वर्साय की सन्धि

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
वर्साय की सन्धि का इंगलिश कवर पेज
The Signing of the Peace Treaty of Versailles

वर्साय की सन्धि प्रथम विश्व युद्घ के अन्त में जर्मनी और गठबन्धन देशों (ब्रिटेन, फ्रान्स, अमेरिका, रूस आदि) के बीच में हुई थी।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पराजित जर्मनी ने 28 जून 1919 के दिन वर्साय की सन्धि पर हस्ताक्षर किये।[1] इसकी वजह से जर्मनी को अपनी भूमि के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ा, दूसरे राज्यों पर कब्जा करने की पाबन्दी लगा दी गयी, उनकी सेना का आकार सीमित कर दिया गया और भारी क्षतिपूर्ति थोप दी गयी।

वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपा गया था। इस कारण एडोल्फ हिटलर और अन्य जर्मन लोग इसे अपमानजनक मानते थे और इस तरह से यह सन्धि द्वितीय विश्वयुद्ध के कारणों में से एक थी।

परिचय[संपादित करें]

पेरिस शांति सम्मेलन में अनेकानेक संधियों एवं समझौतों का मसविदा तैयार किया गया और उन पर हस्ताक्षर किये गये, लेकिन इन सभी संधियों में जर्मनी के साथ जो वर्साय की संधि हुई वह अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है और सभी संधि में प्रमुख है। चार महीने के परिश्रम के बाद संधि का मसविदा तैयार हुआ। 230 पृष्ठों में अंकित यह संधि 15 भागों में विभक्त थी और उसमें 440 धाराएँ थीं। 6 मई, 1919 को यह सम्मेलन के सम्मुख पेश हुई और स्वीकृत हो गयी। 30 अप्रैल को ही विदेश-मंत्री काउन्ट फॉन ब्रौकडौफ रान्टाजु के नेतृत्व में जर्मन प्रतिनिधि-मण्डल वर्साय पहुंचा। प्रतिनिधियों को ट्रयनन पैलेस होटल में ठहराया गया। मित्रराष्ट्रों के अफसर उनकी सुरक्षा की देखभाल कर रहे थे। होटल को काँटेदार तारों से घेर दिया गया था और जर्मन प्रतिनिधियों को मनाही कर दी गयी थी कि वे मित्रराष्ट्रों के किसी प्रतिनिधि या किसी पत्रकार से किसी प्रकार का सम्पर्क रखें। 7 मई को क्लिमेशों ने अन्य प्रतिनिधि-मण्डलों के समक्ष, ट्रयनन होटल में, जर्मन प्रतिनिधि मण्डल के सम्मुख संधि का मसविदा प्रस्तुत किया। इस मसविदे पर विचार-विमर्श करने के लिए उन्हें केवल दो सप्ताह का समय दिया गया।

जर्मनी को किसी भी तरह संधि पर हस्ताक्षर करना ही था। जर्मन राजनीतिज्ञों ने गंभीरता के साथ संधि के मसविदे पर विचार किया और 26 दिनों के बाद अपनी तरफ से साठ हजार शब्दों का एक विरोधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया। जर्मनी ने इस बात की शिकायत की थी कि उसने जिन शर्तों पर आत्मसमर्पण किया था, प्रस्तावित संधि में उन सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। उनका कहना था कि जर्मनी की नयी सरकार पूर्ण रूप से प्रजातांत्रिक है और राष्ट्रसंघ की सदस्यता के लिए इच्छुक है। निरस्त्रीकरण की शर्त केवल जर्मनी पर ही नहीं, अपितु समस्त राज्यों पर लागू की जानी चाहिए। विश्वयुद्ध के लिए एकमात्र जर्मनी को जिम्मेदार ठहराना गलत है। जर्मन प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि संधि की सभी शर्तों को मानना असंभव है। एक बड़े राष्ट्र को कुचलकर तथा उसे गुलाम बनाकर स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती।

मित्रराष्ट्रों ने जर्मनी के प्रस्तावों पर विचार किया और कुछ छोटे-मोटे परिवर्तन के बाद जर्मनी को पांच दिनों के भीतर ही संशोधित संधि पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। इस बार जर्मनी को यह अवसर नहीं दिया गया कि वह संधि के मसविदे के संबंध में किसी प्रकार का संशोधन या निवेदन प्रस्तुत कर सके। मित्रराष्ट्रों ने स्पष्ट कर दिया था कि हस्ताक्षर नहीं करने का अर्थ जर्मनी पर पुनः आक्रमण होगा। अंत में जर्मन सरकार ने संधि पर हस्ताक्षर करना स्वीकार कर लिये।

वर्साय की संधि के प्रावधान[संपादित करें]

वर्साय की संधि के बाद जर्मनी के क्षेत्रों का विभाजन : ██ लीग ऑफ नेशन्स द्वारा शासित भूभाग ██ जर्मनी से छीनकर पड़ोसी राज्यों को दिया गया भूभाग ██ विमार जर्मनी (Weimar Germany)

राष्ट्रसंघ[संपादित करें]

राष्ट्रसंघ का निर्माण एवं संगठन वर्साय-संधि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग था। संधि के प्रथम भाग का संबंध इसी से है। यह मूलतः राष्ट्रपति विल्सन का सृजन था। उसका ख्याल था कि राष्ट्रसंघ को शांति-सम्मेलन की सबसे महान कृति होनी चाहिए। लायड जॉर्ज ने लिखा है विल्सन शांति-संधियों के केवल उस भाग को जिसमें राष्ट्रसंघ की व्यवस्था थी, सबसे अधिक महत्व देता था। इसके लिए वह कोई भी त्याग करने के लिए तैयार था और अंत में उसके कठिन प्रयास से ही राष्ट्रसंघ का निर्माण हुआ। विल्सन को छोड़कर मित्रराष्ट्र के अन्य प्रतिनिधियों का यह विचार था कि राष्ट्रसंघ संबंधी बातों को वर्साय-संधि के अंतर्गत रखना आवश्यक नहीं है। अन्ततः विल्सन की बात मान ली गयी और राष्ट्रसंघ के संविधान को वर्साय-संधि के अंतर्गत ही रख दिया गया। वर्साय-संधि की प्रथम 26 धाराएँ राष्ट्रसंघ का संविधान ही है, जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को कायम रखना था।

प्रादेशिक व्यवस्था[संपादित करें]

एल्सस-लॉरेन प्रदेश : वर्साय-संधि द्वारा प्रादेशिक परिवर्तन करके जर्मनी का अंग-भंग कर दिया गया। 1871 में जर्मनी ने फ्रांस से एल्सेस-लॉरेन के प्रदेश छीन लिये थे। सबों ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार किया कि यह एक गलत काम हुआ था और इसका अंत आवश्यक है। अतः संधि की शर्तों के द्वारा एल्सस-लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस दे दिये गये।

राइनलैंड : फ्रांस की सुरक्षा की दृष्टि से जर्मनी के राइनलैण्ड में मित्र राष्ट्रों की सेना 15 वर्षों तक रहेगी तथा राइन नदी के आस-पास के क्षेत्र को स्थाई रूप से निःशस्त्र कर दिया जाए ताकि जर्मनी किसी प्रकार की किलेबंदी न कर सके।

सार क्षेत्र : सार क्षेत्र जर्मनी में कोयला क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रदेश की शासन व्यवस्था की जिम्मेवारी राष्ट्रसंघ को सौंप दी गई किन्तु कोयले की खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया। यह भी तय हुआ कि 15 वर्षों बाद जनमत संग्रह द्वारा निश्चित किया जाएगा कि सार क्षेत्र के लोग जर्मनी के साथ रहना चाहते हैं या फ्रांस के साथ। यदि सारवासी जर्मनी के साथ मिलने की इच्छा प्रकट करें तो जर्मनी फ्रांस को निश्चित मूल्य देकर खानों को पुनः खरीद ले।

बेल्जियम एवं डेनमार्क की प्राप्ति : यूपेन मार्शनेट और मलमेडी का प्रदेश बेल्जियम के अधीन कर दिया गया। श्लेशविग में जनमत संग्रह करके उसका उत्तरी भाग डेनमार्क को दे दिया गया।

जर्मनी की पूर्वी सीमा : जर्मनी को सबसे अधिक नुकसान पूर्वी सीमा पर उठाना पड़ा। मित्र राष्ट्रों ने स्वतंत्र पोलैण्ड राज्य के निर्माण का निर्णय किया। डान्जिंग को स्वतंत्र नगर के रूप में परिवर्तित किया गया और उसे राष्ट्र संघ के संरक्षण में रख दिया गया। पोलैण्ड को समुद्री मार्ग देने के लिए डाजिंग के बंदरगाह का उपयोग करने का अधिकार दिया गया। मेमेल का बंदरगाह जर्मनी से लेकर लिथुआनिया को दे दिया गया। जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया के राज्य को मान्यता दी। इस प्रकार प्रादेशिक व्यवस्था के तहत जर्मनी को 25 हजार वर्ग मील का प्रदेश और 70 लाख की आबादी खोनी पड़ी।

जर्मन उपनिवेश संबंधी व्यवस्था : मित्र राष्ट्र जर्मन उपनिवेशों को अपने-अपने साम्राज्य में मिलना चाहते थे किन्तु विल्सन ने इसका कड़ा विरोध किया। विल्सन के विरोध के कारण मित्र राष्ट्रों ने संरक्षण प्रणाली की शुरूआत की। इसका आशय यह था कि जो देश बहुत पिछड़े हुए है उनका समुचित कल्याण व विकास करना। सभ्य राष्ट्रों में पवित्र धरोहर के रूप राष्ट्रसंघ की ओर से इसकी उन्नति के लिए दिया जाना चाहिए। Mindet व्यवस्था के तहत जर्मनी को अपनी सभी उपनिवेश छोड़ने पड़े और उन्हें मित्र-राष्ट्रों के संरक्षण में रखा गया। प्रशांत महासागर के कई द्वीपों तथा अफ्रीकी महादेशों में स्थित उपनिवेश जर्मनी को खोने पड़े।

सैनिक व्यवस्था[संपादित करें]

जर्मन सेना की अधिकतम संख्या एक लाख कर दी गई। अनिवार्य सैनिक सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हवाई जहाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त नौसेना शक्ति को भी सीमित कर दिया गया। जर्मनी की नौसेना के केवल 6 युद्धपोत रखने की इजाजत दी गई। पनडुब्बियों को मित्र राष्ट्रों को सौंपने की बात की गई। निःशस्त्रीकरण की इस व्यवस्था का पालन करवाने तथा निगरानी रखने के लिए जर्मनी के खर्च पर मित्र राष्ट्रों का एक सैनिक आयोग स्थापित किया गया। इस प्रकार सैनिक दृष्टि से जर्मनी को पंगु बना दिया गया।

आर्थिक व्यवस्था[संपादित करें]

वर्साय संधि की 231वीं धारा के तहत जर्मनी व उसके सहयोगी राज्यों को युद्ध के लिए एक मात्र जिम्मेदार माना गया। अतः मित्रराष्ट्रों को युद्ध में जो क्षतिपूर्ति उठानी पड़ी थी, उसके लिए जर्मनी को क्षतिपूर्ति करने को कहा गया कि 1921 तक जर्मनी 5 अरब डालर मित्रराष्ट्रों को दे। मित्र राष्ट्रों को जर्मनी से कुछ वस्तु के आयात-निर्यात पर विशेष सुविधाएं दी गई। नील नहर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण कर उसे सभी जहाजों के लिए खुला छोड़ दिया गया।

नैतिक दायित्व[संपादित करें]

संधि की 231वीं धारा के अनुसार सारी क्षति और युद्ध के लिए जर्मनी को उत्तरदायी ठहराया गया।

राजनैतिक व्यवस्था[संपादित करें]

राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रसंघ की स्थापना वार्साय की संधि का महत्वपूर्ण अंग थी। विल्सन के प्रभाव के कारण ही राष्ट्रसंघ की धाराओं को वार्साय की संधि में रखा गया। राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सुरक्षा को कायम करना था।

संधि का मूल्यांकन[संपादित करें]

विश्व इतिहास में हुई अनेक संधियों में वर्साय की संधि सर्वाधिक वर्णित और विवादित रही है। वस्तुतः इस संधि ने विश्व इतिहास की धारा को गहरे रूप से प्रभावित किया। इन संधि की तीव्र आलोचना की जाती है और इस द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज के रूप में समझा जाता है। निम्न बिंदुओं के तहत इस संधि की आलोचना को देखा जा सकता है-

1. आरोपित संधि : वार्साय की संधि को “एक लादी गई शांति” की संज्ञा अर्थात् “आरोपित संधि” के नाम से जाना जाता है। संधि को तैयार करते समय सम्मेलन में जर्मनी को स्थान नहीं दिया गया। यह मित्र राष्ट्रों का आदेश था जिसे स्वीकार करने के अतिरिक्त जर्मनी के समक्ष कोई दूसरा उपाय नहीं था। फलतः जर्मन जनता के मन में यह बात बैठ गई कि यह आरोपित संधि है जिसे मानने के लिए वह बाध्य नहीं है। यही वजह है कि जर्मनी ने आगे चलकर संधि प्रावधानों को ठुकरा दिया।

2. जनसाधारण की शांति नहीं, राजनयिकों की शान्ति : वर्साय की संधि में उल्लेखित प्रावधान जनसाधारण के हित और आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सके। इसमें कई ऐसी प्रादेशिक व्यवस्थाएँ थी जिसमें संशोधन की जरूरत थी। क्षतिपूर्ति में कई ऐसे प्रावधान किए गए थे जो यूरोप के औद्योगिक पुनर्जीवन को विनाशकारी आघात पहुचाए बिना वसूल नहीं किए जा सकते थे। इस तरह जनसाधारण की शांति का यह संधि पूरा नहीं करती।

3. कठोर एवं अपमानजनक शर्तें : वार्साय की संधि द्वारा जर्मनी को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, उपनिवेश छीन आर्थिक रूप से पंगु बना दिया गया, आर्थिक संसाधनों पर दूसरे राष्ट्रों का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया और सैनिक दृष्टि से उसे अपंग बना दिया गया। क्षतिपूर्ति की शर्त अत्यंत कठोर एवं अपमानजनक थी। क्षतिपूर्ति की रकम अदा न करने की स्थिति मं जर्मनी के क्षेत्रों पर कब्जा करने की बात की गई। वस्तुतः विजेता राष्ट्र ने प्रतिशोध के तहत कठोर शर्तों को जर्मनी पर लादा। संधि की शर्ते इतनी कठोर थी कि कोई भी स्वाभिमानी, सुसंस्कृत राष्ट्र इसे सहन नहीं कर सकता था। चर्चिल के शब्दों में “इसकी आर्थिक शर्तें इस हद तक कलंकपूर्ण तथा निर्बुद्ध थी कि उन्होंने ने इसे स्पष्टतया निरर्थक बना दिया।”

4. संधि गलत स्थानों पर कठोर तथा गलत तरीके से नरम थी : यह संधि केवल असामान्य रूप से कठोर नहीं थी, वरन् गलत स्थानों पर कठोर तथा गलत तरीके से नरम थी। तथाकथित युद्ध अपराध संबंधी प्रावधानों जर्मनी द्वारा स्वीकृत कराने का प्रयत्न यथार्थ सेपरे था क्योंकि जैसा डेविड थामसन ने कहा ““इस बात का उल्लेख ऐसे मसौदे में शामिल करके जिस पर हस्ताक्षर करने के लिए जर्मन प्रतिनिधि विवश किए गए नैकि उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न नहीं कर सकते थे।”” दूसरे क्षतिपूर्ति की मांग भी असंभव मात्रा में की गई थी और इसकी वृहत् राशि बिना किसी गंभीर विचार किए निश्चित की गई थी। आर्थिक दृष्टि से यह संपदा जर्मनी के लिए चुकाना तथा मित्र राष्ट्रों के लिए प्राप्त करना कैसे संभव होगा, इसका विश्लेषण नहीं किया गया था। निःसंदेह दण्ड और मुआवजे का संपूर्ण आकार अविवेकी और अव्यवहारिक था। उपर्युक्त सभी प्रकार की अनावश्यक कठोरताएं जर्मनी के राष्ट्रीय असंतोष व क्रोध को अभिव्यक्ति करने की उसकी क्षमता के विरूद्ध कोई पृथक् कदम नहीं उठाया गया। यह संधि गलत तरीके से नरम थी, ““सार क्षेत्र”” का राष्ट्र संघ द्वारा 15 वर्ष तक शासन और 1935 में उसे जर्मनी का लौटा देना शायद ही उचित था। राइनलैण्ड पर 15 वर्ष तक मित्र राष्ट्रों का अधिकार भी खोखला सिद्ध हुआ।

5. प्रतिशोधात्मक संधि : विजेता राष्ट्रों ने प्रतिशोधात्मक रवैया अपनाकर कठोर शर्तों को जर्मनी पर लादा। फ्रांस अपनी पुरानी पराजय और अमपान का बदला लेना चाह रहा था उस दृष्टि से संधि में जर्मनी के साथ अधिकतम कठोर प्रावधान किये गए।

6. विश्वासघाती संधि : वार्साय की संधि नैतिक दृष्टि से अनुचित व जर्मनी के साथ विश्वासघात मानी गई। जर्मनी ने विल्सन के 14 सूत्रों के आधार पर युद्ध कर संधि करना स्वीकार किया था लेकिन वार्साय की संधि में विल्सन के इन सूत्रों का खुलेआम उल्लंघन हुआ था। जर्मनी के साथ राष्ट्रीयता के सिद्धांत का पालन नहीं हुआ था। उस पर बहुत सी शर्ते लाद दी गई थी। लेकिन विजेताओं को उससे मुक्त रखा गया है। विल्सन के तीसरे सूत्र के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की समस्त रूकावटे दूर करने का प्रयत्न करना था, किन्तु जर्मनी की सामूहिक स्व्तंत्रता सुरक्षित नहीं थी। उसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वर्षों तक मित्रराष्ट्रों के नियंत्रण में रहा। 14 सूत्रों में सभी राष्ट्रों के शस्त्रों के कमी करने का सुझाव दिया गया था, किन्तु मित्र राष्ट्रों ने अपने शस्त्रों में कमी किए बिना जर्मनी की सैनिक शक्ति को अत्यंत सीमित कर दिया। मित्र राष्ट्रों ने विल्सन के 14 सूत्रों का पालन उसी सीमा तक किया जहाँ तक उन्हें लाभ था। इस तरह वार्साय की संधि में जर्मनी के साथ विश्वासघात किया गया। इस विश्वासघात का बदला लेने के लिए आगे जर्मनी ने युद्ध किया।

7. संधि के प्रणेताओं में वैचारिक संघर्ष : वार्साय की संधि ने तीन बड़ों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस) के विचाराें और उद्देश्यों में संघर्ष की स्थिति मौजूद थी। विल्सन के उच्च परन्तु अव्यावहारिक विचार, क्लिमेंसो के राष्ट्रवादी व यथार्थवादी मांगों तथा लायड जार्ज के अवसरवादी उद्देश्यों के बीच विरोध था, बावजूद इसके वार्साय की संधि पर इनकी सहमति थी जो इनके साम्राज्यवादी व शोषण की मानसिकता को प्रतिबिबिंत करता है। लॉगसन के अनुसार “विल्सन के आदर्शवाद और सम्मेलन के भौतिकवाद में तीव्र विरोध था और ज्यादातर मामलों में भौतिकवाद विजयी रहा।”

8. संघष के नये दौर की शुरूआत : वार्साय की संधि ने यूरोपीय राष्ट्रों के बीच विश्वव्यापाी सत्ता के लिए नए संघर्ष की शुरूआत की। 1919 तक अन्तर्राष्ट्रीय विधि किसी देश की सरकार तथा उसके नागरिकों की संपत्ति में भेद मानती थी। किन्तु वार्साय की संधि के अनुसार युद्धरत देश अपने तथा अपने मित्र राष्ट्रों की सीमा में किसी शत्रु देश के व्यक्ति की किसी प्रकार की संपति जब्त कर सकता था। यदि वह युद्ध में विजयी हुआ तो पराजित देश की सरकार को अपने नागरिकों की इदस प्रकार जब्त की गई संपत्ति की क्षतिपूर्ति करने के लिए बाध्य कर सकता था। यह एक नया दृष्टांत था।

9. वाइमर गणतंत्र के प्रति घृणा : युद्ध के बाद जर्मनी में वाइमर गणतंत्र की स्थापना हुई और उसे वार्साय की संधि से जोड़कर देखा गया। तमाम उदारवादी विशेषताओं के बीच इसे शत्रु पक्ष द्वारा स्थापित संस्था माना गया। इसलिए जर्मनी में प्रजातंत्र आरंभ से ही द्वन्द्व, घृणापात्र व शत्रुपक्ष की व्यवस्था बन गया।

10. आत्मनिर्णय के सिद्धांत की अवहेलना : इटली की सीमाएं राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर निर्धारित नहीं की गई, न ही पोलैण्ड की भूमि पर सभी नागरिक निर्विवादित रूप से पोल थे। इसी प्रकार तुर्की के साम्राज्य के भागों को सुरक्षित संप्रभुता का वचन नहीं दिया गया। राष्ट्रसंघ विशाल व लघु राज्यों के समान राजनीतिक संप्रभुता दिलाने में असमर्थ रहा। इस संधि के नैतिक पक्ष व युक्ति संगतता के विषय में ए.जे.पी. टेलर का कथन है कि “प्रारंभ से ही वार्साय की संधि में नैतिक मान्यता का अभाव था। जर्मनी के विषय में आत्म निर्णय के सिद्धांत की अवहेलना की गई। राष्ट्रपति विल्सन के आत्मनिर्णय के सिद्धांत के अनुसार यूरोप के अनेक राष्ट्रों का पुनर्गठन किया गया था। इससे अनुसार एक ही राष्ट्र जाति, एक ही भाषा एवं सांस्कृतिक परंपरा वाले लोगों को मिलाकर उनका पृथक तंत्र बनाने का निश्चय किया गया। इसी आधार पर चेकोस्लोवाकिया, पोलैण्ड, यूगोस्लाविया के स्वतंत्र राज्यों का जन्म हुआ। किन्तु इस सिद्धांत का जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी के संबंध में पालन नहीं किया गया। जर्मनी के हजारों नागरिकों को जर्मन साम्राज्य से पृथक करके अन्य राज्यों के अधीन कर दिया गया।” 1918 ई. में जब ऑस्ट्रिया के जर्मनों ने जर्मन-ऑस्ट्रिया गणतंत्र की स्थापना की और जर्मन के गणतंत्र के साथ सम्मिलित होने व लैंड को मिलाने की इच्छा व्यक्त की तब मित्र राज्यों द्वारा सितम्बर 1919 ई. में दोनों राज्यों के सम्मिलन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रकार मित्र राष्ट्रों द्वारा स्वयं द्वारा स्वीकृत सिद्धांत को जर्मनी के विषय में क्रियान्वित न कर जर्मन नागरिकों को निराश किया गया। बटलरने अनुसार “आत्मनिर्णय के सिद्धांत का युक्तियुक्त प्रयोग न करना पेरिस की व्यवस्था में अंतर्निहित कमजोरी का द्योतक था।”

वर्साय की संधि एवं द्वितीय विश्वयुद्ध[संपादित करें]

विश्व इतिहास के जिन एक संधियों और उसके प्रभावों की सर्वाधिक चर्चा हुई है, उनमें वर्साय की संधि का विशिष्ट स्थान है। उस संधि के कठोर प्रावधानों और उसके स्वरूप के संदर्भ में आलोचकों ने इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण के रूप में परिभाषित किया है। उनके अनुसार वार्साय की संधि शांति की व्यवस्था न होकर असंतोष की जनक थी। संधि के ठीक 20 वर्ष 2 महीने 4 दिन पश्चात् यह संसार द्वितीय विश्वयुद्ध के चपेट में आ गया।

संधि होने के बाद से ही उसकी व्यवस्थाओं को जर्मनी द्वारा भंग किया जाता रहा। साथ ही संधि प्रावधानों में संशोधन भी किए जाते रहे। इन संधि प्रावधानों के उल्लंघनों एवं संशोधनों ने संसार को द्वितीय विश्व युद्ध की ओर ढकेल दिया। संधि प्रावधानों का उल्लंघन एवं संशोधन इसलिए किया गया कि यह अत्यधिक कठोर एवं अपमानजनक थी। ऐसी कठोर एवं अपमानजनक संधि की शर्तों को कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र एक लंबे समय तक बर्दाश्त् नहीं कर सकता था। अतः यह स्पष्ट था कि जर्मनी भविष्य में उपर्युक्त अवसर मिलते ही वर्साय संधि द्वारा थोपी गई व्यवस्था से मुक्त होने तथा अपमान के कलंक धोने का प्रयास करेगा। जर्मनी की कैथोलिक सेंटर पार्टी के एजर्बर्गर का विराम संधि के समय वक्तव्य था कि "जर्मन जाति कष्ट सहेगी परंतु मरेगी नहीं।" स्वभाविक रूप से जर्मनी ने इस अपमानजनक शर्तों को धोने का सफल प्रयास किया। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में यूरोप का राजनीतिक वातावरण अत्यंत अशांत हो गया और विश्व को प्रथम महायुद्ध से भी अधिक भयंकर और प्रलयंकारी युद्ध देखना पड़ा। फ्रांस के मार्शल फॉच के अनुसार भी "यह संधि शांति नहीं है, केवल 20 वर्षों का युद्धविराम है।" स्पष्ट है कि इसी संधि में द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज विद्यमान थे।

1919 में संधि के समय जर्मनी असहाय था और संधि के चुपचाप स्वीकार करने के अलावा उसके पास कोई चारा न था लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे वह कुछ शक्ति संचय करके संधि की शर्तों का उल्लंघन करने लगा और संधि निर्माताओं ने भी उसमें संशोधन किए। 1926 में जब जर्मनी को राष्ट्रसंघ की सदस्यता दी गई तब संधि के प्रथम भाग में संशोधन किया गया। युद्ध अपराधियों संबंधी सातवां भाग कभी पूर्णतः क्रियान्वित नहीं किया गया। जर्मन सम्राट विलियम कैसर सहित अनेक युद्ध अपराधियों को दण्ड न देकर महज कुछ एक को सामान्य दण्ड दिए गए। क्षतिपूर्ति से संबंधित प्रावधान को पहले तो संशोधित किया गया और बाद में पूर्णतः त्याग दिया गया। लोजान सम्मेलन (1932) में क्षतिपूर्ति के प्रश्न को ही समाप्त कर दिया गया।

1933-34 में जर्मन राजनीति में हिटलर के उत्कर्ष के बाद वार्साय की शर्तों को तोड़ना तो एक मामूली बात हो गई। 1935-36 में हिटलर ने संधि के निःशस्त्रीकरण से संबंधित प्रावधानों का उल्लंघन कर सेनाओं में वृद्धि की और 1936 में राईनलैंड पर अधिकार कर लिया। मार्च 1938 में ऑस्ट्रिया को जर्मनी के साथ मिलाकर तथा सितम्बर 1938 चेकोस्लोवाकिया को मिलाकर हिटलर ने वार्साय की संधि के प्रादेशिक व्यवस्थाओं के प्रावधानों को भंग कर दिया। जब हिटलर ने वर्साय संधि द्वारा निर्मित पोलैण्ड से संबंधित पोलिश गलियारे एवं डान्जिंग बंदरगाह संबंधी व्यवस्थाओं को तोड़ने के उद्देश्य से पोलैंड पर आक्रमण किया तो द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। कुछ मिलाकर वर्साय संधि की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए ही हिटलर ने घटनाओं की वह शृंखला आरंभ की जिसके कारण द्वितीय विश्वयुद्ध का विस्फोट हुआ। इस तरह वर्साय की संधि प्रावधानों के उन्मूलन की प्रक्रिया की अंतिम परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ में हुई। इस दृष्टि से द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज वर्साय की संधि में देखे जा सकते हैं।

कुछ आलोचक मानते हैं कि वर्साय संधि की कठोर शर्ते नहीं बल्कि उनको क्रियान्वित करने की ढिलाई द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बनी। लॉगसम के अनुसार-

मित्र राष्ट्रों, विशेष कर फ्रांस और ब्रिटेन के परस्पर विरोध तथा संधि की शर्तों का कठोरतापूर्वक पालन न कर पाने की नीति ही द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बनी। यदि संधि का पालन कठोरतापूर्वक पालन कराया जाता तो जर्मनी को यह अनुभव हो जाता कि भविष्य में युद्ध प्रारंभ करना खतरनाक है। लेकिन मित्र राष्ट्रों की उदासीनता एवं तुष्टीकरण की नीति से जर्मनी का हौंसला बढ़ता गया और उसने पुनः युद्ध कर दिया। 1936 में जब हिटलर ने राइनलैण्ड के असैनिकीकरण के प्रावधान को भंग किया, तब इंग्लैण्ड और फ्रांस आसानी से उसकी आक्रामक महात्वाकांक्षाओं का दमन कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा न कर हिटलर के साहस को प्रोत्साहन दिया और अप्रत्यक्ष रूप से उसकी शक्ति में वृद्धि की। मित्र राष्ट्रों ने हिटलर द्वारा संधि की शर्तों को तोड़ने के प्रति जो उदासीनता, उपेक्षा और कायरता दिखाई, उससे उत्साहित होकर हिटलर एक के बाद एक संधि प्रावधानों को तोड़ता और प्रदेश अधिकृत करता चला गया।”

इस प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्साय की अन्यायपूर्ण कठोर और अपमानजनक संधि, एक सीमा तक द्वितीय विश्व युद्ध के लिए उत्तरदायी थी। किन्तु यह भी सत्य है कि मित्र राष्ट्रों की परस्पर विरोधी नीति, उपेक्षा, उदासीनता, तुष्टीकरण और संधि की शर्तों को कठोरतापूर्वक लागू न करवाने की नीति भी इसके लिए कम उत्तरदायी नहीं थी।

स्रोत[संपादित करें]

  1. Hakim, Joy (1995). A History of Us: War, Peace and all that Jazz. New York: Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-19-509514-6. 

इन्हें भी देखें[संपादित करें]