपत्ति नहीं है, प्लेटें/प्लेटों की तरह वह भी अब हिंदी में ढल चुका है। लेकिन जबरदस्ती का अनूदित शब्द पटल, पट्टिका, पट्ट, परत का मैं विरोध करता हूँ। (मतलब मैं ऑब्जेक्ट कर रहा हूँ, ये नहीं कह रहा बदल ही दिया जाना चाहिये; उसमें मुझे जो तर्कपूर्ण बहुमत होगा मान्य होगा!)। मुझे चुनना हो तो मैं प्लेट को पूरी तरह हिंदी में ढल चुका शब्द मान कर उसमें हिंदी के ही प्रत्यय लगाऊंगा। यही बात मैं विवर्तिनिकी के लिये भी कहूँगा, अगर हम उसे प्रयोग करें तो शायद यह उस कोश में मिलेगा और हमारी विकिपीडिया पर... अन्यत्र कहीं नहीं... भले ही वह कोश और व्याकरण सम्मत हो( वैसे विवर्तनिकी में कोई व्याकरणीय भूल मुझे नहीं दीख रही)। -- सत्यम् मिश्र (वार्ता) 00:16, 28 जून 2014 (UTC)
सत्यम् मिश्र जी, मैं आपकी कुछ बातों से सहमत नहीं हूँ। विशेष रूप से मैं इस समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि यहाँ हमें वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा निर्धारित शब्दावली पर आवश्यकता से अधिक बहस नहीं करनी चाहिये। (उनकी संस्कृतनिष्ठता/कठिनता/अप्रचलित होना या कुछ और कहकर)। कारण यह है कि इस तरह की बहस का कोई अन्त नहीं है। कोई किसी शब्द का पक्षधर होगा कोई किसी अन्य शब्द का। जबकि सच्चाई यह है कि हममें से अधिकांश लोग शब्दावली निर्माण का क ख ग नहीं जानते हैं जबकि शब्दावली आयोग की उसी क्षेत्र में विशेषज्ञता है। और अन्तिम बात यह कि इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का एक महत्वपूर्ण निर्णय है जिसमें सीबीएससी (या, एन सी ई आर टी ?) को आदेश दिया गया है कि वह शब्दावली आयोग द्वारा निर्धारित शब्दावली का ही उपयोग करे।---- अनुनाद सिंहवार्ता 07:52, 16 जुलाई 2014 (UTC)
@अनुनाद सिंह: जी नमस्कार ! आपने ऊपर लिखा तो है कि 'प्लेट' और 'पट्टिका' दोनों शब्दावली आयोग द्वारा सुझावित हैं और किसी का प्रयोग किया जा सकता है। आप असहमत किस बात पर हैं? मैंने अभी देखा भी वहाँ "प्लेट विविर्तनिकी" लिखा है। वो खुद ही विरोधाभासी है... वहाँ, "पट्टिका विविर्तनिकी" नहीं लिखा है लेकिन "पट्टिका" और "आधार" लिखा है। मतलब मैं 'पट्टिका विविर्तनिकी' लिख दूँ तो यह सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ हो जाएगा? और ये उच्चतम न्यायालय के आदेश का क्या मतलब है? कोर्ट-कचहरी कहाँ से ले आये आप बीच में! पहली बार सरकारी विशेषज्ञों ने सरकारी शब्दकोष में रेल के लिये लौहपथगामिनी लिक्खा था (ये चुटकुला नहीं है, बस मैं फिलहाल संदर्भ नहीं दे सकता)। प्लेट के लिये मैं संदर्भ भी दे रहा हूँ और तार्किक रूप से सोचने की गुजारिश भी कर रहा हूँ, फिर भी लोग अपनी-अपनी बात पे अड़े हैं। क्या करना चाहिये मुझे यही बताएँ आप लोग! --सत्यम् मिश्र (वार्ता) 09:03, 16 जुलाई 2014 (UTC)
@सत्यम् मिश्र: जी, नमस्ते। पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं आपके किस विचार से असहमत था। ऊपर आप लिखते हैं- यही बात मैं विवर्तिनिकी के लिये भी कहूँगा, अगर हम उसे प्रयोग करें तो शायद यह उस कोश में मिलेगा और हमारी विकिपीडिया पर... अन्यत्र कहीं नहीं : इस बारे में मैं यह कहूँगा कि लगभग सारी पारिभाषिक शब्दावली ही 'बनावटी' है। केवल हिन्दी ही नहीं, अंग्रेजी सहित सभी भाषाओं की। हर पारिभाषिक शब्द कभी-न-कभी 'पहली बार' प्रयोग होता है। केवल प्रचलित शब्दों में से शब्दावली बनानी होती तो अंग्रेजी में कई लाख शब्द कैसे आ गये? 'सिम्पल इंगलिश' के समर्थकों का तो दावा है कि एक हजार से भी कम शब्दों से ही 'सारा काम' चलाया जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि छोटे-से-छोटे विषय की भी अकेले की पारिभाषिक शब्दावली एक हजार शब्दों से बहुत बड़ी होती है। दूसरी बात यह कि पारिभाषिक शब्दावली सबके उपयोग और समझने के लिये होती ही नहीं और न सबके उपयोग के ध्येय से बनायी जाती है। जीवविज्ञान की शब्दावली राजनयिक को समझ न आना और कानून की शब्दावली गणितज्ञ को समझ में न आना कोई अचरज वाली बात नहीं है। अब 'प्लेट' पर। आयोग ने 'प्लेट' और 'पट्टिका' दोनों सुझाये हैं। इसलिये दोनों में से कोई एक या दोनों का प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु थोडी देर के लिये मान लीजिये कि आयोग ने 'प्लेट' शब्द नहीं सुझाया होता। मेरी और आपकी बात में यहाँ असहमति होती। आप कहते कि 'प्लेट' आसान है, प्रचलित है। मैं कहता कि यह सब (और इससे बहुत अधिक सार्थक चर्चा) पहले ही आयोग के विशेषज्ञों द्वारा हो चुकी है। उसे मानकर आप आयोग द्वारा सुझाये 'पट्टिका' का प्रयोग कीजिये। अब बात 'लौहपथगामिनी' की। मेरी जहाँ तक जानकारी है यह 'शुद्ध मजाक के लिये गढ़ा गया' शब्द है। लेकिन इस शब्द को जितना 'कठिन' बताने की कोशिश की गयी है उससे भी अधिक आसान सिद्ध हुआ है- जो भी 'कुछ' जानता है वह यह शब्द अवश्य जानता है। इसके विपरीत अंग्रेजी के हजारों ऐसे पारिभाषिक शब्द हैं जिनका सही उच्चारण करना तक बहुत मुश्किल है। अन्त में 'उच्चतम न्यायालय' । कोर्ट-कचहरी मैं यहाँ इसलिये ले आया कि वहाँ भी इसी तरह की दलीलें दी गयीं होंगी कि आयोग की शब्दावली ये कठिन है वो अप्रचलित है, वो विचित्र है! किन्तु न्यायालय ने यही माना कि शब्दावली का मुद्दा सामान्य जनता के 'वोट' से नहीं तय होना चाहिये। ऐसा भी नहीं होना चाहिये कि जिसको जो अच्छा लगे वह वही शब्द प्रयोग करे। बल्कि उनको मानकीकरण की महत्ता समझ में आयी। वहाँ यह समझा गया कि जो 'आम जनता' सोचती है उससे अधिक 'विशेषज्ञ' सोचते हैं। संक्षेप में मैं यह कहना चाहता हूँ कि,
  • (१) यदि आयोग द्वारा सुझाया गया शब्द उपलब्ध हो तो अनिवार्यतः उसे/उन्हें ही प्रयोग में लाया जाय,
  • (२) जिसके लिये आयोग द्वारा सुझाया शब्द उपलब्ध न हो केवल उसके लिये सोचविचारकर या चर्चा से तय करके शब्द प्रयोग कर लिया जाय और आशा की जाय कि शीघ्र आयोग द्वारा निर्धारित शब्द आयेगा। आयोग का शब्द आने पर उसका उपयोग करने में न हिचका जाय।---- अनुनाद सिंहवार्ता 13:20, 16 जुलाई 2014 (UTC)
जी @अनुनाद सिंह: जी! मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि ऐसे विवादों का हल निकलना मुश्किल है, खासतौर से जब दो शब्द बराबर प्रचलित हों, कोश में दो या अधिक शब्द दिए हों। उपरोक्त बात जो आपने उद्धृत की है उसका मतलब नहीं कि मैं कोश के खिलाफ़ हूँ। लेकिन अगर कोश कोई ऐसा शब्द सुझाये जो प्रचलन में न हो (या उसकी वही वर्तनी न हो) जबकि वैकल्पिक शब्द बीस-तीस सालों से उसी कम्यूनिटी में प्रचलित हो जिसके लिये कोश बनाया गया है, तो ऐसी स्थिति में प्रचलित शब्द को कोश के ऊपर भी वरीयता मिलनी चाहिये अगर वह तर्क और संदर्भ दोनों पे खरा उतरता है। इस तरह के विवादों में क्या-क्या संभावनाएं और हो सकती हैं मैं अनुमान भी नहीं लगा सकता, परन्तु इस वार्ता के मुख्य विषय के प्रसंग में मैं न तो कोश के विरुद्ध हूँ, न प्रचलन के न, सन्दर्भों के। फिर भी मैंने बातचीत के रुक जाने के बाद काफ़ी इंतजार करने के बाद स्थानांतरण किया। उपरोक्त बातचीत में मुझे स्पष्ट रूप से किसी ने यह नहीं कहा कि आप "प्लेट" शब्द इस्तेमाल करो लेकिन फ़िर भी यदि पूरी चर्चा कोई पढ़े तो यही प्रतीत होगा कि मेरे प्रस्ताव को समर्थन ही मिला। u:Manojkhurana जी ने तो प्लेट्स तक के इस्तेमाल की अनुमति दे दी। फ़िर? क्या अपराध कर दिया अगर पन्ने स्थानांतरित कर दिया? --सत्यम् मिश्र (वार्ता) 14:11, 16 जुलाई 2014 (UTC)

हिन्दी में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों के बहुवचन[संपादित करें]

मेरा यह सन्देश मनोज खुराना जी के विचार

साथ ही मैं मानता हूँ कि यदि प्लेट शब्द प्रयोग किया जाता है तो बहुवचन में प्लेट्स प्रयोग होना चाहिए, प्लेटें या प्लेटों नहीं। के सम्बन्ध में है।

मानकीकरण करने वाले विशेषज्ञों ने ठीक इसके उल्टी राय दी है। उनका कहना है कि यदि आवश्यक होनें पर आप हिन्दी में 'ट्रेन' या 'प्लेट' शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका बहुवचन हिन्दी व्याकरण के हिसाब से बनाइये, अण्ग्रेजी व्याकरण के हिसाब से नहीं। अर्थात 'ट्रेनें' और 'प्लेटें' सही है, ट्रेन्स और प्लेट्स नहीं। (नम्बर कट जायेगा)---- अनुनाद सिंहवार्ता 13:42, 16 जुलाई 2014 (UTC)

अनुनाद जी, मैं आपसे असहमत नहीं हूँ। लेकिन यदि आप मेरा सदस्यपृष्ठ देखें तो मेरी व्यथा समझ पाएंगे। मेरा सुझाव पुरानी प्रथा पर आधारित नहीं है, यह एक नई प्रथा चलाने का आह्वान है। मेरा विचार है कि इस तरह से हम अंग्रेजी वर्ड्स (ना कि वर्डों) को अधिक से अधिक मात्रा में हिंदी में आत्मसात कर पाएंगे। हमें हिंदी की इस लचीलेपन की विशेषता का उपयोग नए आयाम जोड़ने में करना चाहिए, हिंदी को और से और समृद्ध करने में करना चाहिए। ट्रेनों , प्लेटों, बैंकों, डॉक्टरों आदि बहुप्रचलित शब्दों के लिए तो काम चल जाएगा लेकिन ट्वीटों, ब्लॉगों, को-ऑर्डिनेटों, की-बोर्डों, सॉफ्टवेयरों, पोर्टफोलियोओं आदि का क्या होगा ? हज़ारों हज़ार शब्द हैं अंग्रेजी के जो अभी हिंदी में आत्मसात करने हैं, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि तमाम उच्च शिक्षा के विषय अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं। यदि हम लचीलापन दिखाकर नए "एक्सपेरिमेंट्स" को मौका देंगे तो हिंदी आगे ही बढ़ेगी, यदि हम पुरानी हिंदी के पुराने स्वरूप को पकड़कर बैठे रहेंगे तो हिंदी आज जिस हाल में है उससे भी बुरी हालत में पहुँच जाएगी। कृपया मेरे सदस्यपृष्ठ पर हिंदी और अंग्रेजी की तुलना अवश्य देखें। अंत में, कृपया ध्यान दें यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं मैं किसी के भी इनसे सहमत या असहमत होने की आशा नहीं रखता। रही बात विशेषज्ञों की, तो भाषा के सबसे बड़े विशेषज्ञ आमजन होते हैं। भाषा वही जो विचारों का आदान प्रदान सुविधाजनक बनाए, जिसे आमजन स्वीकार करे। हिंदी और संस्कृत को ही देख लें। संस्कृत विशेषज्ञों की भाषा थी ना, कहाँ है आज वो ? यही हाल हिंदी का होने वाला है। कागभुषण्डी को अमरता का वरदान तो नहीं दे पाए लेकिन लंबी आयु का गुर सिखाते हुए ब्रह्मा ने कहा था- विनाश सदा किसी माध्यम से होगा। यदि तुम स्वयं को विनाश के माध्यम में ढाल लोगे तो बच जाओगे। आग से विनाश होगा तो तुम खुद आग बन जाना, बच जाओगे। पानी से विनाश होगा तो पानी बन जाना, बच जाओगे। अब जब हिंदी का विनाश अंग्रेजी से हो रहा है तो विनाश से बचने का एक ही उपाय है, अंग्रेजी में ढल जाना। --मनोज खुराना वार्ता 15:06, 16 जुलाई 2014 (UTC)
मनोज जी और अनुनाद जी! मैं क्षमा पहले माँग लेता हूँ... और है ये मुद्दे से विचलन ही... जिन्हें लगता है अंग्रेजी हिंदी का विनाश कर रही है उनसे यह भी पूछा जाना चाहिये की हिंदी किन-किन भाषाओँ का विनाश करके आज इस रूप में है! जिस खूबसूरती से यह क्लेम किया गया और किया जाता है कि राजस्थानी, मारवाड़ी, अवधी, मगही, मैथिली इत्यादि हिंदी की बोलियाँ हैं यह शुद्ध नाटक है जिसके द्वारा हिंदी को सबसे ज्यादा जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली भाषा स्थापित किया जासके और अब आज यह हो भी गई है; कितनी भाषाओँ की कब्र पे सोचा है? खैर! मुद्दे की बात करें तो पुरानी परम्परा देख लीजिए... हिंदी संस्कृत से निकली या नहीं यह विवाद किनारे कर के थोड़ी देर के लिये आज की हिंदी देख लीजिए। आपको ढेर सारे शब्द मिलेंगे जो फ़ारसी और अरबी इत्यादि के प्रत्ययों और उपसर्गों से निर्मित हैं। कागज का बहुवचन कागजों भी होता है और कागजात भी (मजेदार बात की कागजातों का प्रचलन भी है जिस पर वैयाकरणवृन्द खफ़ा होता है)। जाना होगा, खाना होगा जैसी क्रियाएँ(या क्रिया वाचक शब्द) संस्कृत के प्रत्ययों से नहीं बने हैं। "खाद् धातु" संस्कृत की है लेकिन "खाना होगा" रूप संस्कृत प्रत्यय से नहीं बन सकता। मैं मनोज जी से सहमत हूँ की अंग्रेजी के प्रत्यय (बहुवचन बनाने के लिए स् कार जोड़ना) का प्रयोग किया जा सकता है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है अगर ठीक से सम्भाला जाए। व्याकरण का काम है इसे संभालना, रोकना नहीं। हिंदी के पहले वैयाकरण पं किशोरीदास वाजपेयी जी ने अपनी पुस्तक का नाम रखा "हिंदी शब्दानुशासन" (पढ़ें आप लोग तो काफ़ी अच्छा लगेगा, बड़ी सरल भाषा में और मजेदार किताब है) यह कह कर कि व्याकरण अनु-शासन है...यानि धारा के पीछे से उस पर नियंत्रण रखता है ये नहीं की खुद आगे का रास्ता खोदने लगे... बस इतना नियंत्रण करता है कि धारा में बह रहा जल कई अलग-अलग ओर न छिटक जाए धारा बनी रहे। ऐसा नहीं कि संस्कृत मे पाणिनि के बाद परिवर्तन नहीं हुए, आज भी अष्टाध्यायी वरदराज के वार्तिकों के साथ पढ़ी जाती है जो सुधार थे मूल नियमों में क्योकि समय बीतने के साथ प्रचलन बदल गया। कोशकार और प्रचलन के बीच पूर्ण सहमति नहीं होती, समझौता होता है। दोनों के बीच का द्वन्द कितना कम हो यह कोशिश होनी चाहिये समाप्त तो ये नहीं हो सकता। क्या आक्सफोर्ड की अंग्रेजी डिक्शनरी में सुधार नहीं होते और हिन्दुस्तानी शब्द नहीं शामिल हैं! कुछ अन्यथा मत लें किसी बात का!--सत्यम् मिश्र (वार्ता) 16:47, 16 जुलाई 2014 (UTC)
सत्यम् मिश्र जी, आपके विचार पढ़कर और आपका ज्ञान देखकर बहुत प्रसन्नता हुई किसी बात को अन्यथा लेने का तो प्रश्न ही नहीं है। मैं व्याकरण का ज्ञाता तो नहीं हुँ लेकिन आपके शब्दों ने जितनी खूबसूरती से मेरा मंतव्य प्रकट कर दिया है उससे मैं अभिभूत हूँ। मेरे कहने का सार यही था जो आपने किशोरीदास जी के शब्दों में उद्धृत कर दिया है। रही बात कब्रों की, तो इशावास्योपनिषद में लिखा है कि विकास की उपासना करने वाले अंधकार में घिर जाते हैं और विनाश की उपासना करने वाले भी। अंत में इस रहस्य को स्पष्ट किया गया है कि एक के बिना दूसरे में कोई सार नहीं है। दोनों को एक साथ ही साधना पड़ता है। विकास के साथ साथ विनाश को भी मैनेज करना पड़ता है यही प्रकृति का नियम है। लेकिन ध्यान दें कि ये आम मौतें नहीं शहीदियाँ हैं जिनके परिणामस्वरूप भारत एक सूत्र में पिरोया गया है। जहाँ इतनी कबरें है वहीं एक अंग्रेजी की भी सही।--मनोज खुराना वार्ता 04:42, 17 जुलाई 2014 (UTC)

ग़ैर मुक्त सामग्री का साँचा[संपादित करें]

@हिंदुस्थान वासी: क्या आप किसी ग़ैर मुक्त स्रोत की जानकारी दे सकते हो जहाँ से सामग्री डाली गई है? मुझे लगता है यह मूल शोध की सामग्री है जिसे पूर्ववत कर देना चाहिए।☆★संजीव कुमार (✉✉) 15:30, 17 दिसम्बर 2014 (UTC)

भौतिक भूगोल का स्वरुप ;लेखक सविन्द्र सिंह, यह एक किताब है। और किताबें जो स्रोत के रूप में दी गई है उनपर भी शक है। सत्यम् जी के वार्ता पर हुई चर्चा देखें - सदस्य वार्ता:सत्यम् मिश्र#कॉपीराइट उल्लंघन। लेखक के वार्ता पर भी देखें - सदस्य वार्ता:Agggzp#स्वागत और धन्यवाद !। समस्या ये है कि ये किताबें ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है।--पीयूषवार्ता 15:38, 17 दिसम्बर 2014 (UTC)
@संजीव कुमार और हिंदुस्थान वासी:: मैं सामग्री हटाने के पक्ष में नहीं हूँ। और जैसा संजीव जी! आपने मेरे वार्ता पृष्ठ पर लिखा है, इसमें सुधार करके इसे रखा जा सकता है। पर आप भी जानते हैं कि सन्दर्भ उस बात के लिये दिया जाता है, उसके मूल मंतव्य के लिये दिया जाता है। सन्दर्भ देकर लंबे पैराग्राफ को ज्यों का त्यों नहीं नक़ल किया जा सकता। एकाध लाइन ज्यों की त्यों रखनी हो तो उद्धरण चिह्नों के साथ रख सकते हैं।
मैंने सवीन्द्र सिंह की पुस्तक का इंतज़ाम करके उसमें देखा। उत्पत्ति वाले खण्ड में बुलेटेड लिस्ट में कही गयी सारी बातें और अंत में दी गयी शब्दावली इस पुस्तक से शब्दशः नकल है। इसके अलावा भूकंप वाले खण्ड में भी मामूली भाषांतर के बावजूद यह स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि सामग्री नकल है। अतः इसे हटा देना चाहिये (मैं तत्काल तो सुधार नहीं कर पाऊँगा, किसी और को करना हो तो कर सकता है)।
दूसरी पुस्तक, जहाँ तक मेरी जानकारी है, बी एच यू के प्रोफ़ेसर एम बी सिंह की है। यह केवल बनारस में ही मिलेगी। मेरी संस्था की लाइब्रेरी में भी नहीं है। अगर दो एक दिन इन्जार करें तो मैं शायद किसी माध्यम से वेरीफाई करवा सकूँ।
जहाँ तक हटाने का सवाल है तो, इसे स्रोतहीन या मूल शोध कहके भी हटाया जा सकता है।--सत्यम् मिश्र (वार्ता) 18:04, 17 दिसम्बर 2014 (UTC)
हमें उसे हटा देना चाहिये जिस बारे में जानकारी है कि वो साफ़ कॉपी है। विकिपीडिया के योगदान मुक्त लाइसेंस के तहत होते है। इससे किताब के प्रकाशक, लेखक को नुकसान होता है। तो मैं कहता सत्यम् जी कि आप उस सामग्री को हटा दे जिसपर आपको शक है। फिर इतिहास से भी उन्हें मिटा दिया जाएगा। कॉपीराइट वाले मामले तुरंत निपटा देना ही अच्छा रहता है।--पीयूषवार्ता 12:53, 2 जनवरी 2015 (UTC)
पीयूष जी मैंने इस लेख पर काम शुरू कर दिया है, जल्द ही इसे उपयुक्त रूप दे दूँगा। इसमें से कॉपीराइट उल्लंघन वाली संदेहास्पद सामग्री हटा दिया हूँ। आप चाहें तो इसे इतिहास से मिटाने का अनुरोध कर दें। याद दिलाते रहने के लिये धन्यवाद! --सत्यम् मिश्र (वार्ता) 18:37, 2 जनवरी 2015 (UTC)
  • संजीव जी, सत्यम् जी की हटाई गई सामग्री छुपा दे।--पीयूषवार्ता 14:42, 4 जनवरी 2015 (UTC)
पूर्ण हुआ।☆★संजीव कुमार (✉✉) 17:36, 5 जनवरी 2015 (UTC)