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रामदेव पीर

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श्री बाबा रामदेव पीर
रुणिचा के शासक, संत तथा समाज सुधारक, पीरों के पीर, रामसापीर,रूणेचा रा धनी ,सांप्रदायिकता के देवता, कृष्ण के अवतार,
पूर्ववर्तीअजमाल जी
जन्म( भाद्रपद सुदी द्वितीया ) विक्रम संवत 1409
उंडू काश्मीर (बाड़मेर)
निधनरामदेवरा
समाधि
रामदेवरा
पिताअजमाल जी
मातामेना दे
धर्महिन्दू

रामदेव जी (रामदेव पीर, रामशा पीर; 1352–1385 ई.; संवत् 1409–1442) भारत के गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में पूजे जाने वाले हिन्दू देवता हैं। वे चौदहवीं शताब्दी के राजपूत थे और पोखरण क्षेत्र से सम्बंधित थे।[1] कहा जाता है कि उनके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं और उन्होंने अपना जीवन गरीबों और समाज के वंचित वर्ग के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। राजस्थान में मेघवाल समुदाय के लोग उन्हें विशेष रूप से पूजते हैं। भारत में कई सामाजिक समूह उन्हें अपना इष्ट-देव मानते हैं। रामदेव को भगवान कृष्ण का अवतार भी माना जाता है।

पृष्ठभूमि

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राजा अजमल (अजमल जी तंवर) ने रानी मीनलदेवी से विवाह किया, जो छहान बारू गाँव के पेमजी भाटी की पुत्री थीं। संतानहीन होने के कारण राजा द्वारका गए और भगवान कृष्ण से अपने पुत्र की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद उनके दो पुत्र हुए: बड़े वीरमदेव और छोटे रामदेव। रामदेव का जन्म भादव सुदी दूज, संवत् 1409 में रामदेवरा, जैसलमेर जिले के तंवर राजपूत परिवार में हुआ। रामदेव जी का विवाह अमरकोट के सोढ़ा राजपूत दलै सिंह की पुत्री नेतलदे के साथ हुआ था।[2]

रामदेव सभी मनुष्यों की समानता में विश्वास रखते थे, चाहे वे उच्च हों या निम्न, अमीर हों या गरीब। उन्होंने गरीबों और उत्पीड़ितों की इच्छाओं की पूर्ति करके उनकी मदद की। उन्हें अक्सर घोड़े पर बैठे हुए दर्शाया जाता है। उनके अनुयायी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश, मुंबई, दिल्ली और पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में फैले हुए हैं। राजस्थान में उनके स्मरण में कई मेले आयोजित किए जाते हैं, और उनके नाम पर कई राज्यों में मंदिर बने हुए हैं।[3][4]

राजा अजमल की कहानी

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राजा अजमल द्वारका आए और कई दिनों तक प्रार्थना करते रहे। अंत में निराश होकर उन्होंने कृष्ण की मूर्ति से पूछा कि उन्हें यह दुख क्यों भोगना पड़ रहा है। मूर्ति ने राजा के बार-बार पूछने पर कोई उत्तर नहीं दिया। क्रोधित होकर राजा ने मूर्ति के सिर पर एक सूखा लड्डू फेंक दिया। मंदिर के पुजारी ने राजा को पागल समझा और उसे भगवान से मिलने के लिए रहस्यमय द्वारका जाने की सलाह दी। द्वारका, जिसे कई शताब्दियों पहले समुद्र ने निगल लिया था, अरबी सागर की तलहटी में स्थित था। निडर राजा समुद्र में कूदकर भगवान से मिलने गए।

राजा की भक्ति और विश्वास देखकर भगवान प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया। राजा ने अनुरोध किया कि कृष्ण उनके पुत्र के रूप में जन्म लें। भगवान ने राजा के घर आने का वचन दिया। इसके बाद, राजपरिवार को वीरमदेव नामक पुत्र हुआ। कुछ वर्षों के बाद, कृष्ण छोटे रूप में वीरमदेव के पास प्रकट हुए।

मुसलमान रामदेव को रामशा पीर के रूप में पूजते हैं। कहा जाता है कि उनके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं और उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। किंवदंती के अनुसार, मक्का के पाँच पीर उनकी शक्तियों की परीक्षा लेने आए। रामदेव ने उनका स्वागत किया और उनसे साथ भोजन करने का आग्रह किया। पीरों ने मना कर दिया और कहा कि वे केवल अपने बर्तन से ही भोजन करते हैं, जो मक्का में हैं। रामदेव मुस्कुराए और कहा, "देखो, आपके बर्तन आ रहे हैं", और तभी उनके बर्तन हवा में उड़कर मक्का से यहाँ आ गए। उनकी शक्तियों को देखकर पीरों ने उन्हें सम्मान दिया और उन्हें रामशा पीर कहा।[5][6][7][8]

वे पाँच पीर, जो रामदेव की शक्तियों को देखने आए थे, उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके साथ रहना तय किया। उनकी कब्रें रामदेव की समाधि के पास स्थित हैं। रामदेव ने अपने जीवन में कुल 24 चमत्कार किए।[9]

रामदेवरा (जैसलमेर) स्थित बाबा रामदेव की समाधि

बाबा रामदेव ने वि.स. १४४२ में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को राजस्थान के रामदेवरा (पोकरण से 10 कि.मी.) में जीवित समाधि ले ली।

रामदेव जयंती

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रामदेव जयंती, अर्थात् बाबा का जन्मदिवस प्रतिवर्ष उनके भक्तों द्वारा सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। यह तिथि भाद्र शुक्ल द्वितीया को पड़ती है। रामदेवरा के मंदिर में भादवा सुदी बीज से एकादशी तक एक अंतरप्रांतीय मेले का आयोजन होता है जिसे "भादवा का मेला" कहते हैं। इस मेले में देश के हर कोने से लाखों हिन्दू और मुस्लिम श्रद्धालु यात्रा करते हुए पहुंचते हैं तथा बाबा की समाधि पर नमन करते हैं।[10] [11]

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. नगर, डाॅ महेन्द्र सिंह (2011). राव जोधा पूर्व मारवाड़ का इतिहास. जोधपुर: महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केंद्र. p. 174. रामदेवजी ने तीन विवाह किये थे। उनका एक विवाह दलजी सोढा की पुत्री नेतलदे से हुआ था। रामदेव की दो अन्य रानियां पाऊ ठिकाने की भटियाणी और मारोठ के शाशक बिल्हण दहिया की पुत्री थी। रामदेव के छः पुत्र सादो, देवराज, गीदरा, मेहरा,बीका,जैता थे ।एक पुत्री चांद कुँवरी थी।
  2. Pilgrims, Patrons, and Place: Localizing Sanctity in Asian Religions (illustrated, revised ed.). UBC Press. 2003. p. 347. ISBN 9780774810395. Ramdev (Ramdeo, Ramde) Pir, a semi-legendary Rajput hero of the end of the fourteenth century who became the religious head of the untouchables in Rajasthan...
  3. "राजस्थान के गौरव - पियूष प्रवाह" (PDF). Board of Secondary Education, Rajasthan - Official Website. p. 54 Page of the PDF or 46 Page of the Book.
  4. India today, Volume 18, Issues 1-12. लिविंग मीडिया इंडिया प्राइवेट लिमिटेड. 1993. p. ६१. 23 दिसंबर 2016 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 11 अप्रैल 2020.
  5. A call to honour: in service of emergent India by Jaswant Singh. Rupa & Co. 2006. p. 23. ISBN 9788129109767.
  6. India today, Volume 18, Issues 1-12. Living Media India Pvt. Ltd. 1993. p. 61.
  7. Smith, Bardwell L. (1976). Hinduism: New Essays in the History of Religions By Bardwell L. Smith. Brill Archive. pp. 138–139. ISBN 9004044957.
  8. Roy Burman, J. J. (2004). Gujarat Unknown: Hindu-Muslim Syncretism and Humanistic Forays By J. J. Roy Burman. Mittal Publications. pp. 114–115. ISBN 9788183240529.
  9. India today, Volume 18, Issues 1-12. Living Media India Pvt. Ltd. 1993. p. 61.
  10. "रामदेवरा में मनाया बाबा का जन्मोत्सव:तंवर वंश की भाट बही के अनुसार बाबा रामदेव का अवतरण दिवस आज, समाधि पर किया पंचामृत से अभिषेक". दैनिक भास्कर. 6 अप्रैल 2022 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 19 जून 2023.
  11. Bhati, Harshwardhan (31 अगस्त 2017). "इतिहास का ये रोचक तथ्य आया सामने, चैत्र शुक्ल पंचमी को हुआ था बाबा रामदेव का अवतरण!". राजस्थान पत्रिका. 8 अक्टूबर 2018 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 19 जून 2023.