धूमावती

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धूमावती
Dhumavati.JPG
संबंध महाविद्या, देवी
अस्त्र सुप
जीवनसाथी शिव

धूमावती पार्वती का एक रूप हैं। इस रूप में उन्हें बहुत भूख लगी और उन्होंने महादेव से कुछ खाने को माँगा। महादेव ने थोड़ा ठहरने के लिये कहा। पर पार्वती क्षुधा से अत्यंत आतुर होकर महादेव को निगल गई। महादेव को निगलने पर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ। अब तक आपने अनेक देवी-देवताओं और उनकी मान्यताओं के बारे में सुना होगा, लेकिन आज हम आपको धूमावतीदेवी के बारे में बता रहे हैं, जिनके रूप के पीछे अनोखी कहानी है। उनका रूप अन्य देवियों की तरह सुहागन और अति लुभावना नही, बल्कि डरावना और क्रूर है। यह विधवा हैं, किंतु कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मुराद मां पूरी करती हैं। इनका पूजन सिर्फ विधवाएं ही कर सकती हैं, लेकिन सुहागिन स्त्रियां पति और पुत्र की दीर्घायु के लिए दूर से ही प्रार्थना कर सकती हैं। धूमावती जयंती (12 जून) को बनाई जाती है। हम माँ धूमावती से जुड़ी कुछ खास और 6 बातें बता रहे हैं- 1.मध्यप्रदेश के दतिया जिले में धूमावती माता का यह अपनी तरह का ही अनोखा मन्दिर है। यहां सबसे विशेष बात ये है किमां धूमावती को नमकीन पकवान, जैसे- मंगोडे, पकौड़ी, कचौड़ी व समोसे आदि का भोग लगाया जाता है। जिनकी दुकानें मंदिर के आसपास ही हैं और लोग प्रसाद के लिए इन चीजों को खरीददते हैं। बाद में भक्तों को इन्ही का प्रसाद बांटा जाता है। सीतापुर यूपी व नेपाल में भी मां धूमावती के दर्शन होते हैं। 2. माना जाता है कि पीताम्बरा पीठ की स्थापना एक संत, जिन्हें स्वामीजी महाराज कहा जाता था, ने की थी। स्थानीय किंवदंती के अनुसार पीठ के परिसर में माँ धूमावती की स्थापना न करने के लिए अनेक विद्वानों ने स्वामीजी महाराज से आग्रह किया था। तब स्वामी जी ने कहा कि- मां का भयंकर रूप तो दुष्टों के लिए है, भक्तों के प्रति ये अति दयालु हैं। 3.जब माँ पीताम्बरा पीठ में मां धूमावती की स्थापना हुई थी, उसी दिन स्वामी महाराज ने अपने ब्रह्मलीन होने की तैयारी शुरू कर दी थी। बताते हैं कि ठीक एक वर्ष बाद मां धूमावती जयन्ती के दिन स्वामी महाराज ब्रह्मलीन हो गए। 4.मां धूमावती की आरती सुबह-शाम होती है, लेकिन भक्तों के लिए धूमावती का मन्दिर शनिवार को सुबह-शाम 2 घंटे के लिए खुलता है। बांकी समय मंदिर के पट लगे रहते हैं। धूमावती देवी के दर्शन सिर्फ आरती के दौरान करना ही संभव है। 5.10 महाविधाओं में उग्र मां धूमावती का स्वरूप विधवा का है और कौआ उनका वाहन है। माता श्वेत मलिन वस्त्र धारण करती हैं और उनके केश खुले हुए हैं। शनिवार को काले कपड़े में काले तिल माता को भेंट किये जाते हैं। धूमावती साधना तांत्रिक बाधाओं की काट मानी जाती है। 6.पौराणिक ग्रंथों अनुसार ऋषि दुर्वासा, भृगु, परशुराम आदि की मूल शक्ति धूमावती हैं। सृष्टि कलह की देवी होने के कारण इनको कलहप्रिय भी कहा जाता है। चौमासा देवी का प्रमुख समय होता है जब देवी का पूजा पाठ किया जाता है जयंती पूरे देश भर में धूमधाम के साथ मनाई जाती है जो भक्तों के सभी कष्टों को मुक्त कर देने वाली है। ।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. N. राज गोपाल, सुमन सचर (2000). Indian English poetry and fiction: a critical evaluation (अंग्रेज़ी में). नई दिल्ली: Atlantic Publishers & Distributors. पृ॰ 164. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7156-905-2.