माध्यमिक तंत्र-साहित्य

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्राचीन आगमों या तंत्रों का नामनिर्देश अन्यत्र किया गया है। यहाँ माध्यमिक तंत्र साहित्य के विषय में बताया गया है।


तन्त्र का भेदनिरूपण

देवताओं के उपासनासंबंध से तंत्र का भेदनिरूपण संक्षेप में कुछ इस प्रकार होगा-

  • 1. काली (भैरव; महाकाल) के नाना प्रकार के भेद हैं, जैसे, दक्षिणाकाली, भद्रकाली। काली दक्षिणान्वय की देवता हैं। श्यमशान काली उत्तरान्वय की देवता हैं। इसके अतिरिक्त कामकला काली, धन-काली, सिद्धकाली, चंडीकाली प्रभृति काली के भेद भी हैं।
  • 2. महाकाली के कई नाम प्रसिद्ध हैं। नारद, पांचरात्र, आदि ग्रंथों से पता चलता है कि विश्वामित्र ने काली के अनुग्रह से ही ब्रह्मण्य-लाभ किया था। काली के विषय में 'शक्तिसंगम तंत्र' के अनुसार काली और त्रिपुरा विद्या का साद्दश्य दिखाई देता है।
छित्रा, बाला, कमला, सुमुखी, भुवनेश्वरी, लक्ष्मी, तारा, बगला, सुंदरी, तथा राजमातंगी

प्रसिद्ध ग्रन्थ[संपादित करें]

काली से सम्बन्धित[संपादित करें]

काली के विषय में कुछ प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं-

1. महाकाल संहिता, (50 सहस्रश्लोकात्मक अथवा अधिक), 2. परातंत्र (यह काली विषयक प्राचीन तंत्र ग्रंथ है। इसमें चार पटल हैं, एक ही महाशक्ति पÏट्सहानारूढा षडान्वया देवी हैं। इस ग्रंथ के अनुसार पूर्वान्वय की अधिष्ठातृ देवी पूर्णोश्वरी, दक्षिणान्वय की विश्वेश्वरी, पूर्वान्य की कुब्जिका, उत्तरान्वय की काली, ऊर्ध्वान्वय की श्रीविद्या।), 3. काली यामल; 4. कुमारी तंत्र; 5. काली सुधानिध; 6. कालिका मत; 9. काली कल्पलता; 8. काली कुलार्णव; 5. काली सार; 10 कालीतंत्र; 11. कालिका कुलसद्भाव; 13. कालीतंत्र; 14.। 15. कालज्ञान और कालज्ञान के परिशिष्टरूप में कालोत्तर; 16. काली सूक्त; 17. कालिकोपनिषद्; 18. काली तत्व (रामभटटकृत); 19. भद्रकाली चितामणि; 20. कालीतत्व रहस्य; 21. कालीक्रम कालीकल्प या श्यामाकल्प; 22. कालीऊर्ध्वान्वय; 23. कालीकुल; 24. कालीक्रम; 25. कालिकोद्भव; 26. कालीविलास तंत्र; 27. कालीकुलावलि; 28. वामकेशसंहिता; 29. काली तत्वामृत; 30. कालिकार्चामुकुर; 31. काली या श्यामारहस्य (श्रीनिवास कृत); 33. कालिकाक्रम; 34. कालिका ह्रदय; 35. काली खंड (शक्तिसंगम तंत्र का);36. काली-कुलामृत; 37. कालिकोपनिषद् सार; 38. काली कुल क्रमार्चन (विमल बोध कृत); 39. काली सपर्याविधि (काशीनाथ तर्कालंकार भट्टाचार्य कृत); 40. काली तंत्र सुधसिंधु (काली प्रसाद कृत); 41. कुलमुक्ति कल्लोलिनी (अव्दानंद कृत); 24. काली शाबर; 43. कौलावली; 44. कालीसार; 45. कालिकार्चन दीपिका (लगदानंद कृत); 46. श्यामर्चन तरंगिणी (विश्वनाथ कृत); 47. कुल प्रकाश; 48. काली तत्वामृत (बलभद्र कृत); 49. काली भक्ति रसायन (काशीनाथ भट्ट कृत); 50. कालीकुल सर्वस्व; 51. काली सुधानिधि; 52. कालिकोद्रव (?); 53. कालीकुलार्णव; 54. कालिकाकुल सर्वस्व; 56. कालोपरा; 57. कालिकार्चन चंद्रिका (केशवकृत) इत्यादि।

तारा से सम्बन्धित[संपादित करें]

तारा : तारा के विषय में निम्नलिखित तंत्र ग्रथ विशेष उल्लेखनीय हैं-

1 तारणीतंत्र; 2. तोडलतंत्र; 3- तारार्णव; 4- नील-तंत्र; 5- महानीलतंत्र; 6- नील सरस्वतीतंत्र; 7- चीलाचार; 8- तंत्ररत्न; 9- ताराशाबर तंत्र; 10- तारासुधा; 11- तारमुक्ति सुधार्णव (नरसिंह ठाकुर कृत); 12- तारकल्पलता; - (श्रीनिवास कृत) ; 13- ताराप्रदीप (लक्ष्मणभट्ट कृत) ; 14- तारासूक्त; 15- एक जटीतंत्र; 16- एकजटीकल्प; 17- महाचीनाचार क्रम (ब्रह्म यामल स्थित) 18- तारारहस्य वृति; 19- तारामुक्ति तरंगिणी (काशीनाथ कृत); 20- तारामुक्ति तरंगिणी (प्रकाशनंद कृत); 21- तारामुक्ति तरंगिणी (विमलानंद कृत); 22- महाग्रतारातंत्र; 23- एकवीरतंत्र; 24- तारणीनिर्णय; 25- ताराकल्पलता पद्धति (नित्यानंद कृत); 26- तारिणीपारिजात (विद्वत् उपाध्याय कृत); 27- तारासहस्स्र नाम (अभेदचिंतामणिनामक टीका सहित); 28- ताराकुलपुरुष; 29- तारोपनिषद्; 30- ताराविलासोदय) (वासुदेवकृत)।

'तारारहस्यवृत्ति' में शंकराचार्य ने कहा है कि वामाचार, दक्षिणाचार तथा सिद्धान्ताचार में सालोक्यमुक्ति संभव है। परंतु सायुज्य मुक्ति केवल कुलागम से ही प्राप्य है। इसमें और भी लिखा गया है कि तारा ही परा वग्रूपा, पूर्णाहंतामयी है। शक्तिसंगमतंत्र में भी तारा का विषय वर्णित है। रूद्रयामल के अनुसार प्रलय के अनंतर सृष्टि के पहले एक वृहद् अंड का आविर्भाव होता है। उसमें चतुर्भुज विष्णु प्रकट होते हैं जिनकी नाभि में ब्रह्मा ने विष्णु से पूछा- किसी आराधना से चतुभ्र्वेद का ज्ञान होता है। विष्णु ने कहा रूद्र से पूछो- रूद्र ने कहा मेरू के पश्चिम कुल में चोलह्द में वेदमाता नील सरस्वती का आविर्भाव हुआ। इनका निर्गम रूद्र के ऊध्र्व वस्त्र से है। यह तेजरूप से निकलकर चौलह्रद में गिर पड़ीं और नीलवर्ण धारण किया। ह्रद के भीतर अक्षोभ्य ऋषि विद्यमान थे। यह रूद्रयामल की कथा है।

श्रीविद्या[संपादित करें]

श्रीविद्या से सम्बन्धित तन्त्र ग्रन्थों के बारे में जानने के लिये

पर जाएँ।

श्रीविद्या का नामान्तर है 'षोडशी'। त्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुरा, ललिता, आदि भी उन्हीं के नाम है। इनके भैरव हैं- त्रिपुर भैरव (देव शक्ति संगमतंत्र)। महाशक्ति के अनंत नाम और अनंत रूप हैं। इनका परमरूप एक तथा अभिन्न हैं। त्रिपुरा उपासकों के सतानुसार ब्रह्म आदि देवगण त्रिपुरा के उपासक हैं। उनका परमरूप इंद्रियों तथा मन के अगोचर है। एकमात्र मुक्त पुरूष ही इनका रहस्य समझ पाते हैं। यह पूर्णाहंतारूप तथा तुरीय हैं। देवी का परमरूप वासनात्मक है, सूक्ष्मरूप मंत्रात्मक है, स्थूलरूप कर-चरणादि-विशिष्ट है। उनके उपासकों में प्रथम स्थान काम (मन्मथ) का है। यह देवी गुहय विद्या प्रवर्तक होने के कारण विश्वेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हैं। देवी के बारह मुख और नाम प्रसिद्ध हैं। - यथा, मनु, चंद्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य, अग्नि, सूर्य, इंद्र, स्कंद, शिव, क्रोध भट्टारक (या दुर्वासा)। इन लोगों ने श्रीविद्या की साधना से अपने अधिकार के अनुसार पृथक् फल प्राप्त किया था।

दस महाविद्या[संपादित करें]

इस महाविद्याओं में पहली त्रिशक्तियों का प्रतिष्ठान जिन ग्रंथों में है उनमें से संक्षेप में कुछ ग्रंथों के नाम ऊपर दिए गए हैं।

भुवनेश्वरी के विषय में 'भुवनेश्वरीरहस्य' मुख्य ग्रंथ है। यह 26 पटलों में पूर्ण है। पृथ्वीधराचार्य का भुवनेश्वरी अर्चन पद्धति एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। ये पृश्रवीधर गांविन्दपाद के शिष्य शंकराचार्य के शिष्य रूप से परिचित हैं। भुवनेश्वरीतंत्र नाम से एक मूल तंत्रग्रंथ भी मिलता हैं। इसी प्रकार राजस्थान पुरात्तत्व ग्रथमाला में पृथ्वीधर का भुवनेश्वरी महास्तोत्र मुद्रित हुआ है।

भैरवी के विषय में भैरवीतंत्र प्रधान ग्रंथ है। यह प्राचीन ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त 'भैरवीरहस्य', 'भैरवी सपयाविधि' आदि ग्रंथ भी मिलते हैं। पुरश्चर्यार्णव नामक ग्रंथ में भैरवी यामल का उल्लेख है। भैरवी के नाना प्रकार के भेद हैं- जैसे, सिद्ध भैरवी, त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षटकुटा भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी, इत्यादि। 'सिद्ध भैरवी' उत्तरान्वय पीठ की देवता है। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता है। नित्या भैरवी पश्चिमान्वय की देवता है। भद्र भैरवी महाविष्णु उपासिका और दक्षिणासिंहासनारूढा है। त्रिपुराभैरवी चतुर्भुजा है। भैरवी के भैरव का नाम बटुक है। इस महाविद्या और दशावतार की तुलना करने पर भैरवी एवं नृसिंह को अभिन्न माना जाता है।

बगला का मुख्य ग्रंथ है - सांख्यायन तंत्र। यह 30 पटलों में पूर्ण है। यह ईश्वर और क्रौंच भेदन का संबंद्ध रूप है। इस तंत्र को 'षट् विद्यागम' कहा जाता है। बगलाक्रम कल्पवल्ली नाम से यह ग्रंथ मिलता है जिसमें देवी के उद्भव का वर्णन हुआ है। प्रसिद्धि है कि सतयुग में चारचर जगत् के विनाश के लिये जब वातीक्षीम हुआ था उस समय भगवान तपस्या करते हुए त्रिपुरा देवी की स्तुति करने लगे। देवी प्रसन्न होकर सौराष्ट्र देश में वीर रात्रि के दिन माघ मास में चतुर्दशी तिथि की प्रकट हुई थीं। इस वगलादेवी को त्रैलोक्य स्तंभिनी विद्या जाता है।

धूमवती के विषय में विशेष व्यापक साहित्य नहीं है। इनके भैरव का नाम कालभैरव है। किसी किसी मत में धूमवती के विधवा होने के कारण उनका कोई भैरव नहीं है। वे अक्षय तृतीया को प्रदीप काल में प्रकट हुई थीं। वे उत्तरान्वय की देवता हैं। अवतारों में वामन का धूमवती से तादात्म्य है। धूमवती के ध्यान से पता चलता है कि वे काकध्वज रथ में आरूढ़ हैं। हस्त में शुल्प (सूप) हैं। मुख सूत पिपासाकातर है। उच्चाटन के समय देवी का आवाहन किया जाता है। 'प्राणातोषिनी' ग्रंथ में धूमवती का आविर्भाव वर्णित हुआ है।

मातंगी का नामांतर सुमुखी है। मातंगी को उच्छिष्टचांडालिनी या महापिशाचिनी कहा जाता है। मातंगी के विभिन्न प्रकार के भेद हैं- उच्छिष्टमातंगी, राजमांतगी, सुमुखी, वैश्यमातंगी, कर्णमातंगी, आदि। ये दक्षिण तथा पश्चिम अन्वय की देवता हैं। ब्रह्मयामल के अनुसार मातंग मुनि ने दीर्घकालीन तपस्या द्वारा देवी को कन्यारूप में प्राप्त किया था। यह भी प्रसिद्धि है कि घने वन में मातंग ऋषि तपस्या करते थे। क्रूर विभूतियों के दमन के लिये उस स्थान में त्रिपुरसुंदरी के चक्षु से एक तेज निकल पड़ा। काली उसी तेज के द्वारा श्यामल रूप धारण करके राजमातंगी रूप में प्रकट हुईं। मातंगी के भैरव का नाम सदाशिव है। मातंगी के विषय में मातंगी सपर्या, रामभट्ट का मातंगीपद्धति, शिवानन्द का मंत्रपद्धति है। मंत्रपद्धति सिद्धांतसिधु का एक अध्याय है। काशीवासी शंकर नामक एक सिद्ध उपासक सुमुखी पूजापद्धति के रचयिता थे। शंकर सुंदरानंद नाथ के शिष्य (छठी पीढ़ी में) प्रसिद्ध विद्यारण्य स्वामी की शिष्यपरंपरा में थे।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]