भुवनेश्वरी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
आदि शक्ति माँ भुवनेश्वरी
अस्त्र पाश अंकुश अभय और वरद मुद्रा
सवारी कमल

भुवनेश्वरी अर्थात् संसार भर के ऐश्वर्य की स्वामिनी। वैभव-पदार्थों के माध्यम से मिलने वाले सुख-साधनों को कहते हैं। ऐश्वर्य-ईश्वरीय गुण है- वह आंतरिक आनंद के रूप में उपलब्ध होता है। ऐश्वर्य की परिधि छोटी भी है और बड़ी भी। छोटा ऐश्वर्य छोटी-छोटी सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने पर उनके चरितार्थ होते समय सामयिक रूप से मिलता रहता है। यह स्वउपार्जित, सीमित आनंद देने वाला और सीमित समय तक रहने वाला ऐश्वर्य है। इसमें भी स्वल्प कालीन अनुभूति होती है और उसका रस कितना मधुर है यह अनुभव करने पर अधिक उपार्जन का उत्साह बढ़ता है।

भुवनेश्वरी इससे ऊँची स्थिति है। उसमें सृष्टिभर का ऐश्वर्य अपने अधिकार में आया प्रतीत होता है। स्वामी रामतीर्थ अपने को 'राम बादशाह' कहते थे। उनको विश्व का अधिपति होने की अनुभूति होती थी, फलतः उस स्तर का आनंद लेते थे, जो समस्त विश्व के अधिपति होने वाले को मिल सकता है। छोटे-छोटे पद पाने वाले, सीमित पदार्थों के स्वामी बनने वाले, जब अहंता को तृप्त करते और गौरवान्वित होते हैं तो समस्त विश्व का अधिपति होने की अनुभूति कितनी उत्साहवर्धक होती होगी, इसकी कल्पना भर से मन आनंद विभोर हो जाता है। राजा छोटे से राज्य के मालिक होते हैं, वे अपने को कितना श्रेयाधिकारी, सम्मानास्पद एवं सौभाग्यवान् अनुभव करते हैं, इसे सभी जानते हैं। छोटे-बडे़ राजपद पाने की प्रतिस्पर्धा इसीलिए रहती है कि अधिपत्य का अपना गौरव और आनन्द हैं।

यह वैभव का प्रसंग चल रहा है। यह मानवी एवं भौतिक है। ऐश्वर्य दैवी, आध्यात्मिक, भावनात्मक है। इसलिए उसके आनन्द की अनुभूति उसी अनुपात से अधिक होती है। भुवन भर की चेतनात्मक आनन्दानुभूति का आनन्द जिसमें भरा हो उसे भुवनेश्वरी कहते है। गायत्री की यह दिव्यधारा जिस पर अवतरित होती है, उसे निरन्तर यही लगता है कि उसे विश्व भर के ऐश्वर्य का अधिपति बनने का सौभाग्य मिल गया है। वैभव की तुलना में ऐश्वर्य का आनन्द असंख्य गुणा बड़ा है। ऐसी दशा में सांसारिक दृष्टि से सुसम्पन्न समझे जाने की तुलना में भुवनेश्वरी की भूमिका में पहुँचा हुआ साधक भी लगभग उसी स्तर की भाव संवेदनाओं से भरा रहता है, जैसा कि भुवनेश्वर भगवान् को स्वयं अनुभव होता होगा।

भावना की दृष्टि से यह स्थिति परिपूर्ण आत्मगौरव की अनुभूति है। वस्तु स्थिति की दृष्टि से इस स्तर का साधक ब्रह्मभूत होता है, ब्राह्मी स्थिति में रहता है। इसलिए उसकी व्यापकता और समर्थता भी प्रायः परब्रह्म के स्तर की बन जाती है। वह भुवन भर में बिखरे पड़े विभिन्न प्रकार के पदार्थों का नियन्त्रण कर सकता है। पदार्थों और परिस्थितियों के माध्यम से जो आनन्द मिलता है उसे अपने संकल्प बल से अभीष्ट परिमाण में आकर्षित-उपलब्ध कर सकता है।

भुवनेश्वरी मनःस्थिति में विश्वभर की अन्तः चेतना अपने दायित्व के अन्तर्गत मानती है। उसकी सुव्यवस्था का प्रयास करती है। शरीर और परिवार का स्वामित्व अनुभव करने वाले इन्हीं के लिए कुछ करते रहते हैं। विश्वभर को अपना ही परिकर मानने वाले का निरन्तर विश्वहित में ध्यान रहता है। परिवार सुख के लिए शरीर सुख की परवाह न करके प्रबल पुरुषार्थ किया जाता है। जिसे विश्व परिवार की अनुभूति होती है। वह जीवन-जगत् से आत्मीयता साधता है। उनकी पीड़ा और पतन को निवारण करने के लिए पूरा-पूरा प्रयास करता है। अपनी सभी सामर्थ्य को निजी सुविधा के लिए उपयोग न करके व्यापक विश्व की सुख शान्ति के लिए, नियोजित रखता है।

वैभव उपार्जन के लिए भौतिक पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। ऐश्वर्य की उपलब्धि भी आत्मिक पुरुषार्थ से ही संभव है।

     जय माँ भुवनेश्वरी
 "माँ द्वारा स्वचयनित स्थान"
 आचार्य नागेन्द्र मोहन सैलवाल द्वारा लिखा गया आलेख  के अनुसार देवभूमि उत्तराखंड में सांगुड़ा की मनोहारी सुरम्य उपत्यका में स्थित मां भुवनेश्वरी सिद्ध पीठ सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र रहा है। जैसे कि किसी भी धर्मस्थल की स्थापना की पृष्ठभूमि में अनेक जनश्रुति, दंतकथा या पौराणिक गाथाएं होती हैं वैसे ही मणिद्वीप स्थित सिद्धपीठ के साथ भी अनेक दंतकथाएं जुड़ी हैं। यह ठीक है कि इतिहास की कठोर सीमाओं के अंतर्गत हर बात की तार्किक परिणति संभव नहीं है लेकिन आस्था के आगे तमाम तर्क व्यर्थ हो जाते हैं। अठारहवीं सदी के इस मंदिर में मातृलिंग की स्थापना 21 मार्च, 1757 को श्रद्धालुओं ने की। लेकिन 1953 में आयी भयावह प्राकृतिक आपदा ने इसे भारी क्षति पहुंचाई। फिर मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रयास 1977 में हुए। लेकिन मंदिर के जीर्णोद्धार, नवनिर्माण तथा सामाजिक सरोकारों से जुडऩे के भगीरथ प्रयास वर्ष 1991 के बाद हुए। आज सांगुड़ा पीठ न केवल धार्मिक स्थल के रूप में बल्कि समाज कल्याण का केद्र बनकर उभरा है। 18वीं सदी का यह आस्था स्थल पौड़ी गढ़वाल के सतपुली-बांघाट-व्यासघाट पर तिल्या के समीप नारद गंगा के तट पर ऊंची चट्टान पर विद्यमान है। यह बांघाट से दो किलोमीटर दूर स्थित है। मंदिर का परिवेश अत्यंत रमणीक एवं मनोहारी है। मंदिर के बारे अनुश्रुति है कि इस स्थान को मां भगवती ने खुद चुना है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां श्रद्धानुसार मंदिर की 11, 21 या 108 परिक्रमा करके बेलपत्ती चढ़ाने से मनोकामना पूरी होती है।

इंद्रप्रस्थ से असुरों का नाश करने के उपरांत हिमालय की ओर उन्मुख मां भुवनेश्वरी अपने गंतव्य स्थल तक पहुंचने के क्रम में युद्धमल सिंह नेगी के नमक के भारे में मातृलिंग के रूप में विराजमान हुई। बांस के बने और भारी सामान के लिए कंधे पर रखकर ले जाये जाने वाले सोल्टे लेकर जब युद्धमल अपने सहयोगियों को लेकर नयार नदी पार कर सांगुड़ा पहुंचे, मणिद्वीप की मनोहारी सुरम्य उपत्यका को देखकर मां भगवती ने इसे अपने विश्राम स्थल के लिए चुना। युद्धमल और उनके साथी जब नमक के सोल्टे के साथ विश्राम करने के बाद आगे बढ़े तो उनके सोल्टे इतने भारी हो गये कि वे आगे न चल सके। उन्होंने आसपास के गांव के लोगों को नमक बांट दिया। ग्रामीण नमक की इतनी मात्रा देखकर हैरत में थे और नमक बांटकर सोल्टा झाड़कर मातृलिंग को काला पत्थर समझकर वहां स्थित एक बेल के पेड़ के नीचे रख दिया। जनश्रुति है कि भुवनेश्वरी ने म्वाथा नेगी भवान सिंह को स्वप्न में जाकर बताया कि सांगुड़ा में मेरे मातृलिंग को स्थापित करो। यह मंदिर मनियारियो की भूमि में स्थापित है।मंदिर निर्माण मे नैथानी लोगो ने भी भाव के साथ भूमिका निभाई और तब से वह माँ को कुलदेवी के रूप मे पूजने लगे। कालांतर यहां मातृलिंग की स्थापना करके मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई,जो कालांतर में भूकंप से धराशायी हुआ। स्थानीय जनता के प्रयास से एक छोटा मंदिर पुन: बनाया गया। लेकिन इस भुवनेश्वरी मंदिर के जीर्णोद्धार की असली शुरुआत वर्ष 1991 में पीठाधीश (राजेन्द्र प्रसाद सैलवाल जी) के साथ जिसमें जनरत्न नैथानी जी, सनत कुमार जी , श्री लक्ष्मीकांत जी सुरेंद्र सिंह नेगी जी म्वाथा मनियारी लोगो ने ने जीर्णोद्धार का संकल्प लिया। मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित गणेश प्रसाद सैलवाल जी बताते हैं कि आज यह मिशन न केवल मंदिर का कायाकल्प कर पाया है बल्कि इसने क्षेत्र में सामाजिक क्रांति का परचम भी लहराया है। देश-विदेश में बैठे हजारों श्रद्धालुओं को एक सूत्र में बांधकर बासंतिक व शारदीय नवरात्र पर यहां एकत्र होने का अवसर दिया। आज यहां मनोहारी व भव्य मंदिर परिसर व बड़ी धर्मशाला का निर्माण कराया गया है। आज यह मिशन निकटवर्ती ग्रामों के निर्धन व मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने, सरकारी स्कूलों में फर्नीचर उपलब्ध कराने, रोजगारपरक पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण देने, आदिशक्ति मां भुवनेश्वरी संस्कृत विद्यालय चलाने, अभावग्रस्त बच्चों को अस्थायी संरक्षण प्रदान करने, पुस्तकालय चलाने,जैसी मुहिम से जुड़ा है। आस्था के मायने सिर्फ कर्मकांड नहीं होता, इसके सहारे कैसे हजारों लोगों की जिन्दगी बदल सकती है, यह इस मिशन ने बताया है। संस्था क्षेत्र में नि:शुल्क चिकित्सा शिविर चलाकर सैकड़ों लोगों को लाभ पहुंचाती है।

क्षेत्र में स्वरोजगार अभियान के लिए मधुपालन व अन्य कुटीर उद्योग धंधों के विस्तार हेतु गंभीर प्रयासरत हैं। माँ के भक्त श्री Bhashkar Naithani जी बताते हैं कि हम लोगों को मिशन से जोडऩे के लिए तथा अतीत को जीवंत करने हेतु अभिनव योजनाओं का क्रियान्वयन कर रहे हैं। साथ ही श्रमदान व स्पर्श गंगा अभियान के तहत नयार गंगा की सफाई अभियान में भी जुटे हैं।

" रमेश गड़िया "


जय माँ भुवनेश्वरी

"माँ के पूज्य पीठाधीश (पुरोहितों) का कुल परंपरा का परिचय।"

21 मार्च 1757 सोमवार को  "माँ भुवनेश्वरी मातृलिंग" की  स्थापना की गई थी। उस समय प्रथम पीठाधीश  श्री उत्सव सैलवाल जी के द्वारा माँ के मातृलिंग की स्थापना की गई थी। यह परंपरा तब से और अब तक वर्तमान मे भी बनी हुई है।

माँ भुवनेश्वरी ने अपने पुरोहित परमानन्द सैलवाल जी को स्वयं साक्षात दर्शन दिये थे, और माँ ने स्वयं उन्हें संबोधित किया था औऱ कहा-

        तुम मूलतः चौथाण मे विंशर महादेव क्षेत्र मे यायावर गोचर ब्राह्मण शैलवासी हो। शिरोमणि सैलवाल के पुत्र हरिधर सैलवाल के पुत्र उत्सव सैलवाल के पुत्र बूथाराम सैलवाल के पुत्र परम मेधावी पुत्र तुम्हारे पिता दल्पाराम हुये जो कि निरंतर मेरी भक्ति मे लीन थे।

   मेरी प्रेरणा से अमरदेव सिंह रावत, युद्धमल सिंह नेगी,जूठामल सिंह नेगी, भवानी सिंह नेगी, नेत्रमणि नैथानी ने 1757 मे चौथाण से उत्सव सैलवाल औऱ उनके पुत्र बूथाराम सैलवाल को लाकर शैली ग्राम मे स्थापित कर मेरी पुरोहिती का दायित्व सौंपा।

पीठपरम्परा को माँ का आशीर्वाद

                 

आने वाली पीढ़ी आज तक के संचित पुण्य का फल पायेगी।मैं प्रत्येक सदी मे तुम्हारी आयु (55 वर्ष) मे प्रत्येक पीठाधीश को किसी न किसी रूप मे दर्शन दूंगी। तुम्हारे वंशजो के स्पर्श से दी गई वस्तु भक्तों के लिये मेरा प्रसाद होग़ी।तुम्हारे कुल मे ब्रह्मज्ञान और यश सदा रहेगा।

      जाओ मेरा ध्यान करो।अस्तु.....

 

पीठ परम्परा  (वंशावली )का परिचय---

श्री हरिधर सैलवाल के पुत्र

श्री उत्सव सैलवाल के पुत्र

श्री बूथाराम सैलवाल के पुत्र

श्री दल्पाराम सैलवाल के पुत्र

श्री राजेन्द्र सैलवाल के पुत्र

श्री गणेश प्रसाद सैलवाल(वर्तमान पीठाधीश) के पुत्र नागेन्द्र मोहन सैलवाल (भावी पीठाधीश)।।

आदिशक्ती माँ भुवनेश्वरी मणिद्वीप सांगुड़ा बिलखेत।।