नंद वंश

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३२३ ईसा पूर्व में धनानन्द के शासनकाल में नन्दवंश का साम्राज्य अपनी चरम अवस्था में था

नंदवंश प्राचीन भारत का एक राजवंश था।पुराणों में इसे महापद्मनंद कहा गया है ।

उसे महापद्म एकाराट पूराण मे कहा गया है, सर्व क्षत्रान्तक आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है । जिसने पाँचवीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व उत्तरी भारत के विशाल भाग पर शासन किया। नंदवंश की स्थापना महापद्मनंद ने की थी। भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई जो कुलीन नहीं था तथा जिसकी सीमाएं गंगा के मैदानों को लांघ गई। यह साम्राज्य वस्तुतः स्वतंत्र राज्यों या सामंतों का शिथिल संघ ना होकर बल्कि किसी शक्तिशाली राजा बल के सम्मुख नतमस्तक होते थे। ये एक एक-रात की छत्रछाया में एक अखंड राजतंत्र था, जिसके पास अपार सैन्यबल, धनबल और जनबल था। महापद्मनंद ने निकटवर्ती सभी राजवंशो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की एवं केंद्रीय शासन की व्यवस्था लागू की। इसीलिए सम्राट महापदम नंद को "केंद्रीय शासन पद्धति का जनक" कहा जाता है। महापद्म नन्द के नव नंद प्रमुख राज्य उत्तराधिकारी हुए हैं- उग्रसेन, पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त, धनानन्द इसके शासन काल में भारत पर आक्रमण सिकन्दर द्वारा किया गया । सिकन्दर के भारत से जाने के बाद मगध साम्राज्य में अशान्ति और अव्यवस्था फैली । धनानन्द एक लालची और धन संग्रही शासक था, जिसे असीम शक्तिल और सम्पत्ति के बावजूद वह जनता के विश्वाास को नहीं जीत सका । उसने एक महान विद्वान ब्राह्मण चाणक्य को अपमानित किया था । चाणक्य ने अपनी कूटनीति से धनानन्द को पराजित कर चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाया । [1] स्मित के शब्दों में कहें तो "उन्होंने 66 परस्पर विरोधी राज्यों को इस बात के लिए विवश किया कि वह आपसी उखाड़-पछाड़ न करें और स्वयं को किसी उच्चतर नियामक सत्ता के हाथों सौंप दे।"[2]


नंद वंश : एक नापित ने सत्ता संभाली[संपादित करें]

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं नंद वंश के बारे में। उनके मुताबिक, वह महापद्मनंद ही थे,

पहले बता चुका हूं कि महाजनपदीय राजतंत्रों में सत्ता पलट के लिए हिंसा और विश्वासघात धीरे-धीरे साधारण चीजें होती गयीं। सभी राजा हर समय हिंसा और विश्वासघात से डरे-सहमे रहते थे। यह डर उन्हें अपने भाई-बंधुओं, पुत्रों, अधिकारियों से लेकर बाहरी दुश्मनों तक से था। मगध के प्रथम वृहद्रथ राजवंश के तीसरे राजा रिपुंजय की हत्या उसके मंत्री पुलिक ने कर दी थी। बिम्बिसार का हर्यंक वंश तो पितृहन्ता वंश ही कहा जाता है, जिसमें लगातार दो राजकुमारों ने अपने पिता राजाओं को वध कर सत्ता झपट ली। इस राजवंश ने लम्बे समय तक शासन किया, लेकिन इसके एक राजा महानन्दिन को शिशुनाग नाम के एक व्यक्ति ने अंततः उखाड़ फेंका और मगध की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। यह घटना ईसापूर्व 412 में हुई थी। हर्यंक वंश ने कुल मिला कर 133 वर्षों तक राज किया। लेकिन 412 से 344 ईसापूर्व तक मगध पर शिशुनाग अथवा शैशुनाग वंश का राज रहा। शिशुनाग ने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र से वैशाली में स्थानांतरित किया और इसके बेटे कला-अशोक के शासनकाल में 383 ईस्वीपूर्व में बौद्धों की दूसरी महासंगीति अथवा महापरिषद वैशाली में आयोजित हुई। इसके पश्चात मगध की राजधानी को पुनः पाटलिपुत्र में ला दिया गया, क्योंकि व्यापार और प्रशासन के ख्याल से यह अधिक उपयुक्त था। कला-अशोक के बेटे नन्दिवर्धन के राजकाल (366-344 ईसापूर्व) में एकबार फिर खूनी-खेल हुआ। इस राजा के एक अधिकारी ने राजकाज और दरबार में खास रुतबा बना लिया और अंततः धोखे से राजा की हत्या कर दी। हत्या करने वाला अधिकारी महापद्मनंद था, जिसका कहीं-कहीं महापद्मपति, उग्रसेन, अग्रसेन और यूनानी ग्रंथों में अग्रेमिस के रूप में भी उल्लेख मिलता है। वह निश्चित रूप से चालाक, कुटिल और महत्वाकांक्षी था। लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि इन सब के साथ वह स्वप्नदर्शी था और उसमें राज-प्रबंधन और शासन करने की अद्भुत क्षमता थी। उसने जल्दी ही शिशुनाग-राजतन्त्र को अपने काबू में कर लिया और स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। यह घटना 344 ईसापूर्व की है। इस महापद्मनंद के नाम से ही इस पूरे राजवंश को नन्द वंश कहा जाता है। इस वंश के अंतिम राजा धननंद को ही अपदस्थ कर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य राजवंश की स्थापना की थी। धननंद 322 ईसापूर्व में अपदस्थ हुआ और इसके साथ ही मौर्य काल का आरम्भ हो गया ,क्योंकि चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से सत्ता संभाल ली।


इस तरह बहुत लम्बे समय तक नन्द वंश का शासन नहीं चला। 344 से 322 ईसापूर्व तक, यानि कुल जमा बाईस वर्षों तक। जनश्रुतियों और इतिहास में नौ नंदों की चर्चा है। माना जाता है कि ये सभी राजा थे। इनके नाम जान लेना बुरा नहीं होगा। ये थे – उग्रसेन, पाण्डुक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गोविश्नक, दाससिद्धक, कैवर्त तथा धननंद। लेकिन यह भी कहा जाता है कि नन्द बस दो पीढ़ियों तक राज कर सके। उग्रसेन – जिसे महापद्मनंद भी कहा जाता है के आठ पुत्र थे। इन आठों में धननंद ही राजा हुआ। शेष नन्द संभव है सत्ता में भागीदार हों, और इसलिए सब मिलकर नौ-नन्द कहा जाता होगा। महापद्मनंद इतना होशियार था कि अपने पुत्रों के बीच एकता बनाये रखने हेतु एक तरकीब के तहत नौ-नन्द की पहल की होगी, ताकि सब संतुष्ट रहें। हालांकि यह एक अनुमान ही है। हमारा काम तो इतने भर से है कि नन्द वंश का राज बाईस वर्षों तक रहा।


इस वंश को इतिहासकारों ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया है। इसके अनेक कारण हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्रोतों के अनुसार यह पहला शासक था, जो समाज के निचले पायदान से आया था। महापद्मनंद नापित (नाई ) परिवार से आता था, जिसका काम लोगों की सेवा करना निर्धारित था, राज करना नहीं। मगध के समाज में भी ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में थे, जो इस तरह के एक व्यक्ति के राजसत्ता में आ जाने से चकित और चिढ़े हुए थे। इसलिए महापद्मनंद की जितनी भी भर्त्सना संभव थी, उतनी की गयी है। उसे गणिका (वेश्या) पुत्र से लेकर नीच कुलोत्पन्न, अनभिजात, नापितकुमार आदि कह कर अवहेलना की गई है। यह तो निश्चित है कि समाज के तथाकथित ‘बड़े लोगों’ के बीच उसकी मान्यता नहीं थी। चूकि यही ‘बड़े लोग’ पुराण और अभिलेखों के रचयिता होते थे, इसलिए इन लोगों ने अपनी राय महापद्मनंद और पूरे नन्द-काल के बारे में रखी है। लेकिन उनकी इन घृणित टिप्पणियों से ही नन्द राजाओं की प्रकृति और प्रवृत्ति का भी पता चलता है।


मैं जोर देकर कहना चाहूंगा, महापद्मनंद ऐसा राजा या शासक नहीं था, जिसकी हम उपेक्षा करें। उसकी चुनौतियाँ चन्द्रगुप्त से कहीं अधिक कठिन थी। उसने किसी मजबूत और यशस्वी राजा को नहीं, बल्कि एक पिलपिले कठपुतली चरित्र वाले राजा को अपदस्थ किया था। यह उसके अपने हित से अधिक समाज और देश हित के लिए उचित था।

यह ठीक है कि उसकी सामाजिक औकात कमजोर थी और यह भी मान लिया कि वह “नीच -कुलोत्पन्न” था। वह किसी राजा का बेटा नहीं, एक फटेहाल नाई का बेटा था, जैसा कि कर्टियस ने लिखा है कि ‘उसका पिता नाई था, जो दिन भर अपनी कमाई से किसी तरह पेट भरता था।’ ऐसे फटेहाल व्यक्ति का बेटा यदि एक बड़े निरंकुश राजतन्त्र का संस्थापक बनता है, तब इसे एक उल्लेखनीय घटना ही कहा जाना चाहिए। हमें इस बात की खोज भी करनी चाहिए कि इसके कारण तत्व क्या थे और पूरे इतिहास-चक्र पर इस घटना का कोई प्रभाव पड़ा या नहीं?

महापद्मनंद के इस तरह उठ खड़े होने के पीछे उसके व्यक्तिगत गुण तो निश्चय रूप से थे, लेकिन सामाजिक कारण भी रहे थे। मगध में, जैसा कि पहले ही कहा है, वर्ण धर्म के आधार कमजोर रहे हैं। इसी कारण वैदिक ऋषि इस इलाके से इतने रुष्ट रहते थे कि ज्वर से उस कीकट (मगध का पुराना नाम) में जाने की प्रार्थना करते हैं, जहाँ उसके विरोधी रहते हैं। यह अकारण नहीं था कि बौद्धों को यहां आधार मिला था। उनलोगों ने भी स्थिर समाज में थोड़ी हलचल पैदा की थी। बुद्ध की मृत्यु के कुछ ही समय बाद प्रथम बौद्ध परिषद्, जो राजगीर के सप्तपर्णी गुफा में हुई थी, की अध्यक्षता एक नाई उपालि ने की थी। उपालि के निदेशानुसार ही विनय पिटक के अधिकांश भाग रचे गए। उपालि के इस सांस्कृतिक-सामाजिक स्वीकार और इसी प्रकार की अन्य प्रवृत्तियों का अंगड़ाई लेना और इन सब के रूपांतरित होकर एक नए राजनैतिक बदलाव की पृष्ठभूमि बन जाना संभव है। जो हो, महापद्मनंद का सत्ता में आना एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना तो थी ही। हालांकि यह सब राजतन्त्र के बीच हुआ था। लेकिन राजतांत्रिक परिवेश में सम्पन्न राजनैतिक घटनाओं के कुछ न कुछ सामाजिक आधार तो होते ही हैं।

एक शासक के रूप में महापद्मनंद की विशेषता है कि उसने मगध को एक बड़े साम्राज्य में तब्दील कर दिया। बिम्बिसार ने उसे एक वृहद महाजनपद बनाया था। उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे मगध-राज में तब्दील कर दिया। लेकिन उस राज को साम्राज्य में परिवर्तित करने वाला महापद्मनंद था, न कि चन्द्रगुप्त मौर्य। पूरब में चंपा, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में व्यास और उत्तर में हिमालय तक उसने मगध साम्राज्य की सीमा रेखा खींच दी थी। लगभग सभी महाजनपद इसमें समाहित हो गए थे। वह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसने महाजनपदीय व्यवस्था का अंत कर दिया था। यह सब उसने बिना किसी चाणक्य या कौटिल्य और उसके ‘अर्थशास्त्र’ के निदेश के बिना किया था।

महापद्मनंद की राजव्यवस्था अत्युत्तम थी, क्योंकि उसके समय मगध का राजस्व इतना पुष्ट था कि वह एक बड़े सैन्य बल का गठन कर सकता था। तत्कालीन अभिलेखों से मिली सूचना के के अनुसार उसकी सेना में ‘बीस हजार घुड़सवार, दो लाख पैदल, चार घोड़ों वाले चार हजार रथ और तीन हजार हाथी थे।’ नन्द पहला शासक था, जिसने सेना को राजधानी में रखने के बजाय सीमा क्षेत्रों में रखना जरुरी समझा था। सब से बढ़ कर यह कि जिस राष्ट्र की आजकल बहुत चर्चा होती है, उसकी परिकल्पना पहली दफा महापद्मनंद ने ही की थी। एक-राट (एक राष्ट्र ) को उसने साकार किया था। वह स्वयं उसका प्रथम सम्राट बना। हिमालय से लेकर समुद्र तक एक राष्ट्र की उसकी योजना थी। एक जैन ग्रन्थ के अनुसार – समुद्रवसनांशेम्य आसमुद्रमपि श्रियः ,

उपायहस्तैराकृष्य ततः सोSकृत नन्दसात।

यह वही महापद्मनंद था, जिसे पुराणों ने सर्व-क्षत्रान्तक (सभी क्षत्रियों का अंत करने वाला) कहा है। संभव है, ब्राह्मण पौराणिकता ने इसे ही परशुराम के रूप में चित्रित किया हो। उसने अपने समय के सभी क्षत्रिय राज-कुलों, जिसमें कुरु, इक्ष्वाकु, पांचाल शूरसेन, काशेय, हैहय, कलिंग, अश्मक, मैथिल और वीतिहोत्र थे, को पराजित कर नष्ट कर दिया था। उसके विजय अभियान अपने विशद वर्णन के लिए आज भी किसी समर्थ इतिहासकार का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दिशा में इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री ने थोड़ा-सा प्रयास किया है।

महापद्मनंद के व्यक्तित्व का आकलन हमें इस नतीजे पर लाता है कि व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है, जात और कुल नहीं। उसके समय तक मनु की संहिता भले ही नहीं बनी थी, लेकिन वर्णव्यवस्था समाज में अपनी जड़ें जमा चुकी थीं और उसी के दृष्टिकोण से वह अनभिजात और नीचकुलोत्पन्न था, शूद्र था। उसने इन तमाम उलाहनों को अपने व्यक्तित्व विकास में बाधक नहीं बनने दिया। किसी भी आक्षेप की परवाह किये बिना उसने राजसत्ता अपने बूते हासिल की। उसने एक राज, एक देश को अपने राजनैतिक चातुर्य और पराक्रम से एक राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया। कुलीनता की पट्टी लटकाये राजन्यों को मौत के घाट उतार दिया, या किनारे कर दिया और अपने द्वारा निर्मित राष्ट्र को व्यवस्था से बाँधने की पूरी कोशिश की। ऐसा नहीं था कि नंदों ने विद्वानों की कद्र नहीं की; जैसा कि चाणक्य ने अपने अपमान को लेकर ऐतिहासिक कोहराम खड़ा कर दिया था। चाणक्य कितना विद्वान था, यह अलग विमर्श का विषय है और उसके अपमान की कहानी एकतरफा है। लेकिन सच यह है कि नंदों ने विद्वानों को राज्याश्रय देने का आरम्भ किया था। उसने उत्तर पश्चिम इलाके से व्याकरणाचार्य पाणिनि को राजधानी पाटलिपुत्र में आमंत्रित किया। इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री के अनुसार पाणिनि नन्द दरबार के रत्न और राजा के मित्र थे। व्याकरण और भाषा विज्ञान की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक ‘अष्टाध्यायी’ की रचना महापद्मनंद के संरक्षण में पाटलिपुत्र में हुई, जिस पर भारत हमेशा गर्व कर सकता है। कात्यायन, वररुचि, वर्ष और उपवर्ष जैसे प्रकांड विद्वान न केवल इसी युग में हुए बल्कि इन सब से नन्द राजाओं के मधुर रिश्ते रहे और इन सब को राज्याश्रय मिलता रहा। हालांकि कौटिल्य अथवा चाणक्य की ऐतिहासिकता पर प्रश्न उठते रहे हैं, लेकिन उसे लेकर जो आख्यान हैं उससे यही पता चलता है कि नंदों द्वारा विद्वानों को प्रोत्साहन देने की परंपरा से ही आकर्षित होकर आश्रय पाने की अभिलाषा से वह नन्द दरबार में गया और जैसी कि कथा है अपमानित हुआ। अभिलाषा गहरी होती है, तब अपमान भी गहरा होता है। कथा से जो सूचना मिलती है, उससे उसके अपमान का भी अनुमान होता है। लेकिन कथानुसार भी चाणक्य इतना विद्वान तो था ही कि उसने सम्पूर्ण परिदृश्य का जज्बाती नहीं, बल्कि सम्यक विश्लेषण किया। उसने पुष्यमित्र शुंग की तरह मौर्य वंश को ध्वस्त कर द्विज शासन लाने की कोशिश नहीं की। महापद्मनंद ने शूद्र जनता के मनोविज्ञान को झकझोर दिया था। इसकी अहमियत चाणक्य समझता था। उसकी शायद यह विवशता ही थी कि उसे एक दूसरे अनभिजात शूद्र चन्द्रगुप्त को नंदों के विरुद्ध खड़ा करना पड़ा।

ऐसा नहीं था कि धननंद के समय मगध की राज-व्यवस्था ख़राब थी। 326 ईसापूर्व में जब सिकंदर भारत आया तब कई कारणों से वह झेलम किनारे से ही लौट गया7 यह सही है कि उसकी सेना एक लम्बी लड़ाई के कारण थक चुकी थी और अपने वतन लौटना चाहती थी। लेकिन यह भी था कि पश्चिमोत्तर के छोटे-छोटे इलाकों में जो राजा थे उन्हें अपेक्षाकृत बड़ी सेना से भयभीत कर देना और पराजित कर देना तो संभव था, लेकिन उसने जैसे ही नन्द साम्राज्य की बड़ी सेना का विवरण सुना तो उसके हाथ-पांव काँप गए। सिकंदर का हौसला पस्त हो गया। सिकंदर मौर्यों से नहीं, नंदों से भयभीत होकर लौटा। इतिहासकारों ने इस तथ्य पर भी कम ही विचार किया है, परवर्ती मौर्य साम्राज्य की शासन-व्यवस्था का मूलाधार नंदों की शासन व्यवस्था ही थी, जिसका ढाँचा महापद्मनंद ने तैयार किया था। चन्द्रगुप्त के समय में इसमें कुछ सुधार अवश्य हुए, लेकिन उसका मूल ढाँचा पहले जैसा ही बना रहा। संस्कृत नाटककार विशाखदत्त की कृति ‘मुद्राराक्षस’ से भी यह बात स्पष्ट होती है कि स्वयं चाणक्य नन्द राज के मंत्री राक्षस को ही क्यों चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाने के लिए उत्सुक था। अंततः उसे सफलता भी मिलती है। इससे स्पष्ट होता है मौर्य काल में केवल राजा बदला था, व्यवस्था और राज-नीति नहीं। चन्द्रगुप्त ने नन्द राजाओं की साम्राज्य-विस्तार की नीति को जारी रखते हुए उसे पश्चिमोत्तर इलाके में हिन्दुकुश तक फैला दिया। लेकिन यह विस्तार नंदों की तुलना में बहुत कम था। इन सब के अलावा नंदों ने भारतीय इतिहास और राजनीति को एक और महत्वपूर्ण सीख दी है, जिसका आज भी महत्व है और दुर्भाग्य से जिसकी चर्चा भी नहीं होती है। आज भी भारतीय राष्ट्र की वैचारिकता की तलाश होती है। इस विषय पर परस्पर विरोधी कई विचार हैं। नंदों ने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया था कि ऊंच-नीच वाली वर्णव्यवस्था को आधार बना कर छोटे-छोटे जनपद तो कायम रह सकते हैं, लेकिन इस सामाजिक आधार पर कोई वृहद राष्ट्र नहीं बन सकता। और यह भी कि जो चीज वृहद होगी उसका वैचारिक आधार लचीला और उदार होना आवश्यक है। नंदों ने किसी धर्म को विशेष प्रश्रय नहीं दिया। हम कह सकते हैं वह धर्मनिरपेक्ष राज्य था। यह वही समय था, जब बौद्ध और जैन धर्म के प्रचारक मगध के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते होते थे। नंदों के पूर्व के हर्यंक राजाओं ने बौद्धों को काफी सहूलियतें दी थी। स्वयं बिम्बिसार ने बुद्ध को वेणुवन प्रदान किया था। लेकिन नंदों ने किसी धर्म विशेष के लिए कुछ किया हो इसकी सूचना नहीं मिलती। इसकी जगह विद्वानों को राज्याश्रय देकर ज्ञान क्षेत्र को विकसित करना उसने जरुरी समझा। पाणिनि को राजदरबार में रखना मायने रखता है। नन्द की चिंता थी कि मागधी भाषा से काम नहीं चलने वाला। एक बड़े राष्ट्र को एक ऐसी जुबान चाहिए, जिससे एक छोर से दूसरे छोर तक संवाद किया जा सके। इसीलिए पाणिनि ने संस्कृत के इलाकाई रूपों को आत्मसात करते हुए एक ऐसी भाषा को विकसित करने का आधार तैयार किया, जहाँ वैविध्य कम हों, एकरूपता अधिक हो। यह काम इतना महत्वपूर्ण है, जिसका अनुमान कर ही हम दंग हो जाते हैं। इन सब के साथ नन्द राजाओं ने अपने नाम-काम के प्रचार हेतु राज खजाने का अशोक की तरह दुरुपयोग नहीं किया। न ही उन्होंने अपने नाम के स्तम्भ लगवाए, न भाड़े के पंडितों को रख अपनी प्रशस्ति लिखवाई।

कुल मिला कर मैं इस बात पर पुनः जोर देना चाहूंगा कि नंदों, खास कर महापद्मनंद के साथ इतिहास ने न्याय नहीं किया है। आज इस ज़माने में जब हमने इतिहास को नीचे से देखने का सिलसिला आरम्भ किया है, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि महापद्मनंद की भूमिका पर समग्रता और ईमानदारी पूर्वक विचार करें। उसे अनभिजात और नीचकुलोत्पन्न कह कर हम उसकी अब और अधिक अवहेलना नहीं कर सकते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लगभग सभी मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भी उसकी उपेक्षा की। कोसंबी और नेहरू सरीखे इतिहास-समीक्षकों ने भी उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। इतिहासकार के. एल. नीलकंठ शास्त्री की हम सराहना करना चाहेंगे कि उन्होंने पहली दफा स्वतंत्र रूप से नन्द राज वंश पर काम किया और महापद्मनंद की भूमिका को रेखांकित किया। शास्त्री के शब्दों में “नंदों के उत्थान को निम्न वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक माना जा सकता है। पुराणों में इस राजवंश को शूद्रों के शासन का अगुआ और इसी कारण अधम कहा गया है।”

ऐतिहासिक स्रोत[संपादित करें]

  • नंदो को समस्त भारतीय एवं विदेशी साक्ष्य तत्कालीन महत्वपूर्ण क्षत्रिय नाई(न्यायी) होने का प्रमाणित करते हैं।[2]
  • चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद का इतिहास उड़ीसा में उदयगिरि पर्वत माला से दक्षिणी भाग में एक प्राकृतिक गुफा है, इसे हाथी गुफा कहा जाता है उसमें प्राप्त पाली भाषा से मिलती-जुलती प्राकृत भाषा और ब्रम्ही लिपि के 17 पंक्तियों में लिखे अभिलेख से प्राप्त होता है जिसके पंक्ति 6 और 12 में नंदराज के बारे में कलिंग के राजा खारवेल द्वारा उत्कीर्ण कराया माना जाता है। इस हाथी गुफा अभिलेख को ईसा पूर्व पहली सदी का माना गया है।
  • महाराष्ट्र में निजामाबाद जिले के पश्चिम में कुछ दूर पर "दस नंद देहरा"( नांदेड़ वर्तमान में) नामक नगर स्थित है। इससे यह पता चलता है कि अश्मक वंश की प्राचीन भूमि भी दस नंदो के राज्य के क्षेत्र में आ गई थी।
  • कथासरित्सागर में एक स्थान पर अयोध्या में नंद के शिविर (कटक) का प्रसंग आया है।
  • मैसूर के कई अभिलेखों के अनुसार कुंतलो पर नंदो का शासन था जिसमें बंबई प्रेसिडेंसी का दक्षिणी भाग तथा हैदराबाद राज्य का निकटतम क्षेत्र और मैसूर राज्य सम्मिलित था।
  • बौद्ध ग्रंथ महाबोधीवंशम एवं अंगुत्तर निकाय में नंदवंश के अत्यधिक प्रमाण है।
  • वायु पुराण की कुछ पांडुलिपियों के अनुसार नंद वंश के प्रथम राजा ने 28 वर्ष तक राज किया और उसके बाद उनके पुत्रों ने 12 वर्ष तक राज्य किया।
  • महावंश के अनुसार महापद्मनंद ने 28 वर्ष तक शासन किया और उनके पुत्रों ने 22 वर्ष तक शासन किया।
  • नंद वंश की महानता का विशद विवेचन महर्षि पतंजलि द्वारा रचित महाकाव्य

"महानंद" में किया गया था इसकी पुष्टि सम्राट समुद्रगुप्त द्वारा रचित महाकाव्य "कृष्ण चरित्र" के प्रारंभिक तीन श्लोको से होती है। मगर उक्त महाकाव्य का विवरण मात्र ही शेष है।

  • बृहत्कथा के अनुसार नंदो के शासनकाल में पाटलिपुत्र में सरस्वती एवं लक्ष्मी दोनों का ही वास था।
  • सातवीं सदी के महान विश्व विख्यात चीनी यात्री हुएनसांग ने अपनी यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है कि "नंदराजा के पास खजाने थे इस में 7 प्रकार के कीमती पत्थर थे।"
  • जैन ग्रंथों में लिखा है कि समुद्र तक समूचा देश नंद के मंत्री ने अपने अधीन कर लिया था-

समुद्र वसनां शेभ्य:है आस मुदमपि श्रिय:। उपाय हस्तेैरा कृष्य:तत:शोडकृत नंदसात।।

परिचय[संपादित करें]

इतिहास की जानकारी के अनेक विवरण पुराणों, जैन और बौद्ध ग्रंथों एवं यूनानी इतिहासकारों के वर्णन में प्राप्त होते हैं। तथापि इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नंद एक राजवंश था जिसकी अधिकांश प्रकृतियाँ भारतीय शासन परंपरा की थी। कर्टियस कहता है कि सिकंदर के समय शाषक का पिता वास्तव में एक गरीब नाई का बेटा था, यूनानी लेखकों के वर्णनों से ज्ञात होता है कि वह "वर्तमान राजा" अग्रमस् अथवा जंड्रमस् (चंद्रमस ?) था, जिसकी पहचान धनानंद से की गई है। उसका पिता महापद्मनंद था, जो कर्टियस के उपयुक्त कथन से क्षत्रिय वर्ण का ठहरता है। कुछ पुराण ग्रंथ और जैन ग्रंथ "परिशिष्ट पर्वन् में भी उसे नाई का पुत्र कहा गया है। इन अनेक संदर्भों से केवल एक बात स्पष्ट होती है कि नंदवंश के राजा न्यायी क्षत्रिय वर्ण के थे।

नंदवंश का प्रथम और सर्वप्रसिद्ध राजा हुआ। पुराणग्रंथ उसकी गिनती शैशुनागवंश में ही करते हैं, किंतु बौद्ध और जैन अनुत्रुटियों में उसे एक नए वंश (नंदवंश) का प्रारंभकर्ता माना गया है, जो सही है। उसे जैन ग्रंथों में उग्रसेन (अग्रसेन) और पुराणों में महापद्मपति भी कहा गया है। पुराणों के कलियुगराजवृत्तांतवले अंशों में उसे अतिबली, महाक्षत्रांतक और और परशुराम की संज्ञाएँ दी गई हैं। स्पष्ट है, बहुत बड़ी सेनावाले (उग्रसेन) उस राज ने (यूनानी लेखकों का कथन है कि नंदों की सेना में दो लाख पैदल, 20 हजार घुड़सवार, दो हजार चार घोड़ेवाले रथ और तीन हजार हाथी थे) अपने समकालिक अनेक क्षत्रिय राजवंशों का उच्छेद कर अपने बल का प्रदर्शन किया। यह आश्चर्य नहीं कि उस अपार धन और सैन्यशक्ति से उसने हिमालय और नर्मदा के बीच के सारे प्रदेशों को जीतने का उपक्रम किया। उसके जीते हुए प्रदेशें में ऐक्ष्वाकु (अयोध्या और श्रावस्ती के आसपास का कोमल राज्य), पांचाल (उत्तरपश्चिमी उत्तर प्रदेश में बरेली और रामपुर के पार्श्ववर्ती क्षेत्र), कौरव्य (इंद्रप्रस्थ, दिल्ली, कुरुक्षेत्र और थानेश्वर), काशी (वाराणसी के पार्श्ववर्ती क्षेत्र), हैहय (दक्षिणापथ में नर्मदातीर के क्षेत्र), अश्मक (गोदावरी घाटी में पौदन्य अथवा पोतन के आसपास के क्षेत्र), वीतिहोत्र (दक्षिणपथ में अश्मकों और हैहयों के क्षेत्रों में लगे हुए प्रदेश), कलिंग (उड़ीसा में वैतरणी और वराह नदी के बीच का क्षेत्र), शूरसेन (मथुरा के आसपास का क्षेत्र), मिथिला (बिहार में मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिलों के बीचवाले क्षेत्र तथा नेपाल की तराई का कुछ भाग), तथा अन्य अनेक राज्य शामिल थे। हिमालय और विंध्याचल के बीच कहीं भी उसके शासनों का उल्लंघन नहीं हो सकता था। इस प्रकार उसने सारी पृथ्वी (भारत के बहुत बड़े भाग) पर "एकराट्, होकर राज्य किया। महापद्मनंद की इन पुराणोक्त विजयों की प्रामणिकता कथासरित्सागर, खारवेल के हाथी गुफावाले अभिलेख तथा मैसूर से प्राप्त कुछ अभिलेखों के कुछ बिखरे हुए उल्लेखों से भी सिद्ध होती है

जैन और बौद्ध ग्रंथों से ये प्राप्त होता हैं कि महापद्मनंद की महारानी ही बेहद सुंदर और खूबसूरत थी महापद्मनंद की रानी के बारे में अधिक जानकारी नही मिलती हैं

पुराणों में महापद्मनंद के नव पुत्र उत्तराधिकारी बताए गए हैं। वहाँ उनके नाम मिलते हैं

(1) गंगन पाल, (2) पंडुक, (3) पंडुगति, (4) भूतपाल, (5) राष्ट्रपाल, (6) गोविषाणक, (7) दशसिद्धक, (8) कैवर्त और (9) धननन्द।

कुशवंशी सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य नन्द वंश के धननन्द का वध कर राजा हुए जिनके डर से सिकन्दर भी भाग गया था।

पुराणों के सुमाल्य को बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित महापद्म के अतिरिक्त अन्य आठ नामों में किसी से मिला सकना कठिन प्रतीत होता है। किंतु सभी मिलाकर संख्या की दृष्टि से नवनंद कहे जाते थे। इसमें कोई विवाद नहीं। पुराणों में उन सबका राज्यकाल 100 वर्षों तक बताया गया है - 88 वर्षों तक महापद्मनंद का और 12 वर्षों तक उसके पुत्रों का। किंतु एक ही व्यक्ति 88 वर्षों तक राज्य करता रहे और उसके बाद के क्रमागत 8 राजा केवल 12 वर्षों तक ही राज्य करें, यह बुद्धिग्राह्य नहीं प्रतीत होता। सिंहली अनुश्रुतियों में नवनंदों का राज्यकाल 40 वर्षों का बताया गया है और उसे हम सही मान सकते हैं। तदनुसार नवनंदों ने लगभग 364 ई. पू. से 324 ई. पू. तक शासन किया। इतना निश्चित है कि उनमें अंतिम राजा अग्रमस् (औग्रसैन्य (?) अर्थात् उग्रसेन का पुत्र) सिकंदर के आक्रमण के समय मगधा (प्रसाई-प्राची) का सम्राट् था, जिसकी विशाल और शक्तिशाली सेनाओं के भय से यूनानी सिपाहियों ने पोरस से हुए युद्ध के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। "महावंशटीका" से ज्ञात होता है कि अंतिम नंद कठोर शासक तथा लोभी और कृपण स्वभाव का व्यक्ति था। संभवत: इस लोभी प्रकृति के कारण ही उसे धननंद कहा गया। उसने चाणक्य का अपमान भी किया था। इसकी पुष्टि मुद्राराक्षस नाटक से होती है, जिससे ज्ञात होता है कि चाणक्य अपने पद से हटा दिया गया था। अपमानित होकर उसने नंद साम्राज्य के उन्मूलन की शपथ ली और कुशवंशी चंद्रगुप्त मौर्य के सहयोग से उसे उस कार्य में सफलता मिली। उन दोनों ने उस कार्य के लिए पंजाब के क्षेत्रों से एक विशाल सेना तैयार की, जिसमें संभवत: कुछ विदेशी तत्व और लुटेरे व्यक्ति भी शामिल थे। यह भी ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त ने धननंद को उखाड़ फेंकने में पर्वतक (पोरस) से भी संधि की थी। उसने मगध पर दो आक्रमण किए, यह सही प्रतीत होता है, परंतु "दिव्यावदान" की यह अनुश्रुति कि पहले उसने सीधे मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर ही धावा बोल दिया तथा असफल होकर उसे और चाणक्य को अपने प्राण बचाने के लिए वेष बनाकर भागना पड़ा, सही नहीं प्रतीत होती। उन दोनों के बीच संभवत: 324 ई. पू. में युद्ध हुआ, जब मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त ने मौर्यवंश का प्रारंभ किया।

सैन्य शक्ति[संपादित करें]

नंदो का साम्राज्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संपन्नता एवं सैन्य संगठन का चरम बिंदु था। इनकी विशालतम सुसंगठित सेना में 200000 पैदल, 80000 अश्वारोही, 8000 संग्राम रथ, 6000 हाथी थे। जिसकी सहायता से सम्राट महापद्मनंद ने उत्तर पश्चिम, दक्षिण पूर्व दिशा में बहुत बड़ी सैनिक विजय प्राप्त की और उस समय के लगभग सभी आस पड़ोस के साम्राज्यो का अंत कर के उन का नामोनिशान मिटा दिया। इसी कारण इन्हें पुराणों में सर्वक्षत्रांतक अथवा दूसरा परशुराम कहा गया है।

  • कर्टियस के अनुसार महापद्म की सेना में 20,000 घुड़सवार दो लाख पैदल 2000 रथ एवं 3000 हाथी थे।
  • डायोडोरस के अनुसार नंद शासन के पास 4000 हाथी थे, जबकि प्लूटार्क ने 80000 अश्र्वरोही, 7200000 की पैदल सेना 8000 घोड़ा वाला रथ और 6000 हाथी की सेना थी।

विश्व विजेता सिकंदर ने भारत पर आक्रमण के समय सम्राट घनानंद की विशालतम सेना देख कर के हौसला पस्त हो गया । इतनी विशालतम शक्ति के सामने सिकंदर जैसे महान विश्व विजेता ने भी नतमस्तक होकर वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझी।

नंदो की विजय[संपादित करें]

सम्राट महापद्मनंद ने तत्कालीन भारत की विस्तृत सभी 16 महाजनपदों काशी, कौशल, वज्जि, मल्ल,चेदि,वत्स,अंक, मगध, अवनीत, कुरु, पांचाल, गंधार कंबोज, शूरसेन, अश्मक, एवं कलिंग को जीतकर एवं सुसंगठित कर प्रथम बार सुदृढ़ केंद्रीय प्रशासन की नीव डाली तथा आगे आने वाली पीढ़ी के शासकों को शासन करने की उत्कृष्ट पद्धति सिखलाई जिसका प्रभाव आधुनिक शासन पद्धति में भी दिखाई पड़ता है। इसीलिए चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद को केंद्रीय शासन पद्धति का जनक कहा जाता है।

सम्राट महापदम नंद अभी तक मगध के सिंहासन पर बैठने वाले राज्यों में सर्वाधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए। उनकी विजयों के विषय में हमें पुराणों से विस्तृत सूचना प्राप्त होती है। उसके पास अतुल संपत्ति तथा असंख्य सेना थी वह कल्कि का अंश' सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला 'दूसरे परशुराम का अवतार'था। जिसने अपने समय के सभी प्रमुख राजवंशों की विजय की उसने एकछत्र शासन की स्थापना किया तथा 18 की उपाधि ग्रहण कि उसके द्वारा उन्मूलन उन्मूलन कुछ राजवंश के नाम इस प्रकार मिलते हैं तो आप इस वंश के लोग कौशल में शासन करते थे वर्तमान अवध क्षेत्र किस राज्य के अंतर्गत था मापदंड द्वारा कौशल विजय की पोस्ट सोमदेव कथासरित्सागर से भी होती है तदनुसार अध्यक्षों का एक सैनिक शिविर था दूसरा पांचाल इस राजवंश के लोग वर्तमान रुहेलखंड में शासन करते थे ऐसा लगता है कि महापद्मनंद के पहले उनका मदद से कोई संघर्ष नहीं हुआ था तीसरा काशी इससे तात्पर्य काशी के वंशजों से पसार के समय से ही काशी मगध का 1 पुराणों में मिलता है जिस समय को अपनी राजधानी बनाई उसने अपने पुत्र को बनारस का नियुक्त किया था ऐसा लगता है कि वंश के उत्तराधिकारी की हत्या को प्राप्त किया

चौथा है इस राजवंश के लोग नर्मदा नदी के 1 भाग प्रशासन करते थे उनकी राजधानी माहिष्मती थी पांचवा कलिंग यह राजवंश उड़ीसा प्रांत में शासन करता था खारवेल का हाथीगुंफा अभिलेख से पता चलता है कि किसी नंद राजा की कलिंग के एक भाग को जीता था छठा अस्मत इस वंश के लोग आंध्र प्रदेश की गोदावरी सरिता के तट पर शासन करते थे आंध्र प्रदेश के निजामाबाद के समीप नवरा नामक एक स्थित है कुछ विद्वानों के अनुसार वह इस प्रदेश में नंदू के आधिपत्य का सूचक है परंतु इस विषय में हम निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कह सकते सातवां रूप मेरठ दिल्ली थानेश्वर के राजवंश का शासन था इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ में थी आठवां मैथिली मैथिली मिथिला के निवासी थे मिथिला की पहचान नेपाल की सीमा में स्थित वर्तमान जनकपुर से की गई है शूरसेन आधुनिक शूरसेन राजवंश का शासन था उसकी राजधानी मथुरा में थी सूत्रों के अनुसार धर्म से संबंधित थे इन्हीं दोनों के बीच हुआ

शासन प्रबंध[संपादित करें]

अपार धन दौलत[संपादित करें]

नंदो का राजकोष धन से भरा रहता था, जिसमें 99 करोड़ की अपार स्वर्ण मुद्राएं थी ।इनकी आर्थिक संपन्नता का मुख्य कारण सुव्यवस्थित लाभों उन्मुखी विदेशी एवं आंतरिक व्यापार था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है कि "नंद राजा के पास खजाने थे इस में 7 प्रकार के बहुमूल्य कीमती पत्थर थे"।

नंद वंश की उपलब्धियां[संपादित करें]

नंद वंश के संस्थापक सम्राट महापदम नंद ने मगध को एक विशाल साम्राज्य में परिणत कर दिया । भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई इसकी सीमाएं गंगा घाटी के मैदानों का अतिक्रमण कर गई। विंध्य पर्वत के दक्षिण में विजय वैजयंती फहराने वाला पहला मगध का शासक महापद्मनंद ही था, खारवेल का हाथीगुंफा अभिलेख से भी कलिंग विजय सूचित होती है। इसके अनुसार नंद राजा जिनसेन की एक प्रतिमा उठा ले ले गए थे तथा उन्होंने कलिंग में तनसुली नहर का भी निर्माण कराया था। मैसूर के 12वीं शती के लेखों में भी नंदो द्वारा कुंतल जीते जाने का विवरण सुरक्षित है क्लासिकल लेखकों के विवरण से पता चलता है की अग्रिम इज का राज्य पश्चिम में व्यास नदी तक फैला था यह भूभाग महापद्मनंद द्वारा ही जीता गया था क्योंकि अगर 20 को किसी भी विजय का श्रेय नहीं प्रदान किया गया है उसकी विजयों के साथ ही क्षत्रियों का राजनीतिक प्रवृत्ति समाप्त हुआ इस विशाल साम्राज्य में एकतंत्रत्मक शासन व्यवस्था की स्थापना की गई।

नंद शासन का महत्त्व[संपादित करें]

नंद राजाओं का शासन काल भारतीय इतिहास के प्रश्न में अपना एक अलग महत्व रखता है। यह भारत के सामाजिक राजनीतिक आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। सामाजिक दृष्टि से इसे निम्न वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक माना जा सकता है। उसका राजनीतिक महत्व इस तथ्य में निहित है किस वंश के राजाओं ने उत्तर भारत में सर्वप्रथम एकछत्र शासन की स्थापना की। उन्होंने एक ऐसी सेना तैयार कि जिसका उपयोग परवर्ती मगध राजाओं ने विदेशी आक्रमणकारियों को रोकने तथा भारतीय सीमा में अपने राज्य का विस्तार करने में किया। नंद राजाओं के समय में मगध राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्धशाली साम्राज्य बन गया था। नंदो की अतुल संपत्ति को देखते हुए यह अनुमान करना स्वाभाविक है, कि हिमालय पार के देशों के साथ उनका व्यापारिक संबंध था साइबेरिया की ओर से भी स्वर्ण मंगाते थे, पता चलता है कि भारत का एक शक्तिशाली राजा पश्चिमी एशियाई देशों के झगड़ों की मध्यस्थता करने की इच्छा रखता था। इस शासक को अत्यंत धनी व्यक्ति कहा गया है जिसका संकेत नंद वंश के सम्राट धनानंद की ओर ही है सातवीं शती के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी नंदों के अतुल संपत्ति की कहानी सुनी थी उनके अनुसार पाटलिपुत्र में पांच स्तूप थे जो नंद राजा के साथ वह अमूल्य पदार्थ द्वारा संचित कोषागारो का प्रतिनिधित्व करते थे।

मगध की आर्थिक समृद्धि ने राजधानी पाटलिपुत्र को शिक्षा एवं साहित्य का प्रमुख केंद्र बना दिया। व्याकरण आचार्य पाणिनि महापदम नंद के मित्र थे। और उन्होंने पाटलिपुत्र में ही रहकर शिक्षा पाई थी वर्ष, उपवर्ष,कात्यायन जैसे विद्वान भी नंद काल में ही उत्पन्न हुए थे।

इस प्रकार नंद राजाओं के काल में मगध साम्राज्य राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टि से प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ।

नंद वंश के उत्तराधिकारी[संपादित करें]

1.पंडुक अथवा सहलिन (बंगाल का सेन वंश) नंदराज महापद्मनंद के जेष्ट पुत्र पंडुक जिनको पुराणों में सहल्य अथवा सहलिन कहा गया है ।नंदराज के शासनकाल में उत्तर बिहार में स्थित वैशाली के कुमार थे ।तथा उनकी मृत्यु के बाद भी उनके वंशज मगध साम्राज्य के प्रशासक के रूप में रहकर शासन करते रहे। इन के वंशज आगे चलकर पूरब दक्षिण की ओर बंगाल चले गए हो और अपने पूर्वज चक्रवर्ती सम्राट महापदम नंद के नाम पर सेन नामांतरण कर शासन करने लगे हो और उसी कुल से बंगाल के आज सूर्य राजा वीरसेन हुई जो मथुरा सुकेत स्थल एवं मंडी के सेन वंश के जनक बन गए जो 330 ईसवी पूर्व से 1290 ईस्वी पूर्व तक शासन किए।

2.पंडू गति अथवा सुकल्प (अयोध्या का देव वंश) आनंद राज के द्वितीय पुत्र को महाबोधि वंश में पंडुगति तथा पुराणों में संकल्प कहा गया है ।कथासरित्सागर के अनुसार अयोध्या में नंद राज्य का सैन्य शिविर था जहां संकल्प एक कुशल प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में रहकर उसकी व्यवस्था देखते थे तथा कौशल को अवध राज्य बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई अवध राज्य आणि वह राज्य जहां किसी भी प्रकार की हिंसा या बलि पूजा नहीं होती हो जबकि इसके पूर्व यहां पूजा में पशुबलि अनिवार्य होने का विवरण प्राचीन ग्रंथों में मिलता है जिस को पूर्णतया समाप्त कराया और यही कारण है कि उन्हें सुकल्प तक कहा गया है यानी अच्छा रहने योग्य स्थान बनाने वाला इन्हीं के उत्तराधिकारी 185 ईस्वी पूर्व के बाद मूल्य वायु देव देव के रूप में हुए जिनके सिक्के अल्मोड़ा के पास से प्राप्त हुए हैं

3.भूत पाल अथवा भूत नंदी (विदिशा का नंदी वंश) चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद के तृतीय पुत्र भूत पाल विदिशा के कुमार अथवा प्रकाशक थे।नंदराज के शासनकाल में उनकी पश्चिम दक्षिण के राज्यों के शासन प्रबंध को देखते थे। विदिशा के यह शासक कालांतर में पद्मावती एवं मथुरा के भी शासक रहे तथा बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार की इतिहासकारों ने भूतनंदी के शासनकाल को 150 वर्ष पूर्व से मानते हैं।

4.राष्ट्रपाल (महाराष्ट्र का सातवाहन कलिंग का मेघ वाहन वंश) महाबोधि वंश के अनुसार नंदराज के चौथे पुत्र राष्ट्रपाल थे। राष्ट्रपाल के कुशल प्रशासक एवं प्रतापी होने से इस राज्य का नाम राष्ट्रपाल के नाम पर महाराष्ट्र कहा जाने लगा यह गोदावरी नदी के उत्तर तट पर पैठन अथवा प्रतिष्ठान नामक नगर को अपनी राजधानी बनाई थी। राष्ट्रपाल द्वारा ही मैसूर के क्षेत्र, अश्मक राज्य एवं महाराष्ट्र के राज्यों की देखभाल प्रशासक के रूप में की जाती थी जिसकी केंद्रीय व्यवस्था नंदराज महापद्मनंद के हाथों में रहती थी। राष्ट्रपाल के पुत्र ही सातवाहन एवं मेघवाल थे ।जो बाद में पूर्वी घाट उड़ीसा क्षेत्र पश्चिमी घाट महाराष्ट्र क्षेत्र के अलग-अलग शासक बन गए। ब्राहमणी ग्रंथों पुराणों में इन्हें आंध्र भृत्य कहा गया है।

5.गोविशाणक(उत्तराखंड का कुलिंद वंश) महाबोधि वंश के अनुसार नंदराज महापद्मनंद के पांचवे पुत्र गोविशाणक थे। नंदराज ने उत्तरापथ में विजय अर्जित किया था। महापद्मनंद द्वारा गोविशाणक को प्रशासक बनाते समय एक नए नगर को बसाया गया था ।वहां उसके लिए किला भी बनवाया गया। इसका नामकरण गोविशाणक नगर रखा गया।उनके उत्तराधिकारी क्रमशः विश्वदेव,धन मुहूर्त,वृहतपाल,विश्व शिवदत्त,हरिदत्त, शिवपाल,चेतेश्वर,भानु रावण,हुई जो लगभग 232 ईसवी पूर्व से 290 ईसवी तक शासन किया।

6. दस सिद्धक चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद के छठवें पुत्र दस सिद्धक थे। नंद राज्य की एक राजधानी मध्य क्षेत्र के लिए वाकाटक मे थी जहां दस सिद्धक ने अपनी राजधानी बनाया। किंतु इनके पिता महा नंदिवर्धन के नाम पर नंदराज द्वारा बताए गए सुंदर नगर नंदिवर्धन नगर को भी इन्होंने अपनी राजधानी के रूप में प्रयुक्त किया जो आज नागपुर के नाम से जाना जाता है। सर्वप्रथम विंध क्षेत्र में अपनी शक्ति का संवर्धन किया इसलिए उन्हें विंध्य शक्ति भी कहा गया। जिन्होंने 250 ईसवी पूर्व से 510 ईसवी तक शासन किया।

7. कैवर्त नंदराज महापद्मनंद के सातवें पुत्र थे जिनका वर्णन महाबोधि वंश में किया गया है ।यह एक महान सेनानायक एवं कुशल प्रशासक थे। अन्य पुत्रों की तरह कैवर्त किसी राजधानी के प्रशासक ना होकर बल्कि अपने पिता के केंद्रीय प्रशासन के मुख्य संचालक थे ।तथा सम्राट महापद्मनंद जहां कहीं भी जाते थे, मुख्य अंगरक्षक के रूप में उनके साथ साथ रहते थे। कैवर्त की मृत्यु सम्राट महापद्मनंद के साथ ही विषयुक्त भोजन करने से हो गई जिससे उनका कोई राजवंश आगे नहीं चल सका।

8. सम्राट घनानंदसम्राट महापद्मनंद की पत्नी महानंदिनी से उत्पन्न अंतिम पुत्र था। घनानंद जब युवराज था तब आनेको शक्तिशाली राज्यों को मगध साम्राज्य के अधीन करा दिया। नंदराज महापद्मनंद की मृत्यु के बाद 326 ईसवी पूर्व में घनानंद मगध का सम्राट बना। नंदराज एवं भाई कैवर्त की मृत्यु के बाद यह बहादुर योद्धा शोकग्रस्त रहने लगा। फिर भी इसकी बहादुरी की चर्चा से कोई भी इसके साम्राज्य की तरफ आक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सका। विश्वविजेता सिकंदर ने भी नंद साम्राज्य की सैन्यशक्ति एवं समृद्धि देख कर ही भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की।

सारांश[संपादित करें]

३४४ ई. पू. में सम्राट महापद्यनन्द ने नन्द वंश की स्थापना की। सम्राट महापदम नंद को भारत का प्रथम ऐतिहासिक चक्रवर्ती सम्राट होने का गौरव प्राप्त है। सम्राट महापदम नंद को केंद्रीय शासन पद्धति का जनक भी कहा जाता है । पुराणों में इन्हें महापद्म तथा महाबोधिवंश में उग्रसेन कहा गया है। यह नाई जाति से थे।

सम्राट महापद्म को एकराट, सर्व क्षत्रान्तक, एक छत्र पृथ्वी का राजा,भार्गव आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है। महापद्म नन्द के प्रमुख राज्य उत्तराधिकारी हुए हैं- उग्रसेन, पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त, धनानन्द। सम्राट घनानंद के शासन काल में भारत पर सिकन्दर आक्रमण द्वारा किया गया। लेकिन मगध के सम्राट धनानंद की विशाल सेना के आगे सिकंदर नतमस्तक हो गया और लौट जाने में ही अपनी भलाई समझी।


  • सम्राट महापद्मनन्द पहले शासक थे जिन्होंने गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विन्ध्य पर्वत के दक्षिण तक विजय पताका लहराई थी.[3]
  • नन्द वंश के समय मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया।
  • व्याकरण के आचार्य पाणिनी महापद्मनन्द के मित्र थे।
  • वर्ष, उपवर्ष, वर, रुचि, कात्यायन जैसे विद्वान नन्द शासन में हुए।
  • शाकटाय तथा स्थूल भद्र धनानन्द के जैन मतावलम्बी अमात्य थे।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. शास्त्री, के ए नीलकंठ. नंद मौर्य युगीन भारत. मूल से 2 दिसंबर 2012 को पुरालेखित.
  2. स्मिथ, वीए. द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया.
  3. Sharma, Prince Sharma. Nandvansh. Nandvansh.

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • नीलकंठ शास्त्री (संपादित) : एज ऑव दि नंदज़ ऐंड मौर्यज़;
  • एज ऑव इंपीरियल यूनिटी (भारतीय विद्याभवन, बंबई); कैब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]