नंद वंश

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३२३ ईसा पूर्व में धनानन्द के शासनकाल में नन्दवंश का साम्राज्य अपनी चरम अवस्था में था

नंदवंश प्राचीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं महान न्यायी अथवा नाई राजवंश था। जिसने पाँचवीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व उत्तरी भारत के विशाल भाग पर शासन किया। नंदवंश की स्थापना प्रथम चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद[1] ने की थी। भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई जिसकी सीमाएं गंगा के मैदानों को लांग गई। यह साम्राज्य वस्तुतः स्वतंत्र राज्यों या सामंतों का शिथिल संघ ना होकर बल्कि किसी शक्तिशाली राजा बल के सम्मुख नतमस्तक होते थे। ये एक एकराट की छत्रछाया में एक अखंड राजतंत्र था, जिसके पास अपार सैन्यबल, धनबल और जनबल था। चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद ने निकटवर्ती सभी राजवंशो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की एवं केंद्रीय शासन की व्यवस्था लागू की। इसीलिए सम्राट महापदम नंद कोकेंद्रीय शासन पद्धति का जनक[2] कहा जाता है। यह स्मरण योग्य बात है कि नंदवंश के राजा अपने उत्तराधिकारियों और भावी पीढ़ियों को दान में क्या दे गए ? स्मिथ के शब्दों में कहें तो "उन्होंने 66 परस्पर विरोधी राज्यों को इस बात के लिए विवश किया कि वह आपसी उखाड़ पछाड़ न करें और स्वयं को किसी उच्चतर नियामक सत्ता के हाथों सौंप दे।"[3] नि:संदेह नंदो के उत्थान को भारतीय राजनीति के उत्कर्ष का प्रतीक माना जा सकता है।

ऐतिहासिक प्रमाण[संपादित करें]

  • नंदो को समस्त भारतीय एवं विदेशी साक्ष्य तत्कालीन महत्वपूर्ण अनभिजात नाई/न्यायी/नापित जाति का प्रमाणित करते हैं।[4]
  • चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद का इतिहास उड़ीसा में उदयगिरि पर्वत माला से दक्षिणी भाग में एक प्राकृतिक गुफा है, इसे हाथी गुफा कहा जाता है उसमें प्राप्त पाली भाषा से मिलती-जुलती प्राकृत भाषा और ब्रम्ही लिपि के 17 पंक्तियों में लिखे अभिलेख से प्राप्त होता है जिसके पंक्ति 6 और 12 में नंदराज के बारे में कलिंग के राजा खारवेल द्वारा उत्कीर्ण कराया माना जाता है। इस हाथी गुफा अभिलेख को ईसा पूर्व पहली सदी का माना गया है।
  • महाराष्ट्र में निजामाबाद जिले के पश्चिम में कुछ दूर पर "नौ नंद देहरा"( नांदेड़ वर्तमान में) नामक नगर स्थित है। इससे यह पता चलता है कि अश्मक वंश की प्राचीन भूमि भी नौ नंदो के राज्य के क्षेत्र में आ गई थी।
  • कथासरित्सागर में एक स्थान पर अयोध्या में नंद के शिविर (कटक) का प्रसंग आया है।
  • मैसूर के कई अभिलेखों के अनुसार कुंतलो पर नंदो का शासन था जिसमें बंबई प्रेसिडेंसी का दक्षिणी भाग तथा हैदराबाद राज्य का निकटतम क्षेत्र और मैसूर राज्य सम्मिलित था।
  • बौद्ध ग्रंथ महाबोधीवंशम एवं अंगुत्तर निकाय में नंदवंश के अत्यधिक प्रमाण है।
  • वायु पुराण की कुछ पांडुलिपियों के अनुसार नंद वंश के प्रथम राजा ने 28 वर्ष तक राज किया और उसके बाद उनके पुत्रों ने 12 वर्ष तक राज्य किया।
  • महावंश के अनुसार नंदू ने 28 वर्ष तक शासन किया और उनके पुत्रों ने 22 वर्ष तक शासन किया।
  • नंद वंश की महानता का विशद विवेचन महर्षि पतंजलि द्वारा रचित महाकाव्य

"महानंद" में किया गया था इसकी पुष्टि सम्राट समुद्रगुप्त द्वारा रचित महाकाव्य "कृष्ण चरित्र" के प्रारंभिक तीन श्लोको से होती है। मगर उक्त महाकाव्य का विवरण मात्र ही शेष है।

  • बृहत्कथा के अनुसार नंदो के शासनकाल में पाटलिपुत्र में सरस्वती एवं लक्ष्मी दोनों का ही वास था।
  • सातवीं सदी के महान विश्व विख्यात चीनी यात्री हुएनसांग ने अपनी यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है कि "नंदराजा के पास खजाने थे इस में 7 प्रकार के कीमती पत्थर थे।"
  • जैन ग्रंथों में लिखा है कि समुद्र तक समूचा देश नंद के मंत्री ने अपने अधीन कर लिया था-

समुद्र वसनां शेभ्य:है आस मुदमपि श्रिय:। उपाय हस्तेैरा कृष्य:तत:शोडकृत नंदसात।।

परिचय[संपादित करें]

इतिहास की जानकारी के अनेक विवरण पुराणों, जैन और बौद्ध ग्रंथों एवं यूनानी इतिहासकारों के वर्णन में प्राप्त होते हैं। तथापि इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि नंद एक राजवंश था जिसकी अधिकांश प्रकृतियाँ भारतीय शासन परंपरा की थी। कर्टियस कहता है कि सिकंदर के समय शाषक का पिता वास्तव में एक गरीब नाई का बेटा था, यूनानी लेखकों के वर्णनों से ज्ञात होता है कि वह "वर्तमान राजा" अग्रमस् अथवा जंड्रमस् (चंद्रमस ?) था, जिसकी पहचान धनानंद से की गई है। उसका पिता महापद्मनंद था, जो कर्टियस के उपयुक्त कथन से क्षत्रिय वर्ण का ठहरता है। कुछ पुराण ग्रंथ और जैन ग्रंथ "परिशिष्ट पर्वन् में भी उसे नापित का पुत्र कहा गया है। इन अनेक संदर्भों से केवल एक बात स्पष्ट होती है कि नंदवंश के राजा न्याय(नाई) क्षत्रिय वर्ण के थे।

नंदवंश का प्रथम और सर्वप्रसिद्ध राजा हुआ। पुराणग्रंथ उसकी गिनती शैशुनागवंश में ही करते हैं, किंतु बौद्ध और जैन अनुत्रुटियों में उसे एक नए वंश (नंदवंश) का प्रारंभकर्ता माना गया है, जो सही है। उसे जैन ग्रंथों में उग्रसेन (अग्रसेन) और पुराणों में महापद्मपति भी कहा गया है। पुराणों के कलियुगराजवृत्तांतवले अंशों में उसे अतिबली, महाक्षत्रांतक और और परशुराम की संज्ञाएँ दी गई हैं। स्पष्ट है, बहुत बड़ी सेनावाले (उग्रसेन) उस राज ने (यूनानी लेखकों का कथन है कि नंदों की सेना में दो लाख पैदल, 20 हजार घुड़सवार, दो हजार चार घोड़ेवाले रथ और तीन हजार हाथी थे) अपने समकालिक अनेक क्षत्रिय राजवंशों का उच्छेद कर अपने बल का प्रदर्शन किया। यह आश्चर्य नहीं कि उस अपार धन और सैन्यशक्ति से उसने हिमालय और नर्मदा के बीच के सारे प्रदेशों को जीतने का उपक्रम किया। उसके जीते हुए प्रदेशें में ऐक्ष्वाकु (अयोध्या और श्रावस्ती के आसपास का कोमल राज्य), पांचाल (उत्तरपश्चिमी उत्तर प्रदेश में बरेली और रामपुर के पार्श्ववर्ती क्षेत्र), कौरव्य (इंद्रप्रस्थ, दिल्ली, कुरुक्षेत्र और थानेश्वर), काशी (वाराणसी के पार्श्ववर्ती क्षेत्र), हैहय (दक्षिणापथ में नर्मदातीर के क्षेत्र), अश्मक (गोदावरी घाटी में पौदन्य अथवा पोतन के आसपास के क्षेत्र), वीतिहोत्र (दक्षिणपथ में अश्मकों और हैहयों के क्षेत्रों में लगे हुए प्रदेश), कलिंग (उड़ीसा में वैतरणी और वराह नदी के बीच का क्षेत्र), शूरसेन (मथुरा के आसपास का क्षेत्र), मिथिला (बिहार में मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिलों के बीचवाले क्षेत्र तथा नेपाल की तराई का कुछ भाग), तथा अन्य अनेक राज्य शामिल थे। हिमालय और विंध्याचल के बीच कहीं भी उसके शासनों का उल्लंघन नहीं हो सकता था। इस प्रकार उसने सारी पृथ्वी (भारत के बहुत बड़े भाग) पर "एकराट्, होकर राज्य किया। महापद्मनंद की इन पुराणोक्त विजयों की प्रामणिकता कथासरित्सागर, खारवेल के हाथी गुफावाले अभिलेख तथा मैसूर से प्राप्त कुछ अभिलेखों के कुछ बिखरे हुए उल्लेखों से भी सिद्ध होती है

जैन और बौद्ध ग्रंथों से ये प्राप्त होता हैं कि महापद्मनंद की दो रानियों थी (1)रानी अवंतिका और (2)रानीमुरा और दोनों महारानियां ही बेहद सुंदर और खूबसूरत थी महापद्मनंद की रानियों के बारे में अधिक जानकारी नही मिलती हैं

पुराणों में महापद्मनंद के दस पुत्र उत्तराधिकारी बताए गए हैं। वहाँ उनके नाम मिलते हैं

(1) गंगन पाल, (2) पंडुक, (3) पंडुगति, (4) भूतपाल, (5) राष्ट्रपाल, (6) गोविषाणक, (7) दशसिद्धक, (8) कैवर्त और (9) धननन्द, (10) चन्द नन्द (चन्द्रगुप्त मौर्य)

चन्द्रगुप्त मौर्य नन्द वंश के सस्थाषक चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद (नाई ) के (10)वे पुत्र थे जिनका वास्तविक नाम चंद्रनन्द था जिनकी मा (मुरा) एक ब्राह्रमण परिवार से थी महापद्मनंद के बाद उनके पुत्र धननन्द राजा हुए जिनके डर से सिकन्दर भी भाग गया था। धननन्द ने मंत्री चाणक्य (विष्णुगुप्त) को पीटकर सभा से इसलिये बाहर निकाला दिया चाणक्य धननन्द से पहले सिंहासन पर बैठ गये थे । चाणक्य ने धननन्द के सौतेले भाई चन्द्रनन्द को भड़काकर धननन्द को धोखे से चन्द्रनन्द से मरवाकर चन्द्रनन्द क्रो राजा बनाया और चन्द्रनन्द क्रो चन्द्रगुप्त मौर्य नाम दिया । (चन्द्र नन्द के नाम से 'नन्द' हटाकर आपने नाम विष्णुगुप्त का 'गुप्त' जोडा और चंद्रनन्द की माँ का नाम मुरा के बदले मौर्य जोडा )

पुराणों के सुमाल्य को बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित महापद्म के अतिरिक्त अन्य आठ नामों में किसी से मिला सकना कठिन प्रतीत होता है। किंतु सभी मिलाकर संख्या की दृष्टि से नवनंद कहे जाते थे। इसमें कोई विवाद नहीं। पुराणों में उन सबका राज्यकाल 100 वर्षों तक बताया गया है - 88 वर्षों तक महापद्मनंद का और 12 वर्षों तक उसके पुत्रों का। किंतु एक ही व्यक्ति 88 वर्षों तक राज्य करता रहे और उसके बाद के क्रमागत 8 राजा केवल 12 वर्षों तक ही राज्य करें, यह बुद्धिग्राह्य नहीं प्रतीत होता। सिंहली अनुश्रुतियों में नवनंदों का राज्यकाल 40 वर्षों का बताया गया है और उसे हम सही मान सकते हैं। तदनुसार नवनंदों ने लगभग 364 ई. पू. से 324 ई. पू. तक शासन किया। इतना निश्चित है कि उनमें अंतिम राजा अग्रमस् (औग्रसैन्य (?) अर्थात् उग्रसेन का पुत्र) सिकंदर के आक्रमण के समय मगधा (प्रसाई-प्राची) का सम्राट् था, जिसकी विशाल और शक्तिशाली सेनाओं के भय से यूनानी सिपाहियों ने पोरस से हुए युद्ध के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। प्लूटार्क कहता है कि चंद्रगुप्त (सैंड्राकोट्टस) मौर्य ने सिकंदर से मिलकर उसकी नीचकुलोत्पत्ति और जनता में अप्रियता की बात कही थी। संभव है, धननंद को उखाड़ फेंकने के लिए चंद्रगुप्त ने उस विदेशी आक्रमणकारी के उपयोग का भी प्रयत्न किया हो। "महावंशटीका" से ज्ञात होता है कि अंतिम नंद कठोर शासक तथा लोभी और कृपण स्वभाव का व्यक्ति था। संभवत: इस लोभी प्रकृति के कारण ही उसे धननंद कहा गया। उसने चाणक्य का अपमान भी किया था। इसकी पुष्टि मुद्राराक्षस नाटक से होती है, जिससे ज्ञात होता है कि चाणक्य अपने पद से हटा दिया गया था। अपमानित होकर उसने नंद साम्राज्य के उन्मूलन की शपथ ली और राजकुमार चंद्रगुप्त मौर्य के सहयोग से उसे उस कार्य में सफलता मिली। उन दोनों ने उस कार्य के लिए पंजाब के क्षेत्रों से एक विशाल सेना तैयार की, जिसमें संभवत: कुछ विदेशी तत्व और लुटेरे व्यक्ति भी शामिल थे। यह भी ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त ने धननंद को उखाड़ फेंकने में पर्वतक (पोरस) से भी संधि की थी। उसने मगध पर दो आक्रमण किए, यह सही प्रतीत होता है, परंतु "दिव्यावदान" की यह अनुश्रुति कि पहले उसने सीधे मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर ही धावा बोल दिया तथा असफल होकर उसे और चाणक्य को अपने प्राण बचाने के लिए वेष बनाकर भागना पड़ा, सही नहीं प्रतीत होती। उन दोनों के बीच संभवत: 324 ई. पू. में युद्ध हुआ, जब मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त ने मौर्यवंश का प्रारंभ किया।

सैन्य शक्ति[संपादित करें]

नंदो का साम्राज्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संपन्नता एवं सैन्य संगठन का चरम बिंदु था। इनकी विशालतम सुसंगठित सेना में 200000 पैदल, 80000 अश्वारोही, 8000 संग्राम रथ, 6000 हाथी थे। जिसकी सहायता से सम्राट महापद्मनंद ने उत्तर पश्चिम, दक्षिण पूर्व दिशा में बहुत बड़ी सैनिक विजय प्राप्त की और उस समय के लगभग सभी आस पड़ोस के साम्राज्यो का अंत कर के उन का नामोनिशान मिटा दिया। इसी कारण इन्हें पुराणों में सर्वक्षत्रांतक अथवा दूसरा परशुराम कहा गया है।

  • कर्टियस के अनुसार महापद्म की सेना में 20,000 घुड़सवार दो लाख पैदल 2000 रथ एवं 3000 हाथी थे।
  • डायोडोरस के अनुसार नंद शासन के पास 4000 हाथी थे, जबकि प्लूटार्क ने 80000 अश्र्वरोही, 7200000 की पैदल सेना 8000 घोड़ा वाला रथ और 6000 हाथी की सेना थी।

विश्व विजेता सिकंदर ने भारत पर आक्रमण के समय सम्राट घनानंद की विशालतम सेना देख कर के हौसला पस्त हो गया । इतनी विशालतम शक्ति के सामने सिकंदर जैसे महान विश्व विजेता ने भी नतमस्तक होकर वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझी।

नंदो की विजय[संपादित करें]

सम्राट महापद्मनंद ने तत्कालीन भारत की विस्तृत सभी 16 महाजनपदों काशी, कौशल, वज्जि, मल्ल,चेदि,वत्स,अंक, मगध, अवनीत, कुरु, पांचाल, गंधार कंबोज,शूरसेन ,अश्मक, एवं कलिंग को जीतकर एवं सुसंगठित कर प्रथम बार सुदृढ़ केंद्रीय प्रशासन की नीव डाली तथा आगे आने वाली पीढ़ी के शासकों को शासन करने की उत्कृष्ट पद्धति सिखलाई जिसका प्रभाव आधुनिक शासन पद्धति में भी दिखाई पड़ता है। इसीलिए चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद को केंद्रीय शासन पद्धति का जनक कहा जाता है।

शासन प्रबंध[संपादित करें]

अपार धन दौलत[संपादित करें]

नंदो का राजकोष धन से भरा रहता था, जिसमें 99 करोड़ की अपार स्वर्ण मुद्राएं थी ।इनकी आर्थिक संपन्नता का मुख्य कारण सुव्यवस्थित लाभों उन्मुखी विदेशी एवं आंतरिक व्यापार था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है कि "नंद राजा के पास खजाने थे इस में 7 प्रकार के बहुमूल्य कीमती पत्थर थे"।

नंद वंश के उत्तराधिकारी[संपादित करें]

1.पंडुक अथवा सहलिन (बंगाल का सेन वंश) नंदराज महापद्मनंद के जेष्ट पुत्र पंडुक जिनको पुराणों में सहल्य अथवा सहलिन कहा गया है ।नंदराज के शासनकाल में उत्तर बिहार में स्थित वैशाली के कुमार थे ।तथा उनकी मृत्यु के बाद भी उनके वंशज मगध साम्राज्य के प्रशासक के रूप में रहकर शासन करते रहे। इन के वंशज आगे चलकर पूरब दक्षिण की ओर बंगाल चले गए हो और अपने पूर्वज चक्रवर्ती सम्राट महापदम नंद के नाम पर सेन नामांतरण कर शासन करने लगे हो और उसी कुल से बंगाल के आज सूर्य राजा वीरसेन हुई जो मथुरा सुकेत स्थल एवं मंडी के सेन वंश के जनक बन गए जो 330 ईसवी पूर्व से 1290 ईस्वी पूर्व तक शासन किए।

2.पंडू गति अथवा सुकल्प (अयोध्या का देव वंश) आनंद राज के द्वितीय पुत्र को महाबोधि वंश में पंडुगति तथा पुराणों में संकल्प कहा गया है ।कथासरित्सागर के अनुसार अयोध्या में नंद राज्य का सैन्य शिविर था जहां संकल्प एक कुशल प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में रहकर उसकी व्यवस्था देखते थे तथा कौशल को अवध राज्य बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई अवध राज्य आणि वह राज्य जहां किसी भी प्रकार की हिंसा या बलि पूजा नहीं होती हो जबकि इसके पूर्व यहां पूजा में पशुबलि अनिवार्य होने का विवरण प्राचीन ग्रंथों में मिलता है जिस को पूर्णतया समाप्त कराया और यही कारण है कि उन्हें सुकल्प तक कहा गया है यानी अच्छा रहने योग्य स्थान बनाने वाला इन्हीं के उत्तराधिकारी 185 ईस्वी पूर्व के बाद मूल्य वायु देव देव के रूप में हुए जिनके सिक्के अल्मोड़ा के पास से प्राप्त हुए हैं

3.भूत पाल अथवा भूत नंदी (विदिशा का नंदी वंश) चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद के तृतीय पुत्र भूत पाल विदिशा के कुमार अथवा प्रकाशक थे।नंदराज के शासनकाल में उनकी पश्चिम दक्षिण के राज्यों के शासन प्रबंध को देखते थे। विदिशा के यह शासक कालांतर में पद्मावती एवं मथुरा के भी शासक रहे तथा बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार की इतिहासकारों ने भूतनंदी के शासनकाल को 150 वर्ष पूर्व से मानते हैं।

4.राष्ट्रपाल (महाराष्ट्र का सातवाहन कलिंग का मेघ वाहन वंश) महाबोधि वंश के अनुसार नंदराज के चौथे पुत्र राष्ट्रपाल थे। राष्ट्रपाल के कुशल प्रशासक एवं प्रतापी होने से इस राज्य का नाम राष्ट्रपाल के नाम पर महाराष्ट्र कहा जाने लगा यह गोदावरी नदी के उत्तर तट पर पैठन अथवा प्रतिष्ठान नामक नगर को अपनी राजधानी बनाई थी। राष्ट्रपाल द्वारा ही मैसूर के क्षेत्र, अश्मक राज्य एवं महाराष्ट्र के राज्यों की देखभाल प्रशासक के रूप में की जाती थी जिसकी केंद्रीय व्यवस्था नंदराज महापद्मनंद के हाथों में रहती थी। राष्ट्रपाल के पुत्र ही सातवाहन एवं मेघवाल थे ।जो बाद में पूर्वी घाट उड़ीसा क्षेत्र पश्चिमी घाट महाराष्ट्र क्षेत्र के अलग-अलग शासक बन गए। ब्राहमणी ग्रंथों पुराणों में इन्हें आंध्र भृत्य कहा गया है।

5.गोविशाणक(उत्तराखंड का कुलिंद वंश) महाबोधि वंश के अनुसार नंदराज महापद्मनंद के पांचवे पुत्र गोविशाणक थे। नंदराज ने उत्तरापथ में विजय अर्जित किया था। महापद्मनंद द्वारा गोविशाणक को प्रशासक बनाते समय एक नए नगर को बसाया गया था ।वहां उसके लिए किला भी बनवाया गया। इसका नामकरण गोविशाणक नगर रखा गया।उनके उत्तराधिकारी क्रमशः विश्वदेव,धन मुहूर्त,वृहतपाल,विश्व शिवदत्त,हरिदत्त, शिवपाल,चेतेश्वर,भानु रावण,हुई जो लगभग 232 ईसवी पूर्व से 290 ईसवी तक शासन किया।

6. दस सिद्धक चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद के छठवें पुत्र दस सिद्धक थे। नंद राज्य की एक राजधानी मध्य क्षेत्र के लिए वाकाटक मे थी जहां दस सिद्धक ने अपनी राजधानी बनाया। किंतु इनके पिता महा नंदिवर्धन के नाम पर नंदराज द्वारा बताए गए सुंदर नगर नंदिवर्धन नगर को भी इन्होंने अपनी राजधानी के रूप में प्रयुक्त किया जो आज नागपुर के नाम से जाना जाता है। सर्वप्रथम विंध क्षेत्र में अपनी शक्ति का संवर्धन किया इसलिए उन्हें विंध्य शक्ति भी कहा गया। जिन्होंने 250 ईसवी पूर्व से 510 ईसवी तक शासन किया।

7. कैवर्त नंदराज महापद्मनंद के सातवें पुत्र थे जिनका वर्णन महाबोधि वंश में किया गया है ।यह एक महान सेनानायक एवं कुशल प्रशासक थे। अन्य पुत्रों की तरह कैवर्त किसी राजधानी के प्रशासक ना होकर बल्कि अपने पिता के केंद्रीय प्रशासन के मुख्य संचालक थे ।तथा सम्राट महापद्मनंद जहां कहीं भी जाते थे, मुख्य अंगरक्षक के रूप में उनके साथ साथ रहते थे प्रथम पत्नी से उत्पन्न दोनों छोटे पुत्र कैवर्त और घनानंद तथा दूसरी पत्नी पुरा से उत्पन्न चंद्रनंद अथवा चंद्रगुप्त तीनों पुत्र नंद राज के पास पाटलिपुत्र की राजधानी में रहकर उनके कार्यों में सहयोग करते थे। जिसमें चंद्रगुप्त सबसे छोटा व कम उम्र का था। कैवर्त की मृत्यु सम्राट महापद्मनंद के साथ ही विषयुक्त भोजन करने से हो गई जिससे उनका कोई राजवंश आगे नहीं चल सका।

8. सम्राट घनानंदसम्राट महापद्मनंद की प्रथम पत्नी महानंदिनी से उत्पन्न अंतिम पुत्र था। घनानंद जब युवराज था तब आनेको शक्तिशाली राज्यों को मगध साम्राज्य के अधीन करा दिया। नंदराज महापद्मनंद की मृत्यु के बाद 326 ईसवी पूर्व में घनानंद मगध का सम्राट बना। नंदराज एवं भाई कैवर्त की मृत्यु के बाद यह बहादुर योद्धा शोकग्रस्त रहने लगा। फिर भी इसकी बहादुरी की चर्चा से कोई भी इसके साम्राज्य की तरफ आक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सका। विश्वविजेता सिकंदर ने भी नंद साम्राज्य की सैन्यशक्ति एवं समृद्धि देख कर ही भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की और वापस यूनान लौट जाने में ही अपनी भलाई समझी। सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की सैनिक मदद से इनका सौतेला भाई चंद्रगुप्त 322 ईसवी पूर्व में मगध की सत्ता प्राप्त करने की लड़ाई किया जिससे युद्ध के दौरान घनानंद की मृत्यु हो गई और मगध की सत्ता चंद्रगुप्त को प्राप्त हुई।

9. चंद्रनंद अथवा चंद्रगुप्त सम्राट महापदमनंद की मुरा नामक दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्र का नाम चंद्रगुप्त चंद्रनंद था। जिसे मौर्य वंश का संस्थापक कहा गया है मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त को नंद की संतान तथा वायु पुराण में चंद्रगुप्त को नंदवंशी राजा कहा गया है।

सारांश[संपादित करें]

३४४ ई. पू. में सम्राट महापद्यनन्द ने नन्द वंश की स्थापना की। सम्राट महापदम नंद को भारत का प्रथम ऐतिहासिक चक्रवर्ती सम्राट होने का गौरव प्राप्त है। सम्राट महापदम नंद को केंद्रीय शासन पद्धति का जनक भी कहा जाता है । पुराणों में इन्हें महापद्म तथा महाबोधिवंश में उग्रसेन कहा गया है। यह नाई जाति से थे![5]

सम्राट महापद्म को एकराट, सर्व क्षत्रान्तक, एक छत्र पृथ्वी का राजा,भार्गव आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है। महापद्म नन्द के प्रमुख राज्य उत्तराधिकारी हुए हैं- उग्रसेन, पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त, धनानन्द। सम्राट घनानंद के शासन काल में भारत पर सिकन्दर आक्रमण द्वारा किया गया। लेकिन मगध के सम्राट धनानंद की विशाल सेना के आगे सिकंदर नतमस्तक हो गया और लौट जाने में ही अपनी भलाई समझी।


  • सम्राट महापद्मनन्द पहले शासक थे जिन्होंने गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विन्ध्य पर्वत के दक्षिण तक विजय पताका लहराई थी.[6]
  • नन्द वंश के समय मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया।
  • व्याकरण के आचार्य पाणिनी महापद्मनन्द के मित्र थे।
  • वर्ष, उपवर्ष, वर, रुचि, कात्यायन जैसे विद्वान नन्द शासन में हुए।
  • शाकटाय तथा स्थूल भद्र धनानन्द के जैन मतावलम्बी अमात्य थे।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • नीलकंठ शास्त्री (संपादित) : एज ऑव दि नंदज़ ऐंड मौर्यज़;
  • एज ऑव इंपीरियल यूनिटी (भारतीय विद्याभवन, बंबई); कैब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Viyogi, Dr.Naval. [सिंधु घाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र एवं वणिक "नंद वंश"] जाँचें |url= मान (मदद).
  2. शास्त्री, के ए नीलकंठ. "नंद मौर्य युगीन भारत". गायब अथवा खाली |url= (मदद)
  3. स्मिथ, वीए. [द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया "Nandvansh"] जाँचें |url= मान (मदद).
  4. Smith, V.A. "The Yearly History of India" (Hindi में). गायब अथवा खाली |url= (मदद)
  5. Nandanas, Oreyas (8/21/2018). [Nandas "Nandvansh"] जाँचें |url= मान (मदद). Nandas (Hindi में). |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  6. Sharma, Prince Sharma (06/29/2018). [Nandvansh "Nandvansh"] जाँचें |url= मान (मदद). Nandvansh (Hindi में). |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]