वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग

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वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (सीएसटीटी) हिन्दी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों को परिभाषित एवं नए शब्दों का विकास करता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली के लिए शिक्षा मंत्रालय ने सन् १९५० में बोर्ड की स्थापना की। सन् १९५२ में बोर्ड के तत्त्वावधान में शब्दावली निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। अन्तत: १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और 1961 ई. में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना हुई। इस प्रकार विभिन्न अवसरों पर तैयार शब्दावली को 'पारिभाषिक शब्द संग्रह' शीर्षक से प्रकाशित किया गया, जिसका उद्देश्य एक ओर वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के समन्वय कार्य के लिए आधार प्रदान करना था और दूसरी ओर अन्तरिम अवधि में लेखकों को नई संकल्पनाओं के लिए सर्वसम्मत पारिभाषिक शब्द प्रदान करना था।

स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान के निर्माताओं का ध्यान देश की सभी प्रमुख भाषाओं के विकास की ओर गया। संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई और केंद्रीय सरकार को यह दायित्व सौंपा गया कि वह हिंदी का विकास-प्रसार करें एवं उसे समृद्ध करे। तदनुसार भारत सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 351 के अधीन हिंदी का विकास एवं समृद्धि की अनेक योजनाएँ आरंभ कीं। इन योजनाओं में हिंदी में तकनीकी शब्दावली के निर्माण का कार्यक्रम भी शामिल किया गया ताकी ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाओं में हिंदी के माध्यम से अध्ययन एवं अध्यापन हो सके। शब्दावली निर्माण कार्यक्रम को सही दिशा देने के लिए 1950 में शिक्षा सलाहकार की अध्यक्षता में वैज्ञानिक शब्दावली बोर्ड की स्थापना की गई।

पहले यह कार्य शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत हिंदी एकक द्वारा किया जाता था किन्तु बाद में विभिनन विषयों की हिंदी शब्दावली का निर्माण करने के दौरान यह ज्ञात हुआ कि यह काम बहुत ही अधिक विशाल, गहन और बहुआयामी है। इसके पूरे होने में बहुत सकय लगेगा और इस कार्य के लिए सभी विषयों के विशेषज्ञों एवं भाषाविदों की आवश्यकता होगी। अतः भारत सरकार ने 1 अक्तूबर, 1961 को प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ॰ डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की ताकि शब्दावली निर्माण का कार्य सही एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य में कार्यान्वित किया जा सके।

अनुक्रम

परिचय तथा इतिहास[संपादित करें]

हिन्दी तथा अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं को प्रशासन, शिक्षा तथा परीक्षा का माध्यम बनाने का सपना तथा संकल्प स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने बहुत सूझ-बूझ तथा विधार मथन के पश्चात् भारत की जनता के सम्मुख रखा। यह संकल्प, यह सपना भारत की सांस्कृतिक तथा भाषायी विविधता को ध्यान में रखकर लिया गया एक आदर्श ऐतिहासिक फैसला था। यह एक ऐसा संकल्प था, जो भारत की मिट्टी में जन्मी प्रज्ञा को ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में मौलिकता प्रदान करने तथा भारतीयता को सुरक्षित रखने के लिए लिया गया था। यह राष्ट्रीय एकता तथा सामाजिक विकास के लिए आवश्यक था तथा एक ऐसा भविष्यगामी फैसला था जिसमें ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ की भावना निहित थी।

जब कोई सपना देखा जाता है, जब कोई संकल्प लिया जाता है, जब कोई आदर्श सामने रखा जाता है, तो उसे मूर्तरूप देने के लिए कारगर योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की आवश्यकता भी होती है। संविधान की 351वीं धारा में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए जो विधान किए गए, उन्हें कार्यरूप देने के लिए सरकार ने कई योजनाएं बनाई जिसमें वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का विकास, मानकीकरण तथा एकरूपता की महत्वाकांक्षी योजना भी थी जो बाद में चलकर भारत सरकार की शिक्षा नीति में भी सम्मिलित की गई।

स्वतंत्रता के समय ज्ञान की विभिन्न विधाओं में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व था तथा परिश्चम से लिए हुए उधार के ज्ञान के लिए एक ऐसी शब्दावली भारतीय भाषाओं में विकसित करनी थी जिसका जन्म भारत की मिट्टी में नहीं हुआ था। इसी कारण यह एक सहज प्रयास न होकर कुछ अप्राकृतिक स्वरूप ग्रहण करने के लिए बाध्य थी। इस सायास और नियोजित प्रयास में तकनीकी पर्यायों या समानर्थी शब्दों का विधान किया जाना था। ऐसे पर्याय, जो अन्वेषक या विद्वान की कृति नहीं, बल्कि विषय विशेषज्ञ तथा भाषाविद् द्वारा मूल तकनीकी संकल्पना की सूचना अनूदित भाषा में संप्रेक्षित कर सके।

शब्दावली निर्माण की इस असहज प्रक्रिया ने उस समय कई विसंगतियों को जन्म दिया। कई विद्वानों ने उस समय वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के विकास का काम प्रारंभ कर दिया। कुछ विद्वानों ने शब्दावली को संस्कृतनिष्ठ करना चाहा, तो कुछ ने इसे उर्दू-फारसी और हिन्दुस्तानी कही जाने वाली भाषा में ढालना चाहा। उस समय कुछ ऐसे भी विद्वान थे जिन्होंने अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों को देवनागरी में लिप्यांतरण करके स्वीकार करने की पेशकश रखी परंतु इन सबसे वैज्ञानिक तथा तकनीकी विषयों के बहुयामी तथा विशाल शब्द भंडार को अपनी भाषा के व्याकरण, उसकी प्रकृति तथा विद्यार्थियो, प्राध्यापकों, शोधार्थियों, अनुवादकों, ग्रंथ लेखकों की आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो रही थी और जिस ढंग से लोग शब्दावली का निर्माण कर रहे थे उससे संविधान की गरिमा में निहित आशय की पूर्ति भी नहीं हो रही थी। एक ही तकनीकी शब्द के कई-कई पर्याय उपलब्ध होने से एक ऐसी अराजक स्थिति उत्पन्न हो गई जिसने शब्दावली निर्माण के नियोजन तथा प्रबंधन की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। ऐसे में भारत सरकार ने यह कार्य अपने हाथ में लेना ही उचित समझा और 1 अक्टूबर 1961 को स्थाई आयोग के रूम में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना राष्ट्रपति के आदेश के अधीन की गई।

पद्म विभूषण प्रोफेसर दौलत सिंह कोठारी जैसे स्वप्नद्रष्टा, प्रसिद्ध शिक्षाविद् तथा मूर्धन्य वैज्ञानिक को आयोग का पहला अध्यक्ष बनाकर भारत सरकार ने यह सिद्ध किया कि वे वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के विकास हेतु गंभीर प्रयास के लिए कटिबद्ध है।

प्रो. कोठारी ने वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के विकास के लिए समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाया तथा शब्दावली निर्माण, उसकी समीक्षा एवं समन्वयन के लिए कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों का निरूपण किया जिसके पालन करने से भारत की सामसिक संस्कृति भाषायी विविधता, राष्ट्रीय एकता तथा अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की आधुनिक तथा आधुनिकतम आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली को विकसित करने में किसी प्रकार की कोई रुकावट नहीं आ सहती थी।

अपनी स्थापना से अब तक के वर्षों में शब्दावली आयोग ने ज्ञान की विभिन्न शाखाओं, यथा-विज्ञान, मानविकी, समाजशास्त्र, कृषि, आयुर्विज्ञान तथा इंजीनियरिंग इत्यादि में लगभग 8 लाख तकनीकी शब्दों के हिन्दी पर्याय निर्धारित कर उन्हें विभिन्न शब्द संग्रहों तथा परिभाषा कोशों के रूप में प्रकाशित किया है। साथ ही साथ सन् 1968 में ग्रंथ निर्माण की योजना के अंतर्गत 15 राज्यों में ‘ग्रंथ अकादमी’ तथा ‘पाठ्य पुस्तक मंडलों’ की स्थापना की है जिससे कि हिंदी के साथ-साथ भारत की अन्य आधुनिक भाषाओं में तकनीकी शब्दावली का विकास तथा पाठ्य-पुस्तक का प्रकाशन किया जा सके। शब्दावली आयोग तथा विभिन्न राज्यों में स्थापित ग्रंथ अकादमियों तथा पाठ्य-पुस्तक मंडलों के समन्वित प्रयास से अब तक लगभग 12 हजार पाठ्य-पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त पूरक सामग्री के रूप में ग्रंथ मालाओं, चयनिकाओं तथा पत्र-पत्रिकाओं की एक लंबी सूची प्रस्तुत की जा सकती है। अखिल भारतीय शब्दावली, विभागीय शब्दावलियाँ तथा प्रशासनिक शब्दावली अपने आप में आयोग के अनूठे प्रयास है। शब्दावली आयोग ने कप्यूटरीकृत राष्ट्रीय शब्दावली बैंक की स्थापना भी की है।

विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला अब ऐसा कोई विषय नहीं होगा या प्रयोजनमूलक हिन्दी की ऐसी कोई विधा अब नहीं बची है जिसकी अंग्रेजी आधारित संकल्पनाओं को व्यक्त करने वाले हिन्दी पर्याय स्थिर न हो गए हों। आयोग की अखिल भारतीय शब्दावली योजना के अंतर्गत 18 शब्दावलियाँ प्रकाशित की जा चुकी हैं जिसमें 20,000 ऐसे शब्दों को विषयवार संकलित किया गया है जिन्हें अखिल भारतीय शब्दावली के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

विज्ञान में उच्च-स्तरीय लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए आयोग विज्ञान की त्रैमासिक पत्रिका ‘विज्ञान गरिमा सिंधु’ का प्रकाशन करता है। मानविकी तथा समाज विज्ञान विषयों में इसी उद्देश्य से ‘ज्ञान गरिमा सिंधु’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी जनवरी 2000 से प्रारंभ किया गया है।

आयोग के पूर्णकालिक अध्यक्ष[संपादित करें]

  1. डॉ॰ दौलत सिंह कोठारी (1961-1965)
  2. डॉ॰ निहालकरण सेठी (1965-1966)
  3. डॉ॰ विश्वनाथ प्रसाद (1966-1967)
  4. डॉ॰ एस. बालसुब्रह्मण्यम् (1967-1968)
  5. डॉ॰ बाबूराम सक्सेना (1968-1970)
  6. डा. कृष्ण दयाल भार्गव (1970)
  7. श्री गंटि जोगि सोमयाजी (1970 से 1971 तक)
  8. डा. पी. गोपाल शर्मा (1971 से 1975 तक)
  9. डॉ॰ हरबंश लाल शर्मा (1975-1980)
  10. डा. कपिला वात्स्यायन (1980 से 1983 तक)
  11. प्रो. मलिक मोहम्मद (1983-1987)
  12. प्रो. सूरजभान सिंह (1988-1994)
  13. प्रो. प्रेम स्वरूप सकलानी (1994-1998)
  14. डॉ॰ राय अवधेश कुमार श्रीवास्तव (1998 से 2001 तक)
  15. डॉ॰ हरीश कुमार (2001 से 2003 तक)
  16. डॉ॰ पुष्पलता तनेजा (2003 से 2005 तक)
  17. प्रो. के. बिजय कुमार (2005 से - २०१२)
  18. डॉ केशरीलाल वर्मा (०३ दिसम्बर, २०१२ से अब तक)

आयोग के कार्य एवं उद्देश्य[संपादित करें]

आयोग जो कार्य कर रहा है वे इस प्रकार हैं :[1]

हिंदी के संदर्भ में[संपादित करें]

1. वैज्ञानिक शब्दावली के निर्माण के सिद्धांतों का निर्धारण करना तथा तकनीकी शब्दावली के क्षेत्र में अब तक किए गए कार्य का पुनरीक्षण, समन्वय तथा समेकन।

2. विभिन्न विषयों की मानक वैज्ञानिक शब्दावली का निर्माण, प्रकाशन, प्रचार-प्रसार एवं प्रशिक्षण।

3. आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली के प्रयोग को परिलक्षित करते हुए विभिन्न पारिभाषिक शब्दकोशों का निर्माण एवं प्रकाशन।

4. पाठमालाओं, मोनोग्राफ, चयनिकाओं (डाइजेस्ट) एवं पाठ-संग्रहों (रीडिंग्स) का निर्माण एवं प्रकाशन।

5. विज्ञान तथा मानविकी आदि में उच्च स्तरीय विश्वविद्यालय स्तर के पाठ्य ग्रंथों के निर्माण एवं प्रकाशन के लिए सभी हिंदी-भाषी राज्यों में हिंदी ग्रंथ अकादमियों/विश्वविद्यालय एककों की स्थापना करना, उन्हें अनुदान देना एवं मार्गदर्शन प्रदान करना।

6. अखिल भारतीय शब्दावली का संकलन, प्रकाशन, प्रचार एवं अनुप्रयोग।

7. विज्ञान तथा मानविकी में उच्च स्तरीय लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए क्रमशः त्रैमासिक पत्रिकाओं ‘विज्ञान गरिमा सिंधु’ तथा ज्ञान गरिमा सिन्धु’ का प्रकाशन।

8. विश्वविद्यालयों एवं उच्च तकनीकी संस्थानों के प्राध्यापकों/वैज्ञानिकों आदि को आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली का प्रशिक्षण देने तथा हिंदी में विज्ञान लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए शब्दावली कार्यशालाओं का आयोजन करना।

9. आयोग द्वारा निर्मित समस्त शब्दावली का कंप्यूटरीकरण करते हुए कंप्यूटर-आधारित राष्ट्रीय शब्दावली बैंक की स्थापना करना ताकि देश भर में सभी विषयों की अद्यतन मानक शब्दावली सर्वसुलभ हो जाए।

10. कृषि, आयुर्विज्ञान एवं इंजीनियरी के सभी विषयों में विश्वविद्यालय-स्तरीय पाठ्यपुस्तकों, संदर्भ-ग्रथों एवं सहायक सामग्री का निर्माण एवं प्रकाशन।

11. शब्दावली का मानकीकरण तथा प्रयोक्ताओं के बीच सर्वेक्षण कार्य।

अन्य भारतीय भाषाओं के संदर्भ में[संपादित करें]

12. अहिंदी-भाषी राज्यों में स्थापित पाठ्य पुस्तक मंडलों के माध्यम से पाठ्य पुस्तकों के निर्माण, शब्दावली निर्माण एवं अन्य संदर्भ-ग्रंथों के निर्माण आदि के लिए केंद्रीय अनुदान, मार्गदर्शन, परामर्श एवं विशेषज्ञता प्रदान करना, उनके कार्यों का अखिल भारतीय स्तर पर समन्वय एवं पुनरीक्षण करना।

13. तकनीकी शब्दावली के अभ्यास, प्रशिक्षण एवं पुनरीक्षण के लिए इन अहिंदी-भाषी राज्यों के पाठ्य पुस्तक मंडलों को तकनीकी शब्दावली कार्यशाला के आयोजन के लिए आर्थिक सहायता, मार्गदर्शन एवं विशेषज्ञता प्रदान करना।

14. आयुर्विज्ञान के शब्दों और वाक्यांशों के द्विभाषी संस्करण अर्थात् तमिल-हिंदी, मराठी-हिंदी, गुजराती-हिंदी आदि संस्करणों का निर्माण एवं प्रकाशन।

विविध कार्य[संपादित करें]

आयोग के कार्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार, विज्ञापन, प्रकाश्नों का मुद्रण, बिक्री, वितरण, प्रदर्शनियों का आयोजन, विशेषज्ञ समितियों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, समीक्षा समितियों, मूल्यांकन समितियों आदि की बैठकों का आयोजन आदि विविध कार्य करना।

शब्दावली निर्माण में आयोग की अधिकारिता[संपादित करें]

राष्ट्रपति के 27 अप्रैल, 1960 के आदेश के अनुसार सभी विषयों की शब्दावली के हिंदी पर्यायों के निर्माण का उत्तरदायित्व केवल वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग को सौंपा गया है। अतः शिक्षा, प्रशासन, अध्यापन आदि सभी क्षेत्रों में सभी पर यह बाध्यता है कि केवल शब्दावली आयोग द्वारा निर्मित मानक शब्दावली का ही सर्वत्र प्रयोग किया जाए। वस्तुतः पूरे देश में मानक शब्दावली के प्रयोग की वांछनीयता और एकरूपता की दृष्टि से यह अनिवार्य भी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी सभी विश्वविद्यालयों आदि को यह निर्देश दिया है कि हिंदी तथा अन्य भाषाओं की पाठ्यपुस्तकों में केवल शब्दावली आयोग की शब्दावली का ही प्रयोग किया जाए। इसी प्रकार राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय ने भी प्रशासन के क्षेत्र में आयोग द्वारा निर्मित प्रशासनिक तथा अन्य शब्दावलियों के प्रयोग की बाध्यता का निर्देश दिया है।

आयोग की प्रगति तथा उपलब्धियाँ[संपादित करें]

विभिन्न विज्ञानों, मानविकी तथा सामाजिक विज्ञानों की मूलभूत शब्दावली के निर्माण का कार्य सन् १९७१ में पूरा कर लिया गया। तत्पश्चात् उक्त शब्दावली के समन्वय तथा समेकन का कार्य प्रारंभ हुआ। इन सभी शब्द संग्रहों की स्थिति इस प्रकार है:

क्रमांक नाम शब्द संख्या
वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (विज्ञान खंड ) १,३०,०००
वृहत् पारिभ आषइक शब्द संग्रह (मानविकी खंड ) ८०,०००
वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (आयुर्विज्ञान ) ५०,०००
वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (इंजीनियरी ) ५०,०००
वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (रक्षा ) ४०,०००
वृहत् पारिभाषिक शब्द संग्रह (कृषि ) १७,५००
समेकित प्रशासन शब्दावली (प्रशासन ) ८,०००
योग २,७५,५०० शब्द

हिंदी की तकनीकी शब्दावली का निर्माण[संपादित करें]

विभिन्न विषयों की तकनीकी शब्दावली का निर्माण सन् 1950 से ही शिक्षा मंत्रालय के हिंदी एकक में शुरू हो गया था। मंत्रालय ने विविध विषयों की अनेक आरंभिक और अनंतिम शब्दावलियाँ छापीं और उन्हें निःशुल्क विश्वविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों को वितरित किया। इसके बाद अनेक विषयों की अंतिम रूप से स्वीकृत शब्दावली भी अलग-अलग छापी गई। सन् 1962 में इन सभी शब्दों को एकत्र कर ‘पारिभाषिक शब्द-संग्रह’ के नाम से पहली बार छापा गया। इस शब्द-संग्रह में लगभग 9000 शब्द थे। शब्दावी आयोग की स्थापना के बाद इस कार्य में बहुत गति आई। तब से आयोग ने विभिनन विषयों की शब्दावलियों को अनेक शब्द संग्रहों के रूप में प्रकाशित किया है। अब तक कुल मिलाकर लगभग 35 शब्द-संग्रह/शब्दावलियाँ छापी जा चुकी जिनमें कुल मिलाकर लगभग 8.5 लाख तकनीकी शब्दों के हिंदी पर्याय दिए गए हैं।

आयोग ने अब तक ज्ञान-विज्ञान की लगभग सभी आधुनिकतम शाखाओं की अधिकांश शब्दावलियों के हिंदी पर्याय बना दिए हैं।

प्रशासन शब्दावली[संपादित करें]

संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई है। तदनुसारिंहंदी की प्रशासनिक शब्दावली की मानकता, एकरूपता और सर्वत्र स्वीकार्यता की दृष्टि से आयोग ने प्रशासन से संबंधित 12000 शब्दों का संकलन ‘समेकित प्रशासन शब्दावली’ के नाम से किया है। अब तक इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह शब्दावली सभी विभागों, कार्यालयों आदि को निःशुल्क भेजी जाती हैं ताकि सभी कार्यालयों में हिंदी की मानक शब्दावली के प्रयोग को बढ़ावा मिले। इसके अंग्रेजी-हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही संस्करण आयोग ने प्रकाशित किया है।

विभागीय शब्दावली[संपादित करें]

विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले विषयों के साथ-साथ आयोग विभिन्न सरकारी विभागों के अनुरोध पर उन विभागों की तकनीकी शब्दावली के हिंदी पर्यायों के निर्माण का भी कार्य करता है। विभागीय शब्दावलियों में अब तक डाक-तार शब्दावली, रेलवे शब्दावली, रक्षा शब्दावली, राजस्व शब्दावली, वैमानिकी शब्दावली, वानिकी शब्दावली, मौसम विज्ञान शब्दावली, स्वास्थ्य भौतिकी तथा विकिरण जैविकी शब्दावली। रेशम शब्दावली, कपास शब्दावली, कोयला शब्दावली, इलेक्ट्रॉनिकी शब्दावली, पेंशन शब्दावली, आसूचना ब्यूरो शब्दावली, आदि का प्रकाशन किया जा चुका है। दूर संचार शब्दावली (15000 शब्द), नाभिकीय भौतिकी आदि के पर्यायों को अंतिम रूप दे दिया गया है। कुछ विभागीय शब्दावली को संबंधित विभागों को प्रकाशनार्थ भेज दी गई हैं तथा कुछ विचाराधीन हैं। विभिन्न विभागों से हिंदी पर्यायों के निर्माण के लिए तकनीकी शब्दों की सूचियाँ आयोग में समय-समय पर प्राप्त होती ही तथा इनकें हिंदी पयार्यो का निर्धारण यथा समय कर दिया जाता है।

शब्दावली का अद्यतनीकरण[संपादित करें]

शब्दावली निर्माण एक निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है। हर साल विश्व में विविध विषयों में हजारों नए शब्द प्रयोग में आते हैं जिनमें से कुछ हजार शब्द ही वैज्ञानिकों द्वारा स्थायी रूप से अपनाए जाते हैं। इन शब्दों के हिंदी पर्याय बनाने का कार्य भी आयोग के विभिन्न विषय एकक निरंतर करते रहते हैं। इस प्रकार सभी विषयों की शब्दावलियों में संशोधन, परिवर्धन एवं अद्यतनीकरण निरंतर होता रहता है।

विषयवार शब्दावलियाँ तथा विषय-समूहवार शब्दावलियाँ[संपादित करें]

प्रारंभ में आयोग ने अलग-अलग विषयों की शब्दावलियाँ छापी थीं। काफी शब्दों के निर्माण के निर्माण के बाद उन्हें विषय-समूहवार बृहत् शब्द-संग्रहों के रूप में छापा गया। विज्ञान के शब्दों को एक संकलन में और मानविकी के शब्दों को अन्य संकलन में छापा गया। बाद में इंजीनियरी, आयुर्विज्ञान, कृषि, पशु-चिकित्सा, लोक प्रशसन, रक्षा, वाणिज्य, प्रशासन, कम्प्यूटर-विज्ञान, अंतरिक्ष-विज्ञान, मुद्रण इंजीनियरी, धातुकर्म आदि विषयों के अनुसार इन्हें अलग-अलग भी छापा गया। वस्तुतः अनेक शब्दावली की मांग काफी समय से होती रही हैं ताकि वह प्रयोक्ता को कम मूल्य में ही प्राप्त हो जाए। तदनुसार अब आयोग अपनी एक योजना के अंतर्गत विषयवार शब्दावलियाँ ही परिवर्धित रूप में प्रकाशित कर रहा है।

मूलभूत शब्दावलियाँ[संपादित करें]

1994 से आयोग ने विज्ञान तथा अन्य विषयों की महत्वपूर्ण शाखाओं में विकसित शब्दावलियों में प्रकाशित आमतौर पर प्रयोग किये जाने वाले शब्दों का चयन कर ‘मूलभूत शब्दावली’ के प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया है। इन शब्दावलियों को विद्यार्थियों/अध्यापकों तथा अन्य प्रयोक्ता वर्ग में निःशुल्क वितरित किया जाता है जिससे हिंदी में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के प्रयोग को बढ़ावा मिल सके तथा वह लोकप्रिय हो सके। इन शब्दावलियों में ऐसे शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान रखा जाता है जो स्नातक तथा परास्नातक स्तर के विद्यार्थी, शोध छात्र तथा प्राध्यापक सामान्यतः प्रयोग करते हैं। आयोग ने अब तक कम्प्यूटर विज्ञान, गणित, भूगोल, भूविज्ञान, भौतिकी, पशुचिकित्सा विज्ञान, यांत्रिक इंजीनियरी जैसे विषयों की मूलभूत शब्दावलियॉं प्रकाशित की हैं तथा इलेक्ट्रानिक्स, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, वास्तुकला, पुरातत्व, इतिहास, रक्षा, राजनीति विज्ञान, प्राणी विज्ञान, कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा सूत्र कृमि विज्ञान की मूलभूत शब्दावलियॉं प्रकाशनार्थ तैयार की जा रही हैं।

शब्दावलियों के अंग्रेजी-हिंदी, हिंदी-अंग्रेजी एवं द्विभाषी संस्करण[संपादित करें]

आयोग के सभी शब्द-संग्रह मूलतः अंग्रेजी-हिंदी में हैं, क्योंकि स्रोत भाषा अंग्रेजी रही है। आयोग ने इनमें से अनेक शब्द-संग्रहों के हिंदी-अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किए हैं। इनमें विज्ञान के विषयों का शब्द-संग्रह, मानविकी के विषयों का शब्द-संग्रह, आयुर्विज्ञान, कृषि एवं इंजीनियरी शब्द-संग्रह एवं प्रशासनिक शब्दावली के हिंदी-अंग्रजी संस्करण अब तक प्रकाशित किए जा चुके हैं। भाषाविज्ञान शब्दावली का द्विभाषी संस्करण (अर्थात् एक ही जिल्द में अंग्रेजी संस्करण) भी प्रकाशित किया गया है। शेष सभी शब्दावलियों के हिंदी-अंग्रेजी संस्करण) भी प्रकाशित किये गये हैं।

राष्ट्रीय शब्दावली बैंक[संपादित करें]

आयोग ने अपनी शब्दावलियों के प्रस्तुतीकरण एवं प्रकाशन की प्रक्रिया का आधुनिकीकरण करने के लिए कंप्यूटर-आधारित राष्ट्रीय शब्दावली बैंक की स्थापना की है ताकि आयोग की शब्दावली सभी प्रयोगकर्ताओं को तुरंत उपलब्ध हो सके। इस कंप्यूटरीकृत शब्दावली बैंक से यह लाभ होगा कि-

  • 1. नए शब्दों को उनके अपने अकारादि क्रम में तत्काल भरा जा सकता है।
  • 2. शब्दों में कभी भी संशोधन-परिवर्धन किया जा सकता है अथवा उन्हें हटाया जा सकता है।
  • 3. शब्दों के हिंदी पर्याय तत्काल मालूम किए जा सकते हैं।
  • 4. शब्दावली के तत्काल मुद्रण के लिए लेसर प्रिंट तैयार किए जा सकते हैं।
  • 5. शब्दों को विषयवार या विषय-समूहवार या समेकित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  • 6. शब्दों के अंग्रेजी-हिंदी संस्करण या हिंदी-अंग्रेजी संस्करण या द्विभाषी संस्करण प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • 7. शब्दावलियाँ फ्लापियों तथा सीडी के रूप में प्राप्त की जा सकती हैं तथा बेची जा सकती हैं।

आयोग का वेबसाइट[संपादित करें]

फरवरी 2000 में आयोग ने राष्ट्रीय सूचना केन्द्र के सर्वर पर वेबसाइट http://www.cstt.nic.in/ प्रारम्भ किया है। इस वेबसाइट पर आयोग के विषय में अग्रेंजी तथा हिंदी दोनों भाषाओं में पूरी जानकारी दी गई है तथा कई महत्वपूर्ण विषयों की शब्दावलियॉं भी उपलब्ध करायी गयी है।

अखिल भारतीय शब्दावली[संपादित करें]

सभी शिक्षाविदों, भाषाविदों एवं विद्वानों की यह धारणा है कि भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली ऐसी होनी चाहिए जिसमें सभी भाषाओं में परस्पर समरूपता हो ताकि उच्च शिक्षा, अनुसंधान, विज्ञान के आदान-प्रदान एवं संप्रेषण में सुविधा रहे तथा उनमें अखिल भारतीय स्तर पर एकरूपता एवं समानता स्थापित हो। सभी भारतीय भाषाओं में समानता का पहला आधार यह है कि हमारी अधिकांश भाषाएँ संस्कृतमूलक हैं। संस्कृत मूल के शब्द बहुतायत राज्यों में आसानी से स्वीकृत किए जाते हैं। फिर प्रशासन एवं उच्च तकनीकी शिक्षा में अंग्रेजी के शब्द और अदालतों आदि के काम में उर्दू के शब्द सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से मिलते हैं। इस प्रकार सभी राज्यों के लिए समान तकनीकी शब्दावली की खोज करना भी वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग का एक उत्त्रदायित्व रहा है। तदनुसार 1980 से आयोग ने अखिल भारतीय शब्दावली योजना शुरू की जिसके अंतर्गत सभी राज्यों की भाषाओं से ऐसे शब्दों का संकलन किया गया जिन्हें अखिल भारतीय प्रयोग के लिए स्वीकार किया जा सकता था। इन शब्दों की सूचियों के निर्माण में विभिन्न भाषाओं के विद्वानों, वैज्ञानिकों एवं भाषाविदों की सहायता ली गई और उन्हें विषयवार सूचीबद्ध किया गया। इन शब्द-सूचियों को सभी राज्यों में भेजकर उनके पाठ्य पुस्तक निर्माण मंडलों में काम करने वाले वैज्ञानिकों/भाषाविदों से उनकी भाषा में उन शब्दों के मानक पर्याय मँगाए गए। विभिन्न राज्यों के बोर्डों से सभी भाषाओं के पर्याय प्राप्त हो जाने के बाद आयोग ने विभिन्न स्थलों पर अखिल भारतीय संगोष्ठियाँ आयोजित कीं जिनमें सभी राज्यों के विषयविदों एवं भाषाविदों को आमंत्रित किया गया। इन संगोष्ठियों के परिणमस्वरूप विभिन्न विषयों के लगभग 20,000 ऐसे शब्द संकलित कर दिए गए हैं जिन्हें अखिल भारतीय शब्दावली के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इन शब्दों को आयोग ने विभिन्न विषयों की अखिल भारतीय शब्दावली के रूप में विषयवार प्रकाशित किया है। अब तक ऐसी 19 शब्दावलियाँ प्रकाशित की जा चुकी हैं। जिन विषयों में अखिल भारतीय शब्दावली की पहचान की जा चुकी है, उनका विवरण निम्नलिखित है :

1. अर्थशास्त्र और वाणिज्य
2. आयुर्विज्ञान (शल्य विज्ञान)
3. खगोलिकी
4. गणित
5. जीवविज्ञान
6. प्राणिविज्ञान
7. प्रायोगिक भूगोल
8. भाषाविज्ञान
9. भूगोल
10. भूविज्ञान (संशोधित)
11. भौतिकी
12. मानव भूगोल
13. रसायन विज्ञान-1
14. वनस्पतिविज्ञान
15. शिक्षा, मनोविज्ञान तथा मनोरोग विज्ञान
16. समाजविज्ञान एवं सांस्कृतिक नृविज्ञान
17. समुद्रविज्ञान
18. सांख्यिकी
19. सिविल इंजीनियरी

ये शब्दावलियाँ विश्वविद्यालय के विभिन्न विषयों के प्राध्यापकों, भाषाविदों, लेखकों, अनुवादकों, कोशकारों, पत्रकारों एवं राज्यों के पाठ्य पुस्तक निर्माण बोर्डों को निःशुल्क वितरित की जाती है। आयोग की यह योजना है कि सभी विषयों की अखिल भारतीय शब्दावली को अब एक ही संग्रह में प्रकाशित कर दिया जाए ताकि शब्द-निर्माताओं को ये शब्दावलियाँ एक ही ग्रंथ में उपलब्ध हो सकें।

आयुर्विज्ञान से संबंधित अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली एवं वाक्यांश[संपादित करें]

सन् 1982 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुरोध पर आयोग ने आयुर्विज्ञान के आम प्रयोग के शब्दों और वाक्यांशों के दक्षिण भाषायी पर्यायों का संकलन करके उन्हें हिंदी के साथ प्रकाशित करने की योजना बनाई। इस योजना के अंतर्गत लगभग 5-6 हजार शब्दों का संकलन किया जा चुका है। पहले चरण के रूप में अंग्रेजी शब्दों और वाक्याशों के हिंदी पर्याय निश्चित करने के बाद उनके तमिल पर्याय तैयार कर लिए गए हैं तथा बंगला, पंजाबी, मराठी तथा उड़िया भाषाओं के पयार्यो को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

तकनीकी शब्दावली कार्यशालाएँ[संपादित करें]

आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली का उद्देश्य शब्द-संग्रह तक सीमित रहना नहीं है बल्कि विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षण में उसका प्रयोग होना भी उसका अंतिम लक्ष्य है। सभी पाठ्य ग्रंथों में आयोग की शब्दावली का ही प्रयोग हो, सभी मौलिक लेखक, अनुवादक तथा संदर्भ-साहित्य के निर्माता, छात्र एवं प्राध्यापक आयोग की शब्दावली का प्रयोग करें, इसके लिए आयोग ने अनेक योजनाएँ चालू की हैं। इनमें से एक प्रमुख योजना तकनीकी शब्दावली कार्यशालाओं के आयोजन की है।

शब्दावली कार्यशाला योजना के अंतर्गत आयोग विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं उच्चतर तकनीकी संस्थाओं में विभिन्न विषयों में ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन करता है जिनमें आयोग के संकाय के सदस्य अथवा विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ विद्वान, भाषाविद् एवं शब्द-निर्माता आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली का परिचय देते हुए तथा उनकी व्याख्या करते हुए उनके संबंध में कार्यशाला में उपस्थित प्राध्यापकों, वैज्ञानिकों, लेखकों, अनुवादकों से विचार-विमर्श करते हैं। इन कार्यशालाओं में प्रायः दो-तीन विषयों को एक-साथ रखा जाता है और इनमें उन विषयों से संबंधित आसपास के महाविद्यालयों के प्राध्यापक सहभागी के रूप में आमंत्रित किए जाते हैं।

यह देखा गया है कि ये कार्यशालाएँ अपने उद्देश्य में बहुत ही सफल रही हैं क्योंकि इन कार्यशालाओं में विचार-विमर्श के माध्यम से आयोग द्वारा निर्मित तकनीकी शब्दावली के प्रयोग की परीक्षा हो जाती है, सभी सहभागी प्राध्यापकों को आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली की मानकता की जानकारी देने से उन्हें अपने विषयों के अध्यापन में मानक शब्दावली का प्रयोग करने की दिशा प्राप्त हो जाती है और अपने विषय को हिंदी माध्यम से पढ़ाने में उनका संकोच समाप्त हो जाता है। शब्दावली-निर्माण की प्रक्रिया की जानकारी सक्षम विद्वानों से प्राप्त होने के बाद उन प्राध्यापकों को आयोग की शब्दावली स्वीकार करने में सुविधा होती है। उन्हें यह भी ज्ञान हो जाता है कि तकनीकी शब्दों के लिए सर्वत्र एक समान हिंदी पर्यायों का प्रयोग अनिवार्य है ताकि एक ही संकल्पना के लिए विभिन्न शब्दों के प्रयोग से अराजकता उत्पन्न न हो। कार्यशाला में विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप अनेक शब्दों के हिंदी पर्यायों पर पुनर्विचार भी किया जाता है।

परिभाषा-कोशों का निर्माण[संपादित करें]

विभिन्न विषयों में तकनीकी शब्दावली के निर्माण के बाद आयोग ने परिभाषा-कोशों के निर्माण की योजना भी शुरू की। शब्दावली या शब्द-संग्रहों में अंग्रेजी तकनीकी शब्दावली तथा उनके हिंदी पर्याय मात्र होते हैं, किंतु परिभाषा-कोशों में अंग्रेजी तकनीकी शब्द, उसका हिंदी पर्याय और उसके बाद तीन-चार पंक्तियों में हिंदी में उसकी परिभाषा दी जाती है। परिभाषा-कोश किसी भी विषय के तकनीकी शब्द की संकल्पना को सही रूप से समझने में छात्र, अध्यापक अथवा अनुसंधानकर्ता की बहुत सहायता करते हैं। वस्तुतः परिभाषा के आधार पर ही किसी शब्द को उपयुक्त ठहराया जा सकता है। साथ ही परिभाषाओं से तकनीकी शब्दों के प्रयोग की क्षमता भी स्पष्ट हो जाती है। इस तरह परिभाषा-कोश एक प्रकार से शब्दावली-निर्माण की प्रक्रिया के ही विस्तार के रूप में है क्योंकि तकनीकी शब्दों को उनकी परिभाषाओं अथवा व्याख्याओं के माध्यम से ही ठीक से समझा जा सकता है।

शब्दावली आयोग ने अब तक लगभग 56 परिभाषा कोश प्रकाशित किए हैं। इनका संबंध समाजविज्ञान एवं मानविकी, मूलभूत विज्ञान, अनुप्रयुक्त विज्ञान आदि सभी से है। इनमें विज्ञान के नवीनतम विषय, उदाहरणार्थ- अर्थमिति, इलेक्ट्रॉनिकी, तरल यांत्रिकी, मानचित्र-विज्ञान, शैल विज्ञान, पादप आनुवंशिकी, कृषि-कीट विज्ञान आदि भी शामिल हैं। इन परिभाषा-कोशों की उपयोगिता की दृष्टि से अनेक विषयों के एक से अधिक परिभाषा कोश भी प्रकाशित किए गए हैं। उदाहरणार्थ, वनस्पति विज्ञान के पांच परिभाषा-कोश, रसायन विज्ञान के तीन परिभाषा-कोश, शिक्षा के दो परिभाषा-कोश आदि।

विश्वविद्यालय-स्तरीय ग्रंथों का निर्माण[संपादित करें]

तकनीकी शब्दावली का निर्माण हिंदी में पाठ्य पुस्तकों के निर्माण का पहला चरण है। माध्यम परिवर्तन के पूर्व यह अनिवार्य है कि प्रत्येक विषय में उचित संख्या में विश्वविद्यालय स्तर की पाठ्य पुस्तकों का निर्माण किया जाए। ये पुस्तकें न केवल विषय की दृष्टि से उच्च स्तरीय हों अपितु इनकी शब्दावली भी मानक हो और उनमें सर्वत्र एकरूपता हो। तदनुसार शिक्षा मंत्रालय ने 1959 से ही हिंदी में ग्रंथ-निर्माण योजना का सूत्रपात किया। इस योजना के अंतर्गत स्वयं आयोग द्वारा एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों, अकादमिक संस्थाओं और राज्य सरकारों के माध्यम से और साथ ही निजी प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तकों के अनुवाद, मौलिक लेखन एवं प्रकाशन का कार्यक्रम आरंभ किया गया। शब्दावली आयोग ने अनुवाद, मौलिक लेखन एवं प्रकाशन का कार्यक्रम आरंभ किया। शब्दावली आयोग ने अनुवाद, मौलिक लेखन के लिए शीर्षकों का चुनाव करने के उद्देश्य से विविध विषयों में 16 विशेषज्ञ समितियों का गठन किया और उनके परामर्श से इस कार्यक्रम के अंतर्गत अनेक पुस्तकें प्रकाशित कीं।

सन् 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं को विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने के लिए तेजी से प्रयास करने पर बल दिया गया। तदनुसार शिक्षा मंत्रालय ने प्रत्येक राज्य सरकार को विश्वविद्यालय स्तर के ग्रंथों के निर्माण के लिए एक-एक करोड़ रुपए देने की मंजूरी दी। तब से ही इस योजना के अधीन विभिन्न राज्यों को आर्थिक सहायता दी जा रही है। इस योजना पर पुनर्विचार करने के लिए 1987 में दलाल समिति तथा 1994 में कोलहाटकर समिति का गठन किया गया।

विश्वविद्यालय ग्रंथ-निर्माण योजना की वर्तमान स्थिति[संपादित करें]

संक्षेप में इस प्रकार है :

  • 1. प्रत्येक हिंदी-भाषी राज्य (उत्त्र प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा) में एक-एक हिंदी ग्रंथ अकादमी की स्थापना हुई है जो विभिन्न उच्चस्तरीय पाठ्य पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कर रही हैं।
  • 4. अहिंदी भाषी राज्यों (आंध्रप्रदेश, गुजरात, केरल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिमी बंगाल तथा तमिलनाडु) में ग्रंथ निर्माण कार्यक्रम के लिए संस्थाएँ स्थापित की गई हैं।

पाठमालाएँ, चयनिकाएँ तथा पाठ-संग्रह[संपादित करें]

विश्वविद्यालय-स्तरीय उच्च विषयों में अध्ययन तथा अध्यापन के लिए पाठ्य पुस्तकें ही पर्याप्त नहीं होतीं। अनेक गहन विषयों को ठीक से समझने के लिए उच्च स्तरीय पत्रिकाओं एवं संदर्भ-ग्रंथों में उपलब्ध सामग्री को पाठमाला, मोनोग्राफ, चयनिका (डाइजेस्ट) एवं पाठ-संग्रह के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। पाठमाला एक लेखक द्वारा एक ही विषय में लिखित पुस्तिका के रूप में होती है जबकि पाठ-संग्रह में एक ही विषय पर विभिन्न लेखकों के लेख संकलित किए जाते हैं। चयनिकाओं में भी अनेक शीर्षकों के अंतर्गत किसी विषय या विषय-समूह की अद्यतन जानकारी प्रस्तुत की जाती है।

शब्दावली आयोग ने ज्ञान-विज्ञान की अनेक पाठमालाओं, चयनिकाओं और पाठ-संग्रहों का निर्माण और प्रकाशन 1980 से आरंभ किया था। अब तक लगभग 10 पाठमालाओं/पाठ-संग्रहों एवं 10 चयनिकाओं का प्रकाशन हो चुका है।

त्रैमासिक पत्रिकायें[संपादित करें]

विज्ञान गरिमा सिंधु[संपादित करें]

विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों एवं उच्च शिक्षा तथा अनुसंधान कार्य में रत छात्रों को उनके विषय की अद्यतन जानकारी देने, हिंदी में मौलिक विज्ञान लेखन एवं स्तरीय अनुवाद को प्रोत्साहित करने तथा वैज्ञानिक लेखन में आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए एवं हिंदी के विज्ञान लेखकों को स्तरीय मंच प्रदान करने तथा विज्ञान लेखन के क्षेत्र में हिंदी को सशक्त माध्यम बनाने के लिए आयोग 1986 से ‘विज्ञान गरिमा सिंधु’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का नियमित रूप से प्रकाशन कर रहा है। इस पत्रिका में उच्च स्तरीय लेख प्रकाशित किए जाते हैं।

ज्ञान गरिमा सिन्धु[संपादित करें]

हाल ही में ऐसा अनुभव किया गया कि सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी के क्षेत्र में भी पाठ्य सामग्री के अतिरिक्त ऐसे पूरक एवं लोकप्रिय साहित्य की आवश्यकता है जो उच्च शिक्षण के स्तर पर हिंदी माध्यम से पठन-पाठन करने वालों के साथ-साथ सामान्य जन को भी अपने चारों ओर के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक आदि क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों, नए सिद्धान्तों, विचारों तथा अन्य अवयतन जानकारी से अवगत करा सके। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आयोग ने ‘ज्ञान गरिमा सिंधु’ नामक त्रैमासिक पत्रिका के प्रकाशन का कार्य जनवरी 2000 से प्रारम्भ किया है। पत्रिका का उद्देश्य हिंदी में लेखन की तकनीकी शैली को प्रोत्साहन देना तथा सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी के क्षेत्र से संबंधित अद्यतन उपयोगी बौद्धिक जानकारी को हिंदी माध्यम से पठन पाठन करने वालों के साथ-साथ सामान्यजन को सुलभ कराना है।

अन्य पत्रिकाएँ[संपादित करें]

आयोग ने समय-समय पर शिक्षा माध्यम परिवर्तन की सरलता के लिए अनुसंधानात्मक / विवरणात्मक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया था। इनके नाम इस प्रकार हैं :

  • 1. आयुर्विज्ञान पत्रिका
  • 2. इंजीनियरी पत्रिका
  • 3. चिकित्सा सेवा
  • 4. शिल्पी मित्र

पुस्तक प्रदर्शनियाँ एवं बिक्री आदि[संपादित करें]

आयोग ने अब तक हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में हजारों पुस्तकें प्रकाशित कर ली हैं और अनेक शब्द-संग्रह, परिभाषा-कोश, पाठमालाएँ, चयनिकाएँ, अखिल भारतीय शब्दावलियाँ, वैज्ञानिक पत्रिका आदि भी। आयोग के प्रकाशनों एवं अन्य कार्यों के उचित प्रचार-प्रसार के लिए आयोग का प्रदर्शनी एकक समय-समय पर प्रदर्शनियों का आयोजन करता रहता है। ये प्रदर्शनियाँ विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा उच्च तकनीकी संस्थाओं की माँग पर अथवा अखिल भारतीय प्रदर्शनियों एवं आयोग द्वारा आयोजित तकनीकी शब्दावली कार्यशालाओं, संगोष्ठियों एवं बैठकों के अवसर पर विभिन्न स्थलों पर आयोजित की जाती हैं। आयोग का वितरण एकक प्रशासन शब्दावली तथा विभिन्न विषयों की अखिल भारतीय शब्दावलियों तथा मूलभूत शब्दावलियों का निःशुल्क वितरण भी करता है। आयोग इनकी बिक्री स्वयं भी करता है और ये पुस्तकें भारत सरकार के प्रकाशन नियंत्रक, सिविल लाइन्स, दिल्ली-110006 से भी उपलब्ध होती हैं।

पूर्वोत्तर राज्यों में शब्दावली आयोग का योगदान[संपादित करें]

सन् 1994 में शिक्षा विभाग द्वारा ‘कोल्हाटकर समिति’ का गठन किया गया तथा हिंदी प्रदेशों की ग्रंथ अकादमियों तथा अहिंदी भाषी राज्यों के पाठ्य-पुस्तक मंडलों के क्रिया-कलापों की समीक्षा का कार्य सौंपा गया था। कोल्हाटकर समिति ने मणिपुरी, नेपाली तथा कोंकणी भाषाओं में पाठ्य-पुस्तक मंडलों की स्थापना की संस्तुति दी।

पूर्वोत्त्र राज्यों में भाषागत विविधताओं, अंग्रेजी को कई राज्यों द्वारा राज्य की भाषा घोषित किया जाना तथा शिक्षा में क्षेत्रीय भाषाओं की शैशव अवस्था को देखते हुए आयोग ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया है तथा सर्वप्रथम मणिपुर राज्य में मई 1999 में 7 दिनों की एक कार्यशाला मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल में राज्य के शिक्षा निदेशालय के भाषा प्रभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई।

आयोग द्वारा शब्द-निर्माण की प्रक्रिया[संपादित करें]

शब्दावली आयोग में विभिन्न विषयों के एकक एवं अधिकारी हैं जो अपने-अपने विशिष्ट विषय की पाठ्य पुस्तकों, अद्यतन शब्दकोशों, विश्वकोशों एवं संदर्भ-ग्रंथों की सहायता से पर्यायों का चयन करते हैं। पर्यायों को अंतिम रूप देने के लिए आयोग के ये अधिकारी अपने-अपने विषयों/उपविषयों/विषय की शाखाओं के विशिष्ट विद्वानों, विश्वविद्यालय एवं उच्चतर तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों आदि को परामर्श के लिए आमंत्रित करते हैं। इन विशेषज्ञों एवं अनुभवी भाषाविदों के परामर्श से ही प्रत्येक विषय के पर्याय को अंतिम रूप दिया जाता है ताकि आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली को मानक स्वीकृति प्राप्त हो। इन शब्दावलियों पर समय-समय पर अनेक कार्यशालाओं, संगोष्ठियों एवं बैठकों में पुनिर्विचार भी किया जाता है और आवश्यकतानुसार संशोधन एवं परिवर्धन भी।

शब्दावली निर्माण के लिए स्वीकृत सिद्धान्त[संपादित करें]

आयोग द्वारा शब्दावली निर्माण के लिए स्वीकृत सिद्धांतों का सार इस प्रकार है:

  • (१) अंतरराष्ट्रीय शब्दों को यथासंभव उनके प्रचलित अंग्रेजी रूपों में ही अपनाना चाहिए तथा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की प्रकृति के अनुसार ही उनका लिप्यंतरण करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय शब्दावली के अंतर्गत निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं :
  • (ख) तौल और माप की इकाइयाँ तथा भौतिक परिमाण की इकाइयाँ, जैसे डाइन, कैलरी, ऐम्पियर आदि;
  • (ग) ऐसे शब्द जो व्यक्तियों के नाम पर बनाए गए हैं, जैसे मार्क्सवाद (कार्ल मार्क्स), ब्रेल (ब्रेल), बॉयकाट (कैप्टन बॉयकाट), गिलोटिन (डॉ॰ गिलोटिन), गेरीमैंडर (मिस्टर गेरी), एम्पियर (मिस्टर एम्पियर), फारेनहाइट तापक्रम (मिस्टर फारेनहाइट) आदि;
  • (ङ) स्थिरांक, जैसे p, g आदि;
  • (च) ऐसे अन्य शब्द जिनका आमतौर पर सारे संसार में व्यवहार हो रहा है, जैसे रेडियो, पेट्रोल, रेडार, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि;
  • (छ) गणित और विज्ञान की अन्य शाखाओं के संख्यांक, प्रतीक, चिह्न और सूत्र, जैसे साइन, कोसाइन, टेन्जेन्ट, लॉग आदि (गणितीय संक्रियाओं में प्रयुक्त अक्षर रोमन या ग्रीक वर्णमाला के होने चाहिए)।
  • (२) प्रतीक, रोमन लिपि में अंतर्राष्ट्रीय रूप में ही रखे जाएँगे परंतु संक्षिप्त रूप देवनागरी और मानक रूपों से भी, विशेषतः साधारण तौल और माप में लिखे जा सकते हैं, जैसे सेन्टीमीटर का प्रतीक c.m. हिंदी में भी ऐसे ही प्रयुक्त होगा परंतु देवनागरी में संक्षिप्त रूप से.मी. भी हो सकता है। यह सिद्धांत बाल-साहित्य और लोकप्रिय पुस्तकों में अपनाया जाएगा, परंतु विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मानक पुस्तकों में केवल अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक, जैसे cm ही प्रयुक्त करना चाहिए।
  • (३) ज्यामितीय आकृतियों में भारतीय लिपियों के अक्षर प्रयुक्त किए जा सकते हैं, जैसे क, ख, ग, या अ, ब, स परंतु त्रिकोणमितीय फलनों में केवल रोमन अथवा ग्रीक अक्षर प्रयुक्त करने चाहिए, जैसे साइन x, कॉस y आदि।
  • (५) हिंदी पर्यायों का चुनाव करते समय सरलता, अर्थ की परिशुद्धता और सुबोधता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुधार-विरोधी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए।
  • (६) सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों में यथासंभव अधिकाधिक एकरूपता लाना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए और इसके लिए ऐसे शब्द अपनाने चाहिए जो -
  • (क) अधिक से अधिक प्रादेशिक भाषाओं में प्रयुक्त होते हों, और
  • (७) ऐसे देशी शब्द जो सामान्य प्रयोग के पारिभाषिक शब्दों के स्थान पर हमारी भाषाओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे telegraph/telegram के लिए तार, continent के लिए महाद्वीप, post के लिए डाक आदि इसी रूप में व्यवहार में लाए जाने चाहिए।
  • (८) अंग्रेजी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी आदि भाषाओं के ऐसे विदेशी शब्द जो भारतीय भाषाओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे टिकट, सिगनल, पेंशन, पुलिस, ब्यूरो, रेस्तरां, डीलक्स, आदि इसी रूप में अपनाए जाने चाहिए।
  • (९) अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का देवनागरी लिपि में लिप्यन्तरण : अंग्रेजी शब्दों का लिप्यंतरण इतना जटिल नहीं होना चाहिए कि उसके कारण वर्तमान देवनागरी वर्णों में नए चिह्न व प्रतीक शामिल करने की आवश्यकता पड़े। शब्दों का देवनागरी लिपि में लिप्यंतरण अंग्रेजी उच्चारण के अधिकाधिक अनुरूप होना चाहिए और उनमें ऐसे परिवर्तन किए जाएं जो भारत के शिक्षित वर्ग में प्रचलित हों।
  • (१०) लिंग : हिंदी में अपनाए गए अंतर्राष्ट्रीय शब्दों को, अन्यथा कारण न होने पर, पुल्लिंग रूप में ही प्रयुक्त करना चाहिए।
  • (११) संकर शब्द : पारिभाषिक शब्दावली में संकर शब्द, जैसे guaranteed के लिए ‘गारंटित’, classical के लिए ‘क्लासिकी’, codifier के लिए ‘कोडकार’ आदि, के रूप सामान्य और प्राकृतिक भाषाशास्त्रीय प्रक्रिया के अनुसार बनाए गए हैं और ऐसे शब्दरूपों को पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकताओं, यथा सुबोधता, उपयोगिता और संक्षिप्तता का ध्यान रखते हुए व्यवहार में लाना चाहिए।
  • (१२) पारिभाषिक शब्दों में संधि और समास : कठिन संधियों का यथासम्भव कम से कम प्रयोग करना चाहिए और संयुक्त शब्दों के लिए दो शब्दों के बीच हाइफन ( - ) लगा देना चाहिए। इससे नई शब्द-रचनाओं को सरलता और शीघ्रता से समझने में सहायता मिलेगी। जहाँ तक संस्कृत पर आधारित आदिवृद्धि का संबंध है, ‘व्यावहारिक’, ‘लाक्षणिक’ आदि प्रचलित संस्कृत तत्सम शब्दों में आदिवृद्धि का प्रयोग ही अपेक्षित है। परंतु नवनिर्मित शब्दों में इससे बचा जा सकता है।
  • (१२) हलन्त : नए अपनाए हुए शब्दों में आवश्यकतानुसार हलन्त का प्रयोग करके उन्हें सही रूप में लिखना चाहिए।
  • (१४) पंचम वर्ण का प्रयोग : पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करना चाहिए परन्तु lens, patent आदि शब्दों का लिप्यंतरण लेंस, पेटेंट/पेटेण्ट न करके लेन्स, पेटेन्ट ही करना चाहिए।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]