वार्ता:कालिंजर दुर्ग

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यह पृष्ठ कालिंजर दुर्ग लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें।

लेखन संबंधी नीतियाँ

लाल कड़ियाँ[संपादित करें]

लेख से जुड़े साँचा:भारत के दुर्ग में बहुत लाल कड़ियाँ हैं। निर्वाचित लेख के लिये इसे हटानी होगी या तो उनके ककम से कम आधार स्तर के लेख बनाने होंगे।--☆★आर्यावर्त (✉✉) 10:59, 3 अप्रैल 2017 (UTC)

टिप्पणी[संपादित करें]

@आशीष भटनागर: जी, मुझे लगता है कि "आवागमन" वाले अनुभाग को "ग्रंथों में वर्णन" के ऊपर स्थानांतरित कर देना चाहिए, ताकि लेख का flow बना रहे। इसके अलावा कुछ छोटे-मोटे बदलाव खुद भी किये हैं। एक बार देख लें, और अगर कुछ अनुचित हो, तो पूर्ववत कर दें। धन्यवाद। - सायबॉर्ग (वार्ता) 01:38, 19 मई 2018 (UTC)

प्रायः आवागमन अनुभाग लगभग अन्त में ही सन्दर्भ आदि के ऊपर स्थित रहता है, इसीलिये वहां जोडा था। किन्तु आप सही कह रहे हैं, उत्सव आदि अनुभागों के बाद तारतम्य टूट जाता है यदि आवागमन के स्थान पर ग्रन्थ आदि आ जायें और फ़िर आवागमन आये। अतः आप जोड दीजिये, मैं अभी मोबाइल पर हूं, आवागमन तो ग्रन्थों में वर्णन के ऊपर, और ग्रन्थों के बाद सन्दर्भ ग्रन्थ एवं टीका ..। एकदम सही रहेगा। उत्तम सुझाव का धन्यवाद।--आशीष भटनागरवार्ता 01:56, 19 मई 2018 (UTC)
YesY पूर्ण हुआ। - सायबॉर्ग (वार्ता) 02:08, 19 मई 2018 (UTC)

काल जय[संपादित करें]

@आशीष भटनागर जी, लेख में इतिहास>पौराणिक इतिहास वाले अनुभाग में लिखा है कि, कालिंजर अर्थात समय का विनाशक – काल: अर्थात समय, एवं जय : अर्थात विनाश। जो सही नहीं है। काल=समय ये तो सही है परंतु जय=विनाश नहीं होता। वास्तव में जिसका समय भी विनाश नहीं कर सकता ये कालिंजर है। जिसने काल पर विजय प्राप्त कर लिया है। जैसे रामायण एक कालजयी कृति हैं, लाखों वर्षों के बाद भी उनका विनाश नहीं हुआ। ये स्थल भी ऐसा ही है जो सत्ययुग, द्वापर, त्रेता, कलि सभी युग में रहा और आज भी है। इसमें समय का विनाश अभिप्रेत नहीं है परंतु समय के साथ भी विनाश न होना, समय/काल के द्वारा भी विनाश न कर पाना अभिप्रेत है।--आर्यावर्त (वार्ता) 02:59, 1 जून 2018 (UTC)

@आशीष भटनागर: जी, कृपया इसपर ध्यान दें तो आगे की समीक्षा का कार्य हो सकें।--आर्यावर्त (वार्ता) 02:44, 7 जुलाई 2018 (UTC)
कृपया देखें: कालिंजर अर्थात जिसने समय पर भी विजय पा ली हो – काल: अर्थात समय, एवं जय : अर्थात विजय। -- उपरोक्त सुधार ९ जून को ही सम्पन्न कर दिया गया था। आप आगे की समीक्षा कर सकते हैं।आशीष भटनागरवार्ता 02:59, 7 जुलाई 2018 (UTC)

कुछ चर्चा के लिए प्रश्न[संपादित करें]

नमस्ते आशीष जी, मेरे कुछ प्रश्न निम्नलिखित हैं:

  1. लेख के ज्ञानसन्दूक में दुर्ग, गुफाएं & मन्दिर लिखा हुआ है। यहाँ & चिह्न के स्थान पर और लिखना कैसा रहेगा?
    1. & को सुधारा गया।
  2. लेख में कई स्थानों पर कालिंजर और कई जगह कालिन्जर शब्द काम में लिया गया है। कृपया इसको एकरूप किया जाये।
    1. अधिकांश स्थानों पर एकरूप कालिंजर किया, मात्र एक स्थान पर कालिन्जर लिखा है जो संस्कृत का संधि विच्छेद होने के कारण लिखा है।
  3. लेख में कुछ कड़ियाँ काम में ली गयी हैं जैसे: कालभैरव, हलाहल, सागर, भरत, व्यास और नीलकण्ठ। इनमें से अधिकतर बहुविकल्पी पृष्ठ हैं और सबसे अन्त वाला अनुप्रेषित। ऐसे बहुविकल्पी और अनुप्रेषित लेखों की कड़ियाँ देने का क्या प्रयोजन है?
    1. कालभैरव = भैरव,
    2. हलाहल को कालकूट नाम से बनाया गया है तथा दोनों के ही एक अर्थ हैं, किन्तु अलग अलग ग्रन्थों में इसे अलग नामों से लिखा गया है, अतः इसके लेख के नाम को एक ही नाम देकर दूसरे को उस पर प्रेषित किया गया है।
    3. सागर = सागर (जलनिकाय)
    4. भरत == भरत (महाभारत)
    5. व्यास = वेदव्यास
    6. नीलकण्ठ = शिव
  4. लेख में gajabdunia.com, samaylive.com और grihshobha.in नाम के तीन सन्दर्भ टूटे हुये सन्दर्भ हैं अर्थात् सम्बंधित लिंक अब उपलब्ध नहीं है। कृपया ऐसे सन्दर्भों को सुधारें।
    1. तीनों मृत कड़ियां आर्काइव यूआरएल से सुधार दी गईं हैं।
  5. लेख में विभिन्न स्थानों पर कुछ शब्दों को गहरा किया गया है, जिसका कोई कारण समझ में नहीं आता। अपनी परम्परा के अनुसार लेख के शीर्षक से जुड़े शब्दों को ही कुछ स्थानों पर गहरा किया जाता है। इसके अतिरिक्त साँचों से भी गहरे शब्द आ सकते हैं।
    1. लेख के शीर्षक को आवश्यक रूप से गहरा किया जाता है, किन्तु मात्र उसी को गहरा किया जाए, ऐसा कोई विधान नहीं है। आप आवश्यकतानुसार किसी शब्द को जोर देने, ध्यानाकर्षण के लिए, आदि उद्देश्यों से भी गहरा कर सकते हैं। इसके लिये कोई परम्परा नहीं विवेक का प्रयोग करें।
  6. ग्रन्थों में वर्णन अनुभाग के उपानुभाग "पौराणिक" की अन्तिम पंक्ति में "कालिंजर महात्म्य" को छोड़कर सभी को विकि-कड़ी से जोड़ा गया है। क्या कालिंजर महात्म्य उल्लेखनीय नहीं है?
    1. कालिंजर महात्म्य पर लेख उपलब्ध नहीं है, अन्य ग्रन्थों के लेख उपलब्ध थे, अतः अन्य ग्रन्थों की विकि कडियां जोड दी गयीं, इसकी छोड दी गयी। कडी देने से उल्लेखनीयता का कोई सम्बन्ध नहीं है।
  7. इसी प्रकार इसी अनुभाग में दिये गये श्लोंको का अर्थ नहीं देने के कारण यह अनुभाग प्रयोग रहित प्रतीत होता है।
    1. पौराणिक अनुभाग में दिये गए सभी श्लोकों के अर्थ से लेख सम्बन्धित भाग दिया गया है। पूरे श्लोक के अर्थ की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये श्लोक मात्र कालिञ्जर के पौराणिक सन्दर्भों के लिये दिये गए हैं।
  8. लेख में अभी भी वर्तनी सम्बंधी त्रुटियों की भरमार है। लाघव चिह्न के स्थान पर डॉट का प्रयोग चल रहा है।
    1. बिन्दुओ को लाघव से बदला गया।
  9. चित्र दीर्घा के चित्रों का कोई भी वर्णन नहीं दिया गया है।
    1. कृपया ध्यानपूर्वक देखें, सभी चित्रों के वर्णन दिये गए हैं।

यह प्रारम्भिक समीक्षा है। उपरोक्त सुधार होने के पश्चात् कृपया पुनः सूचित करें। जिससे लेख की गहन समीक्षा हो सके।☆★संजीव कुमार (✉✉) 14:29, 4 जुलाई 2018 (UTC)

नमस्कार @संजीव कुमार: जी!
सर्वप्रथम तो समीक्षा हेतु धन्यवाद। तदोपरान्त आपके समीक्षा बिन्दुओ का बिन्दुवार सुधार/निराकरण उपरिलिखित प्रस्तुत है।आशीष भटनागरवार्ता 02:22, 7 जुलाई 2018 (UTC)

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@आशीष भटनागर: लम्बे समय तक की देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ:
  1. हाँ, यह सही हो ग्या।
  2. अभी मैंने लेख में देखा कि एक सन्दर्भ में कालिन्जर लिखा हुआ है। जबकि जब दैनिका जागरण के सन्दर्भ को खोलकर देखा तो उसमें कालिंजर लिखा हुआ है। इसके अतिरिक्त संस्कृत में तो कालिन्जर शब्द शुद्ध ही नहीं है, यह कालिञ्जर होना चाहिये।
    1. हां पन्चमाक्षर नियम के अनुसार आपकी बात सही है, किन्तु ये संस्कृत उद्धरण कहीं किसी के लिखे हुए इंटरनेट या पुस्तक से लिये गए हैं, अतः जैसे के तैसे प्रयोग किये गए हैं - कोई बदलाव नहीं किया है। वैसे संस्कृत में इसे कालन्जर कहा गया है। इसे कालञ्जर भी लिखा जा सकता है, किन्तु पंचमाक्षर प्रयोग वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं - जो चाहे करे, न चाहे न करे - वैसे आप चाहें तो मैं बदल भी सकता हूं, या आप भी बदल सकते हैं।
  3. अनुप्रेषण वाला भाग अभी सही है।
  4. सन्दर्भ कड़ियाँ ठीक दिखाई दे रहे हैं। लेकिन सन्दर्भों को लिखने का तरिका ठीक नहीं है। समय मिलेगा तो उसमें मैं सुधार कर दूँगा।
  5. शब्दों को गहरा करना सामान्य विवेक में नहीं आता। हिन्दी व्याकरण में शब्दों को गहरा करने का उल्लेख नहीं मिलता। हाँ, अवतरण चिह्नों का प्रयोग जरूर किया जाता है।
    1. नवऊखल और नीलकंठ - केवल दो ही शब्द गह्जरे थे - इन्हें सामान्य कर दिया गया।
  6. यदि "कालिंजर महात्म्य" पर्याप्त उल्लेखनीयता रखता है तो उल्लेखनीयता के आधार पर लाल-कड़ी दी जा सकती है। कड़ी विहिन रखना उचित प्रयोग कैसे हुआ?
    1. ये उल्लेखनीय तो है, किन्तु अभी तक कोई लेख उपलब्ध नहीं है, अतः कड़ी नहीं दी गयी थी। इस विषय में पर्याप्त पाठ भी उपलब्ध नहीं हुआ, अन्यथा लेख तो बना भी देते।
  7. श्लोकों को अर्थ नहीं देने के कारण यह अनुभाग अर्थहीन सा प्रतीत होता है। चूँकि हम श्लोकों की व्याख्या अथवा पल्लवन नहीं कर रहे फिर भी कम से कम जितना लघु दिया जा सके, उनका अनुवाद देना उचित रहता। चूँकि निर्वाचित लेख पढ़कर पाठकों को समझ नहीं आये जबकि पाठक अच्छी हिन्दी जानता हो, थोड़ा लेख की गुणवता का नकारात्मक पक्ष होगा।
    1. यदि आप "ग्रन्थों में वर्णन" अनुभाग की बात कर रहे हैं, तो वहाम लगभग सभी श्लोकों के अर्थ के सन्दर्भित अंश दिये गए हैं।
  8. सन्दर्भ ग्रन्थ व टीका अनुभाग में अभी भी कुछ डॉट (.) रखे हुये हैं। भूगोल नामक अनुभाग में मीटर को कहीं मी॰ (लाघव चिह्न के साथ), मी (बिना लागव चिह्न के) और मी° (डिग्री का चिह्न) लिखा है इसका कोई उद्देश्य या भूलवश?
    1. ग्रन्थ अनुभाग में सुधार किये गए। भूगोल में भी सुधार किया।
  9. हाँ, माउस चित्र पर लेकर जाने पर वर्णन दिखाई देता है, शायद मैं कोई बीटा उपकरण काम में ले रहा हूँ उस कारण नहीं दिखाई दिये। मतलब यह समस्या नहीं है।
    1. यह कोई समस्या नहीं है, केवल चित्र दीर्घा की एक शैली है, जिसका प्रयोग आपने शायद पहले देखा नहीं है, अतः कुछ गड़बड़ लग रही होगी। इस तरह चित्र कम स्थाण में सटाकर दीर्घा बनायी जाती है, और पाठ चाहें तो होवर करने पर दिखेगा, अन्यथा छिपा रहेगा।
  10. इसके अतिरिक्त कुछ और बिन्दु सामने रख रहा हूँ: लेख में वर्तनी की एकरूपता नहीं है जैसे: कुण्ड और कुंड दोनों शब्द बहुतायत में प्रयुक्त हैं, कृपया कोई एक वर्तनी काम में लें, जो भी उचित हो।
    1. सभी कुंडों को कुण्ड में बदल दिया गया।
  11. सप्त द्वार, मध्यकालीन ग्रन्थ और ब्रिटिश काल में कोई सन्दर्भ नहीं दिया गया। शायद यह पूरा अनुभाग ही इस पीडीऍफ़ फाइल से लिये गये हैं।
    1. सप्त द्वार में तो सन्दर्भ है।
    2. ब्रिटिश काल के ग्रन्थ और मध्य कालीन ग्रन्थ: - इसका एक ही सन्दर्भ है- तो उसे बार बार अनावश्यक लगाना उचित नहीं लगा - एक बार ही लगा दिया- शोधगंगा।
  12. लेख के आकार को देखते हुये भूमिका बहुत छोटी है, वैसे भूमिका को बाद में भी चर्चा करके बढ़ाया जा सकता है।
    1. भूमिका में कुछ विस्तार किया है।
हिन्दी भाषा और वर्तनी की गलतियाँ मैं नहीं देख सकता क्योंकि उनमें मैं स्वयं को अपूर्ण पाता हूँ।☆★संजीव कुमार (✉✉) 19:56, 16 सितंबर 2018 (UTC)
मैंने आशीष जी को यहाँ पिंग किया है। हालांकि निर्वाचित लेख समुदाय का सामुहीक कार्य है अतः अन्य पाठक/लेखक भी लेख में कारण सहित सुधार कर सकते हैं।☆★संजीव कुमार (✉✉) 19:58, 16 सितंबर 2018 (UTC)
@संजीव कुमार: जी, आपके समीक्षा करने एवं सुझावों का साधुवाद। उन पर अमल कर सुधार कर दिये गए हैं। आगे की प्रतीक्षा है, हालांकि लेख बनाये हुए अधिक समय हो जाने से स्मृति से उतरता जा रहा है, फिर भी सभी संभव सुधार कर दिये गए हैं।आशीष भटनागरवार्ता 02:18, 17 सितंबर 2018 (UTC)
किसी कारण से मैंने अपना वाक्य वापस हटा दिया है। अभी कुछ सुधार करूँगा उसके बाद आगे की टिप्पणी करूँगा।☆★संजीव कुमार (✉✉) 11:30, 17 सितंबर 2018 (UTC)

आर्यावर्त की समीक्षा-२[संपादित करें]

आशीष जी,

  • इतिहास अनुभाग के राजवंशों के आधीन नामक उपअनुभाग में तृतीय अनुच्छेद में 'महात्मा बुद्ध (५६३-४८० ई॰पू॰) के समय यहाँ चेदि वंश का आधिपत्य रहा। महात्मा बुद्ध की यात्रा के वर्णन में उनके कालिंजर आने का भी उल्लेख है' ऐसा लिखा हुआ है। एक ही वाक्य में दो बार महात्मा बुद्ध पृष्ठ की कड़ीं जोड़ी है। कृपया एक बार ही जोड़ें। महात्मा बुद्ध पृष्ठ अनुप्रेषित पृष्ठ है जिनकी कड़ीं जोड़ी है। इसके बदले [[महात्मा बुद्ध|गौतम बुद्ध]] होना चाहिए। वैसे महात्मा बुद्ध के बदले भगवान बुद्ध नाम अधिक प्रचलित है।
  • सम्पन्न
  • उत्सव व मेला अनुभाग में प्रथम उपनुभाग कतकी मेला है और नीचे दिए गए मुख्य लेख का शीर्षक कतिकी मेला है। दोनों में से कोई एक वर्तनी रखें जिससे पाठक भ्रमित न हो अथवा कतकी मेला या कतिकी मेला ऐसा लिखना चाहिए।
  • सम्पन्न
  • आवागमन अनुभाग में एक भी सन्दर्भ नहीं दिया गया है। कृपया बस, ट्रेन, हवाईजहाज ये तीनों के लिए कम से कम एक सन्दर्भ जोड़ दीजिये जो आपको नेट से ही मिल जाएंगे।
  • आवागमन के लिये किसी सन्दर्भ की आवश्यकता नहीं समझता। लगे तो बुरा नहीं और न लगें तो कमी नहीं। हां कोई विशेष तथ्य दिया हो तो सन्दर्भ लगा सकें तो बेहतर होगा, तो ऐसा यहां कुछ दिया नहीं है।
  • चित्र दीर्घा में चित्र अस्तव्यस्त दिख रहे हैं कृपया उसे ठीक करें।
  • चित्र दीर्घा तो भली-भांति व्यवस्थित है, आपके मानीटर के रिज़्यालूशन के अनुसार ढल नहीं पाई होगी, वर्ना मुझे अपने क्रोमबुक, एवं डेस्कटाप पर एकदम सही दिखाई दे रही है। इस दीर्घा सांचे में चित्र मानीटर के आयाम अनुसाऋ स्वतः ही व्यवस्थित होते हैं, और उनके ऊपर माउस होवर करने से पाठ भी दृश्य होता है।
  • इतिहास अनुभाग में पौराणिक इतिहास नाम के उपनुभाग के द्वितीय अनुच्छेद में १६वीं शताब्दी के फारसी इतिहासवेत्ता फिरिश्ता के अनुसार, कालिंजर नामक शहर की स्थापना किसी केदार राजा ने ७वीं शताब्दी में की थी' ऐसा वाक्य है। इसमें फिरिश्ता में दूसरे विकि का लेख कडिबद्ध किया गया है। ऐसा करने से पाठक हिंदी से सीधे ही अंग्रेजी विकि पर चले जाते हैं। अंग्रेजी विकि की कड़ीं जोड़ने से अच्छा है कि आप इस लेख को हिंदी में बना दें।
  • ऐसा कोई नियम तो नहीं है कि किसी लेख में एक भी बाहरी कड़ी नहीं लगायी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इसका सीमित प्रयोग भी मान्य होता है, अन्यथा ऐसा प्रावधान ही क्यों किया जाता कि कोई अन्य विकि आदि की कड़ी प्रयोग कर पाए। फिर भी फ़िरिश्ता की कड़ी हटा दी है। फ़िरिश्ता लेख बना दिया है।
  • इतिहास अनुभाग के शिलालेख व प्रशस्तियाँ नाम के उप अनुभाग में भगवान राम पृष्ठ को कडिबद्ध किया गया है जो एक अनुप्रेषित पृष्ठ है। इसके बदले [[राम|भगवान राम]] का उपयोग करना चाहिए।
  • सम्पन्न

समयाभाव के कारण आगे की समीक्षा इसके बाद की जाएगी।--आर्यावर्त (वार्ता) 04:14, 17 जुलाई 2018 (UTC)

आर्यावर्त जी, आपकी समीक्षा हेतु धन्यवाद। अधिकांश बिन्दुओ पर अमल कर दिया गया है।आशीष भटनागरवार्ता 14:03, 25 जुलाई 2018 (UTC)
@आशीष भटनागर: जी, अधिकांश बिंदुओं पर कार्य करने हेतु धन्यवाद। मेरे हिसाब से लेख अभी भी निर्वाचित बनने से बहुत दूर है। हम सब इसे निर्वाचित बनाने हेतु ही प्रयत्नशील हैं। कोई निर्वाचित घोधीय कर दें इससे घोषित तो हो ही जायेगा परंतु वास्तविकता में लेख उनकी कड़ी समीक्षा और समीक्षा के ऊपर की गई कार्यवाही से ही बनता है।
  • आपने लिखा है कि आवागमन के लिए सन्दर्भ देना उचित नहीं समझता! मैं समझाता हूँ कि ये क्यों उचित है। विकिपीडिया में कोई भी संपादन कर सकता है और कोई कुछ भी जानकारी जोड़ देता है। ये सही है या नहीं इसकी जाँच पाठक स्वयं करले इसके लिए ही विकिपीडिया में सन्दर्भ जोड़ने का प्रावधान है। आपने आवागमन के लिए जो जानकारी भरी है ये सही है ये आप जानते हैं, मैं भी जानता हूँ। लेकिन हमारे हजारों पाठक नहीं जानते। विकिपीडिया की प्रकृति के अनुसार एक लेख में अनेक सदस्य संपादन करते हैं। सभी सही जानकारी जोड़ेंगे ये संभव नहीं है। इस प्रकार आवागमन अनुभाग में सन्दर्भ न जोड़ने की प्रथा से गलत जानकारी को भी छद्म रूप से समर्थन मिल जाता है। आपको लगता है कि आवागमन अनुभाग में सन्दर्भ नहीं जोड़े जाते तो कृपया अंग्रेजी विकि के इस लेख की कड़ीं देखिए। श्रीमद भगवद्गीता में भगवान ने कहाँ है कि:-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थात-श्रेष्ठ मनुष्य जो जो आचरण करता है दूसरे मनुष्य वैसावैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

इसप्रकार निर्वाचित लेख में हम उसी को पसंद करते हैं जो श्रेष्ठ है, अनुकरणीय हैं। तभी ये लेख वास्तविकता में एक आदर्श निर्वाचित लेख बनेगा। व्यक्ति के रूप में भी आप एक श्रेष्ठ प्रबंधक हैं, आप आज जो करेंगे उसे देखकर दूसरे सदस्य भी आपका अनुकरण करेंगे अतः हे श्रेष्ठ आवागमन विभाग में सन्दर्भ जोड़ने से आपको पीछेहठ करना शोभा नहीं देता। निर्वाचित लेख में आवागमन विभाग में सन्दर्भ के साथ जानकारी हो और कहां से कितने किमी की दूरी है ये सब विस्तृत जानकारी होनी चाहिए।--आर्यावर्त (वार्ता) 04:58, 26 जुलाई 2018 (UTC)

लीजिये लगा दिये।आशीष भटनागरवार्ता 14:51, 26 जुलाई 2018 (UTC)

गॉड्रिक की कोठरी की समीक्षाएं[संपादित करें]

  1. "ग्रीष्म काल में कड़ी गर्मी पड़ती है व यहाँ भीषण लू हवाएं चलती हैं।" लू अपने आप में एक पवन/हवा है जो अरब से आती हैं इसलिये हवाएं शब्द हटा लें यह अतिश्योक्ति है।
    1. हटा दिया और लू मं कड़ी भी जोड़ दी।
  2. नदी का नाम बानगंगा है बाणगंगा?
    1. मूल शब्द बाणगंगा ही है, जिसे तद्भव रूप में बानगंगा कर दिया गया होगा। वैसे एकरूप कर दी हैं।
  3. "मेवातपति से वापस जाते हुए दुर्ग पर आधिपत्य प्राप्त किया किन्तु वह भी उसे रख नहीं पाया।" मेरे विचार से यहाँ नियंत्रण नहीं रख पाया होना चाहिये।
    1. हां आशय अधिकार या नियन्त्रण से ही है, किन्तु वाक्य में पुनरावृत्ति से बचने हेतु लिखा है कि उसने आधिपत्य प्राप्त किया किन्तु वह भी उसे (आधिपत्य या नियन्त्रण को) रख नहीं पाया।
  4. मेरा मानना है कि तिथियों में विकिकड़ी होना अनावश्यक है। किसी में न रखें अन्यथा सभी तिथियों में लगाये।
    1. मेरा भी यही मानना था, कि सभी तिथियां एकरूप हों, कड़ी अथवा नहीं; किन्तु बाद में ज्ञात हुआ कि जिस तिथि के पृष्ठ पर उस घटना की प्रविष्ति हो उसे तो अवश्य ही कड़ी से जोड़ा जाता है। अर्थात २२ मई पृष्ठ पर एवं १५४५ में यह प्रविष्टि हो।
  5. "मुस्लिम शासकों द्वारा इस दुर्ग पर वर्चस्व प्राप्त करने हेतु बड़े-बड़े आक्रमण हुए हैं, एवं इसी कारण से यह दुर्ग एक शासक से दूसरे के हाथों में चलता चला गया।" चलता चला गया एक अजीब शब्द है इसके स्थान पर "जाता रहा" उपयोग करें।
    1. यह शब्द युग्म तो आम बोलचाल में भि काफ़ी प्रयोग होता है - चलता चला गया अर्थात एक से दूसरे फ़िर तीसरे, और आगे भी ..। जाता रहा उसके अधिकार के स्थानांतरण की गति को उतना बल नहीं दे पायेगा, जितना चलता चला गया - अर्थात अधिकार गतिमान रहा। या कोई तीसरा बेहतर विकल्प भी ढूंढ सकते हैं।
  6. संस्कृत श्लोकों को छोड़कर कलिन्जर को कालिंजर करें। (एकरूपता हेतु)
    1. लीजिये एक कालिन्जराधिपति के अलावा कोई कालिन्जर नहीं बचा - सभि जगह कालिंजर हो गया।

यह कुछ सुझाव हैं। और समीक्षा के बाद हो सकता है कुछ और भी सुधार सुझाये जाये।-- गॉड्रिक की कोठरीमुझसे बातचीत करें 14:44, 5 सितंबर 2018 (UTC)

समीक्षा हेतु धन्यवाद। यथासम्भव सुधार भी कर दिये हैं।आशीष भटनागरवार्ता 01:51, 6 सितंबर 2018 (UTC)
कार्यवाही और उत्तर के लिये धन्यवाद! अब मुझे नहीं लगता कि इस लेख में विवादास्पद वर्तनियों को छोड़कर कोई बड़ी समस्या बची है। मैं भी इसे दूर करने का यथासंभव प्रयास करूंगा। @आशीष भटनागर: जी आप भी इन वर्तनियों को खोजिये तथा इस पर कार्यवाही कीजिये, अगले १० दिनों में यह लेख निर्वाचित हो सकता है। मैंने देखा अभी भी कई जगह मंदिर लिखा है जबकि इसे मन्दिर होना चाहिये। @संजीव कुमार: जी आप भी अपनी शेष समीक्षाएँ कर दें।-- गॉड्रिक की कोठरीमुझसे बातचीत करें 12:43, 16 सितंबर 2018 (UTC)
@Godric ki Kothri: जी, लगभग सभी मंदिरों को मन्दिर से बदल दिया गया है। इसके अलावा मन्दिर पञ्चाक्षर प्रयोग पर ध्यान देने हेतु विशेष धन्यवाद।आशीष भटनागरवार्ता 03:02, 17 सितंबर 2018 (UTC)
मेरे विचार से आवश्यक नहीं कि लेख को निर्वाचन के तुरन्त बाद ही मुखपृष्ठ पर लगाया जाए। आप चाहें तो निर्वाचित घोषित कर अगले बदलाव तक २-३ माह के लिये रिज़र्व रख रकते हैं। इस बारे में अन्य लोगों की राय भी ली जा सकती है। चौपाल पर राय एक्स्प्लोर करके देख लें।आशीष भटनागरवार्ता 03:06, 17 सितंबर 2018 (UTC)

समीक्षा भाग-2[संपादित करें]

@आशीष भटनागर: जी, जैसे कि मैंने आपसे निजी वार्तालाप में वादा किया था, मैंने सन्दर्भों को जाँचा।

  • कई स्थानों पर सन्दर्भों में अंकों की एकरूपता नहीं थी जिसे स्वयं मैंने देवनागरी अंकों में किया।
  • सन्दर्भ संख्या 10 में बुन्देलखण्ड.इन के सन्दर्भ में जागरण लिखा है इसे हटा देना चाहिये।
    • हटा दिया गया।
  • सन्दर्भ संख्या 25 यूसी न्यूज़ से है, क्या यह उल्लेखनीय है?
    • यूसी ब्राउज़र इसी जालस्थल से सम्बद्ध है और काफ़ी चलता हुआ ब्राउज़र है। उसी कम्पनी का जालस्थल है। इसमें उल्लेखनीयता की संदिग्धता प्रतीत तो नहीं होती।
  • सन्दर्भ संख्या 35 अभिव्यक्ति.इन क्या उल्लेखनीय स्रोत है।
    • अभिव्यक्ति.इन पूर्णिमा जी द्वारा चलायी गयी वेबसाइट है जो साहित्य से सम्बन्धित है।
  • सन्दर्भ संख्या 36 ब्लॉग है, इसे हटाया जाना चाहिये।
    • इस बारे में कुछ चर्चा कर ली जाए तो बेहतर होगा, फ़िर सही लगे तो हटा सकते हैं गलत लगे तो रख सकते हैं, क्योंकि यह एक वृत्तान्त प्रतीत होता है, जिसमें पुराणों आदि के सन्दर्भ दिये गए हैं। ये कोई निजी विचार तो नहीं हैं, किन्तु जैसा तय किया जाए।
  • सन्दर्भ संख्या 46 padhlo.in मृत कड़ी है, हालाँकि यह वेबसाइट ही बंद हो चुकी है। लेकिन यह विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती।
    • इसकी मृत कड़ी पुरालेखित की गयी।
--Prongs31 14:03, 22 फ़रवरी 2019 (UTC)
आपकी पुनर्समीक्षा का अतीव धन्यवाद। आशीष भटनागरवार्ता 16:20, 22 फ़रवरी 2019 (UTC)
@आशीष भटनागर: जी, धन्यवाद लेकिन हिंदुत्व.इन्फो ब्लॉग ही है जिसमे निजी विचार ही प्रकाशित होते हैं परन्तु जहाँ तक मुझे पता है ब्लॉग को सन्दर्भ के रूप में सीमित प्रयोग किया जा सकता है। जैसा आप अपना बिन्दु बता रहे हैं, उससे मुझे लगता है कि शायद यह ब्लॉग सन्दर्भ इस श्रेणी में आता है। padhlo.in इतनी अधिक विश्वसनीय वेबसाइट मुझे नहीं लगती लेकिन फिर भी मैं इसे नजरंदाज करने को तैयार हूँ।--Prongs31 16:37, 23 फ़रवरी 2019 (UTC)

अभी "दिल्ली दूर है"[संपादित करें]

मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेख को निर्वाचित घोषित करने हेतु इतना दबाव क्यों बनाया जा रहा ? मतलब यहाँ तक तय्यार हो जाना कि लोगों की राय लेने के लिए दो-तीन महीने रिजर्व में रखा जा सकता है, परंतु निर्वाचित घोषित होना ज़रूरी है।

दूसरी चीज जो नहीं समझ में आ रही वो हमारे समीक्षकों की दृष्टि है। लेख अभी निर्वाचित बनने से काफ़ी दूर है और समीक्षकों को सामान्य गलतियाँ तक नहीं दिख रहीं। मेरा समीक्षा का पिछला अनुभव अच्छा नहीं रहा इस कारण मैं इससे दूरी बरतता हूँ, पर चावल पकाने की तरह एक दाना (एक पैरा) उठा के तो देख ही सकता हूँ।

पहले पैरा में पहला वाक्य देखें तो लिखने वाले को भारी कन्फ्यूजन इसी बारे में है कि वह किस चीज के बारे में लिख रहा। अंगरेजी का लेख कह रहा कि यह 'a fortress-city' है, जबकि हमारा लेख बता रहा कि कलिंजर कोई नगरी है और उसमें यह ऐतिहासिक दुर्ग स्थित है। जहाँ तक मुझे समझ में आ रहा शहर में किला बना या शहर की किलेबंदी करके उसे किले का रूप दे दिया गया इसमें भरम है। वाक्य का दूसरा हिस्सा इतिहास में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है से क्या अभिप्राय है ? अरे जब किला है तो गाय चराने की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण रहा नहीं होगा। शायद लेखक इसके इस क्षेत्र, प्रदेश, देश अथवा विश्व इतिहास में महत्व को लिखना चाह रहे (जो अप्लाई हो)।

कालिंजर नामक शहर, नगर या कस्बा है जिसमें यह किला या दुर्ग बना है, स्पष्ट है - आपको नज़र नहीं आ रहा तो दृष्टिदोष दूर करें। पूरे शहर की किलेबंदी की गयी - ऐसा कहीं नहीं लिखा है - आप स्वयं भ्रम के घेरे से बाहर निकलें।
सभी दुर्ग ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं होते हैं, कुछ का अत्यधिक महत्त्व रहा है और कुछ गौड़ रहे हैं। कभी इतिहास की पुस्तक ७-९वीं की ही उठा कर देख लें।

दूसरा वाक्य भी भ्रम में होना दिखा रहा, खजुराहो शहर विश्व धरोहर स्थल नहीं है, उस शहर में, और आसपास के मंदिर समूहों को धरोहर का दर्जा दिया गया है। खैर, बांदा जिले में होने के बाद इसकी लोकेशन और स्पष्ट करने के लिए अगर यह लाइन जोड़ी गयी है तो कई नगरों से मानों में दूरी लिखी जाती, अन्यथा यह बताना कि यह खजुराहो के बगल में भी है, बेकार है – वाक्य हटाने लायक है।

दूसरे वाक्य में भी स्पष्ट है कि यह यह विश्व धरोहर स्थल प्राचीन मन्दिर नगरी-खजुराहो के निकट ही स्थित है। - प्रायः कोई पूरा का पूरा नगर धरोहर नहीं होता, तथा किसी को भारत में इसकी स्थिति इंगित करने के लिये किसी प्रसिद्ध स्थान से निकटता बतायी गई है। जिसे खजुराहो की जानकारी लेनी हो तो उसकी कड़ी दी गई है। कृपया ध्यानपूर्वक पढ़ें।

तीसरा वाक्य कलिंजर नगरी का मुख्य महत्त्व विन्ध्य पर्वतमाला के पूर्वी छोर पर इसी नाम के पर्वत पर स्थित इसी नाम के दुर्ग के कारण भी है। साफ़ दिखा रहा कि पुराना भ्रम बरकरार है कि यह लेख शहर के बारे में है या किले के बारे में। ध्यान से पढ़ें लेख ही किले के बारे में है।

लेख किले के बारे में ही है, ये आपके अलावा सभि को शीर्षक से ही स्पष्ट है। यहाम अभिप्राय ये है कि इस नगर का महत्त्व इस दुर्ग के कारण ही है, अन्य कोई विशेष महत्त्व की वस्तु नहीं है, जैसे दिल्ली में बहुत सी महत्त्वपूर्ण स्मारक, इमारतें, व अन्य कारण हैं जो उसे महत्त्वपूर्ण बनाते हैं, आगरा में ताजमहल के अल्वा भी बहुत से महत्त्वपूर्ण स्मारक हैं। किन्तु ये तथ्यपूर्ण बातें हैं, अतः...

चौथा वाक्य यहाँ का दुर्ग भारत के सबसे विशाल... – है न वही बात, अगर भरम नहीं होता तो सीधे लिख लेते कि यह दुर्ग भारत के...

कलिंजर नगरी का मुख्य महत्त्व विन्ध्य पर्वतमाला के पूर्वी छोर पर इसी नाम के पर्वत पर स्थित इसी नाम के दुर्ग के कारण भी है। यहाँ का दुर्ग भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलों में एक माना जाता है।: जब पिछला वाक्य नगरी को इंगित कर रहा है तो अगला वाक्य उस नगरी के दुर्ग को ही बतायेगा।

पाँचवाँ, इस पर्वत को हिन्दू धर्म के लोग अत्यंत..., अब ये क्या है ? अब पर्वत अचानक लेख का मुख्य विषय बनके कहाँ से आ गया ? यह किला जिस पर्वत पर है वह होगा कुछ ख़ास।

हाँ यह वाक्य बदलाव योग्य है।

छठें वाक्य में हलाहल विषपान से का क्या तात्पर्य है ? अगर उस ख़ास विष का नाम हलाहल है तो भी सीधे उसी का पान करा दें कि हलाहल पान से ... या बीच में नामक लगायें क्योंकि बाद में ये दोनों पर्यायवाची के रूप में पहचाने जाने लगे थे; और आगे बढ़ें तो ...भीषण गर्मी तो यहाँ तप कर शांत किया था का क्या मतलब है?, अरे ज़हर का नशा बर्दाश्त करने के लिए आँख बंद कर बैठे होंगे, तप से गर्मी कैसे शांत होगी?

हलाहल विष की श्रेणी होती है। और तप से गर्मी कैसे शांत होगी:- तप करके ही देख लें।

यहाँ के सन्दर्भ अनेक प्राचीन हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में मिलते हैं। मानो ये संदर्भ यहाँ पैदा होते हैं और दूर-दूर तक के धार्मिक ग्रंथो रुपी शहरों में पहुँच का बजार में बेचाते हैं। हुआ तो ग्रंथों में... इस क़िले का तज़किरा... होगा।

और कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ (किले में, शहर में , या पहाड़ पर; ये लेखक तय कर चुके होंगे अब तक) मेला लगता होगा जिसमें शिरक़त करने और दूसरे सूबों से भी लोग आते होंगे।

पहला पैरा का ख़ुर्दबीनी निगाह से समालोचन समीक्षा कर रहे और निर्वाचित घोषित करने को उद्धत कामरेडों के लिए है। नीचे देखें तो कही फीट में मान लिखने को वरीयता दी गयी है कहीं मीटर को; अभिगमन तिथि इंटरनेशनल अंक में है और पृष्ठ संख्या नेशनलिस्ट अंकों में; सुबह सूर्योदय और सांय सूर्यास्त भी दिख रहा, इसी कारण से भी है , "नव(9)ऊखल" यानि सात(7) पवित्र स्थलों में......। ऐसे स्रोत इस्तेमाल हुए हैं और उन्हें विश्वसनीय बनाने के लिए "जागरण" का नाम भी डाल दिया गया है (जो बाद में त्रुटिवश हुआ माना जायेगा) और ऐसे ब्लॉग भी। सबसे मजेदार (फ़्रॉम ६थ सेन्चुरी ए,डी तो १२थ सेन्चुरी ए.डी), जैसी चीजें हैं। "कालन्जरे नीलकण्ठं सरश्वामनुत्तम" में भी पंचमाक्षर टोटके का इस्तेमाल होगा ही, अन्यथा वह मार्ग बतायें जिससे ज से पहले आने वाला यह आधा न मजबूती से अड़ा है। और जाते-जाते, अभिगमन तिथि में २३ अगस्त २०१० भी है और साथ ही 2010-08-23 भी है; सबसे मजेदार कि 23 August 2010 भी बरामद हो गया।
समीक्षकगण इसके बाद भी मरे जा रहे इसे निर्वाचीत घोषीत करने के लिए। --SM7--बातचीत-- 10:56, 17 सितंबर 2018 (UTC)
कोई इन्हें बताये कि नव का अर्थ नौ ही नहीं नवीन भी होता है।
समीक्षा करने क्ला भी कोई ्तरीका होता है, समीक्षा का उद्देश्य लेख में कमियाम पूरा करना होता है, न कि उसकी बुराइयाम करना। पहले भाषा पर संयम रखें, तब समीक्षा कीजियेगा - सही लिखा है आपने - आपके अनुभव सदा ही कटु रहे होंगे। नीम पर आम नहीं उगते। करेले की बेल अवश्य चढ़ जाती है। कुछ कटु लिखा हो तो क्षमा - कोयले की संगत में हाथ भी काले हो ही जाते हैं। आशीष भटनागरवार्ता 14:55, 17 सितंबर 2018 (UTC)

N वर्तमान दशा में लेख बिलकुल इस योग्य नहीं। प्रबंधक ऊपर की टिप्पणियाँ, वर्तमान अवतरण और सदस्य द्वारा दिए गए उत्तरों को देखकर स्वयं तय करें कि मेरे द्वारा बताई गयी गलतियाँ अनुचित हैं या बालक सदस्य का उन पर उत्तर। एक गलती मरे हुए अल्फाज में स्वीकारी भी गयी है और काफी सारी डक भी की गयी हैं। --SM7--बातचीत-- 17:06, 17 सितंबर 2018 (UTC)

PS – संगत अभी ढंग से हुई कहाँ है बबुआ जी ! और समीक्षा गलतियाँ इंगित करने के लिए होती है, सुधारने के लिए ही बिनती करनी थी तो समीक्षा के लिए क्यों प्रस्तुत किये। पहले सुधरवा ही लिए होते; सभी संजीव कुमार तो बन न जायेंगे कि लाओ मैं ही सुधार देता हूँ। कहने का जी तो यही हो रहा है कि कहूँ कि – "यह आदमी अपना लेख निर्वाचित कराने की कोशिस में देस भी बिकने दे सकता है"।--SM7--बातचीत-- 17:06, 17 सितंबर 2018 (UTC)