रूस का इतिहास
आधुनिक रूस का इतिहास पूर्वी स्लाव जाति से शुरू होता है। स्लाव जाति जो आज पूर्वी यूरोप में बसती है का सबसे पुराना गढ़ कीव था जहाँ ९वीं सदी में स्थापित कीवी रुस साम्राज्य आधुनिक रूस की आधारशिला के रूप में माना जाता है। हाँलांकि उस क्षेत्र में इससे पहले भी साम्राज्य रहे थे पर वे दूसरी जातियों के थे और उन जातियों के लोग आज भी रूस में रहते हैं - ख़ज़र और अन्य तुर्क लोग। कीवि रुसों को मंगोलों के महाभियान में १२३० के आसपास परास्त किया गया लेकिन १३८० के दशक में मंगोलों का पतन आरंभ हुआ और मॉस्को (रूसी भाषा में मॉस्कवा) का उदय एक सैन्य राजधानी के रूप में हुआ। १७वीं से १९वीं सदी के मध्य में रूसी साम्रज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ। यह प्रशांत महासागर से लेकर बाल्टिक सागर और मध्य एशिया तक फैल गया। प्रथम विश्वयुद्ध में रूस को ख़ासी आंतरिक कठिनाइयों का समना करना पड़ा और १९१७ की बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस युद्ध से अलग हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपराजेय लगने वाली जर्मन सेना के ख़िलाफ अप्रत्याशित अवरोध तथा अन्ततः विजय प्रदर्शित करन के बाद रूस तथा वहाँ के साम्यवादी नायक जोसेफ स्टालिन की धाक दुनिया की राजनीति में बढ़ी। उद्योगों की उत्पादक क्षमता और देश की आर्थिक स्थिति में उतार चढ़ाव आते रहे। १९३० के दशके में ही साम्यवादी गणराज्यों के समूह सोवियत रूस का जन्म हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शीत युद्ध के काल के गुजरे इस संघ का विघटन १९९१ में हो गया।
प्राचीन काल और मॉस्को का उदय
[संपादित करें]
कीवि रूसों के मूल के बारे में अनेक मत हैं। स्कैंडिनेवी वाइकिंग लोगों ने स्तेपी में पहले से अवस्थित ख़ज़ार लोगों को विस्थापित करके कीव (आधुनिक यूक्रेन) में अपनी राजधानी बनाई। यहीं से रूसी साम्राज्य का इतिहास आरंभ होता है। यह कीवि साम्राज्य अगले ३०० सालों तक अस्तित्व में रहा। इस साम्राज्य ने उत्तरी यूरोप तथा मुस्लिम अब्बासी ख़िलाफत के बीच संपर्क का काम किया। हाँलांकि यह खज़ार लोगों द्वारा स्थापित व्यापार मार्ग का अनुकरण मात्र था। ख़जर लोगों ने आठवीं सदी में यहूदी धर्म को अपना लिया था। नौवीं सदी में रुसों ने इस्लाम को राजधर्म को लागू करने की बात भी शुरु की थी। इसका कारण ये था कि इस्लाम में कई पत्नियों को रखने की इजाजत थी जिससे कि तत्कालीन राजकुमार व्लादिमीर बहुत आकर्षित हुआ था। पर इस्लाम में शराब की सख़्त मनाही की वजह से उसने इस्लाम अपनाने का विचार छोड़ दिया और सन् ९८८ में रूसी साम्राज्य ईसाईयत में संस्कृत हुआ।
मंगोल आक्रमण
[संपादित करें]सन् १२०० के बाद मंगोलों की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई। मंगोलिया के ख़ान तेमुज़िन (चंगेज़ ख़ान) के अनुसरण में मंगोल सेना संगठित हुई और सन् १२३० के दशक में तातर आक्रमणों की वजह से कीव का रुसी साम्राज्य बिखर गया। लेकिन १३८० में मास्कवी राजकुमार दिमित्री दॉन्सकॉय ने कुलिकोवो के मैदान में तातरों के खिलाफ़ एक निर्णायक जीत हासिल की। इसके बाद से रूस के इतिहास में मॉस्को का नाम आता है। मॉस्को नए रूसी साम्राज्य की राजधानी बना।
रूसी साम्राज्य का विस्तार
[संपादित करें]
![]() |
इवान तृतीय, जिसे 'महान' की उपाधि से भी संबोधित किया जाता है, ने रूसी साम्राज्य का विस्तार यूरोप में किया। सबसे पहले उसने लिथुआनिया के शासक को हराया और अंततः उसका साम्राज्य तीन गुना फैल गया। इसके बाद इवान चतुर्थ आया जिसे 'इवान भयंकर' कहकर भी याद करते हैं। उसने सामंतों के खिलाफ़ सख़्ती दिखाई और जो लोग उसके खिलाफ होते उसे मार भी दिया गया। इवान चतुर्थ के बाद आराजकता का माहौल रहा। उसके बेटा संतानहीन मर गया और कई वर्षों तक सत्ता अनेक हाथो में जाती रही। इसके बाद मिखाइल रोमानोव को शासक बनाया गया। रोमानोव के वंश ने अगले ३०० सालों तक रूस पर राज्य किया।
१६१३ में रोमानोव के शासक बनने के बाद सत्ता में स्थिरता तो आई पर पश्चिमी यूरोप में हुए औद्योगिक क्रांति तथा वैज्ञानिक खोजों की वजह से रूस फिर भी पिछड़ा हुआ रहा। इसके बाद पीटर के शासनकाल में इसमें सुधार आया। पीटर ने पश्चिमी यूरोप का दौरा छद्मवेष में किया और इस तरह यूरोप की प्रगति पर निगाह डालता रहा। इस क्रम में, कहा जाता है कि, उसने एक बार हॉलैंड की किसी जहाज कंपनी में बढ़ई का काम भी किया। लौटने के बाद पीटर ने भी रूस का आधुनिकीकरण आरंभ किया। पीटर ने सैन्य सुधार, वेष-भूषा सुधार तथा कैलेंडर में सुधार करवाए। उसने स्वेड लोगों को हराकर बाल्टिक सागर के पत्तनों पर अधिपत्य जमाया और इस तरह व्यापार के नए अवसर मिले। साम्राज्य को जीर्णता से उबारने के लिए उसने १७०३ में साम्राज्य की नई राजधानी का निर्माण कराया जिसे आज सेंट पीटर्सबर्ग कहते हैं।
पीटर की मृत्यु के ४० साल बाद कैथरीन को गद्दी मिली जो जर्मन मूल की थी। उसने पीटर के पोते से शादी की थी। उसने रूसी साम्राज्य तथा इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। कैथरीन के समय के सेनाध्यक्ष अलेक्ज़ेंडर सुवोरोव ने एक भी युद्ध न हारने का कीर्तिमान बनाया और १७९९ में इटली में नेपोलियन की फ्रेंच सेना के साथ हुए मुकाबिले के बाद वापस आने में कामयाबी दिखाई।

परन्तु नेपोलियन १८१२ में रूस पर आक्रमण करने दुबारा आया। उसने मॉस्को की घेराबंदी कर रूसी साम्राज्य पर समर्पण का दबाब डाला। पर ग्रामीण गुरिल्ला युद्ध और इस समय अत्यधिक ठंड की वजह से फ्रासिसी सेना को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और अंततः नेपोलियन की हार हुई। इस युद्ध ने लियो तोलस्तोय कए विश्व-प्रसिद्ध उपन्यास को जन्म दिया जिसका नाम था - युद्ध और शांति।
औद्योगीकरण और साम्यवाद
[संपादित करें]जब निकोलस द्वितीय सत्ता में आया (1914)। मास्को के आसपास पड़ने वाले क्षेत्रों के अलावा आज का फिनलैंड , लातविया , लिथुआनिया , एस्तोनिया तथा पौलैंड , यूक्रऐन व बेलारूस के कुछ हिस्से रूसी साम्राज्य के अंग थे। तब तक रूस का औद्योगीकरण एक नए सामाजिक वर्ग को जन्म दे चुका था - मजदूर संघ। उद्योगों के मजदूरों के संघ संगठित होने लगे थे। 1903में रूसी जनतांत्रिक श्रमिक दल के दो टुकड़े हुए - बोल्शेविक (शाब्दिक अर्थ - बहुमती) और मेन्शेविक (अल्पमती)। ये क्रांति चाहते थे। 1904-5 में देश की पूर्वी सेना को जापान के हाथों करारी हार का मुँह देखना पड़ा था। 1904 में सेंट पीटर्सबर्ग़ में आयोजित एक शातिपूर्ण प्रदर्शन रैली पर सेना ने गोली बरसाई जिसमें सैकड़ों मारे गए और कई घायल हो गए। ऐसी घटनाओं से जनता में प्रशासन के ख़िलाफ़ रोष और भी बढ़ा। इन्ही कारणों से प्रेरित होकर 1904 में एक क्रांति हुई जिसको उस समय दबा दिया गया। आंदोलन तो दब गया लेकिन ज़ार निकोलस द्वितीय को कई सुधार करने पड़े, इनमें सबसे महत्वपूर्ण था - रूसी संसद ड्यूमा का गठन। रूसी भाषा में डोमा का अर्थ घर या सदन होता है।
प्रथम विश्वयुद्ध
[संपादित करें]प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत यूरोप में 1914 में हुई। सेंट पीटर्सबर्ग़ का नाम बदलकर पेत्रोग्राद कर दिया गया था। कारण ये था कि पुराना नाम जर्मन लगता था जबकि पेत्रोग्राद पूर्णरूपेण रूसी था - इससे देशभक्ति लाने का अंदेशा था। लेकिन सैन्य विफलताओं तथा खाद्य साधनों की कमी की वजह से मजदूरों तथा सैनिकों में असंतोष फैल गया। फरवरी 1917 में पेत्रोग्राद में विद्रोह हुए जिसके फलस्वरूप ज़ार निकोलस द्वितीय का अपहरण कर लिया गया। इस घटना के साथ ही रूस में पिछले ३०० सालों से चले आ रहे साम्राज्य का अन्त हुआ और साम्यवाद की नींव रख दी गई। हाँलांकि साम्यवादियों को सत्ताधिकार तुरंत नहीं मिला। रूस युद्ध से अलग हो चुका था। इधर निकोलस के परिवार को कैद कर रखा गया और 16-17 जुलाई 1918 की रात को उनकी हत्या कर दी गई।
लगातार निराश हो चुकी रूसी जनता द्वारा बोल्शेविकों को समर्थन मिलने लगा था और इस समर्थन में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी। अपने नेता व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों में २५ अक्टूबर को सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस घटना का विश्व इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह विश्व में पहली बार किसी साम्यवादी शासन की स्थापना का क्षण था। इस घटना को अक्टूबर क्रांति के नाम से जाना जाता था। रूस में इस समय तक जूलियन कैलेंडर का इस्तेमाल होता था जो पुराना था और उसमें सूर्य की परिक्रमा करने में पृथ्वी के द्वारा लगाए गए दिनों का अंशात्मक हिसाब नहीं था। यूरोप के कई देश (जैसे इंग्लैंड) पहले से ही ग्रेगोरियन कैलेंडर - जो आजकल प्रयुक्त होता है - का प्रयोग शुरु कर चुके थे। इस कैलेंडर में इस दोष का निवारण था: अब तक की गई इन ग़लतियो के एवज में वर्तमान तिथि में १३ दिन और जोड़ देना। इसको अपनाने के बाद २५ अक्टूबर (क्रांति का दिन) ७ नवम्बर को आने लगा। हाँलांकि इस घटना को अक्टूबर क्रांति कहते हैं पर इसे ७ नवम्बर को मनाया जाता है।
रूस के युद्ध से अलग होने के कुछ ही दिनों बाद भयंकर अशांति का माहौल फैल गया। बोल्शेविकों को पेत्रोग्राद तथा मॉस्को में तो बहुत समर्थन मिला पर संपूर्ण देश के परिदृश्य में वे राजनैतिक रूप से बहुत अछूते थे। एक विद्वेषपूर्ण आतरिक युद्ध सी स्थिति पैदा हो गई। बोल्शेविकों द्वारा स्थापित लाल सेना तथा रूस की राजनैतिक तथा सैनिक संस्थाओं द्वारा गठित श्वेत सेना में संघर्ष छिड़ गया। इसके अलावे हरी सेना तथा काली सेना नाम के भी संगठन बने जो इन दोनों के ख़िलाफ़ थे। १९२२ में अंततः लाल सेना की विजय हुई।
दिसंबर १९१७ में बोल्शेविकों ने अपनी राजनैतिक शक्ति बनाने के लिए एक नई पुलिस का गठन किया जिसका संक्षेप चेका () था।
लेनिन
[संपादित करें]लेनिन का जन्म २२ अप्रैल १८७० को सिम्बर्स्क में हुआ था। अपनी राजनैतिक गतिविधियों के कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। हाँलांकि उन्होंने एक बाहरी विद्यार्थी के रूप विधि की डिग्री हासिल की। उसके बाद वे सेंट पीटर्सबर्ग़ चले गए और वहाँ पर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होते रहे। उन्होंने कई उपनामों का इस्तेमाल किया जिसमें अंततः १९०१ में वे लेनिन का प्रयोग करने पर स्थिर हो गए। उन्हें साइबेरिया में निर्वासन भुगतना पड़ा। १९०७ के बाद इनको रूस में रहना असुरक्षित लगने लगा और इस कारण वे पश्चिमी यूरोप चले गए। स्विट्ज़रलैंड में बसे लेनिन को जर्मन मदद इस आशा के साथ मिली कि वो रूसी सैन्य प्रयासों को कमज़ोर करने में मदद करेंगे। इस घटना की वजह से उन्हें अक्सर एक जर्मन जासूस की नज़र से भी देखा गया। १९१८ में उनपर दो आत्मघाती हमले हुए। १९२४ में उनकी मृत्यु हो गई। इसके तीन दिन बाद ही पेत्रोग्राद का नाम बदल कर लेनिन ग्राद कर दिया गया। प्रेत्रोग्राद को पहले (और अब) सेंट पीटर्सबर्ग़ कहते थे।
स्तालिन
[संपादित करें]लेनिन की मृत्यु के बाद जोसेफ स्तालिन को सत्ता संघर्ष में विजय मिली। उसने दुनिया भर में साम्यवाद और तानाशाही का नया आयाम पेश किया। स्तालिन ने अपने सभी प्रतिद्वंदियों को या तो मरवा दिया या निर्वासित कर दिया। स्तालिन का जन्म आज के जॉर्जिया में १८७९ में हुआ था जो उसके जन्म के समय रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। वो अपनी किशोरावस्था से कविताएँ लिखता था पर इस रूप में उसे अधिक सफलता नहीं मिली।
सत्ता में आने तुरंत बाद उसने रूस को एक बिल्कुल नए प्रशासनिक स्वरूप में ले गया। उसने पंचवर्षीय योजनाओं की नींव डाली जो पहले से मौजूद आर्थिक योजना की जगह पर लाई गई थी। किसानों से उनकी जमीन लेकर उन्हें एक सम्मिलित खेत बनाया तथा उनमें काम करने वाले श्रमिकों को श्रम के अनुसार वेतन मिलता। इसी प्रकार उद्योगों में भी उत्पादन बढ़ाने की व्यवस्था की गई। जल्द ही रूस एक उपभोक्ता सामग्री बनाने वाले देश से एक भारी मशीनों को बनाने वाले देश के रूप में उभरा। कला और साहित्य को सरकार द्वारा नियंत्रित किया गया। धर्म पर भी लगाम लगाई गई और इसके तहत चर्चों को या तो बन्द किया गया या तोड़ा गया या उनका इस्तेमाल अन्य कार्यों में किया जाने लगा। १९३० के दशक में रूसी लोगों के जीवन में अनुशासन अभूतपूर्व रूप से लागू किया गया। निस्संदेह यह सभी लोगों द्वारा पसन्द नहीं किया गया। उद्योगों में अधिक मिहनत करने वाले मजदूरों को पुरस्कार और प्रोत्साहन मिले जिससे कि उत्पादन क्षमता में बढोतरी हुई। उसी समय स्ताखानोवित नामक पद बहुत लोकप्रिय हुआ। यह अलेक्सेई स्ताखनोव नामक एक मजदूर द्वारा छः घंटे से कम समय में १०२ टन कोयले के खनन का रिकार्ड बनाने के लिए प्रसिद्ध हुआ। इस व्यक्ति को उस साल के टाइम पत्रिका पर भी जगह मिली। इन प्रोत्साहनों के द्वारा मजदूरों में अधिक उत्पादन की होड़ लगी। जल्द ही रूस एक औद्योगिक देश के रूप में जाना जाने लगा। १९३४ के आसपास का रूसी जीवन वहाँ की संस्कृति पर एक अमिट छाप छोड़कर गया। सरकार द्वारा आशावाद, आधिक्य, साम्यवादी भावना, देशभक्ति जैसी भावनाओं को बढ़ावा दिया गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध
[संपादित करें]जिसे दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध के नाम से जानती है उसे रूस में महान देशभक्ति युद्ध के नाम से जाना जाता है। रूस इस युद्ध के लिए पहले से तैयार नहीं था। 1939 में जर्मनी के साथ हुए सौहार्द्र समझौते के बाद 1941 में हिटलर द्वारा आक्रमण करने से रूस को झटका सा लगा। जल्द ही जर्मन सेना ने रूस के पश्चिमी प्रदेशों पर कब्जा कर लिया और लेनिनग्राद को घेर लिया गया। इसके बाद शुरु होता है एक अप्रत्याशित प्रतिरोध और संघर्ष का क्रम जिसने इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया। लगभग 900 दिनों तक घिरे रहने, सैन्य और शस्त्रास्तों की कमी के बावजूद रूसी सेना ने जर्मनी की यूरोपजेता सेना के सामने समर्पण नहीं किया। कठिन सर्दी और भूख में भी रूसियों का मनोबल कायम रहा और अंततः कम से कम 6 लाख 70 हज़ार लोगों की मौत के बावजूद रूसी लोग जर्मन सेना का प्रतिरोध करते रहे। इससे रूसी सेना की अजेयता और दृढ़ता को नमूना पेश हुआ।
इसी बीच जर्मन दिसम्बर 1941 में मॉस्को पहुँच गए। राजधानी को बचाने के लिए युवाओं की भर्ती होने लगी। अपने सेनापतियों के सलाह के खिलाफ स्तालिन ने भारी जर्मन सैन्य जमावड़े के अंदेशे के रहते हुए भी नवंबर 7 को बोल्शेविक क्रांति की 25वीं वर्षगाँठ की परेड मॉस्को में निकलवाई। इसकी घोषणा आखिरी समय तक नहीं की गई थी और सौभाग्यवश उस दिन कोई बमबारी नहीं हुई। इससे रूसी नौजवानों में एक मनोबल का संचार हुआ। सैनिक वहीं से मोर्चे के लिए रवाना हुए।
स्तालिनग्राद की घेराबंदी
[संपादित करें]वोल्गा नदी के दक्षिण में बसा शहर स्तालिनग्राद औद्योगिक क्रांति की देन था। हाँलांकि इसका नाम बदलकर अब वोल्गोग्राद कर दिया गया है पर उस समय इसका नाम जोसेफ़ स्तालिन के नाम पर था और इस कारण इस शहर पर कब्जा करने का मतलब स्तालिन को हराना था। इसी ख़ब्त के साथ हिटलर ने अपनी सेना को स्तालिनग्राद के कब्जे के लिए भेजा। जून १९४२ में वोल्गा नदी के पश्चिमी तट पर जर्मन सेना आ पहुँची। शहर पर बमों की वर्षा सी होने लगी। जर्मन युद्धक विमानों ने वोल्गा नदी पार कर आ रहे रूसी सैनिकों पर भी गोली बारी की। सैन्य साधनों की कमी से जूझ रहे रूसी सैनिकों ने दो बड़े करनामे कर दिखाए।
पहला कारनामा था - पावलोव भवन। जर्मन सेना से चारों ओर से घिर चुके एक घर में क़ैद चंद सैनिकों ने दो महीनों तक अपना अड्डा डाले रखा और जर्मन सेना पर जवाबी कार्रवाई करते रहे। बाद में रूसी प्रतिरोधी सेना की टुकड़ियों ने इस भवन को जर्मनों से बचा लिया और इस तरह याकूव पावलोव के नेतृत्व में भीषण घेराबंदी और आक्रमण सहकर इस टुकड़ी ने रूसी सेना के सामने एक प्रेरणाप्रदायक संघर्ष किया। दूसरी घटना थी स्नाइपर वसिली जाइत्सेव की निशानेबाजी। छुपकर मारने वाली इस कला में जर्मन सेना ने भी अपने श्रेष्टतम स्नाइपर का इस्तेमाल किया। जवाब में मध्य रूस से आए इस नौजवान ने कोई २०० जर्मन सैनिक अकेले मार दिए। जल्द ही रूसी प्रेस ने इस घटना का प्रचार भी किया जिससे रूसी सेना का मनोबल बना रहा। लगभग २०० दिनों की घेराबंदी के बाद रूसी सेना की विजय हुई। इस युद्ध में दोनों ओर से लगभग १५ लाख लोग मारे गए थे। गलियों में सैनिको के शवों के ढेर लग गए थे। स्तालिनग्राद में रूसियों की विजय विश्वयुद्ध के लिए भी अहम साबित हुई। जर्मनों की हार होने लगी। रूसी सेना जर्मनों के धकेलते-धकेलते १९४५ में बर्लिन तक आ पहुँची और मई १९४५ में जर्मनी की हार हुई। स्तालिन द्वारा दिए गए आँकड़ों में रूस में कुल ७० लाख लोग मारे गए थे। बाद के अनुमानों के अनुसार रूस में युद्ध के दौरान कुल २.६ करोड़ लोग मारे गए। रूस में युद्ध का अंत ९ मई १९४५ को माना जाता है जब जर्मन सेना ने समर्पण कर दिया। इस दिन को आज भी विजय दिवस के रूप में मॉस्को के रेड स्क्वायर में मनाया जाता है।
शीतयुद्ध
[संपादित करें]रूस युद्ध में भारी क्षति सहन कर चुकने के बावजूद एक शक्ति के रूप में उभरा। राजनैतिक और वैज्ञानिक कारणों से रूस तथा अमेरिका में श्रेषठता साबित करने की प्रतिस्पर्ध लग गई। युद्ध के आखिरी क्षणों में रूसियों के जर्मन रॉकेट वैज्ञानिक फॉन-ब्राउन के रॉकेट डिजाइन हासिल हुए जबकि खुद फ़ॉन-ब्राउन अमेरिका चले गए। दोनों देशों में रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में नए अनुसंधान और विकास किए। १९४९ में नैटो की स्थापना हुई। स्तालिन की मृत्यु १९५३ में हो गई। तीस साल के शासन के बाद रूस एकदम नई स्थिति में आ गया था। इसके बाद निकिता ख्रुश्चेव ने सत्ता सम्हाली और उन्होंने वि-स्टालीकरण की बात की। ख्रुश्चेव ने एक और कदम उठाया - रूसी सुरक्षा परिषद का गठन जिसे संक्षेप में केजीबी («КГБ») कहते हैं। १९६१ में यूरी गगरिन अंतरिक्ष जाने वाले पहले व्यक्ति बने पर १९६९ में नील आर्मस्ट्राँग के चाँद पर सबसे पहले कदम रखने के साथ ही अमेरिका ने रूसियों को इस दौड़ में पीछे छोड़ दिया।
निकिता ख्रुश्चेव ने स्तालिन की उपलब्द्धियों के चर्चा में रहने के बावजूद अपनी जगह बनाई। उसके शासनकाल में खाद्य संकट गहरा गया। इसका उपाय उसने सर्वत्र मक्के की खेती लगाकर करने की पहल की जो अधिक कारगर नहीं हुई। ख्रुश्चेव के शासनकाल को शीतयुद्ध का चरम कहा जा सकता है। अंतरिक्ष होड़, १९६० में जमीन के उपर उड़ रहे अमेरिकी विमान को नष्ट करना, १९६१ में बर्लिन की दीवार का खड़ा होना, १९६२ में क्यूबा का मिसाइल संकट इत्यादि जैसी तनावपूर्ण और संघर्षाहूत घटनाएँ उसके शासनकाल में ही हुईं। १९६४ में उनको लिओनिड ब्रेझ्नेव के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
ब्रेझ्नेव के शासन काल को एक स्थिरता का काल कहा जाता है क्योंकि अर्थव्यवस्था में पिछले तीन दशकों से जो तेजी आई थी वो वापस निम्नस्तर पर चली गई। १९७२ में अमेरिका से संबंध सुधारों के प्रयास तो हुए पर १९७९ में अफग़ानिस्तान पर रूस की चढ़ाई के साथ ही इन संबंधों में भी दरार आ गई। १९८४ में मॉस्को में ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ जो सफल रहा। १९८२ में ब्रेझ्नेव का निधन हो गया। इसके बाद मिखाइल गोर्बाचोव को सत्ता मिली। गोर्बाचोव के शासनकाल में कई सुधार हुए।
सोवियत संघ का विघटन
[संपादित करें]गोर्बाचेव के शासनकाल में दो पद बहुत ही प्रसिद्ध हुए - ग्लासनोश्त और 'पेरेस्त्रोइका'। ग्लासनोश्त का अर्थ होता है - खुलापन और पेरेस्तोरइका का मतलब - पुनर्निर्माण। उन्होंने राजनैतिक बंदियों को रिहा किया और पूर्वी योरोप में हस्तक्षेप से बचने की नीति अपनाई। धीरे-धीरे विसाम्यवादी प्रदर्शनों की वजह से उनका सरकारें गिरती गईं। १९८९ में बर्लिन की दीवार भी ढहा दी गई और पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हुआ। इस घटना को आज भी साम्यवाद की असफलता के आरंभिक निशान के रूप में देखा जाता है। इसी साल सोवियत सेना अफ़ग़ानिस्तान से भी हट गई। ये सब बातें पुनर्निर्माण यानि पेरेस्तोरइका के लिये तो एक प्रतीक बनीं पर ग्लासनोश्त को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली। १९८६ में चेर्नोबिल में हुए परमाणु उर्जागृह में हुई दुर्घटना को सरकारी मीडिया द्वारा छुपाने और दबाने की कोशिश की गई। ग्लाशनोश्त की वजह से सोवियत संघ के घटक देशों में राष्ट्रवादी प्रदर्शनों को अवसर और ध्यान दिया गया। मार्च १९९० में गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने। १९९१ में जब गोर्बाचेव क्रीमिया में एक छुट्टी पर थे तब तख्तापलट की कोशिश हुई और गोर्बाचेव को तीन दिनों तक नजरबंद किया गया। इधर मॉस्को में बोरिस येल्तसिन का समर्थन बढ़ गया था और उन्हें राष्ट्रपति बना दिया गया। सोवियत संघ के कई देशों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। ८ दिसम्बर १९९१ को बेलारुस, यूक्रेन और रूस के राष्ट्रपतियों ने मिलकर सोवियत संघ के भंजन का फैसला किया।
पूर्व सोवियत संघ के क्षेत्र में, रूसी संघ ने कई युद्ध शुरू किए, जिनमें से पहला चेचन्या में युद्ध था। 18वीं शताब्दी में रूस ने इन लोगों पर विजय प्राप्त कर ली थी, और जब 1990 के दशक में चेचन गणराज्य ने स्वतंत्रता की घोषणा की, तो रूस ने बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध करते हुए वहां अपना शासन पुनः स्थापित कर लिया, जिसमें ग्रोज़्नी शहर में गणराज्य के नागरिकों का नरसंहार भी शामिल था।
21वीं सदी की पहली तिमाही
[संपादित करें]2008 में रूसी आक्रमण के कारण जॉर्जिया में युद्ध छिड़ गया।
व्लादिमीर पुतिन के तीसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के बाद, जो 2012 में सत्ता में आए, रूस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू हुई, जिसका सबसे उल्लेखनीय मामला उफा शहर का एक लड़का था, जिसे कंप्यूटर गेम में क्रेमलिन पर बमबारी करने के लिए किशोर कॉलोनी में भेज दिया गया था।
इसके अलावा, सत्ता में आने के तुरंत बाद, उन्होंने यूक्रेन के डोनेट्स्क और लुगांस्क क्षेत्रों के पास सैनिकों को जुटाना शुरू कर दिया और इस देश के खिलाफ एक बड़ा सूचना युद्ध छेड़ दिया। यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने सत्ता बरकरार रखने के लिए 2013 में पुतिन से सेना भेजने और यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए कहा, साथ ही रूस के साथ सीमा को निरस्त्र करने के लिए भी कहा, जिसके कारण यूरोमैदान के रूप में विरोध प्रदर्शन हुए।
20 फरवरी 2014 को, जब यानुकोविच कीव में थे, रूस ने क्रीमिया प्रायद्वीप पर अपना कब्ज़ा शुरू कर दिया, बाद में यानुकोविच को शरण प्रदान की, और 12 अप्रैल 2014 को, रूस ने पूर्वी यूक्रेन में युद्ध शुरू कर दिया, जब रूसी FSB अधिकारी इगोर गिरकिन और अलेक्जेंडर बोरोदाई के नेतृत्व में उग्रवादियों ने स्लोवियांस्क शहर पर आक्रमण कर दिया। एक दिन बाद, 13 अप्रैल को, यूक्रेन ने आतंकवाद विरोधी अभियान (ए.टी.ओ.) शुरू किया। ई [1] [2]. 2014 में, डोनेट्स्क शहर में हवाई अड्डे और अखाड़े को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था, यह 1990 के दशक में ग्रोज़्नी शहर में हुए अपराधों के समान था, जहां रूसी आतंकवादियों और स्थानीय अपराधियों ने अलगाववादियों के रूप में सत्ता पर कब्जा कर लिया था। 7 अक्टूबर 2014 को, रूसी कब्जे वाले शहर ज़ुग्रेस, इहोर कोझोमा[11] में पहले यूक्रेनी युद्ध कैदियों में से एक पर सार्वजनिक रूप से अत्याचार का एक ज़बरदस्त मामला सामने आया था। [3] [4]
2014 में, डोनेट्स्क शहर में, रूसी सशस्त्र बलों ने पत्रकार इरीना डोवगन को प्रताड़ित किया, जिन्होंने रूस द्वारा शहर पर कब्जे और मास्को द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित कठपुतली "डोनेट्स्क पीपुल्स रिपब्लिक" के खिलाफ आवाज उठाई थी - उन्हें एक खंभे से बांध दिया गया और सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, फिर, यूरोपीय समुदाय की मांगों के कारण, उन्हें यूक्रेन में छोड़ दिया गया
फरवरी 2015 में पुतिन के दूसरे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी, युद्ध-विरोधी राजनीतिज्ञ बोरिस नेमत्सोव की हत्या कर दी गई। अगस्त 2020 में, संघीय सुरक्षा सेवा ने प्रमुख रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवलनी को जहर दे दिया, जिन्होंने अन्य देशों के मामलों में रूसी हस्तक्षेप का विरोध किया था और पुतिन के कई अपराधों के लिए उनके इस्तीफे की मांग की थी। उसी समय, पुतिन ने बेलारूस में लुकाशेंको के तानाशाही शासन का समर्थन किया।
जनवरी 2021 में, नवलनी को मास्को हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 2022 तक रूस ने यूक्रेन के विरुद्ध गुप्त युद्ध छेड़ रखा था, जो 2022 तक पूर्ण आक्रमण में बदल गया। 2022 में, रूस भर में युद्ध-विरोधी विरोध प्रदर्शनों की एक श्रृंखला हुई, जिसे सुरक्षा सेवाओं द्वारा क्रूरतापूर्वक दबा दिया गया
अप्रैल 2022 में, तुला क्षेत्र की एक छोटी लड़की मारिया मोस्कलेवा द्वारा युद्ध-विरोधी चित्र बनाने के कारण, उसके और उसके पिता अलेक्सी मोस्कलेवा के खिलाफ राजनीतिक उत्पीड़न शुरू हो गया। उस पर रूसी सेना को "बदनाम" करने का आरोप लगाया गया, उसके पिता को जेल भेज दिया गया, और लड़की को उसके पिता से अलग कर एक अनाथालय भेज दिया गया [5].
यूक्रेन में, रूस बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध कर रहा है, जैसे आवासीय क्षेत्रों पर गोलाबारी, मारियुपोल जैसे शहरों का पूर्ण विनाश, और यूक्रेन समर्थक रुख के लिए नागरिकों पर अत्याचार, जिसमें कब्जे वाले खेरसॉन में इमारतों के तहखानों में यातना देना शामिल है। यूक्रेन में नागरिकों के खिलाफ सबसे क्रूर अपराध बुचा में गोलीबारी थी, जो मार्च 2022 में की गई थी, जिसकी तुलना कुछ शोधकर्ता 1940 के कैटिन नरसंहार से करते हैं।
2024 में, सुदूर उत्तर में एक रूसी कॉलोनी में, एलेक्सी नवलनी की कॉलोनी के नेतृत्व द्वारा हत्या कर दी गई, और यहां तक कि राजनेता के अंतिम संस्कार में भी रूस की संघीय सुरक्षा सेवा द्वारा गिरफ्तारियां और अपहरण किए गए। रूस तो अस्पतालों पर भी हमला कर रहा है, जिसमें कीव में कैंसर से पीड़ित बच्चों के लिए बना "ओजमादित" अस्पताल भी शामिल है। [6].
पुतिन के नेतृत्व में 21वीं सदी की पहली तिमाही में रूस में जो राजनीतिक प्रणाली उभरी, उसे "रुशिज़एम" (रूसी: Рашизм, अंग्रेज़ी: Rashism) नाम दिया गया, क्योंकि इसमें आक्रामक नीतियों पर जोर दिया गया, जिसके कारण मानवता के खिलाफ कई अपराध हुए, जिनमें अपने ही नागरिकों के खिलाफ अपराध भी शामिल थे। [7] [8] [9] [10]
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि वह दो अधिनायकवादी शासनों, नाजी और सोवियत का संयोजन है, क्योंकि पुतिन सोवियत खुफिया विभाग में एक पूर्व कर्नल हैं, और उनके पसंदीदा लेखक इवान इलिन एक रूसी नाजी थे और उन्होंने अन्य लोगों के विनाश का आह्वान किया था।
इसका एक प्रतीक लैटिन अक्षर Z और V है, जिसका उपयोग अक्सर प्रचार और सैन्य उपकरणों में किया जाता है, और वे 2022 के बाद से नए दमन का प्रतीक भी हैं, क्रेमलिन की नीति के विरोधी और शांति के समर्थक दोनों सफेद-नीले-सफेद झंडे का उपयोग करते हैं, जो आधिकारिक तौर पर युद्ध-विरोधी प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाते हैं।
कब्जे वाले क्षेत्रों में, रूसियों ने शैक्षिक संस्थानों, संग्रहालयों और पुस्तकालयों से यूक्रेनी भाषा के साहित्य को बड़े पैमाने पर नष्ट करना शुरू कर दिया, जो रूसी प्रचार के मानकों को पूरा नहीं करते थे, और "फ़िल्टरेशन" शिविरों की एक प्रणाली बनाई, जो नागरिक यूक्रेनी आबादी के साथ उनके अमानवीय व्यवहार के कारण, शोधकर्ताओं ने नाजी जर्मनी और स्टालिन के गुलाग के एकाग्रता शिविरों की तुलना की।
और रूसी राजनीतिक रणनीतिकार टिमोफी सर्गेयेत्सेव का लेख, "रूस को यूक्रेन के साथ क्या करना चाहिए?" (रूसी: Что Россия должна сделать с Украиной ?) अमेरिकी इतिहासकार टिमोथी स्नाइडर [11] [12] ने इसे "नरसंहार की रूसी पुस्तिका" कहा। आज, इस प्रकार के 21 शिविरों का अस्तित्व ज्ञात है, और डोनेट्स्क क्षेत्र के कब्जे वाले हिस्से में कुछ के पते और स्थान ज्ञात हैं।[13] [14] [15].
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Террористы привязали мужчину с украинским флагом к столбу в Зугрэсе
- ↑ Попавший в плен боец АТО рассказал об издевательствах толпы у "столба позора"
- ↑ НЕZЛАМНІ: Ірина Довгань - історія донеччанки, катованої окупантами за допомогу українським бійцям
- ↑ Патріотка Ірина Довгань, яку катували терористи, розповіла, чому не вважає себе героїнею
- ↑ Москалёв Алексей Владимирович
- ↑ Пошкоджена будівля медзакладу, є загиблі: РФ завдала повторного удару по Києву
- ↑ Laruelle M. Accusing Russia of fascism (англ.) // Russia in Global Affairs. — 2020. — Iss. 18, no. 4. — P. 100—123.
- ↑ Garaev D. The Methodology of the ‘Russian World’and ‘Russian Islam:’New Ideologies of the Post-Socialist Context (англ.) // The Soviet and Post-Soviet Review. — 2021. — Iss. 48, no. 3. — P. 367—390.
- ↑ Лариса Дмитрівна Якубова. Рашизм: звір з безодні. — Akademperiodyka, 2023. — 315 с.
- ↑ Tsygankov, Daniel Beruf, Verbannung, Schicksal: Iwan Iljin und Deutschland // Archiv fuer Rechts- und Sozialphilosophie. — Bielefeld, 2001. — Vol. 87. — 1. Quartal. — Heft 1. — S. 44—60.
- ↑ Russia's genocide handbook
- ↑ Это настоящий концлагерь: 21 фильтрационный лагерь создали оккупанты на Донетчине
- ↑ 'You can't imagine the conditions' - Accounts emerge of Russian detention camps
- ↑ Mariupol Women Report Russians Taking Ukrainians To 'Filtration Camps'
- ↑ Ukrainians who fled to Georgia reveal details of Russia’s ‘filtration camps’
