दूलह(रीतिग्रंथकार कवि)

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दूलह रीतिकाल के रीतिग्रंथकार कवि हैं। रामचंद्र शुक्ल ने इनका कविताकाल संवत् १८०४ से सं. १८२५ तक माना है। नागरीप्रचारिणी सभा के खोज-विवरण द्वारा विदित हुआ है कि एकमात्र उपलब्ध अलंकार ग्रंथ, 'कविकुल कंठाभरण' का रचनाकाल संवत् १८०७ है। 'शिवसिंह सरोज' के परिशिष्ट भाग के कवियों के जीवनचरित्र में ग्रंथगत समय का खंडन करते हुए कहा गया है, 'इनका जन्म सं. १८०३ गलत हैं। क्योंकि इनके पिता कवींद्र के जन्म का संवत् इसी ग्रंथ में १८०४ दिया हुआ है। अनुमान से यह सं. १७७७ के लगभग होना चाहिए।' ये बातें अनुमान पर ही आधारित हैं। जो हो, शुक्ल जी द्वारा अनुमित इनका कविताकाल ही सबके द्वारा मान्य हुआ है। ये कवि कालिदास त्रिवेदी के पौत्र और उदयनाथ त्रिवेदी 'कवींद्र' के पुत्र थे।

परिचय[संपादित करें]

'कविकुल कंठाभरण' के अतिरिक्त इनका कोई दूसरा काव्यग्रंथ नहीं मिलता; थोड़ी सी फुटकल कविताएँ ही मिलती हैं, जो इनकी किसी कविता-पुस्तक की अवशेष होंगी। इनका कविकुल कंठाभरण अलंकारनिरूपण के लिए रचित हुआ है। जिस प्रकार संस्कृत में अलंकार के नवाभ्यासियों के लिए अप्पय दीक्षित का 'कुवलयानंद' सर्वोत्तम माना जाता रहा है, उसी प्रकार हिंदी में महाराज जसवंत सिंह का 'भाषाभूषण' और कविवर मतिराम का 'ललित ललाम' ये दोनों पुस्तकें समादृत रही हैं। कुवलयानंद की पद्धति के अनुसरण पर ही भाषाभूषण में दोहे के आधे भाग में लक्षण और आधे भाग में उदाहरण दे दिया गया है। मतिराम और दूलह की पद्धति उससे भिन्न है। दूलह ने अलंकार का लक्षण और उदाहरण एक ही छंद में दिया किंतु उसके लिए कवित्त और सवैया जैसे बड़े छंद चुने। इसका परिणाम यह हुआ कि अधिक अवकाश मिल जाने के कारण लक्षण और उदाहरण को समझाने के लिए दोहे की अपेक्षा अधिक सुविधा हो गई और बड़े छंदों के नादसौंदर्य के कारण उन्हें याद करने की कठिनाई भी जाती रही।

हिंदी के आचार्यों में महकाकवि केशवदास की कविप्रिया से ये प्रभावित अवश्य हैं किंतु इनपर कुवलयानंद का प्रभाव ही अधिक दिखाई पड़ता है। कुवलयानंद में कुल १२३ अलंकार गृहीत हुए हैं। 'कविकुल कंठाभरण' में ११५ अलंकारों का वर्णन हुआ है। कुवलयानंद की ही भाँति इसमें भी शब्दलंकारों का उल्लेख नहीं हुआ है। अलंकारों का अंतर स्पष्ट करने के लिए इन्होंने विशेष सावधानी बरती है। इस ग्रंथ के आरंभ में दूलह ने इसकी विशेषता और इसकी रचना का उद्देश्य स्पष्ट किया है।

हिंदी साहित्य के बृहत्इतिहास (षष्ठ भाग) के अनुसार उनके दोहों से कतिपय अन्य साहित्यिक तथ्य निकाले गए हैं, 'दूलह ने 'सतकवि', 'करतार' तथा 'अलंकृती' शब्दों का प्रयोग करके इस युग के साहित्यिकों के तीन वर्गों का संकेत किया है। सतकवि से अनेक अंगों का एकत्र विवेचन करनेवाले आचार्यों दास, देव आदि; कर्ता से रीति के आश्रय से वर्णन करनेवाले कवि मतिराम, भूषण आदि तथा अलंकृती से अलंकार विषय के ज्ञाता और लेखक जसंवत सिंह, दूलह आदि का अर्थ लिया जा सकता है।'

हिंदी के आलंकारिक आचार्य अंशत: ब्रजभाषा की अध्यक्षता और अंशत: दोहे जैसे छोटे छंद के चुनाव के कारण अलंकार के भेदों का अंतर स्पष्ट नहीं कर सके हैं। किन्तु दूलह ने इसके लिए उत्तम पद्धति अपनाई कि उन्होंने एक ही वाक्य में एक अलंकार के सभी भेदों के उदाहरण दे दिए। कहीं कहीं अध्येताओं के लिए कठिनाई वहाँ उपस्थित हो जाती है जहाँ उन्होंने एक ही छंद के आधे भाग में एक अलंकार का लक्षण तथा उदाहरण और आधे भाग में दूसरे का लक्षण तथा उदाहरण रख दिया है; किंतु कुल मिलाकर रीतिकालीन अलंकार ग्रंथों में सभी दृष्टियों से यह पुस्तक अद्वितीय है।

इनके फुटकल छंद यद्यपि १५-२० ही मिलते हैं तथापि भावों की गंभीरता, कल्पना की रमणीयता और भाषा की प्रोढ़ता के कारण कुछ लोग इनकी गणना देव, पद्माकर और मतिराम की श्रेणी में करते हैं। यद्यपि यह मत अतिरंजित ही है।